Friday, February 20, 2009

स्त्री का कंटेंट पर कोई नियंत्रण नही है


कहने को स्त्री का दखल हर नए क्षेत्र मे है,जहाँ वह पढ लिख कर अपनी योग्यता के बलबूते पहुँच रही है।ऐसे मे जब रवीश ने जेन्डर के सवाल को पत्रकारिता के लेखन से जोड़ा तो लगभग यह सामने आया कि कंटेंट पर स्त्री का नियंत्रण नही है, डिसीज़न मेकिंग की बात तो दूर वह अपनी बात अपने शब्दों मे भी नही कह पा रही है ,एंकरिंग फिर भी सुलभ है जो किसी रैम्प पर किसी और के बनाए परिधानो की प्रदर्शनी के लिए किए जाने वाले कैट वॉक जैसा है।झलकती है तो केवल स्त्री की दर्शनीयता,कमनीयता ....उसकी योग्यता नही ...अपनी भाषा तक नही...वहाँ दर्ज ये कमेंट सोचने को विवश करते हैं-

SHASHI SINGH said...
कहीं ऐसा तो नहीं तो कि पुरुष प्रधान (?) न्यूज़ डेस्क पर बैठा कुंठित पत्रकार इस बात का बदला ले रहा है कि तमाम काबिलियत के बावजुद महिला नहीं होने की सज़ा के तौर पर उसे डेस्क के थैंकलेस जॉब की कोल्हू में जबरिया जोता जा रहा है?

February 14, 2009 10:10 PM
सुजाता said...
विचारोत्तेजक लेख ! स्त्री की भाषा भी उसकी अपनी नही है,यह केवल पत्रकारिता मे नही है,इसलिए सचेत होकर अपनी स्त्री भाषा स्त्री विमर्श की भाषा गढने का वक़्त है।उपमान मैले हो गए हैं।
स्त्री लिखेगी तो भी लिखवाने वाला जब तक पुरुष है या पुरुष की पोज़ीशन /ऑप्रेसर की स्थिति मे बनी स्त्री लिखवा रही है ,तो भी यही लिखा जाएगा।
दर असल यह पूरी की पूरी व्यवस्था की संरचना का मामला है जिसमें आधिकारिक तौर पर मस्क्यूलिनिटी को सर्वोच्चता प्राप्त है।आप नए स्ट्रक्चर खड़े कीजिए वहाँ भी यह जेंडर प्रॉबलम तुरत से खड़ी हो जाएगी।

February 14, 2009 10:58 PM

kiran said...
नमस्कार सर,
ये जेंडर प्रॉब्लम है या नहीं..ये नहीं कह सकती...हां इसमें दो राय नहीं कि टीवी में..खासकर हिन्दी मीडिया में गहरी सोच और संवेदनशील महिला पत्रकारों की कमी जरुर है...जो विषयों को समझते हुए..लिख रही हों...या जिन्हें लिखने का मौका दिया जा रहा हो...मैं एक छोटे चैनल में हूं..मगर खुश हूं कि मुझे लिखने का अवसर मिलता है..लेकिन यहां खालीपन बहुत बड़ा है.....

February 15, 2009 1:53 PM
kiran said...
इसके अलावा आज उन लोगों की भरमार है..जिनका लेखन सतही होने के बावजूद...वे सीनियरर्स की प्रशंसा के पात्र बनते हैं...एक हद तक ये भी कह सकते हैं कि आज सतही लेखन की ही मांग है...जो कम से कम..में फटाफट एक पैकेज लिख दें...जिसमें गहराई कम...लफ्फाज़ी ज्यादा हो....वैसे, मुझे खुशी है कि आपकी और हिन्दी टीवी मीडिया के कुछ और गिने चुने पत्रकारों ने हिन्दी की अस्मिता...उसकी गरिमा को कायम रखा है....जो मुझ जैसों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हैं..और हमें आगे बढ़ने का हौसला देते हैं.....आप ऐसे ही लिखते रहें..इन दिनों आपकी विशेष रिपोर्ट..बेमिसाल लग रही है..खासकर मीडिया पर आपका प्रहार बहुत भाया....

February 15, 2009 2:00 PM

Dipti said...


