Wednesday, March 18, 2009

असल मर्द की क्या परिभाषा है ?

पिछले दिनों आशा जोगलेकर जी ने एक पोस्ट लिखी स्त्री मुक्ति मे पुरुषों की भागीदारी"जिसमे पुरुष स्त्री मुक्ति मे कैसे सहयोग दे सकते हैं इस पर कुछ बिन्दु रखे गये थे।लेख आशा जी की जानकारी के मुताबिक मूलत: मराठी मे था और लेखक मिलिन्द च्वहाण थे।यद्यपि पोस्ट किन्ही अन्य कारणों से भी विवादित रही लेकिन मेरा ध्यान एक अन्य मुद्दे पर चला गया जिसे लिखने की मै बहुत दिन से सोच रही थी।यह ध्यानाकर्षण हुआ इस पोस्ट पर मुनीश जी की एक टिप्प्णी से--




अब मेरी जिज्ञासा है कि रियल मैन याने असली मर्द की क्या परिभाषा है यूँ मैने भी बहुत कुछ लिख रखा है पर क्या ही अच्छा हो कि आज हम आप सभी से सुनें कि दुनियावालों की नज़र मे असल मर्द कौन है!!

24 comments:

Anonymous said...

नकली को परिभाषित कर दे असली की परिभाषा खुद सामने आजायेगी

Sanjay Grover said...

‘‘एक सम्पूर्ण पुरुष’’ शीर्षक से कभी एक व्यंग्य लिखा था। आप कहें तो पूरा यहीं चेप दूं ?

दिनेशराय द्विवेदी said...

कोई तो बताए पैमाना नापने का?

Ek ziddi dhun said...

सुजाता, वैसे तो छि ये मर्दवाद। पर फिर भी
असली मर्द वही है जिसमें एक स्त्री जीवित हो। सॉरी असली मर्द पता नहीं असली फूहड़ जंगली की परिभाषा। असली मनुष्य वही है जिसमें एक स्त्री जीवित हो।

Anonymous said...
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मुनीश ( munish ) said...

सुनामी संकट के समय बहुत सी स्त्रियाँ उनके लंबे बाल झाडियों मे फसने की वजह से काल कवलित हो गईं । उसी तरह साडी पेड पर चढने के लिये सर्वथा अनुपयुक्त होने से उनके लिये घातक सिध्द हुई ।
Dear Friends,
The above gem of an information is a qoute from the post concerned and it is this factual blunder which is instigating the moderator Ms.Sujata to side-track the whole issue. Mr. Chiplunkar has informed us all that this is only a figment of the translator's imagination and it was not there in the original marathee article .It does not need the knowledge of rocket science to know that waves measuring more than 100 ft are enough to kill a woman wheather wearing a skirt or a saree , whether having long or short hair and wheter on a tree or on ground .
When it was repeatedly pointed out that she should not have published the post with this ridiculous information then instead of admitting her fault she is stooping so low as to side track the whole issue!
Now your query Ms. Sujata . Real men or for that matter women are those who save each other from going wayward ,from going astray . Right? I hope u'll not cook such cock n ' bull stories in future just to make a post racy and eye catching ! Otherwise what difference would remain between us and news-channels ? I hope u refrain from anti saree propoganda . Happy Blogging !

सुजाता said...

मुनीश जी,

आपकी राय और सलाह के लिए बहुत धन्यवाद!

दिनेश जी ,

परिभाषा माने वह बताइए जो दुनियावाले मानते हैं जब आम बोलचाल मे दुनियावाले कहते हैं -यह असली मर्द है- तो उसके क्या मायने लेंगे आप? बस वही समझना चाह रही हूँ !

मुनीश ( munish ) said...

"Sorry if this is reading like an epitaph for the Feminist movement that my generation had invested so heavily in. Most of the movement’s leaders are dead or in retirement. The few still left, appear weary and morose. They tried. They really tried. But their efforts weren’t good enough. It isn’t about legislation. It isn’t about money. And it certainly isn’t about sex. True and lasting liberation is about the evolution of the species. So long as inequality rules, there is no hope for real freedom. Female emancipation in such a scenario is doomed to remain where it has been stuck for centuries. Man is not known to willingly give up a single inch of territory. He can’t. He won’t."----शोभा डे'{दा टाईम्स ऑफ़ इंडिया , 8 march2009}
सो यदि आप नारी मुक्ति आन्दोलन के प्रति वाकई गंभीर हैं तो श्रीमती
डे' को पढ़ें न की खबरिया चैनल्स की भांति भीड़ जुटाने की जुगत में कुछ भी ठेलने का ठेका लिए रहें । आज का पाठक क्वालिटी चाहता है वो भी सच से बगैर छेड़-छाड़ किए ।

Ek ziddi dhun said...

