Friday, March 13, 2009

नास्तिक हुए बिना स्त्री आज़ाद नही होगी

पिछले दिनों पूसा क्रषि संस्थान के प्रसार सम्भाग द्वारा जेंडर सेंसिटाइज़ेशन पर आयोजित 21 दिवसीय रिफ्रेशर कोर्स  मे एक दिन के लिए वक्ता के तौर पर जाने का अवसर मिला।अपने आप मे यह नया अनुभव था कि कृषि अनुसन्धान से जुड़े लोगों , रिसर्चर्स , अध्यापकों के बीच जिनकी आयु 20 से 55 से भीतर थी और जेंडर सम्वेदनशीलता जैसे मुद्दे से उनका कोई अकादमिक सम्बन्ध तो नही ही था।
2.30 घण्टे के वक्तव्य, स्लाइड्स , बात -चीत के बाद यह महसूस हुआ कि यह सब चोखेरबाली पर लिखी जाने वाली बातों और आने वाले टिप्पणियों से ज़्यादा अलग नही था।कृषि से जुड़ी महिलाओं और पुरुषों के बीच इन मुद्दों को उठाने से पूर्व बहुत ज़रूरी था कि सभी सदस्य स्वयम अपना जेंडर सम्वेदनशीलता और पूर्वाग्रहों के बारे मे जान पाते। 
लेकिन जेंडर मुद्दों पर बात करना बहुत आसान काम नही है।लगातार एक यह भय मौजूद रहता है कि आपको व्यवस्था विरोधी, परिवार विरोधी , परम्परा विरोधी , तोड़ू फोड़ू , विनाशक , सन्हारक मान लिया जाएगा।

