Thursday, February 12, 2009

"गुलाबी चड्डी" अभियान का मूल तत्व

मेरे लिए "गुलाबी चड्डी" अभियान का जो मूल तत्व है, और उसमे छिपी उम्मीद है की स्त्री एक सम्पूर्ण मनुष्य है और अपने फैसले ख़ुद ले सकती है, वों महत्त्वपूर्ण है, और एक ऐसे समय मे जब अराज़क तत्व संस्कृति के नाम पर, भारतीयता के नाम पर आतंक कायम किए हुए है और वृहतर समाज और क़ानून दोनों हाथ -पर -हाथ रखकर बैठे है। आम स्त्रियों के मन मे और तमाम ऐसे लोगो के मन मे जिन्हें स्वतंत्रता प्रिय है, एक जो डर बैठ गया है, की इस महान देश मे औरतों को सबक सिखाने का जिम्मा कोई भी ऐरा-गेरा ले सकता है। उस स्थिति मे विरोध का जो भी तरीका हो वों चुप रहने से बेहतर है। और विरोध के तरीके भी कोई सन्दर्भ रहित नही होते। एक अति दूसरी अति को जन्म देगी ये निश्चित है। पर विरोध के तरीके को ग़लत बताने वाले अपने घरो मे दुबक कर क्यो बैठ जाते है, जब राम सेना के विरोध की बारी आती है? क्यों नही इससे ज़्यादा रचनात्मक तरीका ढूंढते है, अपने लोकतंत्र को बचाने का ? एक ऐसा समाज बनाने का जहा हर व्यक्ति की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी हो ?

विरोध का कारगर तरीका क्या हो? ये निश्चित रूप से सोचने का मुद्दा है, और सिर्फ़ इसी सन्दर्भ मे नही, देश की ढेर सारी समस्याओ के निदान के लिए भी, आम नागरिको की विरोध मे क्या भुमिका हो इस पर भी सोचने की ज़रूरत है . स्त्री की समस्या भी बहुत सी समस्याओं से जुडी है।

ग़लत क्या है? सही क्या है? और जो स्त्री के लिए आज "पब" जाना ग़लत हो गया है, तो क्या पिछले हजारो सालो की भारतीय संस्कृति मे पुरुषो ने सोमरस-से -मयखाने का जो सफर तय किया है वों क्यों निंदनीय नही है? दिरा पान दुनिया की सभी संस्कृतियों का हिस्सा रहा है, और भारत का इतिहास इससे अलग नही है, और औरतों का मदिरा-पान अगर हिंदू धर्म के विरोध मे ही है, तो कोई बताये की हिन्दुस्तान के कई मंदिरों मे, देवी की प्रतिमा के पूजन मे "शराब " का क्या काम है? शिव का भांग के साथ क्या सम्बन्ध है? कितनी लज्ज़त से भारतीय साहित्य, "मधुशाला", और मयखानों की इबादत से भरा पडा है। या वों भी कोई अँगरेज़ अनुवाद करके छोड़ गया है?

मुझे लगता है की संस्कृति पर , भारतीय इतिहास पर, और अपने बदलते परिवेश को समझने के लिए, और भविष्य क्या लेकर आ रहा है ? शांत होकर अलग-अलग दिशा से वैचारिक संवाद की गुंजायश बना कर रखनी होगी। और सबसे ज़रूरी, हर दूसरे मनुष्य के लिए वही सम्मान बनाना होगा जो हम अपने लिए आपेक्षा करते है.
हिन्दी ब्लॉगजगत, और भारतीय समाज बार-बार इस सीमा को लाँघ जाता है, और ये निशानी है असभ्य समाज की, और सामाजिक -सांस्कृतिक उथलेपन की भी। कभी कभी मुझे लगता है हिंदू धर्म के ठेकेदार जब तक इस धर्म की आत्मा और सहिसुण्ता का नाश नही कर देंगे, और इसे इस्लाम की तरह आक्रमक (मेरा आशय इस्लाम की प्रतिक्रियावादी छवी से है, और उस प्रारूप से भी जो कट्टर-पंथी है, और एक विद्रूप छवी से भी जो "राम सेवको, और सैनिको के दिल मे है) नही बना देंगे उन्हें चैन नही आयेगा। जब तक हमारे हर देवता के नाम पर खूनी दरिन्दे संगठन नही खड़े कर देंगे, और जब तक हमें राम के नाम से, हनुमान के नाम से, शिव के नाम से, और हमारे इतिहास और धर्म मे जो भी गौरवशाली है, उससे नफरत नही हो जायेगी, तब तक ये धर्म की रक्षा का बीडा उठा कर रखेगे।
इसीलिये ये सिर्फ़ औरतों की ही जिम्मेदारी नही है, हर उस भारतीय की जिम्मेदारी है, की वों यूं ही अपनी आजादी का , सांस्कृतिक गौरव का और धार्मिक श्रदा का अपहरण कुछ लगवे-भगवो को न करने दे।
पब जाना या न जाना किसीका व्यक्तिगत चुनाव हो सकता है, और मेरे अपने जीवन जीने के चुनाव से अलग या इसके समान हो सकता है, पर कुछ असामाजिक तत्व, इस बात का ठेका ले ले की वों सबको सबक सिखायेंगे, और स्त्री के लिए मर्यादा निश्चित करेंगे, ये एक बड़ा सामाजिक सवाल है। ये सिर्फ़ पब जाने तक ही सीमित भी नही रहेगा अगर आमजन प्रतिरोध न खडा करे, अगर कानून सख्ताई से न निपटे ।


