Thursday, February 5, 2009

गहराई से सोचिए तो सही

चोखेरबाली की प्रथम वर्षगाँठ पर ढेरों बधाइयां ।
धन्यवाद सुजाता जी, लेख के वास्तविक उद्देश्य को उजागर करने के लिए ।फिजा का नाम तो मात्र उदाहरण के तौर पर आ गया, इस लेखिका कि उसके प्रति कोई अतिरिक्त सहानुभूति नहीं । बात सीमा की हो या फिजा की समाज दोष नारी को ही देना जानता है । पुरूष दो स्त्रियों की लड़ाई में साफ साफ बच जाता है । एक स्त्री के प्रति सहानुभूति दिखाते है दूसरी को पूरी तरह दोषी करार, कर पुरूष वाले पक्ष को भूल ही जाते हैं । सीमा की तपस्या तो अधिक कठिन व गंभीर है,उसके सामने बहुत से जटिल प्रश्न इस समय हैं । समस्या तो यह है कि समाज के ठेकेदार या मीडिया तो यह मानने को ज्यादातर तैयार ही नहीं होता कि नारी भी जीवन का कोई अर्थपूर्ण कार्य करने में व्यस्त हो सकती है । बहुत से निकम्मे पुरूष भी समाज में हमें आसपास दिखते हैं, बहुत सी स्त्रियां भी ।"जिसके अन्दर कूबत होती है वो आगे बढ़ जाता/जाती है, नारी पुरूष की बात करना बेमानी है बात सबल निर्बल की है, नारी पुरूष की नहीं" एक अबोध विचारहीन बालक या समाज को यह बात कहकर बहलाना बहुत आसान है। समाज विज्ञान संबंधी बहुत सी रपटें व प्रामाणिक लेख अखबारों में नित छपते ही रहते हैं । बात यहां यह है कि सबल निर्बल के भी कई पक्ष हैं, जो व्यक्ति पर ही निर्भर न हो कर उसके सामाजिक आर्थिक पारिवारिक माहौल पर टिके रहते है । ये सभी ज्यादातर एक पुरूष को सबल बनाते हैं तथा नारी को कमजोर । अपवादों को लेकर सामाजिक स्थिति की बात नहीं की जा सकती । मीडिया या फिर समाज का एक बड़ा तबका अपनी जल्दबाजी या व्यक्तिगत सीमा या मजबूरियों के चलते हालात के केवल स्थूल पक्षों को ही देख पाता है । जरूरत है, गहराई के साथ, संयम के साथ सूक्ष्म व तार्किक तरीके से समझ पैदा कर, हालात सुधारने की ।

6 comments:

Vinay said...

पहली बधाई मेरी स्वीकार करें, चोखेरबाली की सफलता की शुभकामनाएँ

संगीता पुरी said...

हमारी ओर से भी बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं !!!!

राजकिशोर said...

बहुत-बहुत बधाइयाँ और भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। हर कदम पर साथ रहने की आशा के साथ,
रा.

Anonymous said...

वाह नारी की बात आपने शुरू की है ...फिर बात आ गई स्त्री औऱ पुरूष पर । दो स्त्रियों की लड़ाई में पुरूष को दोषी बना दिया । औऱ फिर समझा भी दिया कि स्त्री औऱ पुरूष में अंतर क्या होता है । फिजा औऱ चांद की कहानी पर मैने भी लिखा है जरा एक बार पढ़ना । लेकिन एकतरफ सोचने से काम नही चलने वाला । शुक्रिया

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जोरदार एक वर्ष पूरा करने की हार्दिक बधाई।

निश्चित रूप से इस मन्च से किए जा रहे प्रयास एक जमे हुए पानी के तालाब पर फैली मोटी काई की परत को काटकर उसमें हलचल मचाने और जल में निर्मल करने वाले प्रवाह को गति देने की दिशा में सफल हुए हैं।

जब यह प्रवाह अनवरत सक्रिय रहते हुए सही दिशा और गति पकड़ लेगा तो इससे एक निर्मल निर्झर फूट पड़ेगा।

आप सभी इसी दिशा में निरन्तर अग्रसर हों इसकी शुभकामनाएं।

Vikas said...

meri bhi badhai le lein. kafi kuch achchha padne ko mil jata hai apke yahan.

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