सुजाता, शुभा की कविता के बहाने एक नक सलाह-

सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच
मानवीय सार पर बात करना ऐसा ही है
जैसे मुजरा करना
इससे कहीं अच्छा है
जंगल में रहना पत्तियां खाना
और गिरगिटों से बातें करना।
-शुभा
http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2008/03/blog-post_9163.html
http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2008/03/blog-post_1605.html

Arvind Mishra said...

व्यर्थ की बहस !

Anonymous said...
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आर. अनुराधा said...

सुजाता, यह अलस्सुबह भीमपलासी क्यों छेड़ दी!!??? वह भी उनके सामने जिन्होंने भैरवी के "भ" की भी समझ नहीं।

गलत समय में गलत विषय पर चर्चा (मुझे शक है कि होगी भी!!) कहीं नहीं पहुंच पाएगी।

Anonymous said...

असली मर्द ?
ये सिर्फ पुरुष प्रधानता के अंहकार की अभिव्यक्ति है.
असली पुरुष के गुणों की व्याख्या में तमाम अच्छे अच्छे तथाकथित पुरुषोचित गुण आयेंगे फिर असली स्त्री की व्याख्या में वो गुण आयेंगे जो पुरुष प्रधानता का अंहकार स्त्रियों के लिए चाहता है
ऊपर पोस्ट में शामिल टिप्पणी भी यही बयान करती है

Anonymous said...

http://www.thefword.org.uk/reviews/2006/03/men_are_back_bu

Sanjay Grover said...

सुनामी में ऐसा हुआ या नहीं वो एक बात है, पर यह तो काॅमन सेंस से भी समझा जा सकता है कि सुनामी या ऐसी किसी भी अन्य आपदा के वक्त साड़ी, लुंगी और धोती की तुलना में पैंट, नेकर, स्कर्ट, सलवार सूट आदि ज्यादा जानबचाऊ साबित होंगे।
व्यंग्य ‘‘एक सम्पूर्ण पुरुष’’ के लिए मेरा ब्लाॅग (www.samwaadghar.blogspot.com) देखें, मगर थोड़ी देर बाद। yahaaN bhi dekheN.

Sanjay Grover said...

व्यंग्य-कक्ष में एक संपूर्ण पुरूष

वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘। मर्दों में मर्द। पतियों में पति। दोस्तों में दोस्त। रिश्तेदारों में रिश्तेदार। स्वस्थों में स्वस्थ। बीमारों में बीमार। लेखकों में लेखक। कलाकारों में कलाकार। प्रगतिशीलों में प्रगतिशील। रूढ़िवादियों में रूढ़िवादी। आधुनिक। परंपरावादी। देशप्रेमी। सहिष्णु। तेजतर्रार। विनम्र। आक्रामक। नाराज़। संतुष्ट। सभी कुछ।

एक संपूर्ण पुरूष। ‘अ कंपलीट मैन‘ं।

पत्नी उससे खुश थी। चूंकि वह पत्नी को खुश रखता था, इसलिए पत्नी को खुश रहना पड़ता था। पत्नी के अलावा भी वह कई पत्नियों और दूसरी स्त्रियों को खुश रखता था। इस संबंध में उसके अपने तर्क भी थे। जब वह दूसरी स्त्रियों के बीच होता तो कहता कि मैं मर्द हूं। स्मार्ट हूं। लड़कियां मुझ पर मरती हैं। मैं कितना प्रगतिशील हूं। जब दूसरे मर्द दूसरी स्त्रियों या उसके घर की स्त्रियों के साथ होते तो वह परंपरावादी हो जाता। कहता कि वे जनानियां हैं। औरतों में घुसे रहते हैं। दूसरी स्त्रियों से अपनी घनिष्ठता के बीच आने वाले उनके पतियों, भाइयों और दूसरे लोगों को वो किसी-न-किसी तरह पटाए-फुसलाए-बहलाए रखता। जबकि अपनी स्त्रियों से घनिष्ठता बनाने वाले हर पुरूष को कोई-न-कोई चाल चलकर संबंध तोड़ने पर मजबूर कर देता।

वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।

समाज में उसकी इज़्ज़त थी, प्रतिष्ठा थी, सम्मान था। किसी के घर बच्चा पैदा होता तो वह किलकारियां मारता सबसे पहले बधाई देने पहुंच जाता। बच्चे के मां-बाप को भेंट देता, शाबासी देता, हर तरह से प्रोत्साहित करता। बाहर निकलकर दूसरे लोगों से कहता कि साले, मूर्ख और गंवार कहीं के, बच्चे पैदा किए चले जा रहे हैं। न देश का खयाल है, न समाज का, न बच्चों के भविष्य का। लोग सुनकर खुश होते कि देखो अगले को सभी की कितनी चिंता है। कोई मरता तो सबसे पहले लटकने वाला चेहरा उसी का होता। अर्थी को दिए जाने वाले चार कंधों में एक उसका होना लगभग निश्चित था। जैसे वह रोज इंतजार ही कर रहा होता कि कोई मरे और वह दुःख बांटने जाए। आदमी से प्रेम करने की बजाय समाज को खुश रखना उसका दर्शन था।

वह एक संपूर्ण पुरूष था। अ कंपलीट मैन।

लोगों से बाते करते हुए उसकी ‘स्मार्टनेस‘ देखते ही बनती थी। वह जानता था कि ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान‘। अर्थात् ‘प्रैक्टिस मेक्स अ मैन परफैक्ट‘। सो दिन-रात अभ्यास करके उसने कमीनेपन, दोमुंहेपन, पाखंड, नीचता, लंपटता, लुच्चई जैसे अत्यावश्यक चारित्रिक गुणों का विकास अपने अंदर कर लिया था। अपनी वाक्पटुता को वह तर्क कहकर खुश रहता, तो दूसरों के तर्कों को वाग्जाल कहकर भी वह ही खुश रहता। ‘फूट डालो और राज करो‘ इस स्वर्णिम सूक्ति ने उसे दोस्तों, रिश्तेदारों व सहकर्मियों के बीच पाॅपुलर व अमर बना दिया था। उसके संबंध मूलतः दो तरह के लोगों से थे। एक तो वे जिनकी चमचागिरी वह कर सके। दूसरे वे जो उसकी चमचागिरी कर सकें। दूसरों के बिना वह इसलिए नहीं रह पाता था कि बिना उन्हें छोटा किए खुद को बड़ा नहीं मान पाता था। यूं वह महान था कि अपने महान होने के लिए उसने दूसरों को इतना महत्व दे दिया था।

वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।

जब वह लिखने पर उतारू हो जाता तो एक-से-एक चीज लिख मारता। ऐसे-ऐसे लेख जो दूसरे लिखें तो किसी अखबार में संपादक के नाम पत्र में भी न छपें। मगर उसके व्यावहारिक स्वभाव व सामाजिक संबंधों के चलते संपादकीय पृष्ठ पर बतौेर मुख्य लेख छप जाते।

आदमी को सामाजिक जानवर बनाने वाली सभी किताबें उसने घोंट रखी थीं। सो जानता था कि ‘आॅफेंस इज़ द बेस्ट डिफेंस‘ यानी ‘आक्रमण में ही सुरक्षा है‘। अतः किसी की रचना चुराता तो साथ ही उस पर चोरी का आरोप भी लगा देता। ऐसा जो कुछ भी करता सब दूसरों पर थोप देता। कवि सम्मेलनों के अलावा भी कवि सम्मेलन कर लेता।

जन्मोत्सवों में बधाई गायन और विवाहों में सेहरा गायन आदि के साथ-साथ मुर्दनी के माहौल को कवि मेले में बदल देने का हुनर भी उसमें था। अतः मुर्दों समेत सभी उससे खुश थे। यही उसकी कलाकारी थी कि वह कलाकार न होते हुए भी कलाकार था।

एक संपूर्ण पुरूष। अ कंपलीट मैन। जो कि वह था।

मगर जो शेर उसकी संपूर्णता में बाधक था, अभी भी हैः-

ये चलती-फिरती सूरतें जो देखते हैं आप,
कितने हैं इनमें वाकई इंसा न पूछिए।

-संजय ग्रोवर

(25 अप्रैल, 1997 में को अमर उजाला में प्रकाशित)
इसी संदर्भ में एक अन्य व्यंग्य ‘मर्दों वाली बात’ का लिंक:www.samwaadghar.blogspot.com/2009/03/8-4.html

Sanjay Grover said...

