Wednesday, February 4, 2009

जब पुरूष तपस्या भंग करते हैं ............

जब पुरूष तपस्या भंग करते हैं ............
नारी को पुरूष की तपस्या भंग करने के लिए तो सदियों से दोष दिया जाता रहा है लेकिन पुरूष यदि नारी जीवन की एकांत तपस्या को भंग कर दे तो भी उस पर उंगली उठा उसे दोषी ठहराने में समाज के अधिकतर ठेकेदारों को संकोच होता है । चाँद ने फिज़ा से शादी की तो भी पहली पत्नी को मोहरा बनाकर औरत को ही दोष दिया गया कि फिज़ा ने पहली पत्नी और बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर दी । अब चँद्रमोहन गायब हो गया, फिज़ा को छोड़ गया तो भी उसी की गलती, उसने दूसरों का बुरा किया सो उसके साथ बुरा हो गया । यानी हर हाल में गलती औरत की ही है ।पूरे दृश्य में मानो पुरूष कोई जीवंत इंसान ना हो मात्र एक कठपुतली हो जिसे जैसे चाहे चला लिया जाए । फि़जा़ ने अपने साथ हुए अन्याय या धोखे क विरूद्ध आवाज़ उठाई, क्योंकि उसकी पृष्ठभूमि सबल थी, बहुत लम्बे समय तक उसने आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की ताकत को समझा था । लेकिन अभी समाज में बहुत सी ललनाएं हैं जो मानसिक, आर्थिक और सामाजिक आजा़दी के मायने तक नहीं जानती और जिनके साथ धोखा हो रहा है । स्त्री के जानते बूझते भी पुरूष या उसका गुलाम समाज या परिवार नारी को मजबूर करने वाले हालात पैदा कर ही देता है । अधिकतर सामाजिक व्यवस्थाएं और उपव्यवस्थाएं पुरूषों के एकाधिकार में हैं । उनका ढाँचा लोकतांत्रिक नहीं है । स्त्रियों की मौजूदगी या तो शोपीस की तरह रहती है या फिर है ही नहीं । हम सब औरतों को पूरे मन से समाज में नीति निर्धारण की जिम्मेदारी के लिए तत्पर होना ही होगा अन्यथा यह शोषण नहीं रूकेगा ।पढी लिखी औरतों की किसी भी भावना को अपने स्वार्थ के लिए शोषित करने वालों की समाज और कई बार तो परिवार में भी कमी नहीं होती, इसलिए सावधान तो हमीं को रहना होगा हर तरीके के शोषण से बचने के लिए । हम लोग जीवन के जिस भी महान (या समाज परिवार की नजर से तुच्छ) क्षेत्र में तपस्या में रत हैं, लगी रहें, और एक एक ईंट जोडकर नए समाज को खड़ा करती रहें । जीवन के नए क्षितिजों को एक्सप्लोर करने की हमारी तपस्या किसी की स्वार्थ पूर्ति में होम न हो जाए ।

11 comments:

रंजना said...

आज जो नारी संगठन अनुराधा/फिजा के लिए आवाज बुलंद कर रही हैं,यदि वे चन्द्रमोहन की पहली पत्नी के लिए खुलकर झंडे लेकर निकलती तो बड़ा ही शोभनीय लगता......
आपलोगों को नही लगता कि इन दोनो स्त्री पुरुषों(चाँद फिजा) ने मिलकर एक स्त्री और उसके बच्चों के साथ अन्याय किया था ???
क्या आपको आभास नही होता कि इस पूरे मामले में, कानून के दावं पेंचों में माहिर इस महिला(फिजा) की ही पूरी प्लानिंग थी कि पहले धर्म परिवर्तन करो और फ़िर शादी.आज वह जिस तरह से सारे मैसेज और साक्ष्य मिडिया के सामने परोस रही है,यह उसके शातिर दिमाग का फुल प्रूफ़ प्लान का ही हिस्सा है, उसने पहले से ही सोच रखा था कि कहीं अगर चन्द्रमोहन ने पलटी मारी तो उसे कैसे सबक सिखायेगी.

नारी के हक़ की बात उठाना बहुत ही अच्छी बात है,पर सही ग़लत का भान रखना भी हमारा ही कर्तब्य है.....
आज अगर सारे विवाहित पुरूष ऐसे ही पत्नी बच्चों को छोड़ कर धर्म बदल दूसरी तीसरी शादियाँ करने लगेंगे तो क्या यह समाज और परिवार के लिए उचित होगा ??क्या आप अपने घर परिवार में ऐसा होता देखना पसंद करेंगी?????

अनिल कान्त said...

मुझे इस बात का बहुत अफ़सोस होता है कि जितना मीडिया , पत्रकार और लोग चाँद और फिजा की परवाह कर रहे हैं ...उन्होंने कभी उनकी पहली पत्नी और उनके बच्चो पर इन सब के दौरान जो गुजरी और जो मानसिक, सामजिक , आर्थिक पीडाएं भुगतनी पड़ रही हैं और न जाने कब तक भुगती पड़ेंगी ....पर बिल्कुल चर्चा नही की ...ना ही महिला संगठन को उतनी चिंता उनकी रही ...बड़ा अशोभनीय है ये सब

Unknown said...

शायद इसी बहाने नारी संगठन "धर्म परिवर्तन" की गहराती समस्या से वाकिफ़ हो सकें… :) :)

Anonymous said...

