Tuesday, March 17, 2009

धर्म से टकराए बिना स्त्री मुक्ति सम्भव नही

स्वप्नदर्शी जी की पोस्ट के बाद धर्म और स्त्री की मुक्ति की बात एक रोचक अन्दाज़ मे आ गयी है।एक स्वस्थ बहस के तत्व इसमे देख सकती हूँ। 
मुद्दा है कि नास्तिक हो जाने से क्या होगा ? क्या इससे स्त्री को समाज मे उचित स्थान , मानवीय अधिकार और सुरक्षा मिल जाएगी?क्या वह इससे आज़ाद हो जाएगी?

स्त्री धर्म की व्याख्या करते करते और स्त्री को उसका धर्म सिखाते सिखाते युग बीत गए हैं, उसने सीख भी लिया -हिन्दू स्त्री का जीवन ऐसा हो , मुस्लिम हो तो स्त्री ऐसी होनी चाहिए , ईसाई हो तो स्त्री को ऐसा होना चाहिए.........धर्म और धर्म को बनाने वाला ईश्वर(पता नही कोई कैसे इस बात मे यकीन रख सकता है कि किसी धर्म को ईश्वर ने बनाया है, खैर) और उस धर्म को मानने वाले उसके बन्दे सब मिलकर स्त्री को पाठ पढाते आए हैं।कभी सिखाया गया कि पति परमेश्वर है, कभी सिखाया गया कि स्त्री को पुरुष की अनुगामिनी होना चाहिए , कभी सिखाया गया कि उसे पुरुष की परछाई होना चाहिए,पुरुष के बिना स्त्री के लिए स्वर्ग भी नरक समान है,सभी नाते सूर्य से भी बढकर ताप देने वाले हो जाते हैं........(अयोध्या काण्ड , रामचरितमानस) और इसलिए यदि वह विधवा है या अविवाहित है तो उसका जीना उसे खुद भी दुश्वार लगने लगे दुनिया को तो बाद मे लगे।पतिव्रत धर्म का पाठ जो अनुसूया सीता को पढाती है वह आज तक हिन्दू स्त्री को घोल घोल कर पिलाने की चेष्टा की जाती है(अरण्य काण्ड) अनुसूया कहती हैं - "पति प्रतिकूल जनम जँह जाई ।विधवा होई पाई तरुनाई" माने - जो अपने पति की बात नही मानती वह जहाँ भी जन्म लेती है भरी जवानी मे विधवा हो जाती है।माने जन्म जन्मांतर के डर भी स्त्री को दिखलाए जाते हैं, वह कभी किसी हाल मे पति के खिलाफ न चले रामचरितमानस का पाठ इसी लिए उसे कराया -समझाया जाता है।कीर्तन, मंडली,पाठ , जागरण सभी मे स्त्रियाँ ही बढ चढ कर भाग क्यों लेती हैं - धर्म सीखने की उन्हे ही सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?क्योंकि वे दर असल इस योनि मे किसी पाप या दोष के कारण आई हैं ? यही कहता है न धर्म ?

अभी मार्च के हंस  मे शीबा असलम फहमी मुस्लिम धर्म के मुल्लाओं के हाथ मे आ जाने से उसके स्त्री विरोधी स्वरूप पर दुखी होकर लिखती हैं - "क्या इन्हें कभी यह खयाल नही आता कि जब एक गैर मुस्लिम औरत एक मुसलमान औरत पर तरस खाते हुए पूछती है कि- 'आपके इस्लाम मे तो औरतों को घर से बाहर निकलकर तालीम व तरक्की हासिल करने की मनाही है' तो उस बेचारी को कैसा लगता होगा? जब कोई यह पूछती है कि आपको तो हमेशा यह डर लगा रहता होगा कि अगर पति नाराज़ हो गया तो तलाक न देदे ,तो कैसा कोड़ा पड़ता होगा आत्मसम्मान पर?जब कोई यह पूछता है कि 'मुसलमान औरत होने के नाते आप तो पति की दूसरी, तीसरी,चौथी शादी के लिए ज़हनी तौर पर तैयार रहती होंगी? तो कैसा खून खौलता होगा हमारा! या जब कोई बड़ी सहानुभूतिपूर्वक कहता है कि 'आप लोगों मे तो पर्दे के कारण लड़कियों को पढाते लिखाते नही , ज़रा बड़ी हुई कि शादी कर दी, तो कितना कमतर महसूस करते हैं हम?'' और जब कोई अश्चर्य से पूछता है कि 'अरे, मुसलमान होकर आप इतनी पढे लिखी हैं और घर से बाहर रह सकती हैं तो फख्र नही अफसोस होता है कि इस्लाम की क्या छवि है सारी दुनिया में " आगे लिखते हैं "औद्योगिक क्रांति के बाद से ही जब सरी दुनिया नए ज्ञान विज्ञान और सामाजिक व्यव्स्था को अपना रही थी , तब जड़ मुल्लाओं ने कौम के लिए शुतुर्मुर्गी नीति तय कर दी........साथ ही साथ (वे) इस्लाम को स्त्री विरोधी बनाकर अधी आबादी को संशय,भय, बगावत की तरफ धकेल रहे हैं "'