Lijiye dusra bhi yahiN par lijiye-
व्यंग्य
**मर्दों वाली बात**

वातावरण मर्दांनगी से भरपूर था। इतना कि भरी हुई टोकरी से मरी हुई मछलियोें की तरह मर्दानगी फिसल-फिसल जाती थी। मर्दानगी के कई रूप थे। कही घनी मूंछों में थी, तो कहीं बांहों की फड़कती पेशियों में। चढ़ी हुई आंखों में थी, तो मस्तानी चाल में थी। बच्चों को गरियाते हुए थी और मां-बहनों को सुरक्षियाते हुए थी। अखबारी कागज़ पर कूद-फांद भी मचा रही थी और धर्म के दंगल में कुश्ती भी लड़ रही थी।

एक खास किस्म के चिंतन की कृपा से एक खास किस्म की पूर्व-निर्धारित शैली में जीने वाले सभी जन मर्द थे। हालांकि वे गैस का सिलिंडर लाने से लेकर बिजली का बिल जमा कराने तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘एडजस्ट‘ कर लेते थे, मगर फिर भी मर्द बने रहते थे, क्योंकि औरतों के साथ ‘एडजस्ट‘ नहीं कर पाते थे। वे सब इसलिए भी मर्द थे कि वे माइकल जैक्सन नहीं थे। हालांकि उनमें से कई कवि, लेखक और कलाकार थे, जो लंबे बाल भी रखते थे और पान से होंठ लाल भी किए रहते थे। मंच पर सांस्कृतिक हरकतें मचाने में वे माइकल से उन्नीस भी नहीं पड़ते थे, पर वे सुमित्रानंदन पंत भी नहीं थे कि अपनी सुकुमारता को मर्दानगी से स्वीकार पाते। हाय कि मर्द होते हुए भी वे सब कितने लाचार थे।

उनमे से कुछ लोग लंबे बाल रखने की बजाय दाढ़ीबढ़ाए रखते थे, तो कुछ, कुछ और प्रतीकें। ये सब उनके पूर्वजो की पुस्तकों में मर्दानगी के चिन्ह घोषित किए गए थे और मर्दानगी सिर्फ प्रतीकों में ही बची रह गई लगती थी। अपने पूर्वजों की पुस्तकों और उनमें तय किए जा चुके मर्दानगी के मानदंडों में लिथड़े हुए वे आंखें बंद किए पड़े रहते थे। यह उनकी मर्दानगी का एक और प्रकार था। अपनी टोटल मर्दानगी के बावजूद वे मर्दानगी के सभी प्रतीकों का खुलकर प्रदर्शन न कर पाने की अपनी सांस्कृतिक मजबूरी पर मन मसोस कर रह जाते थे।

लगभग सभी मर्द लोग बदलाव के हामी थे, मगर धीरे-धीरे। वे कमीज-धोती से शर्ट-पतलून तक तब आते थे, जब दूसरे (कम मर्द या नामर्द) लोग छींटदार कपड़ों पर पहुंच जाते थे। इस तरह वे एक बदलाव लाते हुए भी, बड़े धैयपूर्वक, एकाध सीढ़ी का ‘गैप‘ बनाए रखते थे। वे चाहते थे कि देश-समाज-सभ्यता-संस्कृति को धक्का एकदम से न लगे बल्कि धीरे-धीरे लगे। हालांकि यह युक्ति किसी असाध्य रोग को झेल रहे वृद्ध रोगी को दयामृत्यृस्वरूप ‘स्लो प्वाइज़न‘ देने जैसे थी, मगर उनकी मर्दानगी के अनुकूल पड़ती थी।

एक दिन उन सबने उन पुरस्कारों पर हाय-तौबा मचा दी, जो उन्हें नहीं दिए गए थे। हालांकि माइकल जैक्सन कोई इधर का उद्योगपति नहीं था। फिर भी उसे न जाने क्या सूझी कि उसने इधर के मर्दों के लिए कुछ लंबे-मोटे पुरस्कारों की घोषणा कर दी।

