Monday, February 2, 2009

क्या आप कार्यक्रमों मे गुलदस्ते भेंट करती है हमेशा ?

दफ्तर , शैक्षणिक संस्था या कोई भी कार्यालय ,मंत्रालय , हवाई अड्डा ..कुछ भी हो मै अक्सर देखती हूँ कि किसी कार्यक्रम , गोष्ठी ,उत्सव मे मुख्य अतिथियों को गुलदस्ते भेंट करने के लिए हमेशा महिलाओं को आगे किया जाता है।वे ही हाथ जोड़े ऑडीटोरियम के द्वार पर खड़ी मिलेंगी आपके स्वागत के लिए और खुशी खुशी आपको आपके बैठने के स्थान तक ले जाएंगी।सिर्फ इतना नही जल-पान की व्यवस्था देखने के लिए भी आपको अक्सर स्त्रियाँ ही खड़ी मिलेंगी। क्या उन स्त्रियों ने कभी सोचा है कि वे प्रोफेशनल जगह पर भी घरेलू भूमिकाओं का निर्वाह कर रही हैं और यह उनके प्रोफेशन का हिस्सा कतई नही है। क्या उन्हें कभी आपत्ति हुई इस बात पर कि उन्हे अपने ही पुरुष सहकर्मियों को भोजन परोस कर देने या मुख्य अतिथियों को गुलदस्ते देने जैसे कामों को ऑफिस मे करने की अपेक्षा क्यो की जाती है?यह किस तरह की मानसिकता बना दी गयी है लड़कियों की कि वे इसमे महत्व दिए जाने का अर्थ लेती हैं और अथिति के साथ गुलदस्ता देते हुए एक फोटो मे आने के लिए खास तैयारी करती हैं।यह सरासर अन्याय है स्त्रियों के साथ और मूर्खता तो है ही।साथ ही एक कार्यक्रम के सम्पन्न होने मे सारे महत्वपूर्ण निर्णयों से वे बाहर रहती है, इसी मे सहूलियत मानती हैं और बिना सरदर्दी अपना काम करके खिसक लेना चाहती हैं।हैरानी नही होनी चाहिए अगर मै कहूँ कि वे जानती ही नही कि उनके द्वारा ऑफिस ले लोगो का गुलदस्ता भेंट करवाए जाने के निहितार्थ क्या हैं?अगर जानती होतीं तो निश्चित रूप से वे ऐसा कतई नही करना चाहतीं।

कुछ स्त्रियों को कहते सुना है मैने अक्सर कि "मेरे रहते मेरे पति किचन मे नही जाते , मैने तो सख्त मना किया हुआ है हाँ मेरे पीछे से कुछ भी करो मै हूँ तो रसोई मे खड़े होने की क्या ज़रूरत? या तो फिर मै चारपाई पर पड़ गयी हूँ तब तो समझ भी आता है कि पति सब कुछ कर रहा है" यह दर्प किसी स्त्री के मन मे कैसे पैदा हो जाता है? चलिए मान लिया अपने पति के लिए होता होगा पर इसी का एक्स्टेंशन दफ्तरों तक कैसे पहुँच जाता है? क्यों पहुँच जात है?क्या दुनिया का हर पुरुष उनकी सेवाओं पर अधिकार रखता है?किसी सुदर्शना से बुके दिलवाना या सोवेनेर दिलवाना किस तरह की मजबूरी है?और अतिथि के लिए यह एक खास तरह का यौनिक आनन्द ही है कि उसका सम्मान विपरीत सेक्स की कार्यकर्ता के द्वारा करवाया जा रहा है।इसलिए बुके लेते हुए एक विशेष प्रकार की मुस्कान मुख्य अतिथि पुरुष के मुख्मंडल पर फैल जाती है।बहुत सम्भव है कि यह भावना अपवाद हो लेकिन इससे क्या इससे पूरी तरह इनकार किया जा सकता है?रिसेप्शन पर बैठना मै इसी तरह का काम समझती हूँ।नौकरी पाना बहुत बार लड़कियों के है।लिए मजबूरी होती है लेकिन इसके पीछे उनके सुन्दर चेहरे का कैसा व्यावसायिक इस्तेमाल होता है यह समझना हम सभी के लिए ज़रूरी है।

