Sunday, March 15, 2009

स्त्री मुक्ती आंदोलन में पुरुषों की भागीदारी

अंतर राष्ठ्रीय महिला दिवस के निमित्त लोकसत्ता में श्री मिलिंद चव्हाण का एक लेख पढा । पढ कर लगा कि चोखेर बाली के पाठक शायद इसे पसंद करेंगे । हो सकता है कि यह जानकारी पुरुष पाठकों के लिये महत्वपूर्ण हो । लेख क्यूंकि मराठी में है इसीसे इसका अनुवाद ही प्रेषित है ।
भारत में ही नही अपितु संपूर्ण विश्व में पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था है । इसी कारण जाने अनजाने पुरुषों को स्त्रियों की अपेक्षा ऊँचा और महत्वपूर्ण दर्जा दिया जाता है । सच में देखा जाय तो इस मानने का कोई आधार नही है ।
स्त्री और पुरुष के शरीर रचना का आधार लेकर, जो कि वास्तव में प्रजाति की निरंतरता बनाये रखने के लिये है, समाज में स्त्री तथा पुरुष ने किस तरह रहना, उठना, बैठना और चलना है इस बारे में तैयार किये गये नियम माने ही लिंग आधारित समाज व्यवस्था है । स्त्री पुरुष की वेष भूषा, केश भूषा, चलना, उठना, बैठना, बात करना, खेलना, यहां तक कि सोना, भी उनकी सामाजिक भूमिका के हिसाब से
तय है ।
अनेक घरों में आज भी पुरुष पहले खाना खाते हैं, इसलिये उन्हें ताजा, गरम, खाना भूख के समय जितना चाहिये उतनी मात्रा में उपलब्ध होता है। इसीलिये सुपोषण का अवसर पुरुषों तथा लडकों को स्त्रियों तथा लडकियों की अपेक्षा अधिक मिलता है । स्त्रियों के बाल लंबे होना चाहिये, वे वैसे ही सुंदर लगते हैं ये सामाजिक धारणा हमारे गांवों तथा शहर के काफी वर्गों मे आज भी प्रचलित है । इसमें स्त्री को क्या चाहिये उसे क्या सुविधा जनक है यह मुद्दा कहीं उठता ही नही ।
सुनामी संकट के समय बहुत सी स्त्रियाँ उनके लंबे बाल झाडियों मे फसने की वजह से काल कवलित हो गईं । उसी तरह साडी पेड पर चढने के लिये सर्वथा अनुपयुक्त होने से उनके लिये घातक सिध्द हुई । ये बातें स्त्री की अपनी मर्जी और सुविधा पर छोड देनी चाहिये ।
हमारी एक और सामाजिक धारणा है कि स्त्रियाँ स्वभावत: कोमल और सहनशील होती हैं हमारे समाज मन में पक्की बैठ गई है । कोई भी यह मानने को तैयार नही कि ये सामाजिक ज्यादा है और स्वाभाविक कम । लडकियों को उठते बैठते यह सिखाया जाता है कि उन्हें कैसा बर्ताव करना है या कैसा नही करना, यदि यह सब निसर्गत: होता तो उन्हें यह सब सिखाना नही पडता ।
स्त्रियों की यह भूमिका, पुरुष-प्रधान व्यवस्था चलती रहे इसीसे निर्माण की गई । इसी के चलते, स्त्रियों का आर्थिक पुरुषावलंबन, शारिरिक और मानसिक अस्वास्थ्य का शिकार होना, आत्मविश्वास का अभाव, स्वयं को एक कमतर इन्सान मानना, आदि उनके गुणविशेष बन गये । संविधान के अनुसार स्त्री फुरुषों को समान अधिकार हैं परंतु आज भी अनेक स्त्रियाँ इससे कोसों दूर है । स्त्रीमुक्ती आंदोलन, स्त्री शिक्षा, औद्योगिक क्रान्ति के वजह से स्त्री के इस भूमिका में बदलाव तो आया है फिर भी आज भी पुरुष प्रधानता इस उस रूप में अस्तित्व में तो है ही ।