घुघूती जी का एक अच्छा लेख न्ही मसलों पर उनके ब्लॉग पर हैशायद बहुत सी बातें जो हम तैश मे नही कह पाते, वों अपनी संवेदना और समझदारी से ग्राह्य बना देती है

31 comments:

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

तरीका कुछ अलग है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसी सेनाओं को मुंहतोड़ जवाब देने की जरूरत है।

Sanjay Grover said...

Agar hum is waqt bhi kharhe nahiN huye to mujhe nahiN lagta ki fir koi aur din aane waala hai.

सुजाता said...

देवी की प्रतिमा के पूजन मे "शराब " का क्या काम है? शिव का भांग के साथ क्या सम्बन्ध है? कितनी लज्ज़त से भारतीय साहित्य, "मधुशाला", और मयखानों की इबादत से भरा पडा है। या वों भी कोई अँगरेज़ अनुवाद करके छोड़ गया है?
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सही कहा।
कहीं ऐसा तो नही कि इन्द्र के साथ अप्सराएँ सुरापान करती कराती दिखाना शायद पश्चिम की देन है।फूहड़ तर्कों से कब तक् काम बनेगा ?अब भी बड़े हो जाना चाहिए हमें,तो देर नही होगी।

दिनेशराय द्विवेदी said...

भारतीय संस्कृति में क्या नहीं है?
भारतीय संस्कृति की पुनर्व्याख्या की जरूरत है। किसी को तो गार्गी बनना ही होगा।

Anonymous said...

मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ की हिन्दुत्व को तालिबानी जामा पहनाने वालों की कड़ी निंदा होनी चाहिए। हिन्दुत्व एक सहनशील व सभी धर्मों का सम्मान करने वाला धर्म है इसके नाम पर एक लोकतांत्रिक देश में क़ानून हाथ में लेना निंदनीय व दंडनीय अपराध है। पर साथ में मैं ये भी चाहूंगी की देश का युवा वर्ग इस विरोध को पब जाने का या नैतिकता को भूल जाने का न्यौता समझे। स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, पर अधिकार के साथ जिम्मेदारियों भी जुड़ी होती हैं,
विधानसभा में हाथापाई कर रहे व राष्ट्र संपत्ति का नुक्सान कर रहे विधायक क़ानून की गिरफ्त में नही आते तो क्या उनका कृत्य नैतिक तौर पर सही माना जाए और इसे उनकी स्वतन्त्रता मानी जाए?
अगर आज उद्योग जगत मंदी के दौर से गुजर रहा है तो इसकी नींव भी उसी ने रखी है, अनैतिक कार्य करके लाभ कमाना। ध्यान रहे, लोभ करना गैरकानूनी नही है, पर अनैतिक है।
स्वतन्त्रता और नैतिकता का संतुलन बिगड़ने पर कलयुग की जड़ें मजबूत होती हैं। इनपर नैतिकता का मट्ठा डालिए और नाश कीजिये इसका।

सुशांत सिंघल said...

श्री राम सेना के तथाकथित हिंदू संस्कृतिवादियों ने जो कुछ किया वह सिर्फ संस्कृति के बारे में उनकी अज्ञानता का ही परिचय था । यह बिलकुल सही है की हिंदू संस्कृति के मौलिक स्वरूप में स्त्री पर घर की चाहरदीवारी में छुप कर बैठे रहने की विवशता कभी भी नहीं लादी गई। अपने लिये योग्य जीवनसाथी के चयन की स्वतंत्रता भी पुरुष से अधिक स्त्री को दी जानी चाहिये, ये आदर्श स्वीकार किया गया है। व्यवहार में स्वयंवर की ऐसी परंपराओं का ज्यादा जिक्र नहीं मिलता होगा पर स्वयंवर की प्रथा को सम्मान तो दिया ही गया है।

सच तो ये है कि गुलामी के बहुत लंबे कालखण्ड में, जबकि हिंदू युवतियों को विदेशी आक्रान्ताओं / शासकों की सेनायें जबरन उठा कर ले जाया करती थीं उस समय यह आपद्‌ धर्म बन गया था कि युवा होने से पहले ही लड़की का विवाह कर दो, और जब तक विवाह न हो, तब तक उसे घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगाओ ताकि वह वासना के भूखे सैनिकों की निगाहों से बची रह सके । परंतु इस आपद्‌ धर्म को ही हिंदू संस्कृति का अनिवार्य अंग समझ लेना हास्यास्पद है, अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन मात्र है। अक्सर घर के बड़े बूढ़े अपने बच्चों को कुछ भी ऐसा करते देख कर नाराज़ हो जाया करते हैं, जो उनके जमाने में नहीं हुआ करता था । उनका तकिया - कलाम बन जाता है - "अजी, हमारे जमाने में तो ऐसा ना कभी देखा न सुना ! आज कल के लड़के - लड़कियां तो बस ! तौबा तौबा!!"