ये तो नहीं कहा जा सकता है कि महिलाओं की लेखनी उग्र नहीं होती है या नहीं हो सकती है। लेकिन, ये सच है कि महिलाओं को लिखने लायक बहुत कम लोग मानते हैं। मेरी पहली नौकरी में ही मुझे इस बात का सामना करना पड़ था। मुझे न तो राजनीति की ख़बर लिखने दी जाता थी और न ही क्राइम की। हां कही कोई भजन कीर्तन हुआ तो वो मेरी झोली में ज़रूर गिर जाता था।


February 16, 2009 2:48 PM

मनीषा पांडेय said...
I am 100 % agree Ravish. Striyon ke pas sachmuch apni bhasha nahi hai. Jo thoda bolati hai unki bhasha bhi khud ki nahi hoti. Apni svatv ke sath apni bhasha arzit karne ka sagharsh bhi abhi hona baki hai..

February 19, 2009 3:56 PM

neelima sukhija arora said...
रवीशजी, आपका यह पोस्ट थोड़ा देरी से पढ़ पाई, इसका अफसोस है, लेकिन यह अफसोस इतने सारे कमेंट्स पढ़कर अफसोस नहीं रहा। टीवी की आक्रामक भाषा और चाकू की तरह दिमाग में जख्म करती स्क्रिप्ट्स हम सभी को परेशान करते हैं, आपके एक प्रोफेसर मित्र ने इसका एक अलग सा विश्लेषण भी कर दिया, जो कहीं न कहीं जेंडर बहस भी खड़ी कर रहा था। और आपने उससे भी बेहतर ढंग से समझाया।
एंकर तो आपको बड़ी संख्या में महिलाएं या लड़कियां मिल जाएंगी लेकिन जब बात का‍पी लिखने की आती है या रिपोर्टिंग की आती है तब लड़कियां कहां खो जाती हैं।
बात बहुत सही भी है, ज्यादातर एंकर लड़कियां होंगी, इस बात पर हम सब का बस चलता भी तो कितना है, यह तो मालिक या मैनेजमेंट तय कर देता है कि एंकरों में कितनी स्त्रियां रहेंगी और कितने पुरुष।
रही कापी लिखने की बात,शायद लड़कियां कापी लिखतीं तो वो अलग ही तरह की होती। मेरा ख्याल है कि यह भाषा किसी सभ्य आदमी की हो ही नहीं सकती है कि घर में घुसकर मारो पाकिस्तान को। जब कोई सभ्य लड़का ही ऐसा भाषा को प्रयोग नहीं करता है तो लड़कियां से ऐसी आशा करना ही बेमानी है।
मैं भी प्रिंटर डेस्क पर ही काम करती हूं, वो भी अखबार में । जहां मैं लगभग हर रोज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तालिबान, ओसामा बिन लादेन और अमेरिका पर स्टोरीज लिखती या रीराइट करती हूं। पर मुझे याद नहीं आता कि मैंने या मेरे साथियों ने कभी भी इतनी ओछी भाषा का प्रयोग किया हो। मेरा मानना है टीवी में भी यदि ज्यादातर लड़कियां स्क्रिप्ट्स लिखने लगें तो इतनी हल्की भाषा का प्रयोग तो नहीं ही होगा।
आपके कमेंट्स में भी लोगों ने मजेदार विश्लेषण लिखे हैं- मुंबई से किसी ने लिखा है ज्यादातर महिला पत्रकारों को भाषा से ज्यादा अपने मेकअप की चिंता होती है ... वो वही पढ़ती है, जो लिखा रहता है ..भाषा के मतलब से उन्हें क्या मतलब है .
शायद इन महोदय को यही पता नहीं है कि मेकअपस सिर्फ एंकर के लिए होता है, हर महिला पत्रकार एंकर नहीं होती है। भैया आईआईएमसी में आज भी मैक्सिमम लड़कियां टा‍प करती हैं आपको नहीं पता हो तो मैं बता दूं। जिस साल मैंने भी मा‍स का‍म किया था ज्यादातर लड़कियां टापर थीं। वहां पर स्टूडेंट्स का‍पी लिखने और रिपोर्टिंग करना ही सीखते हैं,अगर ये वहां का सच है तो आय एम सा‍री आप आइने की एक तरफ ही देख रहे हैं दूसरा हिस्सा भी देखिए।

February 19, 2009 4:01 PM

7 comments:

Arvind Mishra said...