आज भी
घर की मालमत्ता पुरुष के नाम होती है ।
घर के काम खाना बनाना, सफाई रखना, बच्चा सम्हालना मुख्यत: स्त्री के काम हैं ।
अधिकांश स्त्रियों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता नही होती ।
उम्र, जाति, वैवाहिक स्थिति, आर्थिक स्तर, इससे पुरुष प्रधानता में थोडा फर्क तो आया है पर आज भी अधिकांश स्त्रियों को इसका सामना करना पड रहा है ।
कुछ बंधन इस व्यवस्था के चलते पुरुषों पर भी आते हैं जैसे कि
पुरुष का रोना या खुलकर भावना व्यक्त करना अच्छा नही माना जाता ।
पुरुष को कुटुंब का अर्थार्जन करने वाला कर्ता-पुरुष होना ही चाहिये यह अपेक्षा की जाती है ।
बहुत बार उन्हें अपनी मर्जी की शिक्षा की जगह जिसमें कमाई के साधन ज्यादा हों ऐसी शिक्षा या प्रशिक्षण लेना पडता है ।
परिवार में प्यार करने वाली माँ और अनुशासन रखने वाला पिता ऐसे विभाजन की वजह से प्रेम, वात्सल्य आदि व्यक्त करने पर भी बंधन आते हैं ।
पत्नी के साथ स्नेहपूर्ण बर्ताव करने की इच्छा होते हुए भी, जोरू का गुलाम आदि विशेषणों से बचने के लिये पुरुष ऐसा नही करते । उन्हे अपने पौरुष का बेअरिंग सतत मजबूत रखना पडता है ।
पिछले सौ वर्षो का लेखा जोखा लिया जाय तो स्त्रियों को इन्सान के रूप में मान्यता दिलाने के प्रयत्नों को काफी यश मिला है । फिर भी दहेज प्रथा, पारिवारिक हिंसा, बाल विवाह, अकेली स्त्री के प्रश्न आदि समस्यायें काफी तीव्र हैं ।
इस स्थिति में भी अनेक सुजान पुरुष समानता के लिये प्रयत्नशील हैं ।
अपने घरों मे हम स्त्री को समानता कैसे दिला सकते है ?
पति, पिता, पुत्र, भाई ऐसी अनेक भूमिका में रहते हुए पुरुष ये कर सकते है ।
- सबसे पहले मै एक इन्सान हूँ यह समझना, पुरुषत्व के भार के नीचे दब ना जाना । बेटा रोये , तो , ”क्या लडकियों की तरह रो रहे हो” जैसे वाक्यों का प्रयोग न करना ।
- अपनी पत्नी, मां तथा दोस्त को ना कहने का हक है यह समझना ।
- घर में महिला पुरुष सब एक साथ खाना खायें ऐसी व्यवस्था रखना ।
- बेटी को, बहू को उनकी पसंद का करिअर चुनने को प्रोत्साहित करना ।
- स्त्रियों के स्वास्थ्य की तरफ से उदासीन न होना वरन् उन्हे पोषक आहार तथा औषध उपचार मिले यह व्यवस्था करना ।
- घर के कामों मे भागीदारी करना ताकि स्त्रियों तथा लडकियों को मनोरंजन तथा विश्राम का समय मिल सके ।
- घर की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी के लिये स्त्रियों को प्रोत्साहित करना ।
- लडकियों को मैदानी खेल खेलने तथा मोटर साइकिल आदि वाहन चलाने तथा जूडो कराटे सीखने के लिये प्रेरित करना ।
- पारिवारिक हिंसा को रोकना ।
- स्त्रियों को कमतर बताने वाले या अपमानित करने वाले जोक्स, शब्द या गालियों का बहिष्कार करना ।
- घर जमीन, खेती के कागजों में पुरुष के साथ स्त्री का भी नाम डलवाना ।
- अपने आस पास बाल विवाह या दहेज के खिलाफ आवाज उठाना ।
तो आज से ही शुरु करें ?

