Friday, February 27, 2009

मां का जीवन

राजकिशोर

तीन दिन पहले हमसे एक भारी अपराध हुआ। घर की मरम्मत कर रहे एक कारीगर ने पुरानी खिड़की को तोड़ कर नीचे गिराया, तो एक कबूतर का घोंसला भी उजाड़ दिया। तिनकों का वह बेतरतीब समवाय फर्श पर आ गिरा जो उस कबूतर और उसके दो नवजात शिशुओं का घर था। खिड़की के एक टुकड़े पर दोनों शिशु, अपनी आसन्न नियति से अनजान, अपने पैर हिला-डुला रहे थे। अभी उनकी आंखें भी नहीं खुली थीं। पंखों में कोई जान नहीं थी। यह चार्ल्स डारविन का दौ सौवां जन्म दिन है, इसलिए मैंने अनुमान लगाया कि जैसे हम मनुष्यों के पूर्वजों ने कभी यह तय किया होगा कि सामने के दोनों पैरों का प्रयोग हाथों के रूप में करना चाहिए, वैसे ही पक्षियों के पुरखों ने कभी यह इच्छा की होगी कि सामने के दोनों पैरों का प्रयोग पंख के रूप में करना चाहिए। तय किया था या इच्छा की थी, यह कहना शायद ठीक नहीं है। यह तथा पशु-पक्षियों में इस तरह के अन्य परिवर्तन जीवन के विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया में ही हुए होंगे। मैंने इसके पहले पक्षियों के अंडे तो देखे थे, पर उनके नवजात शिशु नहीं। उस दिन देखा और मन में ये खयाल आए, तो यह बात भी याद आई कि देखना ही जानना है। पढ़ा है कि दर्शन शब्द की उत्पत्ति जिस धातु से हुई है, उसका अर्थ भी देखना ही है।

अपराध बोध की शुरुआत तब हुई जब हम यह सोचने लगे कि अब इन नवजात शिशुओं का क्या होगा। क्या ये जीवित रह पाएंगे? वे जिस अवस्था में थे, हम उनके लिए कुछ नहीं कर सकते थे। क्या ये भी विकास की बलि वेदी पर शहीद हो जाएंगे? हमने उनके घोंसले का जैसा-तैसा पुनर्निर्माण किया और कमरे से दूर हट कर इंतजार करने लगे कि शायद इनकी मां आए और इनकी देखभाल करने लगे। जब अंधेरा हो आया और वह नहीं लौटी, तो हम निराश होने लगे। तभी याद आया कि एक दूसरी खिड़की पर बनाए अपने घोंसले में एक दूसरी कबूतर ने अंडे दिए हुए हैं। पत्नी ने सुझाया कि इन बच्चों को उसी घोंसले में रख दिया जाए। शायद कोई सूरत निकल आए।

अगले दिन दोपहर को जो दृश्य दिखाई पड़ा, उससे हम अभिभूत हो गए। एक कबूतर उन दोनों बच्चों के मुंह बारी-बारी से अपने मुंह में डाल कर दुलार कर रही थी। यह दूश्य बेहद आनंददायक था। हममें से किसने युवा माताओं को अपने नवजात शिशुओं को दुलारते-चूमते-उठाते-बैठाते नहीं देखा होगा! उस वक्त स्त्री के चेहरे पर ही नहीं, पूरे अस्तित्व में आह्लाद की जो लहर दौड़ती रहती है, उसका कोई जोड़ नहीं है। यह वह विलक्षण सुख है जो कोई मां ही अनुभव कर सकती है। कबूतरों की मुद्राओं में इतनी बारीक अभिव्यक्तियां नहीं होतीं। क्या पता होती भी हैं, पर हम उन्हें पढ़ना नहीं जानते। सचमुच, हमारे अज्ञान की कोई सीमा नहीं है। हमारे आसपास कितना कुछ घटता रहता है, पर हम उससे अवगत नहीं हो पाते। अपने व्यक्तित्व की कैद दुनिया की सबसे बदतर कैद है। थोड़ी देर बाद हमने पाया कि कबूतर दोनों बच्चों पर बैठ कर उन्हें से रही है। दोनों अंडे भी पास ही पड़े हुए थे। शायद उनके खोल में पल रहे दो जीवन भी सुरक्षित निकल आएं। अब हमने चैन की सांस ली कि हम हत्यारे नहीं हैं।

