Monday, February 16, 2009

“मांग है तो आपूर्ति रहेगी ही. हमें समाज के सोचने के तरीके को बदलना होगा.”

तस्करी का नया गढ

गीताश्री , रविवार डॉट कॉम 
बांग्लादेश की सीमा से लगा है झारखंड का पाकुड़ और साहेबगंज यानी संथाल परगना का इलाका. उच्च गुणवत्ता वाले पत्थर इस इलाके की पहचान हैं लेकिन इन्हीं पत्थरों के कारण इस इलाके की पहचान बदल रही है और अब यह हिस्सा लड़कियों की तस्करी का गढ़ के रुप में जाना जाने लगा है.

होता ये है कि इस इलाके से ट्रकों में पत्थर लाद कर बांग्लादेश ले जाया जाता है. पत्थर निकालने एवं ट्रक पर पत्थर भरने का काम ज्यादातर लड़कियां ही करती हैं. यहीं से शुरु हो जाता हैं इनकी तस्करी और यौन शोषण का रास्ता. झारखंड के एटसेक यानी एक्शन एगेंस्ट ट्रैफिकिंग सेक्सुअल एक्सप्लाएटेशन ऑफ चिल्ड्रेन के राज्य संयोजक संजय मिश्रा स्थिति की भयावहता के बारे में बताते हैं कि कैसे काले पत्थर की खान और उसके निर्यात से आदिवासी लड़कियों की जिंदगी काली होती जा रही है.

संजय कहते हैं- “ तस्करी की वजह से एक जनजाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है. पाकुड़ से पहाड़िया जनजाति खत्म हो रही है. गिनती के परिवार बच गए हैं. उनकी जगह बांग्लादेशी आकर बस रहे हैं. खासकर वहां की लड़कियों की संख्या बढ़ती जा रही है.”

इस समस्या की गंभीरता पर संजय मिश्रा ने ही प्रशासन का ध्यान खींचा. उन्होंने इस मुद्दे पर व्यापक अध्ययन करने के बाद एक गैर सरकारी संगठन मानवी के साथ मिलकर पिछले साल मई में एक सेमिनार का आयोजन करवाया, उसके बाद प्रशासन की नींद खुली.

संजय बताते हैं –“ मानव तस्करी पाकुड़ जिले के आसपास ही ज्यादा फल फूल रही है. एक तरह से यह इलाका देह बाजार के रुप में कुख्यात हो रहा है. खास कर हिरनपुर में आदिवासी लड़कियों के बीच देह व्यापार एक धंधे का रुप ले चुका है. यहां से बाकायदा आदिवासी लड़कियां लगातार बांग्लादेश के बाजारों में बेची और भेजी जा रही हैं.”

एटसेक ने अपनी पहल पर सिर्फ पाकुड़ जिले में तस्करी की संभावना को देखते हुए दो वीजीलेंस कमिटी का गठन किया है, जो इस पूरे मामले पर नजर रखे हुए है. इनकी सजगता का नतीजा है कि ये लोग समय-समय पर वहां लड़कियों को तस्करों के चंगुल से मुक्त कराते रहते हैं. प्रशासन को नींद से जगाने वाली संस्थाओं को भी धीरे धीरे उनका सहयोग मिलने लगा है. अब आए दिन पाकुड़ की देह मंडी से लड़कियां बरामद होकर संजय मिश्रा के रांची और पाकुड़ किशोरी निकेतन में पहुंचने लगी हैं.
इममोरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन एक्ट
आईटीपीए एक विस्तृत कानून है. यह कानून ट्रैफिकिंग रोकने और उसका मुकाबला करने के लिए कानून को लागू कराने वाली तथा न्याय दिलाने वाली एजेंसियों को पूरे अधिकार और ताकत देता है. यह कानून 1956 में बनाया गया था.
उसके बाद भारत की संसद ने इसे दो बार संशोधित किया- पहली बार 1978 में और दूसरी बार 1986 में. इन संशोधनों में ट्रैफिकिंग को रोकने पर जोर दिया गया है. यह बात दूसरे देशों में बनाए गए कानूनों में आमतौर पर नहीं मिलती. बहरहाल, कई वजहों से इस विशेष कानून की धाराओं का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.
इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि इन धाराओं का अकसर गलत उपयोग तथा दुरुपयोग होता है. रिसर्च से पता चलता है कि इसका मुख्य कारण है, इन धाराओं की जानकारी न होना और इन धाराओं में जो बातें कही गई हैं, उनके बारे में समझ की कमी.


कोशिश जारी है
संजय दावा करते हैं कि उनके संगठन ने अब तक 372 आदिवासी लड़कियों को विभिन्न राज्यों समेत बांग्लादेश से मुक्त करवाया है. एटसेक के आंकड़ो के अनुसार झारखंड की 1.23 लाख आदिवासी लड़कियां देश के विभिन्न शहरों में घरेलू नौकरानी के रुप में काम कर रही हैं, जिनमें 2339 दिल्ली में हैं, बाकी हरियाणा, मुंबई और उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में हैं.