परंतु परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ साथ आपद्‌ धर्म स्वयमेव बदल जाना चाहिये ! इसके लिये यदि किसी समाज सुधारक की प्रतीक्षा करेंगे तो क्या हम सही अर्थों में स्वयं को शिक्षित कहला सकेंगे?

रूढ़ियों को टूटना ही होता है, टूटना ही चाहिये ! हर अच्छी चीज़ को स्वीकार करना, चाहे वह नई हो या पुरानी - आधुनिकता की निशानी है । बिना सोचे विचारे हर पुरानी प्रथा को जस का तस स्वीकार करते चले जाना रूढ़िवादिता है, कूप-मंढूकता है। हर पुरानी चीज़ को मात्र इस लिये अस्वीकर कर देना, तिरस्कार कर देना क्योंकि वह पुरानी है - यह भी एक नये प्रकार का अंधविश्वास है। हम आधुनिक तब ही माने जायेंगे जब हम हर चीज़ को - चाहे नई हो या पुरानी, तर्कों की, विज्ञान की कसौटी पर कस कर देखें, भली प्रकार जांचें । अच्छी और उपयोगी लगे तो स्वीकार कर लें, अपना लें। यदि बेकार, असामयिक व कालातीत हो चुकी हो तो रद्दी की टोकरी में सरका दें । इसमे झगड़े की गुंजाइश कहां है, मैं समझ पाने में असमर्थ हूं ।

सही तो ये होता कि तथाकथित श्री राम सेना के उन सिरफिरों को पुलिस के हवाले कर दिया जाता और उनको अनावश्यक पब्लिसिटी दी ही न जाती। बहुत सारी हरकतों को करने का मूल उद्देश्य अखबार और टी वी पर अपने आप को देखना / मात्र अपनी टी. आर. पी. बढ़ाना ही होता है। शायद श्रीराम सेना भी पब्लिसिटी के भूखे लोगों का कोई ग्रुप है। दूसरी ओर मीडिया ने भी इन मूर्खों को पब्लिसिटी देकर अपनी टी. आर. पी. बढ़ाने की ही हरकत की है।

सुशान्त सिंहल

Anonymous said...

जवाब देने की जरूरत है।

निर्मला कपिला said...

mujhe ye samajh nahi atta ki ram sena un purushon ke khilaaf morcha kyom nshi kholatee jo balatkaar karte hain deh vyaapaar karvaate hain sharaab nashe bechte hain aurton ko majboor karte hain ki vo koi galat rah apneeye ye sab jo ho raha hai vo purush ke naaree ke prati jo atyachaar hai usi ke falsavroop nari vidrohi pravtitee ko apnaane par majboor hui hai agar ye samaaj ab bhi na chetega to iska parinaam sab ko bhugatanaa padegaa in dharam ke thekedaaron se ye poochho ki dharam guruom ke ashram bhi mahilaaon ke liye kyon mehfooz nahi hain pehle unki gandagi to saaf karen khud paak saaf ban kar misaal pesh karen fir kisi aur se umeed kare danda to sabhi uthha sakte hai

Sanjay Grover said...

sawaal ye hai ki ham ladkiyoN ko bachaana chaahte haiN ya HINDU SANSKRITI ko ? Hindu sanskriti to jaadugar ka aisa jhola jismeN se waqt zarurat ke hisaab se har tarah ke udaahran nikaalkar dikhaa diye jaate haiN.
हम यह कहते हैं कि यह हमारी सभ्यता और संस्कृति पर हमला है। हमारी सभ्यता और संस्कृति क्या है, इन दिनों इस बाबत काफी लिखा-बताया गया है। खजुराहो की मूर्तिया, बालकृष्ण की रासलीलाएं, कामातुर शिवजी द्वारा मोहिनी (विष्णु) के पीछे भागने का प्रसंग, महाभारत के विभिन्न प्रसंग, स्वर्ग में मेनका, रंभा, उर्वशी द्वारा उपस्थित भद्रजनों (जो पृथ्वी से भी स्वर्ग में आए हैं) के मनोरंजन हेतु नृत्य करना आदि प्रसंग उल्लिखित हैं। इसके बावजूद वेलेंटाइन डे अश्लील है, तो श्लील क्या है? क्या एकतरफा विवाह श्लील है, जिसमें औरत चाहती किसी और को है, पर रहती कहीं और है? क्या लड़की देखने-दिखाने की रस्म अश्लील नहीं है? क्या टीवी, के क्विज कार्यक्रमों में कठपुतली बनकर हिलती स्कोरर लड़की की भूमिका अश्लील नहीं है? क्या विमान परिचारिका की भूमिका अश्लील नहीं है? क्या खेलों में परेड करते खिलाड़ी दलों के आगे झंडा उठाए चल रही लड़कियां अश्लील नहीं दिखती? क्या उन्हेें दीपक जलाने व पुरस्कार बांटने में मदद करती कठपुतलियां अजीब नहीं दिखती? आखिर किस बौद्विक योग्यता के आधार पर इन सबका चयन होता है? इनकी भी तो सिर्फ चेहरा, शरीर, चाल-ढाल देखकर ही नियुक्ति की जाती है, बल्कि कई बार तो ये सब भी नहीं देखा जाता।