वह बेचारी कबूतर दिन भर बैठी बच्चों के जीवन में ऊष्मा भरती रही। यह तय करना असंभव था कि उसने दिन भर कुछ खाया या नहीं। हो सकता है, बीच-बीच में कुछ देर के लिए घोंसले से बाहर निकल कर वह कुछ चारे का जुगाड़ कर लेती हो। हो सकता है उसका सामयिक प्रेमी ही कुछ ला कर वहां रख जाता हो। जिस बात ने मुझे सबसे अधिक परेशान किया, वह यह थी कि अगर यह मां कबूतर एक हफ्ते भी इन बच्चों (यह भी पता नहीं कि ये बच्चे उसी के थे या उसने उन्हें अनायास ही गोद ले लिया था) को सेती है, तो हम मनुष्यों की भाषा में उसके सात कार्य दिवस नष्ट हुए। अगर वह कहीं नौकरी करती होती, तो उसके सात दिन के पैसे कट जाते। इन सात दिनों तक वह ममता की कैद में अपने छोटे-से घोंसले तक सीमित रही और मुक्त आकाश में उड़ने तथा अठखेलियां करने से वंचित रही। इसका हरजाना कौन देगा? यह तो तय ही है कि कुछ दिनों के बाद बच्चे उड़ जाएंगे और अपनी अलग जिंदगी जीने लगेंगे। तब वे न तो अपनी मां को पहचानेंगे और न मां उन्हें पहचान सकेगी। एक स्त्री ने सृष्टि क्रम को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की और किस्सा खत्म हो गया।

बताते हैं कि आदमी के बच्चे का बचपन दुनिया के सभी जीवों में सबसे लंबा होता है। उसका गर्भस्थ जीवन भी सबसे लंबा होता है। इस पूरी अवधि में उसकी मां को कठिन तपस्या करनी पड़ती है। उसका अपना जीवन स्थगित हो जाता है। आदमी का बच्चा ज्यादा देखरेख और सावधानी की भी मांग करता है। यह अधिकतर मां के जिम्मे ही आता है, हालांकि आजकल पति लोग भी कुछ सहयोग करने लगे हैं। जब संयुक्त परिवार का चलन था, तब मां को कुछ प्रतिदान मिल जाता था। आजकल बड़ा होते ही बच्चे फुर्र से उड़ जाते हैं। वे एक ही शहर में रहते हैं, तब भी मां-बाप से उनकी मुलाकात महीनों नहीं हो पाती। जिनके बच्चे परदेस चले जाते हैं, उनका बुढ़ापा निराश्रय और छायाहीन हो जाता है। ऐसी मां को शुरू में भी कष्ट सहना होता है और बाद में भी। मातृत्व की इतनी बड़ी कीमत चुकाना क्या कुछ ज्यादा नहीं है? अन्य पशु-पक्षियों की तुलना में मानव मां इतना त्याग क्यों करे? आंचल में दूध आंखों में पानी का पर्याय क्यों बने?

