Saturday, March 14, 2009

क्या नास्तिक स्त्री हुयी तो आजाद हो जायेगी?

सुजाता की पोस्ट जिसका कन्क्लूजन था कि "बिना नास्तिक हुए स्त्री आजाद नही हो सकती" को थोडा सा आगे बढाना चाहती हूँ, उस बात को जो शुरू की थी. इसका एक सन्दर्भ ये भी निकलता है कि नास्तिक स्त्री हुयी तो आजाद हो जायेगी मेरा कहना फ़िर से वही है, कि धर्म कोई अलग-थलग चीज़ नही है, पूरी सामाजिक सरंचना का ही एक हिस्सा है। ये व्यक्तिगत स्तर से ज्यादा हमें एक समूह की तरह काबू मे रखता है। जिस तरह कि दूसरी सामाजिक संरचनाए है, जैसे क़ानून व्यवस्था, शिक्षा संस्थान, संस्कृति, फैशन, परिवार, विवाह, उसी तरह धर्म भी है, और ये सभी एक दूसरे से बुरी-भली जो भी कहो, तरह से उलझे पड़े है। एक सरंचना का निषेध किया जा सकता है, व्यक्तिगत स्तर पर, पर दूसरी संरचनाए सामने खड़ी है। वों भी सबल के लिए निर्बल को धकियाने की लाठी ही तो है। कम से कम धर्म के स्वरुप पर , इसकी ऐतिहासिक यात्रा पर हम कितना कुछ जानते है, और धार्मिक पूर्वाग्रहों की शिनाख्त आसान है। "अभी कितने ही भ्रम झूठे पड़ने वाले है", और उनकी शिनाख्त का भी कोई तरीका अभी तय नही है।
सवाल ये भी है कि क्या इन संरचनाओं को बिल्कुल ही तोड़ दिया जाय, जो हजारो साल के सोशल प्रयोगों की उपज है, या फ़िर समय के हिसाब से इनके नए और ज्यादा न्याय संगत रूपों की और अंतर्वस्तु की तलाश ज़रूरी है?

चीन मे हुए "सांस्कृतिक क्रांती की यादे अभी धुंधली नही हुयी है", और वों पीढी अभी जिंदा है, जो उस विरासत को बचा पाने का दुःख झेल रही है। हमारे यहाँ भी धर्म से जुडी एक पूरी की पूरी सांस्कृतिक विरासत है, कला है, संगीत है, योगशास्त्र है, गणित है, जो हिन्दुस्तान को पूरी दुनिया मे विशेष बनाती है। और साहित्य भी है, चाहे वों वेद है, रामायण है, या महाभारत है, वों धार्मिक मूल्य के अलावा भी राजनीतिक, और सांस्कृतिक महत्व की है।
इस भूखंड के लिखित अलिखित इतिहास, का सम्पूर्ण सही पर उस यात्रा के कुछ फूटनोट तो है ही।

धर्म और इश्वर को मानने मानने से आगे जाकर, धर्म का जो ऐतिहासिक रोल है, उस पर भी बहस हो जिस तरह से वेटिकन, और वेटिकन की छतो पर बनी माईकल अञ्जेलो की पेंटिग्स को धर्म से आगे जाकर कला की द्रिस्टी से भी देखा जा सकता है, उसी तरह से अपने और दुसरो के धर्मो के साथ , कला संस्कृति, और साहित्य का जो खजाना है, उसके साथ किस तरह का नाज़रिया हो, उस पर भी बात होनी चाहिए कला और संस्कृति भी सामजिक संरचनाए है, और इसमे भी मूलत: पुरूष का ही पक्ष ज्यादा दिखता है, पर बेहद महीन तरीके से यही दस्तावेज महत्त्वपूर्ण हो जाते है, जब वों स्त्री -शोषण के लिखित दस्तावेज बन जाते है, और बार-बार मनुष्य की चेतना पर नए तरह से आघात करते है, आगे बढ़ने के लिए। और यंहा उनका परपस बदल जाता है। बल्कि ठीक उलटा हो जाता है।