कॉलेज मे लड़के -लड़कियों का समूह जब खाना खाने बैठता था तो मुझे हैरानी होती थी कि लड़के खाली हाथ झुलाते उस भोजन पर टूट पड़ते थे जो लड़कियाँ अपनी माँओं से बनवा बनवा कर बान्ध सहेज कर लाती थीं।वे लड़कियाँ जो फूली न समाती थी इस बात पर कि वे उन भूखे लड़कों के कितने काम आयीं वे मुझे हमेशा विस्मय मे डालती रहीं।पिछले दिनों एक भोज के दौरान एक सहकर्मी को कहते सुना - महिलाएँ पहले खड़ी हुईं तो मुझे लगा खाना डाल डाल कर देंगी। यह इतना मन्दे स्वर मे कहा गया कि केवल पास मे खड़ा व्यक्ति ही सुन पाए।मुझे महसूस हुआ कि तुरंत इसका सही जवाब दिया जाना ज़रूरी है चाहे वह बुरा ही क्यो न लग जाए। मेरे कहने पर कि "आप किस सदी मे है , घरेलू भूमिका का यहाँ एक्सटेंशन मत कीजिए" वे सफाई देने लगे।

मुझे महसूस हुआ कि इसी समय कोई महिला अगर आदर्श स्त्री की तरह कह देती कि -"अरे सर , ऐसी क्या बात है लाइए आपके लिए लगा देती हूँ थाली "और इसमें अपने को धन्य समझती तो निश्चित रूप से वे सज्जन मान बैठते कि हर स्त्री जो उनके आस पास है उन्हें अपनी पत्नी ही महसूस होती और उनकी यह अपेक्षा कि दफ्तर मे भी उनका ध्यान उसी तरह रखा जाए जैसे घर पर रखा जाता है बढती ही जाती।

मुझे सख्त ऐतराज़ है स्त्रियों को समारोहों , कार्यक्रमों , गोष्ठियों , दफ्तरों में गृहिणी के कार्य दिए जाने से,उनसे गुलदस्ते भेंट करवाए जाने से , स्कूलों मे लड़कियों से मेहमानो को चाय-नाश्ता सर्व करवाए जाने से, और स्त्रियों के इन कामों को खुशी खुशी किए जाने से।

मै अनुरोध करती हूँ अपनी उन साथिनों से जो दुनिया भर मे कहीं भी कभी भी अपनी घरेलू भूमिका और सेवाएँ प्रस्तुत करने को तैयार रहती हैं कि वे गुलदस्ते भेंट करना बन्द करें , वे इस काम मे खुशी महसूस करने की मूर्खता को समझें और जब तक रिफ्रेशमेंट या सजावट या स्वागत मे पुरुष सहकर्मियों की बराबर की भागीदारी न हो ऐसे काम करने से साफ इनकार कर दें।
मै विश्वास दिलाती हूँ कि कम से कम आपके कार्यक्षेत्र पर आपको कोई इसे अपनी ड्यूटी समझने को बाध्य नही कर सकता और न ही मजबूर कर सकता है।
"न" कह कर तो देखें!

15 comments:

विनीत कुमार said...

एक तो मुझे इस बात से गहरी आपत्ति है कि टीके लगाने और गुलदस्ते भेंट करने के लिए लड़कियों को फॉर ग्रांटेड मान लिया जाता है, उसमें भी काफी हद तक उसकी शक्ल-सूरत के आधार पर ऐसा किया जाता है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि जो दिखने में बहुत डैशिंग नहीं होती, वो इस काम के लिए फिट नहीं मानी जाती। ये विभाजन बहुत ही बेहूदा और गैर सामाजिक है.
दूसरा कि गुलदस्ते भेंट करने का कोई तुक ही नहीं बनता। कुछ जगहों पर इसकी जगह किताब देने का प्रचलन शुरु किया गया है, एक बार इस बारे में अशोक वाजपेयी को बोलते भी सुना है। शीला सिद्धांतकर पुरस्कार के दौरान अतिथियों को किताब लेते-देखे देखा है। अब हमसे पूछिए तो मेरा नजरिया कुछ अलग है।
मैं तो चाहूंगा कि किताब के बजाय रिवन बांधकर रेडियो देने का प्रचलन शुरु किया जाए। एक तो इसमें जिसको जो मन हो सुन सके, कंटेट के मामले में किताबों की तरह बंधा न रहे और दूसरा कि रेडियो का प्रचलन बढ़ना जरुरी है.