पूरे सेशन के दौरान स्त्रियों से हामी मिली और पुरुषों ने लगातार प्रश्न पर प्रश्न किए , मुझे महसूस हुआ कि स्त्रियों के सवाल वाकई पुरुषों के सवाल ज़्यादा हैं।अच्छा लगा यह जानकर कि वे (इनमे 35 से 55 की बीच की आयु के पुरुष थे)
उत्सुक थे,सुनने को तैयार थे ,आवश्यकता पड़ने पर तर्क-वितर्क भी कर रहे थे और अंतत: सब्से बुज़ुर्ग पुरुष साथी यह बोलते हुए निकले कि - हमें बहुत सी नयी बातें जानने का मौका मिला, हमने ऐसे कभी सोचा नही था, अब सोचेंगे।
शायद यह बहुत सकारात्मक था। लेकिन सेशन के बाद मेरा ध्यान उन महोदय की बातों पर केन्द्रित हो गया था जिनकी मुझसे सबसे अधिक असहमति थी और मेरी उनसे।मैने कहा कि उम्मीद करून्गी कि अगली बार मिलने पर हमारी असहमतियाँ कुछ कम हो गयीं हों।
उनका पहला ही प्रश्न था कि -समाधान बतलाइए।
और समाधान भी खुद ही दे रहे थे -कि यदि हम सभी धर्म के रास्ते चलें तो कोई समस्या नही आएगी। 
दर असल वे बार बार मुझे वहाँ ले जाना चाह रहे थे जहाँ बात करके मै आगे बढ आती थी। मै बार बार सिद्ध कर चुकी थी कि धर्म लैंगिक भेद भावों को मज़बूत करने का टूल रहा है और वे बार बार उसे जेन्दर सम्वेदनशीलता का टूल साबित करने पर तुले थे।ये दोनो विपरीत बातें थीं।उनका कहना था कि ईश्वर/खुदा  ने आदम को बनाया , लेकिन जब वह अकेला और उदास हो गया तो उसका मन बहलाने ले लिए हव्वा को भेजा। 
यह वह मान्यता थी जिसके जड़ीभूत हो जाने के बाद किसी बात को समझने की गुंजाइश नही बचती।ईश्वर मे इस कदर  अन्ध विशवास करने वाला कोई भी व्यक्ति जेंडर सम्वेदनशील नही हो सकता, स्त्री-पुरुष बराबरी की बात समझ नही सकता, स्त्री के समानाधिकारों को समर्थन नही दे सकता।इसके लिए बेहद ज़रूरी है कि वह अपनी सोच को वैज्ञानिक बनाए, यह विशवास करना सीखे कि सृष्टि विकास का परिणाम है न कि किसी खुदा या ईशवर ने उसे बनाया है।स्त्री पुरुष के लिए नियम किसी ईशवर ने नही बनाए।धर्म का काम शोषण को सहायता देना है क्योकि धर्म इस बात मे यकीन रखता है कि जो आपके साथ होता है वह पूर्व जन्मों का फल है।क्या स्त्री बन ना और शोषित होना पूर्व जन्मों का फल हैं? क्या यह सज़ा है? यदि धर्म की मानें तो , हाँ ! और फिर सज़ा को भुगतना और चुप चाप महान लोगों (पुरुषों) की सेवा करते जाना स्त्री का धर्म है - भला हो बुरा हो जैसा भी हो...........
हमे मानना होगा कि धर्म स्त्री के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता आया है। वह ऐस टूल है जिसके सहारे हम स्त्री की स्थिति को उसकी नियति, उसकी किस्मत के हवाले करते आए है,जिसके सहारे हम बलवानों के हितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करते चले आए हैं।
ठीक इसी तर्ज़ पर दलित / हरिजन भी धर्म के नाम पर शोषित हुए , सताए गए,वाचिक मानसिक,शारीरिक हिंसा का शिकार हुए.....अब तक जिसके प्रमाण गाँवों ,दूर दराज़ इलाकों .............शायद कभी कभी इंटरनेट पर भी मिल जाते हैं।
ऐसे मे जब कोई  व्यक्ति स्त्री हो और उस पर भी दलित हो तो ......उसकी स्थिति दोहरी मार पड़ने जैसी हो जाती है। प्रेमचन्द् की कहानियाँ बताती हैं कि ग्रामीण जीवन मे दलित की स्त्री को कोई भी अपने साथ सोने को मजबूर कर सकता था।आज हालात ज़्यादा बदले नही हैं। आज भी दलित स्त्री को  सरे आम नंगा करके घुमाया जा सकता है और तमाशा देखने वाली तालियाँ पीटते हैं।
क्या वाकई हम धर्म के आसरे स्त्री को उसकी अस्मिता पा सकने का दावा कर सकते हैं? क्या धर्म स्त्री की पर निर्भरता और दोयम स्थिति को ही बढावा नही देता? रक्शा बन्धन , करवा चौथ , अहोई ......किसी न किसी रूप मे पुरुष पर स्त्री की निर्भरता बनाए रखने के टूल नही बने रहे? 
धर्म की जकड़ से बाहर निकले बिना स्त्री अपनी अस्मिता का दावा नही कर सकती।वह आत्मविश्वास नही पा सकती, अपना वजूद नही पा सकती।वह आज़ाद नही हो सकती, धर्म मे विशवास हमेशा उसके पैरों मे बेड़ियाँ डालेगा।इसलिए अगर कहा जाए कि नास्तिक हुए बिना स्त्री आज़ाद नही होगी, अपनी अस्मिता नही पा सकती तो आपको अतिशयोक्ति लग सकती है, पर मैने यही म हसूस किया है।यह और बात है कि धर्म से टकराने पर महिला कुछ सज्ज्न उसे कुलक्षणी की संज्ञा दे देंगे पर चोखेरबाली हुए बिना आँख की किरकिरी बने बिना  और नयनतारा होकर स्त्री कभी आज़ाद नही होगी।नयनतारा बनने का रास्ता धर्म से होकर जाता है और अपनी पहचान का रास्ता चोखेरबाली या गाली .....जो भी हो से मिलता है .../विडमबना सही , सच है !!

27 comments:

222222222222 said...