मुझे बताइये कि ऐसे मे स्त्री के हाथ जब दुनिया ने धर्म की ज़ंजीरों से जकड़े हों तो वह अधर्मी हुए बिना अपना अस्तित्व कभी पा सकती है? 
जब ईश्वर के नाम पर उसे तरह तरह के भय और सज़ाओं के साए में पालतू बना कर रखा जाता हो तो क्या वह नास्तिक हुए बिना कभी अपनी स्वतंत्र पह्चान बना सकती है? 

शीबा अपने लेख मे लिखती हैं कि इस्लाम का शुरुआती स्वरूप ऐसा नही था ,उसे सातवीं शताब्दी के बाद पुरुषों ने ही 75 फ़िरक़ों मे बांट दिया , यानि इस्लाम की 75 व्याख्याएँ कर दी गयीं ,सबका अलग नज़रिया है अलग लॉ है , लेकिन एक 76 वीं नयी व्याख्या जो स्त्री करना चाहती है उसके विरोध मे ये सभी एकजुट हैं। 

रामचरितमानस  भी एक पुरुष द्वारा रची गयी और उसका पाठ हिन्दू घरोंमे जिस तरह से किया जाता है वह सिद्ध करता है कि स्त्री के लिए हिन्दू धर्म क्या स्थिति तय करता है। 
पंडिता रमा बाई (भारत की पहली महिला डॉक्टर आनन्दी बाई की रिश्तेदार । आनन्दी की मृत्यु विदेश मे डाक्टरी की पढाई के दौरान हिन्दू जीवन पद्धतियों का कड़ाई से पालन करने के कारण हुई)  अपनी पुस्तक "एक हिन्दू स्त्री का जीवन" मे उन अमानवीय स्थितियों का उल्लेख करती हैं जो हिन्दू घरों की स्त्रियों के लिए बनाई गयी थीं जो दर्शाती हैं कि -"इस संसार मे लड़की कुछ नही के बराबर है "
(पृ-47)

जहाँ तक सवाल है कि नास्तिक हो जाने से क्या इससे स्त्री को समाज मे उचित स्थान , मानवीय अधिकार और सुरक्षा मिल जाएगी?क्या वह इससे आज़ाद हो जाएगी?
हाँ , यह एक बेहद ज़रूरी कदम होगा , क्योंकि इससे स्त्री को मूर्ख बनाना आसान नही रह जाएगा , उसे भ्रमित नही किया का सकेगा , कम से कम वह खुद अपनी जड़ताओं , भयों और अन्धविश्वासों से मुक्त हो पाएगी , आत्मविशाव हासिल कर पाएगी , और यही मुक्ति की पहली शर्त होगी कि वह अपनी स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन कर सके , सवाल उठा सके ।हमें स्वीकार करना होगा कि धर्म समाज की मानव की बनाई हुई एक संरचना है जिसमे खामियाँ हैं और इसलिए उसकी पवित्रता मे आँख मून्द कर विश्वास नही किया जा सकता। अपनी अस्मिता के लिए धर्म से टकराए बिना उस पर सन्देह किए बिना  कोई रास्ता नही है।स्त्रियों उस पर सन्देह करो !

25 comments:

Sanjay Grover said...

सुजाता आपने बहुत मेहनत की है इस लेख पर, बधाई। अब देखना यह है कि स्त्रियां किस पर संदेह करती हैं ! धर्म पर या आप पर ?

Unknown said...

सबसे पहले तो जरूरी यह हो जाता है कि धर्म क्या है ? दूसरी बात की स्त्री को सुरक्षा , आत्मविश्वास इत्यादि बातों जानना समझना है तो , उसे जरूरी नहीं है कि वह धार्मिक हो या अधार्मिक , जरूरत है खुद से अहवान करने की जो की आमतौर पर नहीं हो रहा है । मैं मानता हूँ कि आज भी पुरूष वर्ग महिलाओं पर अत्याचार कर रहा है तो यहां भी महिलाओं का ही हाथ होता है , सहयोग होता । अब चाहे यह मां के रूप में हो या फिर किसी अन्य रूप में ।नारी ही नारी की दुश्मन है ।

दिनेशराय द्विवेदी said...

शोषण से मुक्ति लक्ष्य होना चाहिए, फिर किसी से भी टकराना हो परवाह नहीं। वह धर्म हो, राजनीति हौ, कुछ भी क्यों न हो।

विजय गौड़ said...