Ek ziddi dhun said...

1-Varsha kee baat samajh mein nahi aayi....
2-jo sajjan ye kah rahe hain ki Hindu dharm ke mool mein stree par bandishen nahi hain, wo sahee nahin hain. Manusmriti se lekar sangh kee kargujariyon tak striyon ke hisse mein apmaan hi aaya hai. KALYAN ka NAREE ank dekh sakte hain...

Anonymous said...

:) ... you criticized a lot.. but don't you have tried if you have suggested a way ... i too agree that what Sena people are doing is wrong.. but when people are starving .. is consumerism of love is right??? .. would have liked to read about it too...
You talked about Pub culture and leaving the decision to their concise... but ain't we the one .. who criticize law and order .. when some one gets raped... ???...

anyways .. i liked the way you write ... :)

Anonymous said...

(some prob occurred while saving the above comment .. so please neglect that )..:) ... you criticized a lot.. but don't you think, it would have been better if you to suggest a way... i too agree that what Sena people are doing is wrong.. but when people are starving .. is consumerism of love is right??? .. would have liked to read about it too...
You talked about Pub culture and leaving the decision to their concise... but ain't we the one .. who criticize law and order .. when some one gets raped... ???...

anyways .. i liked the way you write ... :)

Unknown said...

Its very Good. Now the time to show the liberty n equlity of the women by pissing on roadside like man. You know, there is the way for everything. And you must know that the method or way is much more important than getting the goal by any means. Otherwise there should be know rule for black money and so. There must be protest for the way Sri Ram Sene used but your way is worst than them. Keep it in mind

समयचक्र said...

समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : वेलेंटाइन, पिंक चडडी, खतरनाक एनीमिया, गीत, गजल, व्यंग्य ,लंगोटान्दोलन आदि का भरपूर समावेश

Asha Joglekar said...

क्या एक गलत का जवाब दूसरे बडे गलत से दिया जाना चाहिये । अगर शराब पीना पिसलाना इतना ही अच्छा होता तो नशा बंदी पिकेटिंग आदि की जरूरत ही नही होती । मुझे याद है स्कूल में हम नशाबंदी के कार्यक्रमों में नशे के विरुध्द गीत गाने जाया करते थे गलत तो गलत ही है चाहे वह पुरुष करे या स्त्री । क्या नारी आज इस हद तक गिर गई है कि चड्डियाँ लहराते घूम रही है । इससे तो वह केवल हास्यास्पद ही हो सकती है ।

Sanjay Grover said...

देखिए आशाजी, बनी-बनाई या मिली-मिलाई धारणाओं के हवाले से बात करना एक बात हैं।
अगर आप किसी तर्क के ज़रिए इंस बात को सिद्ध करें कि नारियों द्वारा चड्ढियां लहराने का मतलब उनका गिरना है, तो मै समझूंगा कि आपने बहस को आगे बढ़ाने में योगदान किया।
सादर,
संजय ग्रोवर

Anonymous said...

पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या…!

http://rewa.wordpress.com/2009/02/15/padhe-likhe-ko-farsi-kya/

Sanjay Grover said...

rewa ji, aapke lekh meN bhi meri baat ka uttar nahiN hai.

eklavya said...