आपकी पोस्ट पढ़कर बेहद राहत मिली। पहल होनी चाहिए। कहीं से भी। किसी भी वर्ग से।
मेरे विचार से धर्म की कालिख ने सबसे ज्यादा मुंह स्त्री का कलंकित किया है। जहां धर्म होगा और उससे जुड़ा यथास्थितिवाद होगा कोई भी स्त्री कभी भी सुरक्षित नहीं रह सकती। धर्म ने अगर स्त्री को निष्काषित किया है तो स्त्री को भी धर्म को पूरी तरह से निष्काषित कर देना चाहिए।
स्त्री तमाम तरह की जड़ताओं में बंधी है जहां से उसकी मुक्ति बेहद जरूरी है। हां, जिन्हें (खासकर प्रगतिशीलों) स्त्री-मुक्ति सिर्फ देह में नजर आती है उनसे गुजारिश है कि वे पहले खुद को अपनी ही देह से मुक्त करने का प्रयास करें।

अन्तर सोहिल said...

"स्त्री पुरुष के लिए नियम किसी ईशवर ने नही बनाए"
यह पोस्ट तीन बार पढ चुका हूं और हर बार तालियां बजाई हैं। खरी बात कही है आपने ।
हर धर्म-सम्प्रदाय की नींव किसी ना किसी पुरूष ने रखी है जो अपने पुरूष-विचार से ही नियम और कानून लागू करता आया है। या तो स्त्री को निम्न मान कर या देवी का भ्रम देकर, शोषण तो दोनों तरह से होता है, बराबर दर्जा देने की बहुत कम कोशिश की गई है।

Sanjay Grover said...

आजकी तारीख में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मुðा यही है। वक्त आ गया है कि हम पड़ोसी पाकिस्तान से सबक ले लें। धर्म के नाम पर तालिबान ने वहां औरतो की जो हालत कर दी है, हमारे यहां पब-प्रकरण उसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

स्वप्नदर्शी said...
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मुंहफट said...

सुजाता जी
स्त्री के भूत-भविष्य-वर्तमान के बारे में इससे संपन्न-सार्थक शीर्षक और कोई नहीं हो सकता....
नास्तिक हुए बिना स्त्री आज़ाद नही होगी.
यही है स्त्री-संसार का प्रतिनिधित्व करने वाला बुनियादी प्रश्न.
जिस समय ने पुरुषों को स्त्री-व्यापार में व्यस्त कर दिया हो,
जो समय स्त्री-अधिकार से मुंह चुराता फिर रहा हो,
जो समय देवी-दुर्गा भी, कुलटा भी कह-कहकर गर्वान्वित होता रहता है,
जो समय आधी दुनिया को उसकी पूरी दुनिया से बेदखल करने के लिए धर्म-कर्म की धुंध में लपेट कर हवन में हाथ सेंकने कदापि बाज न आता हो,
उसके खिलाफ,
उसका अंत होने तक
किसी भी तरह का संघर्ष जायज होगा. आपको बधाई.

स्वप्नदर्शी said...

सवाल ये भी है की क्या नास्तिक होने के बाद आजाद हो जायेगी? क्या उन देशो मे , जहां पिछली तीन पीढीयों ने धर्म का बहिस्कार किया, और वामपंथी सोच अपनाई स्त्री आजाद हो गयी? और उन समाजो मे जिन्होंने धरम को अपनाए रखा, क्या वहा पर स्त्री की दशा -दिशा मे कोई परिवर्तन नही आया? अपने लंबे प्रवास के दौरान मुझे कई कई देशो के बाशिंदे मिले है, और इसका सीधा ज़बाब नही मिल पाया है। भारतीय और चीनी, जापानी स्त्री के घरेलु जीवन मे बहुत ज्यादा अन्तर नही है, आज भी। और रूस और कई दूसरे पश्चिमी देशो की महिलाओं ने धर्म के आलावा दूसरे टूल भी झेले है, जिनसे उनकी स्थिति दोयम हुयी है। और चौतरफा औरतों ने अपनी अस्मिता की लम्बी लड़ाई लड़ी है।

विज्ञान की तरफ़ हम सभी लोग इतनी हसरत से देखते है की ये एक मात्र दर्शन है, मानव मात्र की भलाई के लिए। पर इसी की आड़ मे २००० सालो की गुलामी को ताकत मिली है। और विज्ञान के क्षेत्र का वर्किंग कल्चर पूरी तरह से पुरूष सत्ताक है।

Unknown said...