मेरी इच्छा है कि ये बहस सिर्फ़ आस्तिकता और नास्तिकता के बचकानेपन से बाहर निकले और एक बड़े धरातल पर आस्था, धर्म और जीवन मूल्यों की बहस बने।

धर्म का भी जो रूप आज हमारे सामने है, वों पहले इस तरह का नही था। त्योहारों का जो बाजारू रूप समाने है, शादी व्याह जो भयंकर जलसों मे बदल चुके है, उसका भी शहरीकरण, तकनीकी, और खर्च करने की क्षमता से, और भारत के एक बड़े हिस्से का गाँव से बेदखल होने, कृषक समाज की जड़ो से दूर होने से जितना रिश्ता है, उतना रिश्ता अब धर्म से नही बचा है। ये ज़रूर है, की ये सब धर्म के नाम पर चल रहा है। पर धर्म की और धार्मिक मान्यताओं की इस ऐतिहासिक यात्रा पर, बदलते स्वरुप पर भी बात होनी चाहिए।


अक्सर लोग धर्म की काट विज्ञान को और विज्ञान सम्मत दर्शन मे खोजते है। जिसके अपने फायदे है, और अपने नुक्सान है। विज्ञान ओब्जेक्टिविती के चलते, परमाणु बम बना सकता है, विनाश भी ला सकता, है, पर उस विनाश से बचने के लिए, जो मानवीव संवेदना है, मनुष्य मात्र के लिए सेवा का भाव है, उसे नही उपजाता। जिस तरह से धर्म का इस्तेमाल सत्ता, और राज्य ने इतिहास मे किया है, वही इस्तेमाल विज्ञान का भी हुया है, दूसरे समाजो को गुलाम बनाने के लिए, अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए।

धर्म और विज्ञान को लेकर मेरे अपने जीवन मे बड़ी कशमकश रही है। कभी एक सीधा सरल विश्वास था कि धर्म का विकल्प विज्ञान सम्मत दर्शन है। मेरे अपने जीवन के ज्यादातर फैसले इसी सोच के तहत आते है, पर इसकी सीमा रेखा का भी मुझे ज्ञान है। कभी कभी नयी उम्मीद और असंभव के सृजन के लिए, यथार्थ से ज्यादा कल्पना की डोर पकड़नी पड़ती है। यथार्थ को और वस्तुपरक ज्ञान को, जिसकी निश्चित काल से बंधी सीमा है, को लांघना पड़ता है, अंधे की तरह।

धर्म का जो सेवा भावः है उसके लिए सम्मान अभी भी मेरे दिल मे है। और जो आडम्बर है, साम्प्रदायिकता है, उसके लिए बेहद नफरत। धर्म का, धार्मिक मान्यताओं का, और सामाजिक मान्यताओं का भी, फैशन का, और प्रगतिशीलता का भी, लगातार मूल्यांकन ज़रूरी है। कसौटी पर बार बार, सर्वजन हिताय, और व्यक्तिगत आज़ादी , दोनों के पैमाने से। सर्वजन हिताय जहा सामजिक न्याय की कसौटी है, वही पर व्यक्तिगत आज़ादी, सर्जन और नयी संभावनाओ की। जहा भी इन दोनों के बीच सामजस्य नही है, वों समाज रोगी है। किसी भी एक कि दूसरे के कीमत पर अति, समाज के स्वास्थ्य के लिए और विकास के लिए बाधक हो जाती है.

22 comments:

अजित वडनेरकर said...