मिलिंद चव्हाण

42 comments:

Anonymous said...

उचित लेख, कई बातों से सहमति और यह सूचित करना चाहता हूँ कि कई सारे परिवर्तन हो चुके हैं और कई मामलों में तो स्थिति उलटी हो चुकी है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

पूरी सहमति है इस आलेख से।

मुनीश ( munish ) said...

This matter on the whole is utterly confused. The problem is --men are ,infact, becoming less Manly in real terms and becoming feminine in their attitude ,hence the dissatisfaction among womenfolk. So,the emphasis should be on men becoming real men. No real man can hurt a woman or can tolerate her being abused. I don't know how democratic this platform is ,but let me say without any prejudice to any sex that Let men be men and women be women & any role reversal will be catastrophic. What the society needs is real man and real woman!A woman of course look beautiful with long hair and saree should also stay.

ghughutibasuti said...

बहुत अच्छा लेख है। मिलिंद चव्हाण जी क जितनी सराहना की जाए कम है। आशा जोगलेकर जी ने अनुवाद हम तक पहुँचाया , आभार।
मुनीश जी, अब असली पुरुष व नकली पुरुष की बात तो मैं नहीं जानती। परन्तु यदि आज तक पुरुष नकली थे तो अब असली बन जाएँ, शायद थोड़े बेहतर होंगे। यदि असली थे तो नकली बन जाएँ। थोड़े बदलाव की आवश्यकता तो है ही।
थोड़ा सुन्दर दिखने की कोशिश पुरुष भी करें तो शायद स्त्रियों को भी अच्छा लगेगा। वैसे भारत के अलावा अन्य देशों की स्त्रियाँ साड़ी कम ही पहनती हैं।
घुघूती बासूती

मुनीश ( munish ) said...

Well, Mirage i think a lot of men have already got'em enrolled in jims in order to look good and itz a healthy change, but im still not very enthusiastic about women learning judo 'cos we still don't have enuf coaches in India and i've seen many girls suffer sports-injuries due to wrong training .I think Yoga wud do better for both sexes and it should have been there in the article. U know Yoga is the holistic way of living & u'll never come across a yogi hurling abuses against women or scheming & plotting against women.U know even Shobha ji, one of the greatest feminists of our times, has taken to Yoga recently . So i do agree with ur advocacy for change, but for God's sake don't argue against sarees.

सुजाता said...

बहुत आभार आशा जी , इस लेख को पढवाने , अनुवाद करने के लिए!
मुनीश जी ,

जेन्डरिंग एक सामाजिक प्रक्रिया है और जिन गुणों को हम मस्क्यूलिन और फेमिनिन कहते हैं वे कंट्रास्ट मे नही होते , वे स्त्री पुरुष दोनो मे ही पाए जा सकते हैं , और यह उतना ही स्वाभाविक है , सहज है , प्राकृतिक है।इसमे कोई विचित्र बात नही है।
स्त्री खूब लड़ी मर्दानी हो तो यह तारीफ की बात है और पुरुष अगर संतान को ममता देता है पत्नी की भावनाओं को समझता है , सहानुभूति रखता है तो वह निकृष्ट हो जाता है ! यह एक बड़ा भेदभाव है -मस्क्यूलिन को सम्मान का विषय बना दिया और फेमिनिन को हेय , हीन , कमज़ोर।
दर असल ये दो प्रकार के गुण हैं केवल और इनका संतुलन कर के स्त्री पुरुष दोनो ही का व्यक्तित्व संतुलित हो सकता है।

Renu said...

When i see this blog, I feel that i am very lucky to be born in a family where I nevrfound any discriminations like that, thats why may be I cant understand them so well.
But i feel that we need Men and Women both with their inherent qualities.

मुनीश ( munish ) said...

Absolutely! Balance!! Madhya marg as enunciated by Gautam Buddh.
U know what i mean Sujata ? ultimately nothing will come out of making points of Do's and Dont's. We have enough of laws already . But do they help stop crime against women ? No and they can't. What we need is an overall change in our life-style, our attitude and aboveall our personalities. Itz a tough task ,in fact the toughest one on earth ,but this is the only way in my humble opinion. So there is a need to explore the ways, the training programmes and a practical approach towards bringing BEHAVIOURAL balance.

मुनीश ( munish ) said...
This comment has been removed by the author.
आर. अनुराधा said...

बहस ये किस तल पर आ गई?!! मैं तो हैरान हूं।

Anonymous said...

अच्छा लेख है।
So,the emphasis should be on men becoming real men. No real man can hurt a woman or can tolerate her being abused. I don't know how democratic this platform is ,but let me say without any prejudice to any sex that Let men be men and women be women & any role reversal will be catastrophic. What the society needs is real man and real woman!A woman of course look beautiful with long hair and saree should also stay.
जहां तक मनीष जी की टिप्पणी का सवाल है तI यह उस तरह से असरदार नहीं है जिस तरह से कि इससे ठीक पिछली पोस्ट में छपी यह टिप्पणी है:-
चंदन said...
ऎसे बुद्धिजीवियों को कोटिश: कौटिश: नमन.......आप के विचार अति वन्दनीय हैं....आज आप धर्म को बदलने की सोच रहे हैं..हो सकता है कि आगे चलकर अपने मां-बाप को भी बदल देंगें
नारी शक्ति जिन्दाबाद

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत अच्छे सुझाव हैं। इन्हें सचेतन रूप से लागू करके सामन्ती मानसिकता को निर्मूल किया जा सकता है। बधाई

मुनीश ( munish ) said...