Dr. Amar Jyoti said...

जब तक महिलाएं स्वयम 'शोपीस' या'परिचारिका' की भूमिका निभाने में ख़ुद को गौरवान्वित अनुभव करती रहेंगी तब तक पुरुषों में से कुछ इसे रोकना चाहें तो भी नहीं रोक पायेंगे।

Surbhi said...

Very well said, Sujata ji! I find this practice extremely abhorrent.
I remember a time when my office had a few guests coming for a conference, and I was aksed to 'get ready nicely' and come. I wore the clothes I wear to office normally (which are 'nice'). There were three guests and our CEO - 4 people in all. Three girls waited to present the bouquet, and I was aksed to be the 4th. I refused, saying there should be at least one guy too.
My boss was very upset and said I was being 'arrogant' and 'disprespectful', and that it was an 'honour' being given to me. I replied that my honour comes from the work I do, not from presenting a bouquet to an official guest, which anyone can do.
Finally, they got another girl in my place, so it was still 4 girls and no boy.
Needless to say, I resigned from that office soon to move on to a place where so far I've been treated as an employee and not as a woman.
This also reminds me of the Beijing Olympics opening ceremony, when during a little girl's performance, she was asked to remain back-stage and another 'prettier' girl was put to the forefront for lip-syncing, just because the singer has crooked teeth (but immense talent).

Rachna Singh said...

sujata
if thse photos are not from your personal collection , please put a disclaimer that woman in the photos are no where involved with this post and thoughts expressed in the post . it wil protect them and also you from any web based problems , hope you will treat this comment in a broad outlook

good post

Sanjay Grover said...

श्लील क्या है? क्या एकतरफा विवाह श्लील है, जिसमें औरत चाहती किसी और को है, पर रहती कहीं और है? क्या लड़की देखने-दिखाने की रस्म अश्लील नहीं है? क्या टीवी, के क्विज कार्यक्रमों में कठपुतली बनकर हिलती स्कोरर लड़की की भूमिका अश्लील नहीं है? क्या विमान परिचारिका की भूमिका अश्लील नहीं है? क्या खेलों में परेड करते खिलाड़ी दलों के आगे झंडा उठाए चल रही लड़कियां अश्लील नहीं दिखती? क्या उन्हे दीपक जलाने व पुरस्कार बांटने में मदद करती कठपुतलियां अजीब नहीं दिखती? आखिर किस बौद्विक योग्यता के आधार पर इन सबका चयन होता है? इनकी भी तो सिर्फ चेहरा, शरीर, चाल-ढाल देखकर ही नियुक्ति की जाती है, बल्कि कई बार तो ये सब भी नहीं देखा जाता।
निश्चय ही ये सब क्रियाएं भी नारी को मोहरे या वस्तु में ही बदलने की क्रियाएं हैं।
(चूंकि उक्त पंक्तियां अपने एक पुराने लेख से ली हैं इसलिए थोड़ा उखड़ी-डखड़ी सी लगेंगी।)

Astrologer Sidharth said...

वाह वाह


एक सवाल


क्‍या हो जब फोटो खिंचवाते वक्‍त महिलाओं को सैक्‍स सिंबल की तरह यूज करने के बजाय '

जिसमें दम है वह आगे आए

की तर्ज पर खुद फोटो खिंचवाए और महिलाओं को पीछे ठेल दे।

:)

वाह अच्‍छा आर्टीकल है
यह सच्‍चा स्‍त्री विमर्श है :)

बहुत सुंदर


अरे इंदिरा नुई भी ऐसे ही करती है क्‍या
यानि अतिथि को गमला... सॉरी फूल देने का काम

आर. अनुराधा said...