पूर्ण सहमत… हालांकि धर्म को छोड़ने का रास्ता काफ़ी मुश्किल है, लेकिन शुरुआत तो होनी चाहिये ही… एक संवेदनशील मसले पर बेहतरीन पोस्ट…

Ashok Kumar pandey said...

सही कहा आपने।
धर्म स्त्री और दलित का सबसे बड़ा दुश्मन है।
धर्म से मुक्त होना उनकी आज़ादी की दिशा मे पहला क़दम होगा।
अभी 8 मार्च को हमने एक बहस यहाँ रखी तो एक मित्र कहने लगीं कि आज ही चर्च में कहा गया कि औरत का फ़र्ज़ है कि पहले घर की ज़िम्मेवारी निभाये फिर दफ़्तर की और फिर वक़्त मिले तो खुद और समाज के बारे में सोचे!

हमने कहा कि सच इसके ठीक उलट है। आप क्या कहेंगी ?

संगीता पुरी said...

धर्म तो धारण करने योग्‍य व्‍यवहार होता है ... जिसे जमाने के साथ साथ परिवर्तनशील होना चाहिए ... यह हमारी गलती है कि हम धर्म को जड मान लेते हें ... और हजारो लाखों वर्ष पूर्व की मानसिकता के अनुसार जीने को बाध्‍य होते हैं।

Sanjay Grover said...

ग़ज़ल
हक़ीकत में नहीं कुछ भी दिखा है
क़िताबों में मगर सब कुछ लिखा है

मुझे समझा के वो मज़हब का मतलब-
डर और लालच में आए दिन बिका है

जो रात और दिन पढ़ा करते हो पोथे
कभी उनका असर ख़ुदपर दिखा है !

जब हाथों से नहीं कुछ कर सका वो
तो बोला येही क़िस्मत में लिखा है

असल में रीढ़ ही उसकी नहीं है
वो सदियों से इसी फन पे टिका है

{फन=हुनर, फन=नाग का फन, फन=(फन=FUN)मज़ा
(बारी-बारी से तीनों अर्थों में पढ़ें।)
संजय ग्रोवर

मसिजीवी said...

धर्म के मसले पर स्‍कूली डिबेट हो या गोष्‍ठी, पंगा ये ही है कि इसके भिन्‍न अर्थ लिए जाते हैं..एक वर्ग इसे धारण करने योग्‍य घोषित करता है दूसरा इसके जमीनी स्वरूप को देखकर इससे मुक्ति की बात करता है... यही स्‍त्री समनाता के समले पर भी है। धर्म का व्‍यवहारिक व सांगठनिक पक्ष निश्चित तौर स्‍त्री विरोधी है (शरारती तरीके से कह सकता हूँ..कुछ कुछ ब्‍लॉगर मित्र शास्‍त्रीजी जैसा कि बात कहने में बेहद उदार दिखता है किंतु मूल विचार निश्चित तौर पर स्‍त्री विरोधी है :))

इसे भी तय मानें कि यह धर्म मात्र के साथ है इस धर्म या उस धर्म के साथ नहीं। कहीं तालीबान या स्‍वात नंगे दिखाई दे जाते हैं कहीं नहीं।

Anil Kumar said...

धर्म का मतलब हम भूल रहे हैं, और "पंथ" को "धर्म" की जगह दे बैठे हैं। धर्म सिर्फ एक ही है - मानवता - बाकी सब "पंथ" हैं।

पंथ मानने से बनते हैं, यदि लोग सिर्फ अच्छी बातों को मानने का प्रण कर लें तो स्थिति सुधरने की आशा है। आइये विश्वास करें, अंधविश्वास नहीं!