इसके बाद क्या हुआ? क्या उन्होंने माइकल जैक्सन की भावनाओं का आदर करते हुए पुरस्कार ग्रहण कर लेने की सहृदयता व सहिष्णुता दिखाई? या पुरस्कार लौटा देने का क्रांतिकारी कदम उठाया? पाठक-श्रोता-दर्शक-आलोचक अपने-अपने अंदाजें मारते हुए अपने-अपने नतीजों पर पहुंच गए थे।

इधर मेरे लिए वक्त आ गया था कि हर लेख के अंत की तरह एक बार फिर डरूं। अतः जैसा कि नहीं होना चाहिए, पर अक्सर होता है, मैंने घोषणा की कि यह सब तो एक सपना था।

यह हुई ना मर्दों (ना+मर्दों?) वाली बात!
-संजय ग्रोवर
(जनवरी, 1997 को हंस में प्रकाशित)

Anonymous said...

परिभाषा

बेटा अपने पापा से कहता है पापा ! पापा ! मुझे बहन चाहिए।


पापा बेटा उसके लिए तो नौ महीने लगेंगे।


बेटा नहीं, इतनी देर नहीं चलेगी। ऐसा करिए चार आदमी और काम पर लगा

दो.......!

डॉ. मनोज मिश्र said...

कसौटी क्या है

बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण said...

मैं समझता हूं कि मर्द और औरत को अलगाना मात्र एक मरीचिका है, एक रेड हेरिंग है। हमें ऐसा समजा गढ़ना है जिसमें स्त्री और पुरुष समान हों, उनके अधिकार समान हों, और वे दोनों ही मात्र मनुष्य हों, न स्त्रि न पुरुष, हां उनमें बयोलोजिकल अंतर जरूर रहेंगें, लेकिन समाज की दृष्टि में उनमें कोई अंतर नहीं होगा।

इसलिए रियल मैन या रियल वुमैन की जगह मैं रियल मनुष्य की खायियतें गिनाना ज्यादा जरूरी और प्रासंगिक समझता हूं।

स्त्री आंदलोन, और आरक्षण आंदोलन से भी, से मेरी यही शिकायत है कि वह समाज को बांटना है, एक नहीं करता। जहां आरक्षण अगड़ों-पिछड़ों में समजा को बांटता है, स्त्री आंदोलन पुरुष और स्त्री को सघर्ष और प्रतिस्पर्धा के स्तर पर ला खड़ा कर देता है। इससे समाज की सारी शक्तियां अपने ही विभिन्न खंडों के साथ उठा-पटक करने में खर्च हो जाती हैं।

आवश्यकता यह है कि अपनी शक्ति और साधन को देश के सामने विद्यमान रियल समस्याओं का समाधान करने में लगाएं। यह पुरुषों और स्त्रियों दोनों को करना होगा।

हमारी असली समस्याएं अशिक्षा, भूख, बेरोजगारी, कुस्वास्थ्य, कुप्रशासन आदि हैं। इनसे लड़ने के लिए जो गुण और विशेषताएं आवश्यक होंगीं, वे ही रियल पुरुषों और रियल स्त्रियों में होने चाहिए।

Anonymous said...

रियल मैन याने असली मर्द की क्या परिभाषा है??

Anonymous said...

left or right ?

MUKANDA said...

रियल मैन याने असली मर्द की क्या परिभाषा है?? मेरा ख्याल है बच्चे पैदा करना मर्द का पहला काम है और असली मर्द की परिभाषा है बाकी सब बाद में ....अगर दुनिया में पैदा ही ना होते तो ये बहस भी ना होती ..इससे सिद्ध होता है असली मर्द वही है जो बच्चे पैदा कर सके

MS Nashtar said...

आपने अपने इस आर्टिकल में जेंडर के बारे में बहुत अच्छी जानकारी दिया है और बड़े ही प्यार से लिखा भी है. आपको देखकर मैं ब्लॉगिंग शुरू किया है. आपके लेख से प्रभावित होकर मैंने मेल फीमेल से संबंधित एक लेख लिखा है. कृपया मेरे वेबसाइट विजिट करें. कोई कमी हो तो कमेंट करके जरूर बताइएगा.
धन्यवाद.

अनुप्रिया के रेखांकन

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