सुजाताजी,
बीच वाले फोटो में शायद एक महिला को कोई सर्टिफिकेट दिया जा रहा है, जो लेख से संबंधित नहीं लगता। कृपया देखें।
रचना जी का सुझाव सही लगता है, कृपया गौर करें। किसी के लिए यह आपत्तिजनक भी हो सकता है। ऐसे में थोड़ी धुंधली-सी फोटो इस्तेमाल की जा सकती है।

निशा said...

आपकी बात बिलकुल सही है
मुझे एक बार फूल देना था मैंने मना कर दिया ता फिर किसी ने मुझसे नहीं बोला पर अधिकतर लड़कियां इसमें कुछ गलत नहीं मानती

विनय (Viney) said...

सार्थक लेख और टिप्पणियां! ऐसी बेवकूफियों को संस्कृति या परम्परा का हिस्सा मानना, लिंग आधारित भेदभाव को आगे बढ़ाने का काम ही करता है. और स्कूलों तथा कार्यस्थलों पर महिलायों के ही द्वारा स्वागत तो शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के लक्ष्य को सिरे से नकार, हास्यास्पद हो जाता है.

"कुछ स्त्रियों को कहते सुना है मैने अक्सर कि "मेरे रहते मेरे पति किचन मे नही जाते , मैने तो सख्त मना किया हुआ है हाँ मेरे पीछे से कुछ भी करो मै हूँ तो रसोई मे खड़े होने की क्या ज़रूरत?"

दफ़्तर से घर आ गए दोनों ही थक हार
पत्नी ढूंढें केतली और पति अखबार
-लक्ष्मी शंकर वाजपेयी

एक और बात- ये ठीक है की अतिथि देवता समान है पर समारोह के कीमती वक़्त को, अतिथियों का परिचय करवाने के बाद भी, "स्वागत" में जाया करना कहाँ तक ठीक है?

रचना और आर. अनुराधा के सुझाव पर कृपया जल्दी गौर करें!

dr amit jain said...

आज आप के ब्लॉग पर अनजाने मे ही आ गया , आप के लिखे लेख को पढ़ा , फिर दुबारा से पढ़ा , फ़िर उस पर दी गए टिपिनियो को भी पढ़ा , कुश एसा महसूस हुआ की आप सभी लोग नारी और नर मे सिर्फ़ भेद को ही देखते है , उन को एक दूसरे के पूरक के रूप मे नही देखते / आप सभी की बात मन भी ली जे तो प्रक्रति को नर और नारी नही बनने चाइये थे उसे इस जहा मे सिर्फ़ अर्ध नारीश्वर बनना cahayiye थे , उस से आप की ये कुंठा मिट जाती की कोई लड़की ही क्यो गुलदस्ता भेट करती है , अरे इस दुनिया के पढ़े लिखो जरा कुछ अपने दिल पर भी हाथ रख कर सोचा करो , क्या किसी मेहमान को गुलदस्ता भेट कर देने से किसी लड़की के शील , विचार , धर्म , मे कोई कमी आ जाती है , लगता है सुजाता जी आप को आज तक कोई मौका इस परकार का मिला ही नही की आप किसी समारोह मे किसी भी आगुन्तक तक का स्वागत कर सके / अरे आप को तो इस बात पर भी चिंता है की कोई स्त्री अपने प्यार को अपनी तारीफ मे इस्तमाल क्यो करती है / अगर आप जैसी ही सारी नारी हो जाए तो इस भारतीय समाज मे से प्यार व समर्पण की भावना न जाने किस कोने मे दुबक जायगी / लगता है आप मे वो नारी सुलभ कोमलता ही नही है , इस लिए आप को वो सारी लड़किया जो स्कूल या कॉलेज मे अपने किसी सह्पादी के साथ खाना खाती है भी नही सुहाई , क्या किसी स्त्री का किसी भी पुरूष के लिए किया गया कोई भी काम उसे उस की पत्नी बना देता है , बड़ा ही दुःख हुआ आप की इस परकार की सोच पर आप सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ इस परकार का लेखन करना कहती है जो की आप को औरो से अलग कर दे और उन बेचारी लड़कियो , स्त्रियो को उन के पति , दोस्त , सहयोगियो से ,उदासीन कर दे / लगता है आप किसी बड़ी ही दुःख दये स्थिति से रूबरू हुई है जो की आप को स्त्रियो का दुश मन बना रहा है

हें प्रभु यह तेरापंथ said...

