Friday, February 6, 2009

नारी

सच कहते हो, मै नारी हूँ
फिर भी किसी से ना हारी हूँ
अपने भीतर की ज्योति से
अंदर बाहर उजियारी हूँ ।
मुझको है विश्वास स्वयंपर
मै भी हूँ काफी ताकतवर
ये ताकत मेरे मनकी है
देह भले हो थोडी कमतर ।
मुझमें है शक्ती चरित्र की
मेरी आँखों में ज्वाला है ।
खल दुष्टों के लिये खड्ग है
वरना, अम्रृत का प्याला है ।
मै ही वो स्वयं सिध्दा हूँ
मेरी मुठ्ठी में है जहान
अपनी बुध्दी के बल से ही
छू के रहूँगी आसमान ।

7 comments:

संगीता पुरी said...

सही है....नारी के आत्‍मविश्‍वास को बढाने वाली कविता.....बहुत सुंदर।

Anonymous said...

श्रद्धापूर्ण नमन स्वीकार करें.

mehek said...

nari ka har pehlu dikhati sundar kavita.

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति नारियो के सन्दर्भ में .

अजित वडनेरकर said...

अपनी बुद्धि के बल से ही
छू के रहूँगी आसमान।

आमीन...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत सुँदर कविता है आशा जी

Vikas said...

badi achchhi kavita hai..kavi logo ke sath yahee to plus point hai ki ander ke sare akrosh, sare apman, sare aaveg ko kavita ke sahare bahar nikal lete hain.

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