Saturday, February 21, 2009

स्त्री भाषा-पुरुष भाषा का भेद दर असल प्रजा की भाषा और सत्ता की भाषा का ही भेद है

विजय गौड़

चोखेर बाली ने रवीश जी के आलेख के बहाने भाषा की जो बहस छेड़ी है, रवीश जी के आलेख को ध्यान में रखकर कहूं तो वहां मूल रूप से एक भाषा के भीतर ही शब्द संयोजन और उसके भाषिक विन्यास का मामला है। भाषायी भिन्नता के सवाल पर मुझे तेलगू के कवि वरवर राव की वह टिप्पणी याद आ रही है जिसमें वे भाषा के दो रूपों का जिक्र करते हैं - एक सत्ता की भाषा और दूसरी जनता की भाषा। यानी यहां वे दो भाषाओं के समूल विभेद की बात करते हैं। भाषायी विभेद को वे एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्यायित करते हैं। लिंगभेद की बजाय उत्पादन के यंत्रों पर कब्जा किए शासक वर्ग और उसके द्वारा शोषित जनता के आधार के पर उसका विश्लेषण करते हैं।
एक ही भाषा के भीतर उसके विन्यास के सवाल पर भाषाविद्ध नोम चॉमस्की सृजनात्मकता पर बल देते हैं। उनका मानना है सृजनात्मकता मन की क्षमता है, जो किन्हीं नियमों के अंतर्गत अब तक न सुनी गयी रचनाओं को भी पहचानता है और नये-नये वाक्यों का उत्पादन (निष्पादन) करता है। यानी निष्पादन की इस प्रक्रिया को कोई भी भाषा-भाषी बिना किसी लिंगभेद के ग्रहण करता है। स्वंय हिन्दी के भीतर ही देख सकते हैं कि किसी भी वस्तु के लिंग को निर्धारित करते हुए हिन्दी भाषी स्त्री हो चाहे पुरुष, कभी कोई गलती नहीं करते। एक स्त्री भी "बस जाती है" कहती है और एक पुरुष भी "ट्रक जाता है" कहता है। यहां बस और ट्रक के रूप्ा, आकार या गति के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दी भाषा के भीतर मौजूद सामंतीय संस्कार, जो सिर झुका कर काम करने वाली स्त्री की तस्वीर हमारे सामने रखते हैं, वैसे ही सार्वजनिक रूप से सेवा के भाव के साथ कार्य में जुती बस को स्त्रीलिंग और उसी सामंतीय संस्कारों के चलते बलशाली से दिखते और अपनी मर्जी से संचालित होते भाव को लिए ट्रक को पुल्र्लिंग बना देते हैं। इस तरह से यदि देखना चाहें तो एक हद तक हिन्दी में वस्तुओं के लिंग निर्धारण की व्याख्या संभव हो सकती है। यद्यपि यह मुमिल नहीं है। अन्य भी और कई नियम हो सकते हैं जिन पर गम्भीरता से विचार करने वाले स्वत: पहुंच पाएं। यहां तो बस यह उल्लेखनीय है कि भविष्य में उत्पादित होने वाली किसी भी वस्तु जिसके अस्तीत्व की भी आज कल्पना संभव नहीं, के लिंग निर्धारण में किसी हिन्दी भाषी पुरुष और स्त्री में भी शायद ही मतभेद होे। अब सवाल यह है कि मीडिया की भाषा में, जो सनसनी और चौंकाऊपन दिखाई दे रहा है क्या उसके कारणों को रवीश जी की दृष्टि, जो इसे लिंगभेद के कारणों की उपज मानती है, से विश्लेषित किया जा सकता है ?
मेरी समझ में टी आर पी को बढ़ाने के लिए जो बाजारु किस्म के दबाव हैं, जिसके पीछे मुनाफा एक मात्र शर्त है, वही एक मूल बिन्दू हो सकता है जो इस प्रवृत्ति को विश्लेषित कर पाए। यहां स्त्री और पुरुष के बदल जाने पर शायद ही कोई बदलाव दिखे, ऐसी आशंका रखना चाहता हूं।
बाजार सनसनी पैदा करता है और सनसनी से भरी खबरें ही बाजार हो सकती हैं। बाजार की चमक-दमक में ही वो चुधियाट हो सकती है जो झूठे सपनो का संसार रच सकती है और उन सपने के पूरे न हो सकने के लिए किसी सनसनी भरी खबर में ही जनता की लामबंदी को रोकना संभव है। सनसनी भरी खबर ही ज्यादा दर्शक बटोरू भी हो सकती है। जितने ज्यादा दर्शक जिस रिपोर्ट के कारण मिले उतनी पौ बारह उस पत्रकार की जिसकी वह रिपोर्ट है। ऐसे ही सुरक्षित रह सकती है हमारी रोजी-रोटी, यह बात मीडिया का हर स्त्री-पुरुष जानता है। इसलिए उनका शाब्दिक संयोजन भी उसी प्रवृत्ति के चलते है जो बेशक दर्शक को ज्यादा देर तक भले ही न टिकाए रख पाए पर चौंका कर अपने पास तक तो ले आए। सिर्फ और सिर्फ टी आर चाहिए और उस टी आर पी के आधार पर ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन। बल्कि मुनाफे की यह मानसिकता हमारे भीतर जब महत्वांकाक्षा के रूप में होती है तो ब्लाग पर उस एक क्लिक के लिए ही जो हमारी टी आर पी को बढ़ाने वाला होता है, क्या हमें सनसनीखेज शीर्षको की खोज में परेशान नहीं करता। महत्वाकांक्षा की इस प्रव्त्ति से संचालित स्त्री और पुरुष ब्लागरस में भी यहां कोई खास फर्क शायद ही दिखे।

8 comments:

Vinay said...