I think nobody can ever say that the suggestions enlisted in the post are not good. Nice suggestions of course. But... seeking their implementation is akin to sprinkling water just on the leaves and hoping the plant will grow!! What matters is watering the roots and whole tree'll be nourished. I simply say go to roots and ask why men behave the way they should not or why society curbs women?Itz utterly useless to make lists of what to do and what not to do.Lists are okay for laundry and grocery shops only. Let us all learn to ask the question. Ask the right question and we'll get the right answer! The right question is a pre-requisite to right answer.It is as simple as that.
And now u Profile Badlu ! Look ,here we are in a conversation and not indulging in a contest of Zordar or otherwise tippneez.

Anonymous said...

"सुनामी संकट के समय बहुत सी स्त्रियाँ उनके लंबे बाल झाडियों मे फसने की वजह से काल कवलित हो गईं । उसी तरह साडी पेड पर चढने के लिये सर्वथा अनुपयुक्त होने से उनके लिये घातक सिध्द हुई ।" ----?????????????????????????????????????????????????

Asha Joglekar said...

इस लेख के शुरू में ही कहा गया है कि पुरुष प्रधान समाज को बनाये रखने के लिये टह व्यवस्था बनाई तथा चलाई गई तो इसका उपाय भी पुरुषों की पहल करने से होगा ।
बंगला देश, श्रीलंका, नेपाल तथा पाकिस्तान में भी साडी पहनावा है खासकर ग्रामीण भागों में तो है ही ।
आग लगने से भी साडी की वजह से कई स्त्रियां अपना जीवन को देती हैं क्यं कि वह आग पकडती ही चली जाती है ।

Sanjay Grover said...

निश्चय ही साड़ी कई मायनों में खतरनाक, अधखुला, अनसिला पहनावा है। इस मुðे को मानवीय दृष्टि से देखना चाहिए। अगर स्त्रीत्व सिर्फ साड़ी पहनने से ही खिलता-खुलता है तो फिर पुरुषत्व को भी धोती में वापिस जाकर अपना अस्तित्व दोबारा से तलाशना चाहिए। काहे सूट-टाई लादे फिरते हो भाई।

मुनीश ( munish ) said...

U too Mister Grover? At least being a male u should have stood up in my defence. There is a man ,the writer of this golden post, who blames saree and long hair for Sunami deaths!Ridiculous indeed!! Now itz ur graciously grand entry condemning
world's most graceful attire ever! Now thats an awefully dangerous place and it will be only sensible for me to admit defeat in this war of words with a promise of never to come back here.

मुनीश ( munish ) said...

Amen! Ameeeeen!

Sanjay Grover said...

THANKS Mr. MUNISH. We do'nt want any male here. We need some BeMels, Emails & Tal-Mels here.

Unknown said...

अरे, अरे मुनीश जी कहाँ चले, ऐसे छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो गये तो फ़िर चल चुकी ब्लॉगिंग… असल में "साड़ी" वाला फ़ण्डा तो ओरिजिनल में मिलिन्द जी ने लिखा ही नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है कि "सुनामी" रोज़-रोज़ नहीं आती और मिलिन्द जी शायद मुम्बई की लोकल में सफ़र करती महिलाओं को भी देख चुके हैं। इसलिये यहाँ जो खामख्याली व्यक्त की जा रही है उसे दिल से लगाने की जरूरत नहीं है, हो सकता है कि आपको इनमें से कई टिप्पणीधारी कल ही किसी "दूसरे खेमे" में वाह-वाह करते मिल जायें… टिप्पणियों को इतना गम्भीरता से नहीं लेना चाहिये मुनीश भाई…

मुनीश ( munish ) said...

Ab bhot der ho chuki Suresh bhai ,bhot der ho chuki! main tab tak koi tippni-fiffni nahin karta brother jab tak koi baat mere dil pe na lag jaye lekin ,lekin... yahan to...ab leave it yaar ja ra hoon main!

सुजाता said...