यह टिप्पणी दरअसल सुजाता की पिछली पोस्ट पर डाली थी। मगर तब तक यह सबसे नीचे खिसक चुकी थी। इस पर भी सबकी निगाह पड़ जाए इसलिए स्वप्नदर्शी जी की उसी कड़ी की पोस्ट में इसे लगा रहा हूं।

"धर्म का गलत अर्थ ही उसे कलुषित करता है। धर्म में तो कोई बुराई नहीं है। किसी भी तथाकथित धर्म में चले जाइये...कुछ नैतिक कर्तव्यों की बात कही गई है। ज़मानेभर की अच्छाइयां जिनसे समाज और प्रकृति का कल्याण हो, धर्म का अर्थ रखती हैं। हिन्दू, सिख, ईसाई,इस्लाम तो जीवन पद्धतियां हैं, आचार-व्यवहार के मसले हैं ये सब। सच बोलना, मदद करना, लालच न करना, ज्ञानार्जन करना, अपने परिवेश को समझना, निरंतर आत्मोन्नति करना आदि तमाम कर्तव्यों को अपनाते हुए जो जीवनशैली आप अपनाते हैं वही है धर्म। इसमें कालिख कैसे नजर आ रही है?
धार्मिकता का आस्तिक और नास्तिक जैसे शब्दों से तो कोई लेना-देना नहीं है। नास्तिकता का अभिप्राय क्या सिर्फ ईश्वर में भरोसा न होना या अधार्मिक होना ही है? अगर ऐसा है तो यह बहुत सरलीकरण है और एक चमकदार विचार के बावजूद बहुत सी ग़लतफ़हमियां लोगों के मन में फिर रह जाएंगी ...
क्या अधार्मिक व्यक्ति मूर्ख नहीं होता? क्या सारे नास्तिक अक्लमंद होते हैं? राम-रहीम का नाम लेना ही धर्म है? असली समस्या रूढ़ियों से मुक्त होने की है। शिक्षित होने की है। चीज़ों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की है, उदार दृष्टि की है। हर किस्म की कट्टरता घातक है। तथाकथित धर्म के नाम पर बहुत घालमेल है। लोग पंथ को धर्म समझते हैं। पंथ गलत हो सकता है, धर्म कभी नहीं। आप इस्लाम को धर्म कहेंगे और फिर दस गलतियां उसमें से निकालेंगे। हिन्दुत्व को धर्म कहेंगे और फिर दस गलतियां उसमें से निकालेंगे। अरे भाई ये तो रास्ते हैं...धर्म तो बहस से परे है। सूर्य को उगना ही चाहिए,बारिश होनी ही चाहिए...जैसी आवश्यक बात है धर्म। सूर्य ने अपना कर्तव्य छोड़ दिया अर्थात अपना धर्म छोड़ दिया तो क्या होगा? धर्म बांधता नहीं, विस्तार देता है। आहार करना धर्म हैआहार करना धर्म है और निराहार रहना सीमित वैयक्तिक विकल्प। मांसाहार या शाकाहार यह भोजन के विकल्प या पंथ हैं। यह पसंद पर निर्भर है और इसमें अच्छाई या बुराई ढूंढी जा सकती है।

समूची पोस्ट से हमेशा की तरह सहमति है। आपकी मूल भावना को समझे हुए हैं तभी तो आपके साथ बने हुए हैं। बस, कुछ शब्दों पर कुछ अपनी कही :) "

दिनेशराय द्विवेदी said...

बहस ठीक तरीके से शुरू हुई है, लेकिन कहीं यह किसी गलत मोड़ पर जा कर समाप्त नहीं हो इस का अंदेशा बना रहेगा।

वडनेरकर जी से सहमति है। लेकिन धर्म का जो अर्थ वह कह रहे हैं। वह शास्त्रीय है। इस का वर्तमान लौकिक अर्थ तो वही लेना पड़ेगा जो बहुमत समझता है। जिस धर्म की बात अजित जी ने की है उस से किसी का क्या विरोध हो सकता है?

