Wednesday, February 18, 2009

जाँच आरोपी की होती है,विक्टिम की नही -चरित्र पर वार से बचना चाहिए

कल के मुद्दे पर जवाब मांगने पर अविनाश जी का स्पष्टीकरण आया है ,यह अच्छा है।लेकिन इस जवाब के साथ साथ और बहुत कुछ है जो चला आया है।जैसा कि इस तरह के मुद्दे पर किसी भी आरोपी का बयान हो सकता है ,वैसा ही बयान यह भी है जिसमे विक्टिम के चरित्र को निशाना बनाया गया है। अविनाश जी ने कहा कि लड़की की जाँच कराई जाने चाहिए,किसी अनाम ने कहा मेडिकल परीक्षण होना चाहिए - ध्यान रहे कि लड़की इस केस मे विक्टिम है और जाँच आरोपी की होती है विक्टिम की नही,यह अलहदा बात है कि जाम्च के बाद आरोपी आरोप मुक्त हो जाए ,निर्दोष पाया जाए।


ध्यातव्य है कि यह मामला पत्रकारिता का नही विश्वविद्यालय का है, क्योंकि आरोपी वहाँ गेस्ट फेकल्टी था और विक्टिम छात्रा था। सो यह पुलिस का मामला नही है विश्वविद्यालय का मामला है जिसे ऑर्डिनेंस 15 D के अंतर्गत लिया जाता है। यह ऑर्डिनेंस विशाखा केस से निकल कर आया था क्योकि यह माना गया कि कार्यक्षेत्र पर होने वाले यौन उत्पीड़न के मामले क्रिमिनल कानूनों से प्रभावी तरीके से हल नही हो पा रहे थे। इसे सभी विश्वविद्यालय ऐसे मामलों मे मॉडल मानते हैं।इसी के आधार पर लड़की ने कुलपति से शिकायत की जिसकी पुष्टि होने के बाद ही समिति का गठन किया गया होगा। उसी समिति के सामने आरोपी अपने बयान और स्पष्टीकरण दे सकते हैं।

और अगर बात पुलिस की ही है तो यह रास्ता आरोपी के सामने भी खुला है कि वह अपने सम्मान की सुरक्षा के लिए थाने मे जाए।



चरित्र की डिटेल्स के साथ साथ उस लड़की का नाम भी बहुत से कमेंटस मे लिख दिया गया है, जो कि ऑर्डिनेंस 15D का सरासर उल्लंघन है।यदि समिति गठित हो गयी है तो वह अपना काम करेगी ही ,लेकिन अनाम कमेंट्स करने वालों से अनुरोध है कि यहाँ पर विक्टिम और आरोपी दोनो के ही विषय मे निजी और पारिवारिक जानकारियों का उल्लेख कर के माहौल दूषित न करें।

26 comments:

स्वप्नदर्शी said...

I suggest that, chokher bali's and the reader of this blog, take a breath, and please do not hurry towards a judgment against Avinash or in his favour.

I have said similar thing in case of Aarushi murder case also, where a lot of speculation regarding her relations with servant to honor killing to extramarital affairs of parents were in the news without any substantial facts or proofs.

Finally, truth is still not out in Aarushi case but her family has devastated for certain.

I do not agree with Avinash on many issues, including his portrayal of women issues. And I do not know him except his writing on mohalla blog.


Unless we have some more information, we should avoid saying that he is a culprit indeed.
As a women, my sympathies are with the victim and I admire her courage if this is true. But ultimately, our commitment should be towards the truth.

"Pata nahi aisa lagataa hai ki faisale kee aldbaazee se bachnaa chahiye."

It should not be a justice without trail

Anonymous said...

Dekhne hum bhi gaye the pe' Tamasha na hua--
sachmuch kuchh hai ya do blogger milkar comments batorne ka khel kar rahe hai.

Anonymous said...

आपकी मनोभावमाओं से सहमत हूँ। आरोपी की जाँच भी जरूरी है। मनोविकृति भी मानसिक रोग है।

मैथिली गुप्त said...