यह तरीका सही नही कि आप बहस से हर्ट महसूस करने लगें। सबका अपना नज़रिया है और उसे हक है कि अपने नज़रिए को डिफेन्ड करे।
फिलहाल मुद्दा भयंकर तरीके से भटक रहा है।

Prem Farukhabadi said...

good , keep it up.

मुनीश ( munish ) said...
This comment has been removed by the author.
मुनीश ( munish ) said...

A henna-haired wonder boy openly and in most brazen fashion makes an obnoxious remark on saree and none of u chokhers try to show him his place. Great!! u just need professional clap-boys here .

ghughutibasuti said...

मेरे विचार से सारी बहस लेख से हटकर हो गई। अच्छा होगा कि इस लेख को एकबार फिर से पोस्ट किया जाए।
गलत राह मैंने भी पकड़ी। मुझे केवल लेख पर बात करनी चाहिए थी। न कि टिप्पणियों प्रतिटिप्पणी करनी चाहिए थी।
घुघूती बासूती

सुजाता said...

ओह !! तो क्या हम मान लें कि जब स्त्रियाँ स्त्री मुक्ति मे पुरुषों के सहयोग पर बात करेंगी तो यही नज़ारा सामने आएगा ?

कुछ बातें मेरी समझ से बिलकुल बाहर हैं-
जब बहस डीरेल हो ही गयी है तो अब
मुनीश जी से निवेदन है कि जब बात रियल मैन की उठी है तो वे परिभाषित कर दें कि रियल मैन या असल मर्द कौन होता है और फेमिनिन पुरुष कौन होता है? क्योंकि शायद असल समाधान यही समझा जा रहा है कि पुरुष को पुरुष की तरह रहने दें स्त्री को स्त्री की तरह।
यह मंच लोकतांत्रिक है या नही यह तो आप ही बेहतर जानें पर फिलहाल बात चीत का तरीका बिलकुल भी लोकतांत्रिक नही होता दिख रहा टिप्प्णियों में!

सुजाता said...

बहस का लोकतांत्रिक तरीका कहता है कि आप तर्क करें, उदाहरण दें ----व्यक्तिगत टिप्पणियाँ न करें (A henna-haired wonder boy ).
लेख मे यह निर्देश नही दिया गया कि साड़ी को छोड़ दें, यह केवल इशारा है इस बात की ओर की स्त्रियों का पहनावा कई बार उन्हें असुविधा और कष्ट पहुँचाता है - अत: पहनावा चुनते समय स्त्री के सामने अपनी सुविधा का खयाल होना चाहिए (जैसा किसी भी पुरुष के सामने होता है)
साड़ी निश्चित ही बेहद खूबसूरत परिधान है , मुझे पसन्द भी है लेकिन इसे पहन कर अगर मुझे दो बार ब्लू लाइन बस बदल कर , रिक्शे मे बैठ कर इधर से उधर दौड़ भाग करनी पड़े तो उफ्फ ! निकल आए मुँह से। कई बार उल्झ कर गिरते देखा है लड़कियों स्त्रियों को , दुप्ट्टे सम्भालते गिरते पड़ते चलती हैं तो आधा आत्मविश्वास तो यूँ ही खत्म हो जाता है।
मुझे लगता है कि परिधान तय करने की बात उन्ही पर छोड़ दें!

मुनीश ( munish ) said...

देखिये जी ,जैसा कि मराठी के जानकार श्री सुरेश चिपलूनकर की यहाँ की गई टिप्पणी गवाह है , एक तो आपने बगैर क्रॉस-चेक किए ऐसा लेख छापा जिसके मूल पाठ में इस बात का कोई ज़िक्र ही नहीं था की महिलाएं लंबे बालों और साडियों की वजेह से सुनामी की शिकार हुईं , दूसरे श्री मान ग्रोवर द्वारा जब ये कहा गया कि '' We do'nt want any male here. We need some BeMels, Emails & Tal-Mels here.'' तो आप moderator होते हुए भी खामोश रहीं और जैसी कि कहावत है ,'' मौनं स्वीकृति लक्षणं '' । तो अब ऐसे में आपको क्या तो तर्क दिए जावें और क्या फर्क समझाए जावें । आप स्वयं ही समझदार हो ।

Sanjay Grover said...

A henna-haired wonder boy openly and in most brazen fashion makes an obnoxious remark on saree and none of u chokhers try to show him his place. Great!! u just need professional clap-boys here .