क्या सिर्फ़ चड्डी ही बची थी विरोध का प्रदर्शन करने के लिए. आज यह लोग चड्डी भेज रहे है कल कुछ और , निजी चीज़ो का इस्तेमाल इस तरह सार्वजनिक ना किया जाए तो अच्छा है.विरोध प्रदर्शन के और भी तरीके हो सकते है धरना दो श्रम दान करो, समाज मे जागरूकता लाओ, ग़रीबो को स्वास्थ्य शिक्षा के बारे मे जागरूक करो ना की पब मे जाने बाले लोगो के समर्थन मे चड्डिया लहराओ. यह सही है की सभी को समान अधिकार होना चाहिए लेकिन सामाजिक बुराइयो का विरोध भी तो करना हम ही लोगो का कर्तव्य है इस शराब ने नाजाने कितने घर बरवाद किए और हम अपनी युवा पीडी को इसी के प्याले मे धकेल रहे है उनका मोरल समर्थन कर रहे है. क्या आपको नही लगता की यह सही नही है पढ़ने लिखने अपना कॅरियर बनाने की उम्र मे वो लड़किया पब मे थी क्या ये सही है, देखिए श्री राम सेना ने जो किया मे उसका तहे दिल से विरोध करता हूँ लेकिन जिनके साथ हुआ वो भी तो सही नही है. क्या विरोध प्रदर्शन के साथ ही हमारा यह कर्तव्य नही है की हम अपनी युवा पीढ़ी को सही राह पर आने के लिए प्रोत्साहित करे इसके लिए आंदोलन करे ताकि भारत विकास करे देश आगे बड़े.

Sanjay Grover said...

निश्चय ही गरीब लोगों के घर उजड़ जाते हैं शराब के चक्कर में। निम्नमध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय लोग भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। लेकिन अन्य पहलू भी हैं। पैसे वाला आदमी जिसे ‘‘डिप्रेशन’’ कहकर मनोचिकित्सक से प्रेसक्राइब्ड दवाईया खरीद कर आराम से खा सकता है, उससे ज्यादा बुरी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में फंसा एक रिक्शेवाला क्या करे ? वह सस्ता पाउच खरीदता है और गंदगी, मच्छरों, सुअरों और अपने हालात के बीच फंसा किसी तरह सो रहता है। सुबह को उसका अपराध-बोध और बढ़ता है और फिर एक और पाउच। अमीर आदमी को तो इंस देश में वैसे भी किसी तरह का अपराघ-बोध नहीं है। वे विदेशी तरीके से रहते हैं, विदेशों में रहते है, वहीं के कपड़े पहनते हैं, वहीं की भाषा बोलते हैं, वहीं से मिला पैसा खाते हैं। और बात अपनी संस्कृति की करते हैं। उसी पैसे को यहां भेजकर अपनी ‘‘संस्कृति’’ को ‘‘बचाते’’ हैं।
और भी पहलू हैं। मैंने सुना है कि हिटलर शराब नहीं पीता था। मगर दुनिया में उसके जितनी हत्याएं शायद किसी एक आदमी ने करवायीं हांेगी। सम्भव है रामसेना और अन्य सेनाओं के लोग भी शराब न पीते हों। वैसे बिना शराब पीए लड़कियों को पीटने से तो अच्छा है आदमी शराब पीकर तमीज से रह ले। हैरानी तब होती है जब सभ्य लोगों को भी लड़कियों को सरेआम सड़क पर पीटे जाने से ज्यादा हिंसक, अश्लील और आपत्तिजनक चड्ढी भेजना लगता है। श्रमदान वगैरहा की सलाहें धर्मसेनाओं को भी दी जा सकती हैं।
हालांकि हर बात का हवाला या तर्क पुरानी पुस्तकों या तथाकथित धर्मग्रंथों में ढूंढे जाने का मैं कतई कायल नहीं हूं पर जो हैं उन्हें 15-02-2009 रविवार के दैनिक हिंदुस्तान में मृणाल पाण्डे का वह लेख भी पढ़ लेना चाहिए जिसमें बताया गया है कि हमारे शास्त्रों वगैरह में मदिरापान के संदर्भ में क्या-क्या लिखा है।
एकलव्य के साथ ऐतिहासिक/आपराधिक छल हुआ था, वो भी धर्म, परंपरा और संस्कृति वगैरह के नाम पर। काश आप, उसके नामधारी, यह समझ पाते।

eklavya said...