स्वप्नदर्शी जी से सहमति

विनीत कुमार said...

मैशिलीजी और स्वप्नदर्शी से सहमति औऱ इस बात की कल्पना पहले ही कर लेना कि गलत होने पर भी आरोपी छूट जाएगा, जिस व्यवस्था के बूते बेहतर करने की हम उम्मीद करते हैं, उन्हें धकियाते हुए अपनी पूर्वधारणा थोपने जैसा है। हमारी संवेदना विक्टिम के साथ है लेकिन हम मेनस्ट्रीम की मीडिया(कुछ चैनलों की तरह) अपनी तरफ से न्याय देने की जल्दीबाजी नहीं कर सकते।

मसिजीवी said...
This comment has been removed by the author.
मसिजीवी said...

राहत की बात है कि हम 'देखा हमने कहा था न' भंगिमा में नहीं जा रहे हैं। इस घटना में शिकार तथा अभियुक्‍त तो अपनी अपनी तरह से त्रासदी से गुजरते ही हैं लेकिन उन लागों की यातना अनदेखी रह जाती है जो इससे जुड़े हैं मसलन इस मामले में श्रावणी तथा मुक्‍ता...
इस तरह के मामलों में सच व झूठ शुद्ध रूप में प्राप्‍त नहीं हो पाते लेकिन मुक्‍ता की यातना शुद्ध यातना है ..आरोप सच है तो नर्क और झूठ है तब भी उससे कम नहीं। विक्टिम के साथ साथ हमारी संवेदना उनके साथ भी है

सुजाता said...

इस बात की कल्पना पहले ही कर लेना कि गलत होने पर भी आरोपी छूट जाएगा, जिस व्यवस्था के बूते बेहतर करने की हम उम्मीद करते हैं, उन्हें धकियाते हुए अपनी पूर्वधारणा थोपने जैसा है
__________
@विनीत ,

वाक्य ध्यान से देखिए तो ऐसा नही लिखा गया है।जल्दबाज़ी मे आपने गलत अर्थ लिया है।जाँच के बाद आरोपी निर्दोष पाया जा सकता है।इसका यह मतलब नही है कि जाँच पहले पीड़िता की की जाए और फिर आरोपी की जाँच की शुरुआत की जाए, जैसा कि अविनाश जी ने कहा। यही तरीका है कम से कम मेरी जानकारी यही कहती है।

@स्वप्नदर्शी जी,

culprit (अपराधी,मुलज़िम,दोषी)शब्द का इस्तेमाल चोखेरबाली की किसी पोस्ट मे नही है। हमने आरोपी शब्द का इस्तेमाल किया है। जजमेंट पास करना अपने बूते से बाहर की बात है,अनैतिक है,गलत है।यह पोस्ट केवल अविनाश जी के स्पष्टीकरण और अन्य अनाम टिप्पणियों मे व्यक्त बातों को लेकर लिखी गयी है।
मुक्ता और श्रावणी की पीड़ा भी विक्टिम की पीड़ा से कम नही होगी।उनके लिए स्थितियाँ बेहद कठिन हो गयी हैं और हम उन दोनो के साथ हैं। यह सब अत्यंत दुखद है-सही हो तो भी , गलत हो तो भयंकर भी।

Anonymous said...

मुझे आश्चर्य इस बात पर है कि जिस आरोप के कारण अविनाश की ऐसी-तैसी हो गई है, उसकी शिकायत अब तक पुलिस से नहीं की गई है. भास्कर औऱ विश्वविद्यालय प्रबंधन को तो शिकायत की गई लेकिन पुलिस को नहीं. मतलब साफ है कि सारा मामला अविनाश की ऐसी-तैसी करना था, कमसे कम न्याय पाना तो नहीं था. अगर न्याय पाने में कहीं कोई परेशानी है और एफआईआर लिखाने में भी तो हम सब चोखेरबाली पर ऐसी-तैसी करने के बजाय क्यों नहीं उस बच्ची का साथ दें और उसे न्याय दिलायें.

debashish said...