धर्म का यह सवाल जो आपने उठाय है, एक महत्वपूर्ण सवाल है- न सिर्फ़ स्त्री मुक्ति बल्कि समाज की मुक्ति के साथ भी इसे जोडकर देखा जाना चाहिए।

स्वप्नदर्शी said...

"पति प्रतिकूल जनम जँह जाई ।विधवा होई पाई तरुनाई" माने - जो अपने पति की बात नही मानती वह जहाँ भी जन्म लेती है भरी जवानी मे विधवा हो जाती है"

I think this has come from "Tulsidas", he was the one who had suffered seriously, becoz his wife was very independent.

Just for curiosity, does any body knows if this is also in the Valmiki Ramayan too?

I think there are several examples that Tulsi Ramayan has killed the essence of Valmiki ramayan, and it has a effect of the time, when tulsi wrote ram Charit Manas.

ghughutibasuti said...
This comment has been removed by the author.
ghughutibasuti said...

तुलसीदास जी की रामायण में अवश्य ही उनका स्त्रियों के प्रति दुराग्रह सा दिखता है। अफसोस कि मैंने वाल्मिकी रामायण नहीं पढ़ी है। कभी अवसर लगा तो खरीदने व पढ़ने की चेष्टा अवश्य करूँगी।
फिर भी जितना भी so called धर्म, पंथ या रिलिजन अधिक सही शब्द हैं, को समझा है या यह कहिए उसके प्रभाव को समझा है वह स्त्री को स्वतंत्र तो कदापि नहीं करता। सनातन धर्म, वैदिक धर्म इतना विस्तृत है कि उसे पढ़ना समझना प्रत्येक के लिए असंभव सा है। संभव तब हो सकता है जब उसे पढ़ने समझने को ही जीवन का उद्देश्य बना लिया जाए।
एक और समस्या है, जिनसे हम धर्म के बारे में सिखाने की आशा कर सकते हैं वे अधिकतर कोई न कोई स्त्री विरोधी बात करके पहले ही स्त्री के मन में संशय पैदा कर देते हैं। ऐसे में उनकी सारी विद्वता हमारे लिए अनुपयोगी हो जाती है क्योंकि वे हमें बायस्ड नजर आते हैं।
बहुत अच्छा होता कि कोई धर्म का ज्ञाता भी होता और स्त्री को बराबर भी मानता और यहाँ बहस में भाग भी लेता।
एक और संभावना भी है कि धर्म आरम्भ में स्त्री विरोधी न भी रहे हों किन्तु जब धर्म पुजारियों, पादरियों आदि के हाथों में आ गए तो धर्म का स्वरूप बदल गया हो।
जैसे पूरी रामायण में मुझे सीता का वनवास, ढोर गंवार वाली पंक्तियाँ अधिक याद रहती हैं अर्थात मैं अपनी बात की पुष्टि के लिए उनका प्रयोग करती हूँ वैसे ही पुरुष धर्म गुरुओं ने भी अपने व पुरुष वर्ग के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए धर्म को तोड़ मरोड़कर स्त्री को दबाए रखने के लिए धर्म का प्रयोग किया होगा या वे दलीलें ढूँढी होंगी जिससे स्त्री पर वर्चस्व बनाए रख सकें।
सो यहाँ बहस हम स्त्री के जीवन पर धर्म के प्रभावों की ही कर सकते हैं।
घुघूती बासूती

सुजाता said...

नीशू ,

धर्म क्या है का उत्तर खोजना क्या इस बहस से पलायन करने का तरीका नही है?
कौन नही जानता कि धर्म के क्या मायने हैं?सबकी अपनी व्याख्याएँ हैं , और फिर भी धर्म की बात आते ही आप कुछ ग्रंथों , कुछ पंथों , कुछ रीति रिवाज़ों , कुछ मान्यताओं , कुछ मिथकों की ओर देखते हैं ..... वे सभी यहाँ शामिल हैं !
यह कहहा कि दर असल इसका मूल स्वरूप यह नही था अब ऐसा हो गया .....यह कोई तर्क नही ..जो है वह इसलिए खराब है कि वह मानव निर्मित संरचना थी ...जो तब भी दोषपूर्ण नही थी ..अब भी पवित्र नही है।कम से कम स्त्री का भला तो उसने कभी नही किया।आप अपनी मनुस्मृति उठा लाइए और उसे ही देख लीजिए।

Sanjay Grover said...

धर्म क्या है का उत्तर खोजना क्या इस बहस से पलायन करने का तरीका नही है?
Bilkul thik, sirf palaayan nahiN bahas ko bhatkana bhi hai , bar-bar aastikta, naastikta aur dharma ki alag alag vyaakhyayeN karke.
SAbse pahle to hum yahi nahiN samajh rahe ki stri aur manav-matra ki jo bhi durdasha hai wo dharm, Ishwar, Aastikta-Nastikta ki prachlit manytaoN ki vajah se hai. Fir kyoN hum apni apni vyakhyayeN/paribhashayeN dekar vyarth ki bauddhikta jharh raheN haiN.

