Sunday, January 4, 2009

दो वृद्धाओं ने पिज्जा बेचकर बनाया वृद्धाश्रम

आज के दैनिक जागरण अख़बार में प्रकाशित एक रिपोर्ट ''पिज्जा बेचकर बनाया वृद्धाश्रम'' पढ़कर उन महिलाओं की जीवटता को सलाम करने का मन करता है जो इस उम्र में भी कुछ अलग हटकर कर रही हैं. इस समाचार को गौर से पढें और फिर गुनें ---

बेंगलूर की दो वृद्धाओं ने समाजसेवा के उद्देश्य से वृद्धाश्रम बनाने का सपना पाला और फिर पिज्जा बेचकर इसे सच भी कर दिखाया। पिज्जा दादी के नाम से मशहूर 73 वर्षीय पद्मा श्रीनिवासन और 75 वर्षीय जयलक्ष्मी श्रीनिवासन के जहन में वर्ष 2003 में एक वृद्धाश्रम बनाने का विचार आया, तो उन्होंने पिज्जा बेचकर इसका निर्माण करने का फैसला किया।
पद्मा ने बताया कि मैं हमेशा समाज में अपना योगदान देना चाहती हूं। हमारे समाज में वृद्ध सर्वाधिक उपेक्षित है, इसलिए मैं उनके लिए कुछ करना चाहती हूं। पद्मा ने इसके लिए पहले बेंगलूरु से 30 किलोमीटर दूर विजयनगर गांव में एक भूखंड खरीदा। एक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान से वित्ता प्रबंधक के रूप में सेवानिवृत्ता पद्मा ने कहा कि भूखंड खरीदने के लिए मैंने अपने पास से 10 लाख रुपये खर्च किए।
वह आगे बताती है कि यह भूखंड 22,000 वर्ग फुट का है, लेकिन अब इस भूखंड पर वृद्धाश्रम का निर्माण करने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। इस कार्य में 78 लाख रुपये की लागत आने वाली है। इसी दौरान मेरी बेटी सारसा वासुदेवन व मेरी मित्र जयलक्ष्मी ने इस काम हेतु पैसे जुटाने के लिए पिज्जा बनाकर बेचने का सुझाव दिया। इसके साथ ही पिज्जा का मेरा कारोबार शुरू हो गया। पिज्जा हेवेन' नामक पिज्जा की दुकान पद्मा की बेटी के गरेज में शुरू हो गई। जयलक्ष्मी ने कहा कि पिज्जा की आपूर्ति बेंगलूरु के आईटी कंपनियों में शुरू की गई। जल्द ही हमारा पिज्जा यहां के युवा आईटी कर्मचारियों का पसंदीदा बन गया। पिज्जा हेवेन में तैयार होने वाले पिज्जा की ज्यादातर खपत एचपी, आईबीएम, सिम्फोनी, एसेंचर व सन् माइक्रोसिस्टम्स जैसी शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों में होती है।
जयलक्ष्मी मुस्कुराते हुए कहती है कि पिज्जा हेवेन की प्रगति भी हमें चकित करती है। पिज्जा हेवेन से प्रतिदिन लगभग 200 पिज्जा की बिक्री की जाती है। पिज्जा की कीमत 30 रुपये से 120 रुपये के बीच है। इस तरह, पिज्जा से होने वाली आय व शुभचिंतकों के आर्थिक सहयोग से वर्ष 2008 के जून महीने में 'विश्रांति' नामक वृद्धाश्रम बनकर तैयार हो गया। 'विश्रांति' में अभी 10 वृद्ध रहते है। इस संख्या में जल्द ही बढ़ोतरी होने वाली है।

17 comments:

Unknown said...

बेंगलूर की दो वृद्धाओं ने समाजसेवा के उद्देश्य से वृद्धाश्रम बनाने का सपना पाला और फिर पिज्जा बेचकर इसे सच भी कर दिखाया। ...असली नारी -सशक्तिकरण तो यही है.

Amit Kumar Yadav said...

हमारे समाज में वृद्ध सर्वाधिक उपेक्षित है, पर जिस तरह इन्होने एक नई राह दिखाई है वह आज की पीढी के लिए भी प्रेरणास्रोत है.

Anonymous said...

सामाजिक सरोकारों के प्रति भावनात्मक लगाव से प्रेरित यह रिपोर्ट पढ़कर बड़ा अच्छा लगा. दिल को कहीं गहरे तक तसल्ली मिली. ...एक सार्थक और प्रेरणास्पद पोस्ट हेतु साधुवाद.

ghughutibasuti said...

बहुत बढ़िया प्रयास ! जानकारी देने के लिए धन्यवाद।
घुघूती बासूती

शोभा said...

aisi hi hai bharat ki nari. usmain aseem shakti hai per na jaane kyun vo swayam ko kamjo samjhti hai. nari ki shakti aur uske aatma vishwas ko sallam.

PD said...

यह खबर दो मायनों में महत्वपूर्ण है.. पहला कि उम्र किसी भी कार्य में बाधक नहीं होता है और दूसरा यह कि अगर लगन हो तो कुछ भी कहीं से शुरू करके सफलता पायी जा सकती है..

विनीत कुमार said...

यही बात तो मैं कबसे कहता आ रहा हूं कि सिर्फ भावुक होकर स्त्रियों के लिए बांस की खप्पची से टोकरी बनानेवाले रोजगार के बारे में नहीं सोचना चाहिए, जरुरी है आर्थिक मजबूती न कि क्या बेचकर मजबूत हुआ जाए।

हरकीरत ' हीर' said...

Aakancha ji aapki ye news striyon ke liye kafi mahatvpuran hai ...is umar me itana sahas....? to hum kyon nahi....??

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पद्माजी और जयलक्ष्मी जी के प्रयास को प्रणाम। जरूरतमन्दों की सेवा के उद्देश्य से शुरू किया गया यह उद्यम निश्चित ही प्रशंसा के योग्य है।

KK Yadav said...

''पिज्जा बेचकर बनाया वृद्धाश्रम'' पढ़कर उन महिलाओं की जीवटता को सलाम करने का मन करता है जो इस उम्र में भी कुछ अलग हटकर कर रही हैं....Very nice !!

Ram Shiv Murti Yadav said...

वृद्धों के बिना समाज का अस्तित्व ही नहीं होगा..जरुरत है हम उन्हें उनका स्थान दें.

Anonymous said...

पढ़ कर, प्रेणना मिली।

महेंद्र मिश्र.... said...

प्रेरणास्पद पोस्ट. इसे कार्यो से प्रेरणा ग्रहण करना चाहिए . आभार

www.dakbabu.blogspot.com said...

नर हो न निराश करो मन को, जग में रहकर कुछ काम करो...यह उक्ति चरितार्थ हो गयी.

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World said...

बेहद प्रभावी प्रेरक-प्रसंग. इससे रूबरू करने के लिए आकांक्षा जी को साधुवाद.

Dr. Brajesh Swaroop said...

अनुपम प्रस्तुति.

Bhanwar Singh said...

Kafi prerana mili is post ko padhkar.Akanksha ji ko dhanyvad.

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