जंगल में मोर नाचा किसने देखा। भोपाल की घटना, आप बैठीं दिल्ली में। ब्लॉगजगत के ही एक आदमी पर गंभीर आरोप लगता है और आपको पुरानी खुन्नस दूर करने का बहाना मिल जाता है। यह कोई स्त्री विमर्श का विषय है? भारत भर में हर रोज़ होते कितने बलात्कार की खबरों पर आप लिखती हैं? अगर तेवर पत्रकारिता के रखने हैं तो वाकई फील्ड पर जाईये, तफ्तीश कीजिये और फिर बताईये निश्वर्ष। भोपाल तक जाना न सही, आपने क्या इस मामले में अविनाश, इस लड़की, भास्कर समूह किसी से भी फोन पर भी बात की है? Hear Say के आधार पर trial शुरु कर देना। भगवान ना करे कभी आप ऐसी स्थिति में फंस जायें तो कल्पना करें कि क्या गुजरेगी आप पर इस तरह के कीचड़ लोटन से?

Anonymous said...

वाह जी वाह सही फ़रमाया जी आप सब महानुभावो ने . जिन्हे अविनाश की इतनी चिंता है देवाशीश जी , विनीत जी तुरंत अपनी बहन को अविनाश के पास सविता भाभी के बारे मे स्त्री विमर्श करने भेजे . अगर कोई गडबड हो जाये तो पुलिस मे रिपोर्ट करे फ़िर वहा यह सिद्ध करे कि कोशिश की गई न्याय पाते ही हमे सूचित करे हम आपके साथ खडे होंगे वरना हम आपके कहे अनुसार ये समझ लेघे कि आपकी बहन जी ही अविनाश जी को फ़सा कर सविता भाभी स्टाईल स्त्री विमर्श मे तल्लीन थी अविनाश निरा भोला है. शर्म नही आती तुम दोनो को , लेकिन तुम तो पहले से ही इसी मंजिल के मुसाफ़िर हो अविनाश के साथ धटिया लिजलिजे नाली मे रेकने वाले कीडे .

Anonymous said...

शिक्षा व्यवस्था और पत्रकारिता की जहाँ अपनी अलग दुनिया है वहीं व्यापक विश्व का भी वे हिस्सा हैं । देश के कानून और नैसर्गिक न्याय से पत्रकारिता और शैक्षिक जगत परे हैं ? क्या वि.वि. परिसर या मीडिया दफ़्तर में हत्या हो जाने पर भारतीय दण्ड संहिता और दण्ड प्रक्रिया संहिता नहीं लागू होगी?

Anonymous said...

शिक्षा व्यवस्था और पत्रकारिता की जहाँ अपनी अलग दुनिया है वहीं व्यापक विश्व का भी वे हिस्सा हैं । देश के कानून और नैसर्गिक न्याय से पत्रकारिता और शैक्षिक जगत परे हैं ? क्या वि.वि. परिसर या मीडिया दफ़्तर में हत्या हो जाने पर भारतीय दण्ड संहिता और दण्ड प्रक्रिया संहिता नहीं लागू होगी?

मनीषा पांडे said...

मांग है तो आपूर्ति रहेगी ही वाली पोस्‍ट पर कोई बेनामी कमेंट था कि मैंने अविनाश की तरफ से उस लड़की को डराने-धमकाने में मदद की। हालांकि ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों की सफाई देने की कोई जरूरत नहीं होती, लेकिन फिर भी यह कहना जरूरी है कि मैं अविनाश की ऐसी किसी कोशिश में शामिल नहीं थी। क्‍या मेरे सारे स्‍त्रीवाद की यही परिणति होनी अब बाकी रह गई है कि मैं किसी लड़की को डराने धमकाने का काम करूं। उल्‍टे किसी लड़की को कोई धमकाए तो मैं उसके साथ खड़ी होंगी।

स्वप्नदर्शी said...

@sujata and all
Please substitute 'accused' for 'culprit' in my previous comment, it was a mistake in hurry.