लेकिन वह धर्म जो स्त्रियों को दूसरे दर्जे का नागरिक समझता है और भी न जाने कितनी जकड़ बंदियों में लोगों को जकड़ कर शोषण की सत्ता को मजबूती प्रदान करता है उस के बारे में उन के विचार निश्चित ही यह नहीं होंगे।

नास्तिक का प्रारंभिक अर्थ तो वेद को न मानने वाला था। एक तरह से जो लोग वेद के बहाने लोगों को जकड़ बंदी में जकड़ रहे थे उन का विरोध करने वालों के लिए एक गाली के रूप में इस्तेमाल हुआ। उस का यह प्रयोग अब भी जारी है। आज इसे ईश्वर को न मानने वाले के रूप में देखा जा रहा है।

ईश्वर को मानने और न मानने वालों का वर्गीकरण करने के पहले यह भी स्पष्ट समझना होगा कि ईश्वर क्या है? उस के इतने रूप प्रचलित हैं कि उस ने अपनी पहचान ही खो दी है और सब का अपना अपना ईश्वर अलग हो गया है।

अद्वैत वेदान्त का निचोड़ निकालें तो वह इस भौतिक जगत की समष्टि को ही ईश्वर कहता है। इस के रूपों को मिथ्या और इस के अविनाशी (कंटेंट)पदार्थ को सत्य कहता है।

इस ईश्वर को मानने वाले को आस्तिक कहने लगें तो दुनिया में कोई नास्तिक रहेगा ही नहीं, कम्युनिस्ट भी नहीं।

धर्म जीवन शैली भी प्रदान करता है। मैं चंदन और हल्दी से बनी रोली का टीका लगाता हूँ। उसे लगाने के बाद जो गंध नथुनों में घुसती है वह जो आनंद देती है मैं ही समझता हूँ। टीका मेरे लिए श्रंगार है(यदि पुरुषों को भी इस का अधिकार है तो)। कोई मुझ से पूछता भी नहीं कि मैं क्यों इसे लगाता हूँ। लेकिन इसी टीके के कारण लोग मुझे पंडित जी कहना शुरु कर देते हैं।

धर्म संबंधी सवाल बहुत गहरे हैं। विशेष रूप से उस के एक जीवन पद्यति होने के कारण। वह हमारे जीवन की पद्यति के रूप में इतना रचा बसा है कि बहुत सी चीजों को निकाल दें तो जीवन में रिक्तता पैदा हो लेगी। उस रिक्तता को भरने के लिए वैकल्पिक साधन चाहिए जिन्हें विकसित होना शेष है।

अजित वडनेरकर said...

शुक्रिया द्विवेदी जी। मेरी बात को और आगे बढ़ाने के लिए। संतुलित बात।

Renu said...

धर्म का जो सेवा भावः है उसके लिए सम्मान अभी भी मेरे दिल मे है। और जो आडम्बर है, साम्प्रदायिकता है, उसके लिए बेहद नफरत। धर्म का, धार्मिक मान्यताओं का, और सामाजिक मान्यताओं का भी, फैशन का, और प्रगतिशीलता का भी, लगातार मूल्यांकन ज़रूरी है। कसौटी पर बार बार, सर्वजन हिताय, और व्यक्तिगत आज़ादी , दोनों के पैमाने से। सर्वजन हिताय जहा सामजिक न्याय की कसौटी है, वही पर व्यक्तिगत आज़ादी, सर्जन और नयी संभावनाओ की। जहा भी इन दोनों के बीच सामजस्य नही है, वों समाज रोगी है। किसी भी एक कि दूसरे के कीमत पर अति, समाज के स्वास्थ्य के लिए और विकास के लिए बाधक हो जाती है.........poori tarah se sehmat ha ham. Hame dharam se kabhi koi shikayat nahi najar aati, shikayat ha to logo ki soch se, unki samajh se.
apni snanskriti ko nakarna..ham to theek nahi samjhte aur na hi use samaj ke liye kalyaankaari samajhte hain.