संजय जी आप जिस तरह शराब के समर्थन मे कुतर्क कर रहे है उससे आपकी घटिया सोच उजागर होती है. आप जैसे लोगो के कारण ही देश की यह हालत है. राम सेना और उन जैसे कई अन्य संघठन आप जैसे लोगो के कारण ही अपना अस्तित्व रखते है. आप श्रम दान जैसी सलाहे राम सेना को देने के लिए कहते है लेकिन हे मेरे खुद को श्रेष्ठ समझने बाले तथाकथित बुद्धिजीवी आप स्वयं क्यों श्रमदान करने से घवरा रहे हो, पर उपदेश कुशल बहू तेरे शायद आप जैसे लोगो के ही लिए लिखा है. सिर्फ़ समाज मे कमीयो को ढूँढना आप जैसे लोगो का काम है जब आपसे कोई कहता है की आप ही खुद को क्यों नहीं सुधार लेते सुधार का काम पहले खुद से शुरू करो तो आप फालतू के कुतर्क देने लगते हो.एक्लव्य का उदाहरण आप मुझे दे रहे हो उसकी महानता आप ने नही देखी की उसने समाज की बुराइयो चाहे वो धर्म के नाम पर हो ,संस्कृति के नाम पर हो को नही देखा सिर्फ़ अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहा और उसे हासिल किया इसके वाबजूद उसने गुरु द्रोण के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया जो की उसकी महानता बताता है ना की कोई कुतर्क किया की समाज ने मेरे साथ छल किया है तो मैं भी समाज से इसका बदला लू. नही उसने ऐसा नही किया बल्कि आप जैसे लोगो के सामने एक उदाहरण पेश किया जिसे आप जैसे लोग समझ भी नही पा रहे क्योंकि आपकी आँखे तो धृतरास्त्र की तरह बंद है केबल पूर्वाग्रह से ग्रस्त है. आप लोग समाज के लिए कुछ ना करके केबल उस पर उंगली उठाना जानते है की समाज मैं यह कमी है वो कमी है. मेरे बंधु इस कमी को हम ही दूर नही करेंगे तो कोई बाहर से आएगा इसे दूर करने के लिए? एक और चीज़ क्या ग़रीब आदमी अगर शराब का सेबन करता है तो क्या यह एक अच्छी बात है हम उसे उसकी मज़बूरी कह कर माफ़ कर दे हमे उसके परिवार के बारे मे भी सोचना चाहिए की अगर कम आमदनी मे से अगर वो शराब पर पैसा खर्च करता है तो फिर अपना घर कैसे चलाएगा. देखिए समाज, देश सभी से मिलकर बनता है चाहे ग़रीब हो या अमीर सभी अपना योगदान इस समाज को देते है चाहे कम या ज़्यादा. मैं चड्डी आंदोलन के खिलाफ नही हूँ ना मैं राम सेना के समर्थन मे हूँ . लेकिन मेरे भाई बात केबल इतनी है की इसका तरीका सही नही है काश आप मेरे पहले कॉमेंट की आत्मा समझ सकते. मैं किसी का समर्थन या विरोध नही कर रहा हूँ बल्कि इतना चाहता हूँ की वो लड़किया भी सही नही थी अपनी जगह पढ़ने लिखने और कॅरियर बनाने की उम्र मे वो पब मैं बैठी थी क्या यह सही है अगर आपकी बेटी ऐसा करती तो क्या आप भी उसका समर्थन करते? आप भी उसके समर्थन मैं अपनी चड्डी लहराते? बंधु दूसरे को उपदेश देना बहुत सरल है खुद पहले अपनी आत्मा से पूछो सही क्या है. हाँ यदि आप अपनी बेटी को खुद ही पब मे जाने के लिए प्रोत्साहित करते है तो आप सही है आपके कुतर्क सही है. लेकिन भ्राता मैं देश के लिए सोच रहा हूँ समाज के लिए सोच रहा हूँ ना की वो पब मे जाने बाली लड़कियो के बारे मे. मैं चाहता हूँ की समाज को शराब ,ड्रग्स जैसी बुराइयो से बचाया जाए ना की इन बुराइयो का समर्थन किया जाए बुराई तो बुराई होती है चाहे शराब हो या ड्रग्स या बेकसूरो के साथ मारपीट सब ग़लत है . लेकिन सही क्या है यह भी तो हमे ही समाज को सिखाना है भटको को राह पर लाना है केबल नुकतचिनी से तो काम नही चलेगा कुछ ठोस कर दिखाना होगा. मेरी आप लोगो से विनम्र प्रार्थना है की बुराई का विरोध करो ना की समर्थन. राम सेना जैसे लोगो से निबटना सरकार की ज़िम्मेदारी है और हमे क़ानूनी तरीके से इसका विरोध करना चाहिए ताकि उन लोगो को इसकी सज़ा मिले ना की मुफ़्त की शोहरत.बन्धु ज़रा गहराई से विचार करो.

Sanjay Grover said...