I agree with Aflatoon's comment also. And specially, since this incident did not happen in premises of college or the New Paper office
technically, FIR is more logical consequence as compared to 15D, at least in my work place this how situation is defined.

Something, which looks very undemocratic and to some extent fishy is the fact that, Avinash was not cross questioned or given a chance to explain situation before terminating his position.

And also, my real life experiences related to these matters or even the situation where there is plenty of medical factual evidence and handful of people as a witness available, resolving issue takes several years, and punishment sometimes comes very late. As a student, I have witnessed, the struggle to addressing the problem of the "Mahtosh MoD. Blaatkaar rape incidence" and several molestation related incidences that happened in Premier CSIR Institutes to University like JNU.

and in none of the incidence, the justice was severed so quickly and clearly.

I do not know if the educational institutes have become suddenly so proactive and pro-women.

These are not the arguments in support of Avinash or if he has committed that crime.

स्वप्नदर्शी said...

@sujata,

Please remove the comment of Mr. anonymous that is mentioning the name of victim.

@mr. anonymous

Please do not attempt character assassination of the victim. You have no right to issue character certificate.


And even if any women is "characterless" or even a prostitute, nobody has any right to impose sexual relations on her, without her consent.

And certainly attempt to rape or rape of a women, whether she is 'wife' (maddona) or whore, or anybody else can not be justified, on any ground and should be treated as a criminal offense.

But I disagree with Sujata here, and will advocate for the investigation of 'both' the accused and the victim, because it is an essential step to establish or verify accusation.

@avinash and other media persons

They should probably learn that so called professionalism /journalism, when dealing with such incidents, needs responsible handling. Its not the issue of NEWS VALUE but a issue of human life and fabric of social existence for those individuals involved.

सुजाता said...

@देबाशीष,
इस प्रकरण से कोई हैरान है तो कोई परेशान है।लेकिन आपको यह मेरी खुन्नस निकालना लगता है तो यह भी आप ही जानते होंगे कि अविनाश ने ऐसा मेरे साथ क्या किया कि मुझे खुन्नस होगी?
खैर,
यह मामला पुरुष एकता का सबूत है कि लड़की को चरित्रहीन कहा जा रहा है,उसका नाम ले लेकर बिहार तक उसके चरित्र के बख्नान मशहूर होने की बात की जा रही है,उसके चरित्र के प्रमाण के लिए उसकी मेडिकल जाँच ,माने उसकी वर्जिनिटी की जाँच तक की बात कह दी गयी .........और देबाशीष तब चुप रहे।
और यूँ भी कोई जजमेंट तो यहाँ दिया ही नही गया है।

यह तक कह गया कि लड़की थाने मे नही गयी क्योंकि उसकी पोल खुल जाती।
इसलिए इस पोस्ट मे बताय गया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डिनेंस 15 डी के तहत इन मामलों को अलहदा रखा है, आप मानना चाहें कि सुप्रीम कोर्ट का ही दिमाग खराब है तो मान सकते हैं।
आप यह पोस्ट पढ सकते हैं

http://blog.chokherbali.in/2008/04/quid-pro-quo.html

विशविद्यालय कुछ न करे तो लड़की को थाने मे जाना चाहिए।महिला थाना है भोपाल में।फिलहाल तो विशव्विद्यालय ऐसी सूचनाएँ ब्लॉगरों को नही ही बांटेगा ,जब तक कि वह लड़की खुद ब्लॉग पर आकर न लिखने लगे।

@अफलातून जी,
यह आरोप संगीन आरोप है,मामूली बात नही, इसलिए आरोपी अगर साफ -निर्दोष है तो पुलिस का दरवाज़ा उसके लिए भी खुला है।थानों मे ही कितना न्याय होता है , यह तो अलग सवाल है ही,यह भी कि अदालतें यौन हिंसा के मामलों मे अक्सर 18 साल तक फैसला नही दे पातीं।सम्भवत: इसलिए कार्यक्षेत्र पर यौन उत्पीड़न को अलग मसला माना गया है।
@स्वप्नदर्शी जी,
बेशक घटना विश्वविद्यालय परिसर मे नही हुई, लेकिन विक्टिम और आरोपी का सम्बन्ध विश्वविद्यालय से जुड़ा है,आरोपी शिक्षक था और विक्टिम छात्रा थी।शिक्षक को विश्वविद्यालय ने ही लेक्चर के लिए आमंत्रित किया था।