Unknown said...

सुजाता जी ,

मैं इस बहस से पलायन करने की बात न कर रहा बल्कि आपसे ये जानने की कोशिश की थी आप बताइये कि किस धर्म को छोड़ कर स्त्री अपना अधिकार और स्वाभिमान पा सकती है । और जहां तक आप ये कह रही हैं किधर्म की अलग- अलग व्याख्याएं हैं तो आप बताइये किआपने क्या सोच के यह आलेख लिखा हैं ?धर्म का मूल स्वरूप अगर गलत है तो क्या आप उसको बदलने का प्रयास करेंगी या फिर पीछा छुड़ा लेगी । स्त्री का भला पुरूष समाज ने नहीं किया यह बात से मैं सहमत हूँ पर पूरी तरह से नहीं । जितने भी ऊंचे पदों पर आज महिलाएं हैं वहां पुरूष की भूमिका रही है । हां यह प्रतिशत कम हो सकता है । इसलिए किसी भी व्यवस्था में कमी है तो आप जैसी महिलाएं सुधार करें न कि उसे अनदेखा कर आगे बढ़ जाये ।

Sanjay Grover said...

***********धर्म का मूल स्वरूप अगर गलत है तो क्या आप उसको बदलने का प्रयास करेंगी या फिर पीछा छुड़ा लेगी । *********
ऐसे ही तर्क ये भी हैं कि पति अगर निकम्मा, हिंसक, बलात्कारी है, विकृत मानसिकता वाला है तो आप अपना सब कुछ दांव पर लगाकर अपना पूरा जन्म उसे सुधारने में लगा दीजिए, नही ंतो आप पलायनवादी हैं, भारतीय संस्कृति के खिलाफ हैं, देशद्रोही हैं, गðार हैं, परिवार-तोड़ू हैं, वगैरहा-वगैरहा। संस्कृति चाहे भारतीय हो या पश्चिमी, घर्म चाहे हिंदू हो या मुसलमान, देश चाहे अमेरिका हो या चीन, सभी का निर्माण मानव-मात्र के भले के नाम पर हुआ है। और अब अगर ये सब मानव मा़त्र का तो सत्यानाश कर रहे हैं और निहित स्वार्थ की पूर्ति कर रहे हैं। तो हम इसे स्वीकार क्यों नहीं करते इन्हें छोड़े या बदले बिना कोई चारा नहीं है। इसके बदले स्कूलों-कालेजों में नैतिक शिक्षाओं और उनपर खुली बहस तथा संविधान को ज्यादा से ज्यादा कारगर, लोकतांत्रिक और व्यवहारिक बनाए जाने की ज़रुरत है।

roushan said...

हम अपनी बात करते हैं .
हम आस्तिक हैं धर्मग्रंथों को जम के पढा है और धर्म में भरोसा रखते हैं . धर्म ग्रंथों में स्त्री को दोयम दर्जा दिया गया है इस सत्य से इनकार करने वाले धर्म के प्रति ईमानदार नहीं हैं . धर्मग्रंथों में जो बाते लिखी गयीं हैं वो उस युग की समझ थी. निश्चित ही तब से आज तक में समझ में परिवर्तन हुआ है और धर्मग्रंथों में आज के हिसाब से जो भी बाते अनुचित हैं उन्हें नकारने में धर्म का ही भला है . जो धर्म समाज की जरूरतों के हिसाब से नहीं ढाला जा सकता उसका ख़त्म हो जाना ही बेहतर है .

Sanjay Grover said...

आस्तिक होते हुए भी रौशन जी का यह खुलापन सराहनीय है।

Priyankar said...

टकराना सबसे चाहिए धर्म से भी,शास्त्र से भी,लोक से भी,गुरुजनों से भी तथा मूढता और दुराग्रह से भी . मुक्ति की पगडंडी वहीं से खुलती दिखेगी जो एक दिन बड़े मार्ग में तब्दील हो जाएगी .

सुजाता said...

नीशू जी ,
मै तो इन धर्मों की कोई स्त्री समर्थक व्याख्या नही कर सकती, इसलिए खारिज करने की बात कह रही हूँ।मेरा मानना है कि जब तक आस्था है , प्रश्न नही उठ सकते।आपको लगता है कि आस्था -श्रद्धा-प्रश्न साथ साथ रह सकते हैं?