एक तो मुझे यह अदा बहुत भाती है कि जो भी बात हमने आज से पहले कभी सुनी न हो या हमारी समझ के सांचे में समाती न हो या हमें एकदम से हकबका देती हो उसे झट से कुतर्क कह दो, सारा झंझट ही खत्म ! अब इंस अदा को मैं तर्क कहूं या गुलाब का अर्क या स्वर्ग की आड़ में बैठा नर्क! दूसरे मेरे भाई ब्लाॅग कोई खेत नहीं है कि उसमें हम फावड़े चलाकर श्रमदान करें। वैसे श्रमदान करते समय भी आप घूंघट (एकलव्य) ओढ़े रहते हैं या उसे उतार देते हैं। और तसलीमा नसरीन ने कितना श्रमदान किया था कि उनके विचारों की आग जहां-तहां फैल गयी। लेकिन अपने विचारों के लिए जो भी षडयंत्र वगैरह बर्दाश्त करने पड़ते हैं उन्होंने किए। कभी नकाब उतार कर मुझसे मिलें तो श्रमदान भी करेंगे और उसपर बातें भी। ब्लाॅग पर तो आप भी शब्द चेप रहे हैं और मैं भी। एकलव्य के लिए जो तर्क देकर आप उसे महान बता रहे हैं, उन्हीं तर्काें से ही औरतो(त्याग,लज्जा,मर्यादा,चरित्र), दलितों(धर्म के रक्षक,पिछले जन्म के पापी, भगवान द्वारा बनायी वर्णव्यवस्था के तहत हीन) को भी हजारों सालों से हुड़कचिल्लू बनाया जा रहा है। अगर यही महानता है तो सूपर्णनखा को भी लक्ष्मण की मूर्ति बनाकर दूसरी औरतों के नाक काटने की नेटप्रैक्टिस करनी चाहिए थी। और जब वो इंस में पारंगत हो जाती तो दक्षिणा में अपने हाथ-कान भी काटकर गुरुजी महाराज को दे देने चाहिए थे। और सीतामाता जिन्हें रावण छल से उठा ले गया था, को भी इंस महान कृत्य के लिए रावण साब की मूर्ति बनाकर वेश बदलने की कला साधनी चाहिए थी। फिर तो नारी-मुक्ति का सारा लफड़ा ही बेकार है। आओ सारी औरतों मिलकर पुरुषप्रभुओं/गुरुओं से मिलकर छल और शोषण की कला सीखें, उनकी मूर्तियां बनाएं, उनको अपने शरीर के अंग काट-काटकर दक्षिणाएं दें। आओ बहिनों श्रमदान करें। वैसे अजीब सी बात नहीं है कि महान एकलव्य थे और पुरस्कार द्रोणाचार्य और अर्जुन के नाम पर बंटते हैं। कई बार तो लगता है कि सारे द्रोणाचार्य, एकलव्य बन-बनकर वामपंथ, बसपा, नारी-मुक्ति आंदोलनों और सभी प्रगतिशील आंदोलनों में घुस गए हैं और इंस सब के नाम पर वर्णव्यवस्था और मर्दवाद
को बनाए और बचाए रखने का चालाक खेल खेल रहे हैं। उदयप्रकाश की कहानी ‘मोहनदास’ याद आ जाती है।
मेरी बेटी होती और अगर वो अपने पढ़ने या फिर अन्य दूसरे किसी काम जिसमें उसकी रुचि होती, को ठीक से निपटाने के बाद बचे हुए वक्त में ऐसा करती तो मैं उसे क्यों रोकता भला ! वैसे आप बताईए कि आपकी बहिन-बेटी-बहू-मां वगैरह को बीच सड़क (माफ कीजिएगा, यह भाषा आपने ही शुरु की है) पर ऐसे ही लट्ठ पड़ते तो आप उन्हें भी श्रमदान की सलाहें देते !

eklavya said...
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eklavya said...

प्रिय बंधु संजय जी ब्लॉग तो एक स्रोत है अपनी बात कहने का समाज मे जागरूकता लाने का समाज से गंदगी हटाने का. दूसरी बात यहाँ आप जैसे तथाकथित स्वयंभू बुद्धिजीवी अपने कुतरको काशब्द जाल तो फैलाना जानते है लेकिन उन पर अमल नही करते जिस चीज़ को अमल मैं नही ला सकते वो फ़िज़ूल है आपकी जानकारी के लिए मैं आपको बताना चाहूँगा की मैं अपने खाली वक्त मे सामाजिक कार्य करता हूँ. जैसे की .एड्स कौउंसिलिंग इसके बारे मे लोगो को जागरूक करना वो भी फ्री ऑफ कॉस्ट, इसके अलावा स्वास्थ्य शिविर का आयोजन करना. लोगो को अपनी बची हुई मेडिसिन्स को डोनेट करने के लिए प्रोत्साहित करना . मैं हावावाज़ी मे यकीन नही रखता ना ही सरकार को कोसताकी क्यों उन्होने कुछ ख़ास जातियो केलिए जॉब और शिक्षा मे रिज़र्वेशन रखाहै .यह सरकार की नीति है ठीक है मेरा काम है अपना लक्ष्य हासिल करना चाहे जो भी समस्यारास्ते मे आए .फालतू लफ़फाजिया करना मेरी फितरत नही यह आपको ही मुबारक हो मैं इस ब्लॉग मैं आया की शायद यहाँ से कोई संदेश समाज को जाए लोग मिलकर कोई अच्छा कार्य करे मुझे नही मालूम था की यहा आप जैसे लफ़फाज़ लोग आते है जिन्हे सिर्फ़ शब्दो का जाल बिछाना कुतर्क करना ही आता है. ठोस सामाजिक कार्य उनके बस की बात नही क्योंकि वो कमजोर है .उनकी सोच सिर्फ़ कामिया निकालने लोगो को फालतू शब्द जाल मे फसाने के लिए काम करती है. आप को देख एक शेर याद आ गया हर शाख पर उल्लू बैठे है अंज़ामे गुलिस्ताँ क्या होगा. शायद ये शेर भी किसी आप जैसी सोच बाले से प्रेरित होकर लिखा गया होगा. मुझे कहने मे बहुत अफ़सोस हो रहा है की आप अनर्गल बाते ज़्यादा करते है जिनका की विषय से कोई संबंध नही होता रही बात मेरे घर की मा बेटी की तो मैने उन्हे ऐसे संस्कार नही दिए और ना ही मैने ऐसे संसकार पाए . मेरी मा बेटी पर इतना समय नही है की वो पब मैं जाकर अपना समय बरवाद करे वो तो आपके घर की परंपरा होगी.(क्षमा कीजिए अगर कोई कठोर शब्द लगे हो तो)