स्वपनदर्शी जी,
आप बेशक असहमत हो सकती हैं, पर मेरी समझ से आरोपी पर इल्ज़ाम गलत पाए जाने पर ही विक्टिम की जाँच होती है,आरोपी निर्दोष हो तो फिर उलटा केस बनता है कि विक्टिम कटघरे मे खड़ा होता है और अक्यूज़्ड कहलाता है।
लड़की थाने न जाए इसकी वकालत का मेरा कोई इरादा नही है, केवल इसके कारण को समझने का प्रयास कर रही हूँ।

खैर ,
अविनाश निर्दोष होंगे तो उनके साथ भी इसी जज़्बे से खड़े होंगे और लिखेंगे !

लड़की का नाम-चरित्र बताने वाला कमेंट हटा दिया गया है।

स्वप्नदर्शी said...

This question is not related to this specific case, but in general to the law and its application in India.many years ago I had a conversation with a lawyer friend and this is what I recall.

In India, I have never seen indeed a court trial for anything, except in movies. But in America, normal people like me can participate as a member of jury, indeed can have a vote in favor or against the accused.


I think in India, the accusation is enough to put somebody behind the bar, without verifying the facts and it becomes the responsibility of the accused to prove that he is not guilty.

In America, on the other hand, the police or district attorney has to work hard to accumulate enough evidence, to prove that suspect can be accused of crime. So the duty lies with the police or legal authorities to prove that suspect or accused is a culprit. Until its proven, suspect is considered innocent.

Sujata I am reading your comments, and mine and this what I think is the root cause of difference in our arguments because we have two view points.

Now question is how the laws (which serve certain purpose) shape the consciousness of individuals in a given society?

सुजाता said...

स्वप्नदर्शी जी ,
आपकी बात सही है। यह वो देश है जहाँ लड़की जब सड़क पर निकलती है तो शाम घर लौटने तक वह न जाने कहाँ कहाँ छेड़ी जाती है,बस मे जाने कहाँ कहाँ छूने की कोशिशें होती हैं, फब्तियाँ कसी जाती हैं ...ऐसे मे कोई लड़की जो बिहार से पढने के लिए आई हो ,उसके लिए यह कहना कि मेरे साथ शिक्षक ने बदतमीज़ी की ,तुरंत उसके लिए पढाई के रास्ते बन्द कर देगा।माँ बाप बुला लेंगे वापस और बान्ध देंगे किसी के बर्तन मांजने के लिए उम्र भरके लिए ।
हद है कि कितने आराम से यहाँ लोग किसी ऐसी लड़की के चरित्र के चीथड़े उड़ा रहे हैं जिसके बारे मे वे कुछ नही जानते,क्योंकि वह तो ब्लॉग नही लिखती न। वे यह भी जानते हैं कि आने वाले दिनों मे भी उस लड़की से इनका कोई वास्ता नही पड़ने वाला, वास्त पड़ेगा तो उससे जिसे आप ब्लॉग पर लिखते हुए पिछले दो साल से जानते हैं।

किसी एक पक्ष पर खड़े होते हुए कम से कम आप दूसरे पक्ष को सिरे से बे ईमान तो मत कहिए

Anonymous said...

Only Avinash is saying that he was not allowed to put his point of view. And its nothing the person whose is on the receiving always says this. Point how we can know whether he was given a listening or not. May be he was not able to satisfy the concerned people and that is why he was removed from the position.

Anonymous said...