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप से पूरी सहमति है। धर्म शोषण को जायज ठहराने का एक औजार है। सब प्रकार के शोषण से मुक्ति प्राप्त करने के लिए धर्म से मुक्ति प्राप्त करनी ही होगी।

रविकांत पाण्डेय said...

समस्या तो सही है, पर समाधान उतना ही अवैज्ञानिक एवं दिग्भ्रमित है। स्वप्नदर्शी जी की बातें काफ़ी हद तक सच हैं। और धर्म को सारी फ़साद की जड़ मानना....यह तो ऐसा ही है जैसा एक गणितज्ञ से किसी ने पूछा दो और दो कितने हुये? उत्तर मिला उन्नीस। पूछनेवाले ने इसका मतलब निकाला कि गणित एक बिल्कुल ही गलत विषय है और इसकी जानकारियाँ भरोसे के लायक नहीं हैं...एक गणितज्ञ की बजाय पूरी विधा को ही गलत करार दे देना क्या उचित है?? और धर्म तो स्त्री पुरूष में कोई भेद ही नहीं मानता फ़िर वह दोषी किस भाँति हुआ--"सर्वं खल्विदं ब्रह्म" । दूसरे नास्तिकता का महल कोमलता की लाश पर खड़ा होता है। जिस दिन स्त्रियाँ नास्तिक हो गईं उस दिन किसी भी परिवार के बचने की कोई संभावना नहीं है। जिस दिन स्त्रियाँ नास्तिक हो गईं उस दिन मनुष्य के जीवन का सारा काव्य खो जायेगा। और याद रहे जीवन गणित कम काव्य ज्यादा है।

Sanjay Grover said...

पहली बात तो यह कि सच्ची नास्तिकता तर्क और विवेक से पैदा होती है। मैं परिवार, संस्कार या किसी पार्टी से मिली नास्तिकता की बात नहीं कर रहा। वो तो सिखाई गई आस्तिकता की ही तरह दो कौड़ी की है। जब किसी आदमी के मन में सवाल उठता है कि इस सारी भीड़ के साथ मंदिर जाने का अर्थ क्या है आखिर ? इस सवाल को मुंह से बाहर लाने के लिए भी इस समाज में कितने साहस की ज़रुरत होती है, यह वही जान सकता है जिसने बिना किसी राजनीतिक पार्टी या पारिवारिक समर्थन के इसे भोगा हो। जो नास्तिकता संवेदना, विवके और मौलिकता की वजह से जन्म लेती है वह कोमलता की लाश पर कैसे खड़ी हो सकती है भला !? किताबों में उसके बारे में क्या लिख दिया गया है, अलग बात है। अन्यथा असलियत हम जब से पैदा हुए हैं तब से देख रहे हैं कि धर्म के नाम पर किस बेशर्मी से लाखों लोगों का खून बहाया जा रहा है। बिन लादेन, जार्ज बुश, तालिबान, नरेंद्र मोदी, राम सेना.....में से कौन है जो नास्तिक है !? वो भी धार्मिक स्त्रियां ही होती हैं जो बच्ची को गर्भ में या बाहर मार देती हैं। वो भी धार्मिक स्त्राी होती है जो दूसरी स्त्री के साथ बलात्कार होते देख सिर्फ इसलिए खुश होती है कि वह अन्य धर्म की है। क्या धर्म से मिली कोमलता यही होती है?
मैंने कभी विदेश प्रवास नहीं किया मगर कुछ चीज़ें दूर से भी दिख जाती हैं। बचपन में रशियन या जापानी बुक्स में
स्त्रियों की जो खिलखिलाती भंगिमाएं और उन्मुक्त वस्त्र-भूषाएं दिख जातीं थीं वैसी भारत में आज जाकर संभव हो पायीं हैं और उसका श्रेय भी किसी धर्म को नहीं, विदेशी या निजी चैनलों को जाता है। हमसे ज़्यादा धार्मिक पाकिस्तान में तो आज भी यह संभव नहीं, किताबों तक में नहीं।

रविकांत पाण्डेय said...