Sanjay Grover said...

आस्तिक का अर्थ है जो अस्तित्व में विश्वास रखता है। ईश्वर का अस्तित्व अगर नहीं है तो वो उसमें व्श्विास नहीं करता । इस दृष्टि से हम जिसे आस्तिक समझते हैं वह नास्तिक हुआ। यह उदाहरण मैंने सिर्फ इसलिए दिया कि हम अगर चाहें तो आस्तिक, नास्तिक और धर्म की पचासियों नई-पुरानी व्याख्याएं कर/सुझा सकते हैं। लेकिन झगड़ा हमारे आपके बीच का नहीं है। आम आदमी जब मंदिर और मस्जिद के लिए लड़ता है तो उसके लिए धर्म और आस्तिकता के वही अर्थ होते हैं जो आम प्रचलन में हैं। उसके लिए बाल ठाकरे, बिन लादेन, जार्ज बुश, मोदी, इमाम बुखारी और उमा भारती ही धार्मिक और आस्तिक हैं। हम लाख कहते रहें कि घर्म का अर्थ या शिक्षाएं सच बोलना, मदद करना.....वगैरह हैं पर असलियत यही है कि व्यवहार में ठीक इसके विपरीत देखने को मिलता है। भ्रष्टाचारी देशों की सूची में अव्वल नंबर पर धार्मिक देश ही होते हैं। फिर गड़बड़ आखिर कहां हैं ? धर्म और आस्तिकता के नाम पर व्यवहार में जो चीज़े देखने को मिलती हैं वो हैं इंसान-इंसान में भेद करने वाली (वर्ण) व्यवभ्थाएं, जातिभेद, नस्लवाद, कर्मकाण्ड, अपना काम निकलने के एवज में ईश्वर को रिश्वत (प्रसाद) चढ़ाना, इसी के समानांतर अपना काम निकलने के एवज में अधिकारियों को रिश्वत देना तत्पश्चात भगवान का े‘प्रसाद’ चढ़ाकर अपराध-बोध (बशर्ते कि हो) से मुक्त हो जाना, आए दिन लोगों को दिखा-दिखाकर, सुना-सुनाकर, चिल्ला-चिल्लाकर धार्मिक आयोजन करना और स्त्रियों के चरित्र (?) वगैरहा की चिंता में सूखना और उनके कपड़े नापते रहना। क्या जापान, चाइना, रुस या अमेरिका में आप कल्पना भी कर सकते हैं कि आए दिन स्त्रियों को नंगा करके घुमाया जाए और विद्वान लोग पब में अपनी मर्जी से जाने वाली लड़कियों की चिंता में सूखते रहें। आजादी बहुत बड़ी चीज़ है। धर्म और आस्तिकता/नास्तिकता की तरह इसकी भी कई-कई व्याख्याएं हो सकती हैं। फिलहाल तो पुरुष भी ठीक से आज़ाद नहीं है। लेकिन घर्मविहीन भारत में स्त्री की स्थिति कम-अज़-कम ‘‘ढोल, गवार, शूद्र, प्शु नारी’’ से तो बेहतर ही होगी।

Sanjay Grover said...

अब ये जो कुछ रेनुजी कह रही हैं कि चाहे कुछ भी हो हम अपने घर्म-संस्कृति को नहीं नकार सकते। सह अपने आप में एक उदाहरण है कि घर्म के प्रचलित अर्थ ही काम भी करते हैं और सफल भी होते हैं। हम आप चाहे जितना बड़ी-बड़ी व्याख्याएं करते रहें। तिसपर यह हमें बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि स्त्रियों और दलितों के बारे में वीभत्स, विकृत और अमानवीय बातें भी हमारे ही घर्मग्रन्थों में लिखीं हैं। और स्त्रियों और दलितों के प्रति हूबहू वही रवैया और सोच हम सामाजिक व्यवहार में आए दिन देखते हैं। इसे आप चाहें तो ‘‘धर्म की व्यवहारिक सफलता, उपयोगिता और महत्ता’’ कह सकते हैं।

Asha Joglekar said...