सुजाताजी।
बहुत खुब। अब महिलाओ का टेशन दुर। सुजाताजी ने खोल दिया है मोर्चा। आपने सही लिखा है सुजाताजी औरतो को दफ्तर , शैक्षणिक संस्था या कोई भी कार्यालय ,मंत्रालय , हवाई अड्डा किसी कार्यक्रम , गोष्ठी ,उत्सव मे गुलदस्ते भेंट नही करने चाहिये।
पुरुष सहकर्मियों को भोजन परोस ना भी महिलाऔ को नही करना चाहीये।
"(और अथिति के साथ गुलदस्ता देते हुए एक फोटो मे आने के लिए खास तैयारी करती हैं।)"
सुजाताजी कैसी तेयारी ? यह बात दिमाग को नही लगी।
"(किसी सुदर्शना से बुके दिलवाना या सोवेनेर दिलवाना किस तरह की मजबूरी है?और अतिथि के लिए यह एक खास तरह का यौनिक आनन्द ही है कि उसका सम्मान विपरीत सेक्स की कार्यकर्ता के द्वारा करवाया जा रहा है।इसलिए बुके लेते हुए एक विशेष प्रकार की मुस्कान मुख्य अतिथि पुरुष के मुख्मंडल पर फैल जाती है।)"

आपकि पैनी नजर कि दाद देता हु जी। ऐसा नही होना चाहिये यह होता है जैसा कि आपने पाया तो स्त्रीके साथ नाईन्साफी है।

"(रिसेप्शन पर बैठना मै इसी तरह का काम समझती हूँ।नौकरी पाना बहुत बार लड़कियों के है।लिए मजबूरी होती है लेकिन इसके पीछे उनके सुन्दर चेहरे का कैसा व्यावसायिक इस्तेमाल होता है यह समझना हम सभी के लिए ज़रूरी है।)"

आपकि यह बात भी ठिक है- पर आपने ईस समस्या का हल नही बताया ?

"(लड़के खाली हाथ झुलाते उस भोजन पर टूट पड़ते थे जो लड़कियाँ अपनी माँओं से बनवा बनवा कर बान्ध सहेज कर लाती थीं।वे लड़कियाँ जो फूली न समाती थी इस बात पर कि वे उन भूखे लड़कों के कितने काम आयीं)"

लडकियो ने भुखे लडको को खाना खिलाकर बहुत ही गलत काम किया, लडकियो को ऐसा नही करना चाहीये था। उन्होने ऐसा कर अपने स्वाभिमान को निचे गिराने का प्रयास किया , आप सायद यही कहना चाह्ती है ना ? तो सही है।

"(सज्जन मान बैठते कि हर स्त्री जो उनके आस पास है उन्हें अपनी पत्नी ही महसूस होती)"

ऐसे महानुभव को तो चोखोर बाली कि अदालत मे लाकर कठोर सजा दि जाये जी।

(जब तक रिफ्रेशमेंट या सजावट या स्वागत मे पुरुष सहकर्मियों की बराबर की भागीदारी न हो ऐसे काम करने से साफ इनकार कर दें।)

मेडमजी ! आपकि पुरी पोस्ट मुझे नारी हीत की लगी। मै आपके विचारो से सहमत होता भी गया। मुझे लगा आप इमानदारी से महिलाओ कि भलाई मे लिख रही हो। चुकि मै भी पिछ्ले दस वर्षो महिलाओ के पक्ष मे अपनी बात सस्थाओ के माध्यम से रखता आ रहा हु। ईसलिये मै आपके स्त्री कल्याण विचारो मे सहभागी होता हु।

आपने अपनी पुरी पोस्ट मे मुझे सहमत बनाया किन्तु आखिर कि इस लाईन ने

"(जब तक रिफ्रेशमेंट या सजावट या स्वागत मे पुरुष सहकर्मियों की बराबर की भागीदारी न हो ऐसे काम करने से साफ इनकार कर दें।)"
आपकी ईमानदारी पर सवाल खडा कर दिया है। क्या पुरुष रिफ्रेशमेंट या सजावट या स्वागत मे भाग लेने पर महिलाओ पर से आपकी शन्का, या कही बाते दुरुस्त हो जायेगी जैसे
"यौनिक आनन्द'
"फोटो मे आने के लिए खास तैयारी करती हैं"
"सुदर्शना"
"एक विशेष प्रकार की मुस्कान मुख्य अतिथि पुरुष के मुख्मंडल पर फैल जाती है"
" उनके सुन्दर चेहरे का कैसा व्यावसायिक इस्तेमाल होता है "
"भूखे लड़कों के कितने काम आयीं"