अब आप इस पूरे कमेंट को देखें। क्या आपको लगता है कि इसकी भाषा और भाव कहीं भी उस सामंत वादी, श्रेष्ठतावादी, अहंकार से लबालब भरे (देखिएnone of u chokhers try to show him his place. ), मंदबुद्धि होते हुए भी जन्म से मिली तथाकथित विद्वता के चले दूसरों को नीचा समझकर फटकारने वाले पोंगापंथी मानसिकता(u just need professional clap-boys here .) से कुछ अलग है ? बस संस्कृत की जगह अंग्रेजी आ गयी है। और तानाशाही प्रवृति देखिए कि खुद अंग्रेजी बोलते हुए भी राजा-महाराजाओं वाले अंदाज़ में(A henna-haired wonder boy openly and in most brazen fashion makes an obnoxious remark on saree)दूसरों को सड़ी पहनने का हुक्म दिया जा रहा है।

Sanjay Grover said...

मैंने वह जब कहा जब आप बहस छोड़ने लटके-झटके दिखाकर ना जाने किसको डराने या उकसाने की कोशिश कर रहे थे। यह बहस-स्थल है, किसी राजा-महाराजा का क्रीड़ांगन नहीं है कि या तो सब वही करो/कहो जो मैं सुनना चाहता हूं नही ंतो मैं.....हां......ऊं......।

Sanjay Grover said...

और ज़रा तर्क तो देखिएः-
U too Mister Grover? At least being a male u should have stood up in my defence.
और आप इतने ही स्वाभिमानी हैं तो पल भर में लपक कर बहस में वापिस क्यूं आ गए भाई ?

Sanjay Grover said...

और मैं सुरेश चिल्लपौंनकर जी को भी विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि खेमे संकुचित सोच वालों के होते हैं। हमारा कोई खेमा नहीं इसलिए हम खुलकर साड़ी-धोती, जीन्स, स्कर्ट पर बात कर पाते हैं। मैंने कभी वेलेंटाइन डे नहीं मनाया पर दूसरे मनाते हैं तो मुझे बुरा भी नहीं लगता। ऐसा ही शायद सुजाता जी ने भी एक जगह लिखा था। यहीं वह कह रहीं हैं कि उन्हें साड़ी बहुत पसंद है मगर दूसरों के फैसले उन्हें खुद करने दिए जाएं। साथ ही वे साड़ी से होने वाली परेशानियां भी बता रहीं है। मैं विपरीत टिप्पणी करने के लिए दूसरे खेमे के ब्लाग पर नहीं जाता। चोखेरबालियों की किसी बात पर असहमति होती है तो यहीं पुरज़ोर विरोध करता हूं। खेमों, वर्णों, जातियों, देशों, रंगों, धर्मों से बाहर निकलिए तभी न जान पाएंगे कि सचमुच स्वतंत्र लोग कैसे होते हैं।

मुनीश ( munish ) said...

अच्छा सच-सच बताओ संजू भाई ' गुलाल' देख ली तुमने ? राजे-रजवाड़ों पे बनी बढ़िया मूवी है यार । अनुराग की मस्त डीरेक्शन है ,देख आओ ! हाँ तो मैं कह रहा था कि क्या ये वाकई सच है सुजाता कि मूल-मराठी लेख में वो बातें थी ही नहीं जिन पर यहाँ कई बहुमूल्य कार्य -घंटे अब तक गंवाए जा चुके हैं ? सुनामी में हुई मौतों को जिस तरेह साड़ी और लंबे बालों से जोड़ने का नायाब ओ 'नूरानी तर्क उस लेख में दिया गया है क्या वो वाकई मिलिंद चव्हान के शब्द हैं या सिर्फ़ उसे मसालेदार बनने की कोई बचकानी कोशिश ?

मुनीश ( munish ) said...

अच्छा सच-सच बताओ संजू भाई ' गुलाल' देख ली तुमने ? राजे-रजवाड़ों पे बनी बढ़िया मूवी है यार । अनुराग की मस्त डीरेक्शन है ,देख आओ ! हाँ तो मैं कह रहा था कि क्या ये वाकई सच है सुजाता कि मूल-मराठी लेख में वो बातें थी ही नहीं जिन पर यहाँ कई बहुमूल्य कार्य -घंटे अब तक गंवाए जा चुके हैं ? सुनामी में हुई मौतों को जिस तरेह साड़ी और लंबे बालों से जोड़ने का नायाब ओ 'नूरानी तर्क उस लेख में दिया गया है क्या वो वाकई मिलिंद चव्हान के शब्द हैं या सिर्फ़ उसे मसालेदार बनने की कोई बचकानी कोशिश ?