स्त्री के लिए सवाल उठाना ज़रूरी है, प्रश्न करना और सन्देह करना स्व-चेतना की पहली शर्त है।पहली ही शर्त पर उसे शंका और आस्था का भ्रम मिले तो वह ऐसा मिक्सचर हो जाती है जो खूब पढ लिख कर,आत्मनिर्भर होकर भी बहू पर अत्याचार करती है,बेटी -बेटे मे भेदभाव करती है,बेटी को भाई के नाम अपनी जायदाद का हिस्सा लिख देने को मजबूर करती या शादी के बिना लड़की का जीवन बर्बाद है यह सोचती है,जो नौकरी करने निकलती है पर करियर और काम को लेकर तनिक भी गम्भीर नही होती ।
ऐसे मे फिर लोग कहते हैं - इन औरतों के बस का बस घर सम्भालना और चूल्हा चौका ही है।व्रत के दिन इनसे दफ्तर मे काम नही होता, मेहन्दी लगवा लगवा कर बैठ जाती हैं।इन्हें भैया दूज और अष्टमी पूजने के लिए छुट्टी चाहिए...काम कौन करेगा?काम को तो सीरियसली लेती ही नहीं!पति से पूछे बिना कोई काम नही करती,इनकम टैक्स हो या कोई नयी ऑफीशियल ज़िम्मेदारी - पहले पति का कंसलटेशन चाहिए!जाने क्यों आ जाती है6 नौकरियाँ करने!!

Unknown said...

आपकी प्रगतिशील सोच बेहद अच्छी लगी । लोगों को कहने के अलावा शायद ही और कोई काम हो । स्त्री आज सभी मामलों में पुरूष की बराबरी कर रही है ये तो तुच्छ लोग है । अपना कार्य करते आगें बढ़े इन गंदी नाली के कीड़ों का क्या ? और इस तरह की सोच से जरूर परिवर्तन हो और स्त्री को सभी अधिकार मिलेंगें आत्म चिंतन और प्रयास की जरूरत है ।

Unknown said...

सुजाता जी ,
आपकी प्रगतिशील सोच बेहद अच्छी लगी । लोगों को कहने के अलावा शायद ही और कोई काम हो । स्त्री आज सभी मामलों में पुरूष की बराबरी कर रही है ये तो तुच्छ लोग है । अपना कार्य करते आगें बढ़े इन गंदी नाली के कीड़ों का क्या ? और इस तरह की सोच से जरूर परिवर्तन हो और स्त्री को सभी अधिकार मिलेंगें आत्म चिंतन और प्रयास की जरूरत है ।

Unknown said...

aare bachchan baba kah gaye the
dharm granth sab jalaa chukee hai jiske anter kee jwalaa
mandir masjid girje sabko tod chukaa jo matbalaa
pandir momin paadariyo ke fando ko jo kaat chuka
kar saktee hai aaj usee kaa swaagat meri madhushalaa

bhai neeshu ji prashn uthaai uskaa parihaas kiya gayaa tipniyo mein
chalo mein poochhtaa hoon dharm kya hai
mein phir pooch rahaa hoon dharm kyaa hai ?
mein aap sabhee se poochh rahaa hoon dharm kyaa hai ?
dharm objective prashn hai per iskaa utter subjective hai.
dhaaryate iti dharmah
jo hamne aachran ke sutra apne man mein dharan kar liye vahee dharam hai
hindu, muslim, sikh , isaaai, ye sab dharm ke show case hain lekin hamaraa dharm amara man hai ham jise sweekar karte hain vahee hamaraa dharm ban jataa hai.

chokher waliya ekmat ho jaaye aur ek jeevan shaily apnaaye to vah chokher waliyo kaa dharm ban jaayegaa. tulsi das ko uper bahut dutkaraa gayaa. valmiki se tulsidas bhinn hai to yah swabhavik hai. samaaj aur ram charitra ko jaisa unhone samjha unhone likhaa
vo valmiki se dictation lene nahee gaye the na hee ram charit maanas ramayan kaa anuvaad hai.
mein sadhaaran artho mein naastik hoon aur meraa dharm meraa aachran aur mera kaam hai lekin maine ramayan, ram charitmanas, radhey shayam ramayan, narendtra kohlee ka ramayan charita itne vritaant padhe hain. jahaan aap tulsi das se asahmat hain vahaan asahmati darshaa de lekin aap ek kavi ke roop mein unke chintan ko kharij nahee kar sakte. maine tulsi das ramayan mein jitnaa darshan dekhaa aaj tak padhe kisee saahitya mein darshan kee aisee jhaanke nahee dekhee.
dhol gawaar shoodra pashu-naaree
ye sab taadan ke adhikaaree

tulsi ka man bhaav aur soch jo bhee rahaa ho is mahaan kavi ke vachaan mein mein iska ye arth maantaa hoon
dhol(music item - drum), ganvaar (uneducated-uncivilised), shoodra(kharaab soch baale), pashu-naree ( pashuvat aachran karne baalee naaree )ey sab taadnaa ke paatra hain peete jaaane se hee vas mein aate hain.