आपने अपनी मन्शा को जाहिर कर दिया, कि आपको तकलिफ क्या है ? आपने ऐसी बाते महिलाओ के बारे मे लिख कर महिलाओ के चरित्र पर सवालिया निसान लगाने कि कोशिस कि जिसका मे बिरोध करता हु। मेरे परिवार मे तीन महिलाये है जो नोकरीओ मे है, कभी ना कभी लोगो का अभिवादन किया है- क्योकि उसमे एक ऐयरलायस मे भी है। आपको महिलाओ के हित कि नही पडी है।

पुरुष सहकर्मियों की बराबर की भागीदारी से क्या आप द्वारा स्त्रियो पर लगाये शका भरे आरोप ठिक ठाक हो जायेगे ? आपकी हर पोस्ट मे पुरुषो के विरोध मे लिखा जा रहा है क्या यह "यौनिक आनन्द' या कुण्ठा नही ? आप अपनी व्यक्तिगत घटनाओ को एवम मानसिकताको समाज के कुछ लोगो को परोसने का काम कर रही है यह आपके अनुभव है। हमारी मॉ बहिने सभी सुरक्षित है हिन्दुस्थान मे।

सुधरे व्यक्ती समाज व्यक्ती से राष्ट्र स्वय सुधरेगा।
हे प्र्भु! का यह सिहनाद सारे जग मे पसरेगा॥
जय हिन्द॥

विनय (Viney) said...

@अमित जैन (जोक्पीडिया )
आप यहाँ टिपण्णी करने और फ़िर उसे "भड़ास" पर छाप पुरुषता के ठेकेदार होने की जल्दी में इस विमर्श को ढंग से समझ नहीं पाये.

@HEY PRABHU YEH TERA PATH
आप काफ़ी समीप आ गये थे-
"पुरुष सहकर्मियों की बराबर की भागीदारी से क्या आप द्वारा स्त्रियो पर लगाये शका भरे आरोप ठिक ठाक हो जायेगे ?"

यदि बराबर की भागीदारी होती रही तो शायद स्वागतों का लैंगिक भेद खत्म हो ही जाएगा.

dr amit jain said...

जनाब विनय साहब आप भी कमाल है
आप की रूचि पढ़ी शायद जो आप ने अपने प्रोफाइल पर लिख रखी है / सिर्फ़ इस को पढने के बाद सब आप का मानसिक स्तर समझ सकते है /
रुचि
उंगली करना सब के फटे में टांग डालना खाना दूसरों का भी खा जाना सोना सोना पूरा होने पर भी बिस्तर पर पड़े रहना। कुछ अब्नोर्मल रुचियाँ-नई-नई रुचियाँ विकसित करना दूसरों की रुचियों के बारे में जानना पढ़ना (लगभग कुछ भी) घूमना लोगों से मिलना फोटू-फिलम खींचना हँसना हँसाना और जब खुजली सही न जाए तो लिख लेना।

आप जैसे बेवकूफ शायद इस बात को पचा ही नही पाए की इस चर्चा को अगर किसी और ब्लॉग पर भी उठा दिया जाए / आप अपने आप को इस भारतीय समाज से अलग ही दिखाना चाहते है न / या किसी भी बसे हुए घर को उजड़ने का मजा लेना चाहते है/आप के अनुरूप हर औरत को पारस्परिक सहयोग न कर के अपने सहयोगी के खिलाफ बिगुल बजा देना है

कुश said...

मैं तो boys स्कूल में था .. वहा गुलदस्ता भी हम देते थे और स्वागत गान भी हम गाते थे..

Viney said...

इस विचार-विमर्श से मुझे काफ़ी कुछ समझने का मौका मिला है. इसे यहाँ और चलाया जा सकता था मगर... खैर!

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