सुजाता said...

क्या ये वाकई सच है सुजाता कि मूल-मराठी लेख में वो बातें थी ही नहीं जिन पर यहाँ कई बहुमूल्य कार्य -घंटे अब तक गंवाए जा चुके हैं ?
_______
मुनीश जी ,

मेरे खयाल से इसकी सत्यता -असत्यता जानने से बेहतर है कि आप जैसा महसूस कर रहे हैं वैसे ही इसे खारिज करते हुए आगे बढें।मैने पहले भी यही कहा था।यहाँ जड़ता आ गयी है।
अच्छा प्रोपर्टी पर अपनी बहन, पत्नी, बेटी को बराबर अधिकार देने के मामले मे आप सब के क्या विचार हैं?

मुनीश ( munish ) said...

बिल्कुल , मैं आपसे पूरा इत्तेफाक रखता हूँ ! सच या झूठ में फर्क करने से बेहतर है थोड़ा हँस लेना ।

Sanjay Grover said...

मैंने ‘‘गुलाल’’ नहीं देखी। इतनी पुरानी फिल्में मैं नहीं देखता। 35-13-3024 को रिलीज होने वाली ‘‘मलाल’’ अभी-अभी देखकर लौटा हूं।

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

ek badhiyaa aalekh kee aisee taisee yahaa dekhne ko milee. mujhe lagtaa hai ham is virtual duniyaa kee azaadee mai baat ko kahne ka saleekaa bhoolte jaa rahe hain.
ek purush kaa yah kahnaa ki mahilaao ko sare pahannee chahiye betuka hai. haa mera pakka vishwaas hai ki mahilaaye saree mein bahut aakarshak lagtee hain jaise purush tie- suit mein lekin naa to hameshaa purush saje dhaje rahenge naamahilaaye. jindgee ko ham apnee jarurato ko dekhte hue jiye.
ek baat aur vastra hame shobhneeya nahee banaate balki ashobhneeya lagne se bachaate hain.

kuchh chhipaa lenaa hee sachchha pradarshan hai.

( geetkaar atm prakaash shukla jee ke shabdo mein )
Aankh jitnaa aanktee vah roop kaa ankan nahee hai.
umra chadhtee dhoop kaa vistaar hai darpan nahee hai
dekhne ke aad mein jo andhikhaa hai roop hai vo
dikh rahaa vo drishti kaa vistaar hai darshan nahee hai

Anonymous said...

Good one sanjaygrover, keep it up!

बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण said...

अब जब साड़ी की बात आ ही गई है, उसकी उपयोगिता की भी चर्चा हो जाए। सुनामी में उसने स्त्रियों की जान ली, तो कम से कम एक उपन्यास में उसने एक नारी के प्रेमी की जान बचाई भी।

यह उपन्यास हिंदी के सुविख्यात ऐतिहासिक उपन्यास लेखक वृंदावनलाल वर्मा का प्रथम उपन्यास गढ़ कुंठार है। इसमें नायिका को उपन्यास का एक पात्र अपने किले के एक कुंडनुमा कोठरे में कैद कर देता है। उससे बाहर निकलने का रास्ता छत का एक चोर द्वार है जो जमीन से दस बारह फुट ऊपर है। माहौल ऐसा है कि बाहर युद्ध चल रहा है और नायिक ऐसी एक रहस्य की बात जानती है, जिसे यदि वह अपने प्रेमी तक न पहुंचाए, तो युद्ध में उसके हारने की संभावना है।

ऐसे में नायिका अपनी साड़ी खोलकर उसे रस्सी के रूप में उपयोग करके कोठरी से बाहर आती है और अपने प्रेमी तक बात पहुंचाने में सफल हो जाती है।

इस प्रसंग में नारी के नग्न रूप का चित्रण अवश्य हुआ है, पर वर्माजी जैसे मेंजे हुए कथाकार के हाथ में वह इतने स्वस्थ ढंग से हुआ कि किसी को आपत्ति नहीं होती।