Seeta vanvaas ke prasang mein agar tulsi ne us samay kee soch ko prastut kar diyaa hai to ye to maniye naa saahitya samaaj kaa darshan hotaa hai.
anusuiyaa dwaraa seeta ko jo updesh diye gaye hain usmai bhee kisee had tak us samay kee samaajik soch ke kaaran likha hai ki pati chaaeh jaisaa ho lekin aurat ko uske saath achcha vyabhaar karnaa chaahiye lekin is prasang mai sadaacharan ke jo any sootra diye hain yadi aaj kee mataye apnee putree ko theek se de de to bahut se parivaar sukh aur shanti se sarovaar ho jaayen.
naree swatantrataa kee jaah naree utthaan kahee jyadaa badhiyaa shabd mujhe lagtaa hai.
shiksha aur sirf shikshaa hee mahilaa kalyaan kaa sshakt hathiyaar ho saktaa hai

Sanjay Grover said...

Are Ramsey Bros. ki koi nai film aayi kya? Aaye to bataana. Kabhi-kabhi dekho to achchhi lagti haiN.

Unknown said...

sanjay jee jindgee ek badaa horror show hai. ramse brothers to bas nimitta maatra hai use parde per utarne ke liye

डॉ. मनोज मिश्र said...

किसी साहित्य में किसी के बारे में क्या लिखा है इससे भी ज्यादा महत्व पूर्ण है तत्कालीन समय में समकलीन सामाजिक स्थिति क्या थी

बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण said...

भक्ति आंदोलन, जिसके शोरोमणि तुलसी थे, मूलतः सामंतविरोधी आंदोलन था। वह सामंतवाद द्वारा हाशिए पर दबा दिए गए वर्गों की आवाज था। भक्ति आंदोलन में समाज के हर वर्ग के लोगों ने नेतृत्व ग्रहण किया है, ब्राह्मण, जुलाहा, मोची, नाईं, बनिया, नारी आदि-आदि। भक्ति साहित्य में इन सब वर्गों की समस्याओं का यथार्थ चित्रण है। इसलिए भक्ति रचनाओं को, जिनमें तुलसी कृत रामचरितमानस भी है, महज धार्मिक ग्रंथ मानकर उनकी निंदा करना उचित नहीं है। असल में रामचरितमानस उस समय की सामाजिक व्यवस्था का विश्वकोष है।

यहां वहां से उसके दोहों को संदर्भ से अलग करके उद्धृत करना और उनके आधार पर तुलसी को नारी विरोधी घोषित करना या उन पर कोई अन्य लेबल चेपना फूहड़ता होगी और उनके बारे में और भक्ति आंदोलन के संदर्भ व मूल स्वरूप के बारे में अज्ञान का परिचय देना होगा।

तुलसीदास एक महान, मानवतावादी और करुणामय कवि हैं। जिन्होंने रामचरितमानस को पूरा पढ़ा है, उसके इक्के-दुक्के दोहों-चौपाइयों को नहीं, वे इससे सहमत होंगे। नारी की दशा के प्रति उनकी अपार सहानुभूति थी, जो इस चौपाई से स्पष्ट होती है। संदर्भ है, शिव से विवाह होने के बाद उमा अपनी मां से विदा हो रही है, और मां उमा से कहती हैं:-

“जननी उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारि धरम पति देव न दूजा।
बचन कहत भरि लोचन बारी। बहुर लाइ उर लीन्हि कुमारी।
कत बिधि सृजी नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरज कीन्ह कुसमउ बिचारी।“

इन पंक्तियों को सदर्भ से अलग करके यों ही पढ़कर आप आसानी से कह सकते हैं – “देखिए, तुलसी नारी को कैसी ऊंटपटांग सलाह रहे हैं। मानो स्त्री का कोई वजूद ही न हो, वह मात्र पति की दासी हो। पति के चरणों की पूजा करना, और यही नहीं, इसे ही नारी का धर्म बताना, कितनी घिनौनी, नारी-विरोधी बात है। जिस ग्रंथ में ऐसा कहा गया हो, उसे तुरंत जला डालना चाहिए।“