Only Avinash himself is saying that he was not allowed to put his point of view. When we are saying that , that there is no evidence of rape, then there is no evidence that chance was not given to him to put his point of view. And its nothing new the person whose is on the receiving always says this. Point is how we can know whether he was given a listening or not. May be he was not able to satisfy the concerned people and that is why he was removed from the position.

स्वप्नदर्शी said...

I agree with Sujata, that in circumstances, its very difficult for a women to bring up molestation or rape related charges against somebody and requires a lot of courage.

Anonymous said...

जो लोग अविनाश को जानते हैं, वो जानते हैं कि वो एक घटिया आदमी है। इस मामले में साज़िश वाली थ्योरी में इसलिए दम नहीं है, क्योंकि खुद उसने अपनी सफाई में माना है कि उसने लड़की को दफ्तर बुलाया और उसे घर छोड़ने का ऑफर दिया और घर जाकर छोड़ा भी। क्या साज़िश करने वाला उसके दिमाग में बैठकर साजिश कर रहा था, जो उसने लड़की को बुलाया और फिर उसे छोड़ने का ऑफर दिया? सच तो ये है कि अविनाश ऐसा ही है। चूंकि आपलोग उसे उसके ब्लॉग के माध्यम से जानते हैं इसलिए उसके लिए सहानुभूति हो रही है और चूंकि आपलोग उस लड़की को नहीं जानते, इसलिए उसकी मनस्थिति का अंदाज़ा नहीं लगा पा रहे। कुछ मित्रों ने उस लड़की के चरित्र पर भी टिप्पणी की है। वो यह भूल रहे हैं कि आरोप लगाने वाली लड़की वह कोई वेश्या या कॉल गर्ल नहीं, बल्कि देश के एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता संस्थान में पढ़ रही छात्रा है। क्या उसे अपनी इज्जत और करियर का ख्याल नहीं होगा? आखिर वह क्यों किसी को फंसाने के लिए अपनी इज्जत दांव पर लगा देगी? यह आपलोगों की स्त्रीविरोधी मानसिकता बोल रही है, जो स्त्रियों को सिर्फ भोग की वस्तु समझती है। अविनाश के पैरोकार उसे वामपंथ और स्त्रीवाद से जोड़ रहे हैं। आखिर कितना जानते हैं वो अविनाश को? क्या उन्हें पता है कि वो किस दर्जे का अय्याश और कुंठित आदमी है? क्या उन्हें उसका पुराना इतिहास मालूम है? क्या उन्हें पता है कि पिछले दफ्तरों में उसने क्या-क्या गुल खिलाए और किन हालात में पिछले दफ्तरों से भी उसे निकाला गया? आखिर उसी के खिलाफ क्यों होती रहती हैं साजिशें? क्या दास इतना महान और नामचीन व्यक्ति है कि उसके खिलाफ इस स्तर की साजिश होगी? दास के वकीलो, आपलोग भी या तो उसी जैसे हो या फिर भोले हो या अनभिज्ञ हो। सच ये है कि दास बहुत गंदा आदमी है। पहले भी उसपर बलात्कार की कोशिश के आरोप लगे हैं। अभी वह इतना बड़ा नहीं हुआ है कि उसे फंसाने के लिए बार-बार लड़कियों को मोहरा बनाया जाएगा। जहां तक उस लड़की के पुलिस में नहीं जाने का सवाल है तो आप जानते हैं कि वह क्यों नहीं गई होगी। वह निश्चित रूप से उस फजीहत और परेशानी से बचना चाहती होगी, जो सबको पता है कि पुलिस में एक बार चले जाने पर तमाम औरतों को झेलनी पड़ती है। उसके पुलिस में नहीं जाने को अविनाश का ढाल मत बनाओ, उसे उस लड़की की मजबूरी के तौर पर देखो।

Anonymous said...

आपने जो कहा है सही कहा है लेकिन दिक्कत यह है कि हमारे समाज में तो यही हो रहा है । जांच किसका होता है और आरोपी कौन होता है ।

Anonymous said...

अले राम ले...लाम लाम ये त्या हुआ
तब हुआ छोड़ो ये ना पोछो

Anonymous said...

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