हिंदी साहित्य में नारी की नग्नता का चित्रण अन्य उपन्यासों में भी हुआ है, जैसे जैनेंद्र के सुनीता उपन्यास में या अज्ञेय के शेखर एक जीवनी में, पर वहां वह उतनी कलात्मक स्तर नहीं प्राप्त कर सका है, और अश्लील या अनैतिक ही लगता है।

खैर, बात नारी दिवस और उनके अधिकारों की थी। इस लेख में नारी की स्थिति का अच्छा विवेचन है पर उससे निजात पाने के लिए जो सुझाव दिए हैं, जैसे साथ-साथ खाना, इत्यादि, बचकाने हैं, और मूल कारण पर कुछ भी असर नहीं करते।

नारी की दुर्दशा का मूल कारण सामंतवादी सोच का हम पर हावी होना है। यह सोच हम पर इसलिए है हावी है क्योंकि हमारे समाज में अब भी सामंतवाद के अवशेष काफी प्रबल हैं।

आजादी के बाद देश के कई राज्यों में जमीन के पुनर्वितरण का काम पूरा नहीं किया गया, जिससे जमींदार वर्ग वहां आज भी प्रभावशाली बना हुआ है। दूसरे, आजादी के समय देशी पूंजीपतियों ने अंग्रेजों द्वारा निर्मित नव सामंतों (राजा-महाराजे, तेहसीलदार-ताल्लुकेदार, जमींदार, इत्यादि) के साथ समझौता किया क्योंकि वे अपने बल पर अंग्रेजों को बाहर नहीं कर सकते थे।

इसलिए आजादी के बाद सामंतवर्ग राजनीति पर छा गया है। आज भी कितने ही बड़े-बड़े सामंत मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, जज अएएस अफसर बने हुए हैं, या बने हुए थे। माधवराव सिंधिया, विजयराजे सिंधिया, विश्वनात प्रताप सिंह, आदि के नाम गिनाना काफी होगा।

कहने का मतलब है कि सामंतवाद देश में अब भी काफी क्षेत्रों में बना हुआ है।

और नारी को दोयम दर्जे पर रखना सामंतवाद की मुख्य खासियत है। जब तक सामंतवाद को जड़ से न उखाड़ा जाएगा, नारी को बराबरी की हैसियत प्राप्त नहीं हो सकती।

सामंतवाद को समाप्त करने का काम ऐतिहासिक रूप से पूंजीवाद करता है। पूंजीवाद के अपने मूल्य होते हैं। वे नारी के लिए कितने हितैषी हैं, यह अलग विषय है। पूंजीवादी देशों में नारी की स्थिति को देखने से आपको मालूम हो सकता है कि जब हमारे देश में भी पूंजीवादी व्यवस्था पूरी तरह फैल जाएगी, तो उसमें नारी की स्थिति कैसी होगी।

पर सामंतवाद आसानी से मरता नहीं है। हमारे देश में वह हजारों सालों से चला आ रहा है। आजादी के समय उसे समाप्त करने का अच्छा मौका था, पर देश के पूंजीवादी नेताओं ने उसे गंवा दिया।

यदि पूंजीवादी नेता आजादी के समय सामंतों के साथ समझौता न करके जनता के साथ करते, तो आज हम सबकी हालत बेहतर होती। पर ऐसा हुआ नहीं।

गांधीजी ने जरूर कोशिश की आजादी की लड़ाई में जनता को साथ लेकर चलने की, और असल में हम आजादी जीत इसीलिए पाए कि उसमें किसानों, मजदूरों, महिलाओं और आम जनता ने खुलकर भाग लिया। वरना वाइसरोय को अर्जियां भेजनेवाली गांधी-पूर्व के कांग्रेस की नीति से आजादी हजार साल में भी न मिली होती।

पर गांधीजी वर्ग संघर्ष के खिलाफ थे, और उन्होंने जनता को सत्ता पर काबिज होने से रोका। वे चाहते थे कि सत्ता कांग्रेस (और खासकर के उन्हीं के हाथों में!!!) बनी रहे। यही उनकी राजनीति की सीमा थी।

कारण यह कि गांधी जी को वर्तमान सामाजिक ढांचे से कई स्तर पर समझौते करने पड़े। इसलिए आजादी हमारे लिए अपने उपनिवेशी युग से क्लीन ब्रेक न बन सका। हमने अंग्रेजों के कई संस्थाओं और मूल्यों को वैसे ही अपना लिया। ये नए भारत के लिए अनुपयुक्त थे।

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...