संजय जी, पहले तो देखें कि नास्तिक का मतलब क्या होता है? अस्ति मतलब-"है", नास्ति मतलब-"नहीं है"। अस्तिभाव में जीना आस्तिकता है, नास्तिभाव में जीना नास्तिकता है। जो जीवन के हर मोड़ पर "नहीं" अर्थात नकारत्मकता को चुनता है उसे नास्तिक कहते हैं। दूसरे मंदिर जानेवाले 99% लोग नास्तिक होते हैं क्योंकि मंदिर और आस्तिकता का कोई सीधा संबंध नहीं है। और आपने पूछा-"बिन लादेन, जार्ज बुश, तालिबान, नरेंद्र मोदी, राम सेना.....में से कौन है जो नास्तिक है !? " क्या आप बतायेंगे इनमें से कोई भी आस्तिक है?? इनके जीवन में कहीं भी अस्ति भाव नहीं है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अलग अलग द्रष्टिकोणोँ से
बात रखी गई है -
जिसके आसपास
और जीवन का जो सत्य है
वह उसीसे जुडा सत्य
देख पाता है
स्वप्नदर्शी जी,
रविकाँत जी की बात के
क्या उत्तर हैँ
ये भी सुनना चाहती हूँ -
घर्म की व्याख्या विषद है
आस्तिक और नास्तिक भी
हमीँ ने बनाये खेमे हैँ -
सच्चा धर्म
"मानवता या इन्सानियत "
ही है -
- लावण्या

Ashok Kumar pandey said...

दार्शनिक शब्दावलियों मे उलझने की जगह क्यों न सीधे कहा जाये किआस्तिक यानि तर्कहीन और नास्तिक यानि तर्कपरक्।

Ashok Kumar pandey said...
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स्वप्नदर्शी said...

"आस्तिक यानि तर्कहीन और नास्तिक यानि तर्कपरक्"

There was a time, when I thought so. I wish the categorization can be so simple again. Specially, in hindu religion (Charwak school) and in buddhist faith there is a possibility of Atheism and materialistic philosophy, which is purely based on logic.

And if the religion is the only illusion left, I will be very happy.

"But religion ke bharam kee pahchaan kaee sadiyon se ho rahee hai, aur bhee kitane bharam hai, jinakee shinaakht baakee hai?"

I see religion as another social institution, like family, , state appendages, culture, law etc. At present all these institutions favor men and are used as a tool to reduce women into mere object. therefore, democratization of each institution may be an alternative.

The experiment of "culture revolution" that was conducted in china, which has forcefully abolished the symbols, text and practices related to religion, has turned out as a failed experiment.


I think we should treat religion more of a historical force and Institution.

Ek ziddi dhun said...

वाज़िब बात। यह तो लड़ाई की पहली शर्त है, गो के सिर्फ इतने से लड़ाई खत्म नहीं होगी। रही स्वपनदर्शी की बात तो सोवियत संघ की राजनीति के संचालक ईश्वर कोमानने वाले नहीं थे लेकिन जनता ने यह जुआ कब अपने कंधों से उतारा था।

अजित वडनेरकर said...