संजय दुख और चिंता जताते हुए कहते हैं- “ हिरन पुर में महिला मंडी, पशु हाट से ज्यादा दूरी पर नहीं था. ये सभी अच्छी तरह जानते हैं कि यहां से हजारों की तादाद में गैर कानूनी तरीके से पशु भी बांग्लादेश भेजे जाते हैं. लेकिन ये महिलाएं भी उन्हीं पशुओं की तरह ट्रीट की जाती हैं और ये सिलसिला अब भी जारी है.”

असल में राज्य के पुलिस अधिकारी भी नहीं जानते कि लड़कियों की तस्करी के मामले में कानूनी प्रावधान क्या-क्या हैं. इममोरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन एक्ट में कितनी कड़ी सजा का प्रावधान है, इसका अहसास भी इन पुलिस अधिकारियों को नहीं था. आखिर में स्वयंसेवी संस्थाओं की पहल पर इस मुद्दे पर पुलिस की कार्यशालायें हुईं और मानव तस्करी पर रोक लगाने के लिए बकायदा टास्क फोर्स का भी गठन किया गया.

इन कोशिशों का ही नतीजा है कि इलाके में मानव तस्करी के मामले में कमी आई है लेकिन क्या इसे जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता ? संजय मिश्रा कहते हैं- “मांग है तो आपूर्ति रहेगी ही. हमें समाज के सोचने के तरीके को बदलना होगा.”

5 comments:

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Respected All,

Journalism ke liye ye bade hi sharm ki baat hai ki Dainik Bhaskar Bhopal mein DB Star naam ke Editor Avinash Das ne journalism ki student ke sath rape karne ki koshish ki...yahi nahi uske mana karne par usko peeta.

Aur jab us student ne yah baat sabko batayi to use dhamkaya gaya. Avinash Das naam ka yah editor patrakarita ke liye kalank hai. ndtv mein bhi rahte hue bhi isme aisa hi kiya tha jab use wahan se bhaga diya gaya tha.

Is gandi harkat ko usne tab kiya jab ki wah khud hi university ka visiting faculty ban chuka hai. ab aap hi bataiye ki isse guru shishya ka rishta dagdar nahi hua kya?

Is gande insaan ne us ladki ko dhamki dee ki agar wo ye baat kisi ko bhi batayegi to ye uske sath aur bhi bura kuchh kar sakta hai. isne us bacchi se kaha ki "Tum mera kuchh nahi bigad paogi. Mai Dainik Bhaskar ka Editor Hoon aur tumhara carrier banne se pahle hi khatm kar doonga"

Avinash ke is gande kaam mein DB Star ke hi ek reporter Ashwini Pandey and Manisha Pandey ne uski khoob madad ki. in dono ne bhi us ladki ko khoob daraya aur dhamkaya..


Zara sochiye ki ek ganda admi kisi Bade brand aur banner ka sahara lekar kya kuchh bhi galat kaam kar sakta hai. aaj usne ek student par buri nazar daali kal kisi aur par dalega. ho sakta hai ki ye aisi hi harkat apne office mein bhi kare.

ummeed hai aap sabhi is mudde ko gambheerta se lenge.


Dhanyawad....

सुजाता said...

इस बेनामी टिप्पणी का क्या मतलब है?और जिन जिन तक इस आशय की मेल पहुँची है वे भी सूचीबद्ध हैं !

sanjeev persai said...

सत्य है सुजाता जी
अगर ये हरकत या रिपोर्ट सही है तो इस आदमी को सोचना चाहिए की इस तरह बेनाम टिप्पणी करके ये मामले की गंभीरता को नष्ट कर रहा है, अगर आदमी समझदार है तो समझेगा

मोना परसाई said...

महिलाओं की स्थिति पर और गंभीर तथा निरंतर चर्चा की आवश्यकता है
चोखेरबाली अपना काम कर रहा है बाकी को अपनी भूमिका तय करनी है.
धन्यवाद

मनीषा पांडे said...

ऊपर दिए गए कमेंट में लिखा है कि मैंने अविनाश की तरफ से उस लड़की को डराने-धमकाने में मदद की। हालांकि ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों की सफाई देने की कोई जरूरत नहीं होती, लेकिन फिर भी यह कहना जरूरी है कि मैं अविनाश की ऐसी किसी कोशिश में शामिल नहीं थी। क्‍या मेरे सारे स्‍त्रीवाद की यही परिणति होनी अब बाकी रह गई है कि मैं किसी लड़की को डराने धमकाने का काम करूं। उल्‍टे किसी लड़की को कोई धमकाए तो मैं उसके साथ खड़ी होंगी।

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