शायद इसीलिए पश्चिम की आधुनिक स्त्री मातृ्त्व की महिमा को ताक पर रख कर अपना जीवन जीने में कोताही नहीं करती। गर्भावस्था के आखिरी महीने ही उसकी गतिविधियों को सीमित करते हैं। गर्भ-मुक्त होते ही वह फिर पूर्ववत सक्रिय हो जाती है और बच्चे अकेले या बेबी सिटरों की निगरानी में पलते-बढ़ते हैं। बाद में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए खिलौने के ढेर, टेलीविजन और वीडियो गेम दे दिए जाते हैं। हमारे महानगरों में भी यह चलन शुरू हो गया है। स्त्रियां माता का पुराना लंबा रोल निभाना नहीं चाहतीं। यह कैसे तय किया जाए कि मां की पुरानी भूमिका अच्छी थी या आज की भूमिका अच्छी है? पहली भूमिका में मां का जीवन त्याग-तपस्या से भरा होता है और दूसरी भूमिका के कारण दुनिया में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जिन्होंने मां-बाप का प्यार जाना ही नहीं। जाहिर है, जिसे प्यार नहीं मिला, वह प्यार दे भी नहीं सकता। क्या कोई और रास्ता भी है, जिसमें मांओं को अपना जीवन स्थगित न करना पड़े और बच्चों को भी भरपूर प्यार मिल सके?

10 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत ही अच्‍छा आलेख है ... मेरे ख्‍याल से मां को अपना जीवन कुछ दिनों के लिए स्‍थगित करके बच्‍चों के समुचित शारीरिक , मानसिक और चारित्रिक विकास पर ध्‍यान देना चाहिए ... क्‍योंकि आज उसकी उपलब्धियां इस पीढी की मानी जाएंगी ... जबकि बच्‍चों की उप‍लब्धियां आनेवाली पीढी की ... और वो अधिक महत्‍वपूर्ण हैं ... विकास का क्रम बनाए रखने के लिए।

Anonymous said...

जिन्हें प्यार मिला है क्या वे प्यार दे रहे हैं ?

kumar Dheeraj said...

बहुत ही रोचक लेख है । इसके लिये आप बधाई के पात्र है

kumar Dheeraj said...

बहुत ही रोचक लेख है । इसके लिये आप बधाई के पात्र है

Anonymous said...

बहुत ही रोmanचक लेख है । इसके लिये आप बधाई के पात्र है.Ek sher yaad aa gaya-
रुख बदलते हिचकिचाते थे कि डर ऐसा भी था
हम हवा के साथ चलते थे मगर ऐसा भी था

पांव आइंदा की जांनिब, सर गुजिस्तां की तरफ
यूं भी चलते थे मुसाफिर, इक सफर ऐसा भी था

मोना परसाई said...

कैसे तय किया जाए कि मां की पुरानी भूमिका अच्छी थी या आज की भूमिका अच्छी
राजकिशोर जी
आपने कितना अच्छा प्रश्न उठाया है,
इतने भावों से भरे आलेख के लिए साधुवाद

Chhaya said...

Bahut hi umda Chintan tha...
Mera manana hai ki agar pati aur parivar ka thoda sath mile to Maa mamta bhi na chhode aur na hi apani personnel life..
yeh mumkin hai meri nazar mein...
Jaroori nahi ki pyar dene ke liye bahut samay sath bitana jaroori hota hai...
jitna bhi samay aap kisi ke sath rahe sirf uske sath rahe....

Renu said...

bahut hi accha aur samayik vishay ha aapke lekh ka, bahut bahut badhai ! pyaar viheen saamj na ho iske liye kisi ko to kuch balidaan dena ho hoga. ma ko kuch samay ke liye apna career rokna hi hoga ya fir kuch part time, waise to mujhe yeh aj tak samajh nahi aaya ki sab ko samppornta sirf baahar kaam karne me ya aarthik roop me hi kyon lagti ha, kyon kisi office me koi pad paane se apne ko saarthak samajhne lagta ha, kya ha hamaari is soch ka raj?...paisa ya prashansa ki chahat. Kyon ek acche samaaj ka nirmaan karna saarthak nahi lagta ya hame aatmvishwaas nahi deta, aur thoda sa kisi vyavsay me akrna hame safal kehla deta ha?

azad said...

very good
for women international day

Unknown said...

So very very nice

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