धर्म का गलत अर्थ ही उसे कलुषित करता है। धर्म में तो कोई बुराई नहीं है। किसी भी "तथाकथित" धर्म में चले जाइये...कुछ नैतिक कर्तव्यों की बात कही गई है। ज़मानेभर की अच्छाइयां जिनसे समाज और प्रकृति का कल्याण हो, धर्म का अर्थ रखती हैं। हिन्दू, सिख, ईसाई,इस्लाम तो जीवन पद्धतियां हैं, आचार-व्यवहार के मसले हैं ये सब। सच बोलना, मदद करना, लालच न करना, ज्ञानार्जन करना, अपने परिवेश को समझना, निरंतर आत्मोन्नति करना आदि तमाम कर्तव्यों को अपनाते हुए जो जीवनशैली आप अपनाते हैं वही है धर्म। इसमें कालिख कैसे नजर आ रही है?
धार्मिकता का आस्तिक और नास्तिक जैसे शब्दों से तो कोई लेना-देना नहीं है। नास्तिकता का अभिप्राय क्या सिर्फ ईश्वर में भरोसा न होना या अधार्मिक होना ही है? अगर ऐसा है तो यह बहुत सरलीकरण है और एक चमकदार विचार के बावजूद बहुत सी ग़लतफ़हमियां लोगों के मन में फिर रह जाएंगी ...
क्या अधार्मिक व्यक्ति मूर्ख नहीं होता? क्या सारे नास्तिक अक्लमंद होते हैं? राम-रहीम का नाम लेना ही धर्म है? असली समस्या रूढ़ियों से मुक्त होने की है। शिक्षित होने की है। चीज़ों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की है, उदार दृष्टि की है। हर किस्म की कट्टरता घातक है। तथाकथित धर्म के नाम पर बहुत घालमेल है। लोग पंथ को धर्म समझते हैं। पंथ गलत हो सकता है, धर्म कभी नहीं। आप इस्लाम को धर्म कहेंगे और फिर दस गलतियां उसमें से निकालेंगे। हिन्दुत्व को धर्म कहेंगे और फिर दस गलतियां उसमें से निकालेंगे। अरे भाई ये तो रास्ते हैं...धर्म तो बहस से परे है। सूर्य को उगना ही चाहिए,बारिश होनी ही चाहिए...जैसी आवश्यक बात है धर्म। सूर्य ने अपना कर्तव्य छोड़ दिया अर्थात अपना धर्म छोड़ दिया तो क्या होगा? धर्म बांधता नहीं, विस्तार देता है। आहार करना धर्म है और निराहार रहना सीमित वैयक्तिक विकल्प। मांसाहार या शाकाहार यह भोजन के विकल्प या पंथ हैं। यह पसंद पर निर्भर है और इसमें अच्छाई या बुराई ढूंढी जा सकती है।
समूची पोस्ट से हमेशा की तरह सहमति है। आपकी मूल भावना को समझे हुए हैं तभी तो आपके साथ बने हुए हैं। बस, कुछ शब्दों पर कुछ अपनी कही :)

Ashok Kumar pandey said...

its a regressive social institution.

examples of russia and china need more analysis, which is perhaps not possible.

its much easier for a fool to be believer than adher to athiesm.

Ashok Kumar pandey said...

coorection

examples of russia and china need more analysis, which is perhaps not possible here.

Ashok Kumar pandey said...
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pallavi trivedi said...

एक अच्छा मुद्दा उठा है आज! ये सही है कि धर्म के नाम पर स्त्री को बाँध के रखने की कामयाब कोशिशें सदियों से होती आई हैं!एक बार धर्म का चोला पहना दो फिर स्त्री दर कर खुद ही उससे बाहर निकलने की कोशिश नहीं करेगी!पढ़ी लिखी स्त्रियाँ भी सोलह सोमवार, करवा चौथ, संतान सप्तमी ....और भी न जाने क्या क्या करती रहती हैं! शायद उन्होंने धर्म का केवल एक ही मतलब जाना है और वो है दुनिया भर के व्रत उपवास, पूजा पाठ और भी न जाने क्या क्या ढकोसले! शायद धर्म कि मूल फिलोसफी जानने कि कोशिश ही नहीं की गयी है!धर्म कोई बुरी चीज़ नहीं है.....अगर इसकी आत्मा को पहचाना जाये!हर धर्म में कुछ नकुछ अच्छी बातें हैं जो हमें बेहतर इंसान होने में मदद करती हैं! सिर्फ नास्तिक होने से मुक्ति संभव नहीं है जब तक की अज्ञानता से मुक्ति न मिले!लेकिन फिर भी धर्म के नाम पर तरह तरह के अंधविश्वास और कुरीतियों को छोडा जाना चाहिए !

paulsoliera said...

सही कहा आपने।

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...