जब तक पत्निया इस तरह पर स्त्री गमन करके आये पति के साथ सुलह करके { किसी भी कारण से } दुबारा उनको पति मान कर उनके साथ दैहिक सम्बन्ध बनाती रहेगी तब तक इस समस्या का कोई समाधान नहीं हैं . बात केवल चंद्र मोहन , अनुराधा बाली और सीमा विश्नोई की नहीं हैं . बात हैं समाज मे अनेतिकता बढ़ाने के लिये कौन जिम्मेदार हैं . क्यूँ पत्नियां ऐसे मे चुप रहती हैं . क्यों नहीं वो अपने पति से सम्बन्ध समाप्त करती हैं . जो चन्द्र मोहन और फिजा ने किया वो जीतना ग़लत हैं उससे भी ज्यादा ग़लत हैं सीमा का अपने पति को फिर से पति मानना . अगर समा वो करती जो चन्द्र मोहन ने किया तो सब फिर सीमा को ही दोष देते .
क्यों नहीं पत्नियां ऐसे पति को जेल कर वाती हैं जो बहु विवाह करते हैं ??

निर्मला कपिला said...

मै रंजना जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ1यहीआवाज अगर तब चाँद की पत्नी के लिये उठाई जाती जब फिज़ा ने चाँद से शादी की थी तो सही होता पहले आप किसी का बुरा करो तब ठीक है जब कोई आपके साथ बुरा करे तो गलत है फिज़ा को तभी शोर मचाना चाहिये था जब चांद उसे तंग कर रहा था1तब सभी उसके साथ होते

हरभूषण said...

रंजना जी से पूरी तरह से सहमत हूं साथ ही बहुविवाह के संदर्भ में करी बेनामी टिप्पणी भी सही है यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है।

अभिषेक मिश्र said...

Apni tapasya ki sarthakta vaastav mein bacha kar rakhne ki jarurat hai.

ab inconvenienti said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

हास्यास्पद लेख| आजतक पुरूष ही बाहर निकल काम करते आए हैं, तो जाहिर है तपस्या भंग उन्ही की होगी|"Behind every successful man there is a woman" सुनी है आपने? नारी काम क्यूँ नहीं करती, इसका जवाब भी आप ही के लेख में है| फिजा के दुःख पर आप जाग गयीं लेकिन पहली बीवी के दुःख पर चादर तान ली| सिर्फ़ इसलिए की फिजा धर्म परिवर्तन कर समाज को चुनौती दे सकती है, मीडिया में बिंदास बोल सकती है, नींद की २५ गोलियाँ गलती से (??) खा सकने जैसे प्रपंच कर सकती है| पहली बीवी ये सब करना नहीं चाहती/जानती, इसीलिए आपके लेख में उसका जिक्र नहीं है|

यहाँ एक और बात सिध्ध होती है, जिसके अन्दर कूबत होती है वो आगे बढ़ जाता/जाती है, नारी पुरूष की बात करना बेमानी है| बात सबल निर्बल की है, नारी पुरूष की नहीं|

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पूरी बात ही गलत सन्दर्भ में उठाई गयी है। फिजा ने एक विवाहित व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करके उसकी ऊँची हैसियत और राजनैतिक रसूख को मटियामेट तो किया ही, अपनी जिन्दगी भी तबाह कर ली। लेकिन इन सबसे अधिक दुःखी जीवन उस औरत का हो गया जो इस अवैध सम्बन्ध को वैध बनाने के खेल से बिल्कुल अलग और अनजान थी। चाँद और फिजा की यह दुर्गति तो पूरे होशोहवाश में किए गये उनके कुकृत्य के कारण हुई है लेकिन पहली पत्नी को किस बात की सजा मिली यह प्रश्न अनुत्तरित है।

इस कथा में चोखेर बाली द्वारा यहाँ जो बात रखी गयी है उसे पढ़कर तकलीफ हुई और हैरत भी।

सुजाता said...

उनमुक्ति ने लिखा-

"चाँद ने फिज़ा से शादी की तो भी पहली पत्नी को मोहरा बनाकर औरत को ही दोष दिया गया कि फिज़ा ने पहली पत्नी और बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर दी । अब चँद्रमोहन गायब हो गया, फिज़ा को छोड़ गया तो भी उसी की गलती, उसने दूसरों का बुरा किया सो उसके साथ बुरा हो गया । यानी हर हाल में गलती औरत की ही है"

यह बेहद अफसोसनाक है कि सभी टिप्पणी कारों ने शुरुआत की इन पंक्तियो को महत्वहीन जान कर पोस्ट का अर्थ ही बदल दिया।फिज़ा या चान्द की पहली पत्नी , दोनो ही औरतें दोषी हैं और बेचारा चन्द पूरे परिदृष्य़ से ही गायब कर दिया गया है।
फिज़ा की गलती की सज़ा उसने भुगती । चान्द ने क्या भुगता ? उसे पिता की प्रॉपर्टी भी अब वापस मिलेगी और पत्नी बच्चा भी।हैरानी नही होनी चाहिए कि अगर यह सब प्रॉपर्टी का खेल हो। क्या यह सब चान्द का अपने परिवार को ब्लैकमेल करने का स्टंट नही था ? उसे शक के दायरे से बाहर करके केवल फिज़ा या पहली पत्नी को दोषी मानना हमारी बहुत बड़ी गलती होगी !!

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