अब संदर्भ सहित इन्हीं पंक्तियों की व्याख्या करें। तब हम देखेंगे कि इसमें नारी के प्रति कितनी करुणा, सदाशय, और व्यावहारिक सूझ-बूझ छिपी है। भूलिए मत तुलसी के जमाने में सामंतवाद मजबूत था। पितृसत्तात्मक समाज व्यस्था थी। नारी पुरुष के आश्रय में ही फल-फूल सकती थी। पुरुषों से अलग होने पर नारी का जीवन दयनीय हो उठता था। ऐसे में नारी का परम स्वार्थ और हित इसी में था कि वह हमेशा पुरुष का कृपापात्र बनी रहे। यही सलाह उमा की अनुभवी मां अपनी बेटी को दे रही है। वह एक प्रकार उसे अशीष देरी है कि तू अपने पति का हमेशा कृपापात्र बनी रह। तेरा पति हमेशा तुझे रखे। और इस अशीष को फलीभूत करने के लिए जो नीति उमा को अपनानी है, वह भी उसे समझाती है -- अपनी पति से बेकार में भिड़ मत, उसकी सेवा कर, उसे खुश रख, ताकि तू भी खुश रहे। यह एक प्रकार से वही नीति है, जो कमजोर हमेशा बलवान के प्रति अपनाता है। बलवान से खामखां उलझना कहीं की बुद्धिमानी नहीं है। तुलसी यहां सही-गलत की व्याख्या नहीं कर रहे, बल्कि स्त्री को सफलता का एक गुर समझा रहे हैं। यदि वे उमा को उकसाते कि तू पति की कोई बात मत मान, हर बात में अपनी स्वतंत्रता की दुहाई दे, तो यह तुलसी की घोर अमानवीय स्वरूप होता। ऐसा स्वरूप हमें समस्त रामचरितमानस में और तुलसी की अन्य रचनाओं में कहीं नहीं मिलता।

इसलिए तुलसी पर फतवा कसने से पहले हमें यह भी देखना है कि वे किस संदर्भ में क्या कह रहे हैं, और किस सामाजिक परिस्थिति और अवस्था में वे हुए हैं।

और इस विषय को छोड़ने से पहले, रामचरित मानस के उपर्युक्त उद्धरण के अंतिम दो पंक्तियों पर भी गौर करें।

एक तरफ पति सेवा का उपदेश, दूसरी तरफ पराधीन नारी के लिए स्वप्न में भी सुख न मिलने पर क्षोभ। जो लोग “ढोल गँवार शूद्र पशु नारी ताड़न के अधिकारी“ को वेदवाक्य समझते हैं, वे इन पंक्तियों पर भी गौर करें:-

“कत विध सृजी नारि जग माहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं”

तुलसी के रामचरितमानस के संबंध में कुछ अन्य बातें भी ध्यान में रखने की है। इस प्राचीन ग्रंथ के काफी अंश प्रक्षिप्त हैं। उसका काफी अंश उनके समय के बाद के लोगों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए उसमें जोड़ा है। यह रोग भारत में पहले से चला आ रहा है और वाल्मीकी रामायण से लेकर महाभारत तक कई ग्रंथों में इस तरह के प्रक्षिप्त अंश मिलते हैं। यहां तक कहा गया है कि महाभारत में संपूर्ण गीता प्रक्षिप्त है, और बाद की है।

हिंदी के मूर्धन्य समालोचक डा. रामविलास शर्मा के अनुसार “ढोल गंवार...” वाला अंश भी रामचरितमानस में प्रक्षिप्त है। वे कहते हैं, “ढोल गंवार वाली पंक्ति राम और समुद्र की बातचीत में आई है जहां समुद्र जल होने के नाते अपने को जड़ कहता है और इस नियम की तरफ इशारा करता है कि जड़-प्रकृति को चेतन ब्रह्म ही संचालित करता है। वहां एकदम अप्रासंगिक ढंग से यह ढोल गंवार शूद्र वाली पंक्ति आ जाती है। निस्संदेह यह उन लोगों की करामात है जो यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि नारी पराधीन है और उसे स्वप्न में भी सुख नहीं है।"

वे आगे कहते हैं, “सामंती व्यवस्था में स्त्रियों के लिए एक धर्म है तो पुरुषों के लिए दूसरा है। तुलसी के रामराज्य में दोनों के लिए एक ही नियम है:

“एक नारिब्रतरत सब झारी।
ते मन बच क्रम पतिहितकारी।“

अर्थात, पुरुष के विशेषाधिकारों को न मानकर तुलसीदास ने दोनों को समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश दिया है। लेकिन विशेषाधिकारवालों ने ढोल गँवार आदि जैसी पंक्तियां तो गढ लीं, और एक नारीव्रतरत होने की बात चुपचाप पी गए। वर्तमान समाज में भी नारी अधिकार-वंचित है। पराधीनता में उसे सुख नहीं है। तरह-तरह की मीठी बातों से उसे भुलावा दिया जाता है लेकिन उसकी दासता ढंकी नहीं जा सकती। तुलसीदास के समय में ऐसी परिस्थितियां नहीं थीं कि पराधीनता के पाश तोड़े जा सकें। वह केवल इस पराधीनता पर क्षोभ प्रकट कर सकते थे और ऐसे समाज का स्वप्न देख सकते थे जिसमें पुरुष भी एक-नारी व्रतधारी हों। राम के चरित्र में उन्होंने यही दिखाया। यह दूसरी बात है कि हिंदी आलोचना में जितनी चर्चा सीता के पतिव्रत की है, उतनी राम के पत्नीव्रत की नहीं है।”