Sanjay Grover said...

क्षमा तो मैंने आप जैसे लोगों को बहुत पहले से ही कर रखा है। जो ग़लीज़ भाषा की शुरुआत भी करते हैं, 30-30 पंक्तिओं में सिवाय लफफाज़ी के कुछ नहीं करते और साथ में यह भी कहते जाते हैं कि मैं लफफाजी नहीं करता ! नाम तक नहीं बता पाते ।
आप को जो भी संस्कार वगैरह देने हैं, अपनी मां-बेटियों को दीजिए, दूसरों से जबरदस्ती मत करिए। अगर करनी हो तो खुदको लोकतांत्रिक और समाजसेवक मत कहिए कम से कम।
जिस दिन मैं नकाब ओढ़कर आऊंगा उस दिन मैं भी बताऊंगा कि मैंने क्या-क्या किया है।
मैं समझता हूं जिसमें अपनी कमज़ोरिओं को स्वीकार करने की भी ताकत नहीं उसमें और क्या ताकत होगी।
अगली बार कौन सा नाम ओढ़कर आओगी,मेरा मतलब है आओगे ।

eklavya said...

भाई साब आपकी जानकारी के लिए बता दूं जिन मे हिम्मत होती है वो किसी नकाब को नही ओढ़ते. ये नक़ाब तो आप जैसे लोगो के लिए ही है. जो फालतू की लफ़फाजी करते है. और मुझे आप जैसे लोगो की सलाह की कोई ज़रूरत नही है जो खुद कमजोर है वो दूसरे को क्या सलाह देंगे. आप की जानकारी के लिए क्र्प्या पहले खुद के कॉमेंट को देख लीजिए की गलीज़ भाषा की शुरुआत आप ने ही की थी मैं तो आपको भाई का दर्ज़ा दे रहा था पर यह मेरी ग़लती थी आप किसी सम्मानीय संबोधन के योग्य नही है.

Sanjay Grover said...

पहले तो आपके आरक्षण संबंधी कथन से सिद्ध हो चुका है कि आप वास्तप में कितने ‘‘एकलव्य’’ हैं। अब यह तय होना बाकी रह गया है कि आप खुद ही ‘‘एकलव्य’’ का इस्तेमाल कर रहे हैं या आपका भी कोई इस्तेमाल कर रहा है। जिनका अपना कोई दिमाग नहीं होता, सिर्फ ‘‘संस्कारों’’ की तोतारटंत होती है, उनका इस्तेमाल ही ज्यादा होता है। जिनको आप भाई का दर्ज़ा देते हैं उनके साथ वास्तव में क्या करते होंगे, इंस बारे में ज्यादा कुछ कहने की ज़रुरत अब मुझे नहीं लगती। वैसे भी मैं अब समझ चुका हूं कि मुझे व्यर्थ की बहस में उलझाए रखने के लिए आपका इस्तेमाल किया जा रहा है।

eklavya said...
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eklavya said...

श्रीमान संजय ग्रोवर जी एक पुरानी कहावत याद दिलाने के लिए शुक्रिया जो मैं भूल चुका था वो यह है की" बेअक्लो से डिवेट नही करना चाहिए" और मैं ग़लती से आपके साथ डिवेट करने लगा

Sanjay Grover said...

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा,
एक क़तरे को समंदर नज़र आएं कैसे !
-वसीम बरेलवी

Unknown said...

गुलाबी चड्डी भेजने बालो से मेरा एक आसान सवाल - अगर पुरुषों के किसी संगठन ने ऐसे ही चिढ़कर या गुस्से मे पुरुषों के या महिलाओ के ऐसे कपडे किसी महिला के घर भेज दिए तो कानून क्या करेगा और समाज क्या करेगा. शायद अश्लील हरकत करने का इल्जाम उस के उपर लगेगा. और ये सही भी है. उत्साह मे हमें मर्यादा नहीं भूलनी चाहिए. राम सेना बालो ने जो किया वो दंडनीय है, भर्त्सनीय है उन्हें सजा होनी चाहिए. ऐसी फूहड़ प्रतिक्रया उन्हें उत्सव मूर्ती बनाती है, वो इसके काविल नहीं हैं.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...