क्या भाषा-अभिव्यक्ति का भी लिंगीकरण अवधारित है -काफी रोचक और जुगुप्साभरा !!

सुजाता said...

बेशक , आप तो शास्त्र ज्ञाता हैं , आपको तो ऐसा अनजान नही बनना चाहिए , गाली तो छोटा उदाहरण है,मुच्छड़ भाषा के बहुत उदाहरण भरे पड़े हैं ...........

Anonymous said...

http://virodh.blogspot.com/2009/02/blog-post_6053.html

निर्मला कपिला said...

ये पुरुशोचित अहं की भाषा है

kumar Dheeraj said...

सूजाता जी इसमें घबराने की कोई बात नही है अगर रविश जी ने ऐसा विचार उठाया है तो इसके लिए आपको इंतजार करना पड़ेगा । क्योकि इस विचारधारा का जबाब आप टिप्पणी से नही दे सकते है इसके लिए तो आपको दिखाना प़ड़ेगा और गिनाना पड़ेगा । ये सच है कि रविश जी अब टेलीविजन दुनिया के बड़े पत्रकार हो गये है तो उनका चश्मा बड़ा जरूर हो गया है लेकिन जबाब देने के लिए माकूल समय तो होना चाहिए । वैसे बहस रोचक है लेकिन शीतल राजपुत और नाम नही लेना चाहूगा दूरदशॆन में भी कई नामी महिला पत्रकार है जिनके थिंक टैक का कोई सानी नही है । शुक्रिया

Sanjay Grover said...

********ज़रा सी आलोचना कीजिए तो तीन लोग बंदूक लेकर आ जाते हैं कि आप कौन से दूध के धूले हैं। काम तो करते नहीं,भाषण देते हैं। हमारा समाज चूंकि मूलत एक बेईमान समाज है इसलिए ईमानदारी की एक पंक्ति की भी बात करें या आलोचना का एक सवाल भी उठाया नहीं कि कसौटी लेकर मुंह पर घिसने लगता है कि खुद तो कार पर चलते हैं और पर्यावरण और प्रदूषण पर बोलते हैं। ईमानदार होने की अग्नि परीक्षा हर बार जंगल में जाकर नक्सल होकर नहीं दी जा सकती।******
aur is baat ko maiN fir se rekhaNkit karna chahuNga :--
******हमारा समाज चूंकि मूलत एक बेईमान समाज है इसलिए******
एक पहलू और भी है । क्या यह उग्रता वास्तविक है या बनावटी है ? क्या दर्शको को खुश करने हेतु एक अभिनय मात्र है ! और अगर वास्तविक है और संदर्भ पाकिस्तान, मुसलमान या दलित-पिछड़े वर्ग हैं तो स्त्रियो से भी बहत ज़्यादा उम्मीद नही रखी जानी चाहिए। धर्म, परम्परा, मर्यादा, ईश्वर वगैरह में स्त्रियो का विश्वास कही ज्यादा है। ऊँच-नीच मे भी। ईश्वर और धर्म के रहते वर्ण-जाति से मुक्ति असंभव सी ही लगती है। मंैने टीवी पर, एम्स के सामने, उन्ही पढ़ी-लिखी लड़कियो को दलित-पिछड़ों को दिए जाने वाले आरक्षण का वीभत्स विरोध करते देखा है जो महिला-आरक्षण उछल-उछलकर माँगती हं।ै आभिजात्य और कथित सवर्णता को लेकर कथित उच्च वर्ग की स्त्रियों के इतने भयानक दुराग्रह को देखकर ये लगने लगता है कि शरद यादव या मुलायमसिह अगर (स्त्री)आरक्षण मे आरक्षण की मांग उठाते हैं तो गलत क्या करते हैं !
इस अर्थ मे स्त्री टीवीकर्मियों के लहजे़ की उग्रता तो कम हो सकती है भाषा की सम्भव नही लगती।
-संजय ग्रोवर

सुजाता said...

कुमार धीरज जी ,
इसमे घबराने की कोई बात नही है , बल्कि मेरा कहना यही था कि रवीश जी ने एक अच्छा सवाल उठाया जिसके जवाब मे आई टिप्पणियाँ कुछ संकेत कर रही हैं और उसी से एक दिशा मे बढ पा रहे है।

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