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Sanjay Grover said...

बल्कि मुनाफे की यह मानसिकता हमारे भीतर जब महत्वांकाक्षा के रूप में होती है तो ब्लाग पर उस एक क्लिक के लिए ही जो हमारी टी आर पी को बढ़ाने वाला होता है, क्या हमें सनसनीखेज शीर्षको की खोज में परेशान नहीं करता। महत्वाकांक्षा की इस प्रव्त्ति से संचालित स्त्री और पुरुष ब्लागरस में भी यहां कोई खास फर्क शायद ही दिखे।
Achchha pakrha hai.

Ashok Kumar pandey said...

बिलकुल सही कहा। वर्ग तथा जाति एवम लिंग के आधार पर विभक्त सामाजिक व्यवस्था मे भाषा भी विभाजन्मुक्त नही होती।
भाषा का भी अपना समाजशाष्त्र होता है।

मसिजीवी said...

समाज भाषाविज्ञान लैंगिक सत्‍ता विमर्श को स्‍वीकार करता है, हिन्‍दी में भी भाषा वैज्ञानिक आरके अग्निहोत्री भाषा के बीच इस सत्‍ताई संसार की परतें दिखाते रहे हैं।

किंतु इसके साथ ही एक दूसरा (संभवत कुछ भाववादी कहा जाए) रूप वह है जो अनामिका अक्‍सर अपने व्‍याख्‍यानों तथा लिखित रूप में कहती रही हैं... वे पुरुष भाषा को उस मुच्‍छड़ भाषा के रूप में पहचानती रही हैं जो स्‍त्री भाषा (के घुमरो, संश्‍लिष्‍टता, सूक्ष्‍मता के अभाव के कारण) से कम समर्थ होने के कारण ऐसी है. इसका भी संदर्भ सत्‍ताई अन्‍याय से ही है पर कुछ दूरी का है।

विनय (Viney) said...

विचारोत्तेजक लेख के लिए शुक्रिया! मैं बस और ट्रक के लिंग निर्धारण के विश्लेषण से ख़ास-तौर से प्रभावित हूँ.

editor said...

Umda blog hai. Unfortunately I hadn't come across Chokherbali until now.

Kindly ensure that you leave paragraph after every 2-3 lines as it becomes too taxing to read the continuous running text.

tere maathe pe ye aaNchal bohat khuub hai lekin
tuu is aaNchal ko ek parcham banaa letii to achchaa tha

(Majaz)

Parcham to aap ne banaa hi liya. Mubarakbaad.

Dev said...

बहुत सुंदर रचना.....अच्‍छा लगा पढकर, बहुत सुंदर !!
शुभकामनाएं........ढेरो बधाई कुबूल करें....

Anonymous said...

उसके बाद पंकज पचौरी ने ई-मेल भेजा कि आखिर एनडीटीवी इंडिया ने ये ख़बर क्यों चलाई। पंकज पचौरी जो थोड़ी देर पहले तक ख़बर चलाने के हक में थे अब ई-मेल पर नैतिक बन गए। पंकज के साथ सोनाल जोशी ने खूब घड़ियाली आंसू बहाए। मनीष कुमार ने ये कह दिया कि उन्होंने मुंबई में सारा इंतजाम दबाव में किया। रवीश कुमार जैसे लोगों ने जमकर राजनीति की और नतीजा ये हुआ कि थोड़ी ही देर में इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया।

अगली रात मेरी छुट्टी थी और मैं प्रेस क्लब में अपने दोस्तों के साथ बैठा था। तभी करीब नौ बजे रवीश कुमार का फोन आया। बात बढ़ चुकी थी और कंपनी के तथाकथित नैतिक लोगों को किसी ना किसी की बलि चाहिये थी। मैं थोड़ा तनाव में था। नौकरी की बात को लेकर नहीं बल्कि लोगों के ढोंग और पाखंड को लेकर। रवीश कुमार ने मुझसे संवेदना जताने की कोशिश की। मैंने थोड़ी शराब पी ली थी और हल्के नशे में था। दुख और गुस्से ने नशे को थोड़ा और बढ़ा दिया। तब रवीश कुमार से मैंने कहा कि नौकरी जाए तो जाए लेकिन मैं पंकज और सोनाल जोशी को ई-मेल पर जवाब जरूर दूंगा। रवीश ने मुझे बताया कि वो दोनों बहुत खतरनाक हैं और जवाब देने पर बात आगे बढ़ जाएगी। तब मैंने कहा कि नौकरी की चिंता मुझे कभी नहीं रहती। निजी क्षेत्र में कौन सा ऐसा शख्स होगा जिसकी नौकरी कभी गई नहीं होगी।
सुबह ९.३० बजे सोनाल जोशी का फोन आया। वो हिंदी के बहुत बड़े पत्रकार प्रभाष जोशी की बेटी हैं और एनडीटीवी की इंटरटेनमेंट हेड हैं। सोनाल ने मुझसे पूछा कि हमारी एंकर इस ख़बर को अहम ख़बर क्यों कह रही है?
Kya yahee karan hai ki ndtv men dalito ki samasya par bhi prabhash ji bolte hai aor muslim ki samsya par bhi. kya tehalka men bhi joshi-chakrdhar-pachori-puranik ka brahman chaugadda inhi karno se jama hai.
http://www.chaukhamba.blogspot.com/

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