(यह उद्धरण डा. रामविलास शर्मा की "परंपरा का मूल्यांकन" नाम की पुस्तक के “तुलसी-साहित्य के सामंत-विरोधी मूल्य” वाले अध्याय से है। पृष्ठ 81-82। इस पुस्तक के प्रकाशक हैं, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)

भक्ति आंदोलन और भक्त कवियों पर छिछले स्तर पर टिप्पणी न करके उसके समाजोपयोगी मूल्यों को पहचानना और उन्हें अपने संदर्भ के लिए ढालना ज्यादा उपयोगी होगा।

डा. शर्मा ने तुलसी, सूर, जायसी, कबीर आदि भक्तों पर ससंदर्भ काफी लिखा है। वह सब नारी आंदोलन के लिए ही नहीं, देश निर्माण की सभी परियोजनाओं के लिए काफी प्रासंगिक है।

टिप्पणी हनुमान की पूंछ की तरह लंबी होती जा रही है, लेकिन एक बात और कहना चाहूंगा, धर्म और नास्तिकता के स्वरूप के बारे में।

इन दोनों में सूक्ष्म अंतर है। नास्तिक वह है जो भगवान को नहीं मानता। यह एक निजी मामला है। पर धर्म निजी मामला नहीं है, वह सामाजिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य शाश्वत नहीं होते और सर्वहितकारी भी नहीं होते, इसे समझना जरूरी है। धर्म का सामंतवाद के साथ चोली-दामन का संबंध है। धर्म सामंतवाद के विकसित होने के बाद आता है, क्योंकि उसकी आवश्यकता तभी पड़ती है। धर्म का मूल हेतु सामंतवाद के अंतर्विरोधों को छिपाना और सामंतों के अधिकारों को सही ठहराना है। सामंत वे होते हैं जो समाज के साधनों और संपत्तियों पर, जिनमें नारी भी शामिल है, अधिकार किए हुए हैं। धर्म अनेक तर्क-कुतर्कों से इसे सही ठहराता है। इस मामले में सभी धर्म समान हैं, चाहे वह हिंदू धर्म हो, इस्लाम हो, बौध-जैन-ईसाई-सिक्ख धर्म हों। धर्म का उद्देश्य यथास्थिति को बनाए रखना, यानी सामंतवाद को बनाए रखना होता है।

भक्ति आंदोलन यथास्थिति को पलटने के लिए निम्न वर्गों द्वारा चलाया गया महान आंदोलन है। उसके कई मूल्य आज के पद-दलितों के लिए, जिनमें नारी भी शामिल है, बहुत ही प्रासंगिक हैं। इसलिए नारी आंदोलन को रामचरितमानक का अवमूल्यन नहीं करना चाहिए, बल्कि उससे अपने फायदे की बातें ढूंढ निकलानी चाहिए।

जब सामंतवाद को कमजोर करके पूंजीवाद समाज पर हावी हो जाता है, यथा स्थिति भी मूलभूत रूप से बदल जाती है, और पुराने धर्म अब अनुपयोगी हो जाते हैं। इसीलिए सभी पूंजीवादी देशों में धर्म समाप्त सा हो गया है, और उनके स्थान पर मानवतावाद, विज्ञानवाद, प्रौद्योगिकीवाद, बाजारवाद, समाजवाद, आदि अनेक अन्य मूल्य-ढांचे अस्तित्व में आए हैं।

भारत मे भी जब सामंतवाद खत्म हो जाएगा, तो यही सब होगा। इसलिए नारी आंदोलन का असली लक्ष्य सामंतवाद को खत्म करना होना चाहिए। सामंतवाद खत्म होते ही, उसके मूल्य और उसका वैचारिक आधार यानी धर्म, भी समाप्त हो जाएगा।

रवीन्द्र दास said...

har bar aisa kyon lagta hai k samadhan pahle khoj liya gaya aur samasya bad me khoji jati hai.
yah man lene se koi sampradayik nahi ho jaega ya puratanpanthi nahi ho jaega k dharm hamari sanskritik-avchetan se juda hua pahlu hai. sanaad rahe, dharm matlab koi granth nahi, hamare avchetan ka bahut bada hissa hota hai.

Anonymous said...

problem is not religion,problem lies in art of subversion or mind manipulation used by Marxist/Leninist ideology on Indian population by pro soviet communists.

we are still in the same shell weather you are a man or a woman or an alien on Indian political scene.

RAJ SINH said...

uttam aalekh aur sasakt prastuti .

meree post 'RAM KEE VYAKTI PAREEXA' DEKHEN ISEE SANDARBH ME .

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