मै तो स्वप्नदर्शी जी से सहमत हूँ । धर्म का मूल उद्देश्य सामान्य जन समुदाय को सही राह पर चलाना और गलत से बचाये रखना ही है । अब कुछ लोग महज स्वार्थ के लिये उसके अंदर की वे बातें ढूँढ कर जो उस वक्त के सामाजिक ढाँचे के हिसाब से बनाई गईं थीं उनको बढा चढाक र सामने लाकर ढोल पीटना चाहें तो पीटें । नास्तिकता और स्त्री स्वतंत्रता का कोई कास संबंध मै तो नही देखती ।

P.N. Subramanian said...

अजीत जी और दिनेश जी से पूर्ण सहमती. आगे कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं.

Anonymous said...

दरअसल तो यह बढ़ा-चढ़ाकर नहीं है। जो वास्तव में होता है और जितनी मा़त्रा में होता है, उसका बहुत मामूली सा प्रतिशत ही सामने आ पता है। जो भी हिन्दी का अखबार ठीक से पढ़ता होगा, जानता होगा कि महीने में कम से कम एक खबर किसी गांव में दलित स्त्री को नंगा घुमाने की होती है। पर चूंकि हमारे या हमारे जैसे किसी के साथ नहीं हो रहा तो हम क्यूं ध्यान दें। अब देखिए कि संघर्ष किया कुंदा वासनिक ने, उनका तो किसी को पता भी नहीं लेकिन उस सिलसिले में लावण्याजी को अच्दी-खासी ख्याति ज़रुर मिल चुकी है। फिर भी वे अभी तक नाराज़ हैं। जहां तक कहने को कुछ न बचने की बात है, तो जहां शास्त्रार्थ की आदतें पड़ी हों वहां कहने को कभी कुछ होता भी कहां है। शास्त्रों में से छांट-छांटकर बोलते रहो। जब दिमाग आलरेडी गिरवी रखा हो तो कैसी आजादी और कैसी गुलामी। जहां तक स्वार्थ की बात है तो हिंदू धर्म और उसके मूल स्वरुप को बनाए रखने में सबसे ज्यादा फायदा किसका है, ंिहदू आतंकवादियों में से सबसे ज्यादा किस वर्ण के हैं, कौन नहीं जानता। संजय ग्रोवर की बात आंशिक रुप से ही सही, विचारणीय है। प्रगतिशील सवर्णों को ऐसे मामलों में खुलकर सामने आना चाहिए।

Ashok Kumar pandey said...

ग्रोवर साहब, पूरी बहस को उलझाया और भटकाया जा रहा है।

सीधा मामला है कि धर्म से मुक्त होते ही स्त्री aतथा दलित को इससे जुड़ी प्रतिगामी सामाजिक सँरचनाओं और शोषक मूल्यमान्यताओ से मुक्ति मिल जायेगी। यह मुक्ति का aआरम्भ होगा।
आज़ाद दिमाग ही यह सोच सकता है।

सुजाता said...

स्वप्नदर्शी जी ,
कल भी आपके आलेख को पढकर मुझे और बहुत कुछ सोच पाने मे मदद मिली थी और मैने जो वहा लिखा था उसे दोहराती हूँ -
यदि हम माने कि, और जो सही भी है , कि धर्म एक संरचना है जैसा कि समाज, भाषा या और ...तो यह सम्भव है कि एक संरचना के ढहाते उसके वैक्यूम मे दूसरी संस्था संरचना आ जाएगी।यह भी उतना ही खतरनाक होगा भले ही वह बाज़ार हो या विज्ञान या कुछ भी....
इसलिए क्या किया जा सकता है? शायद सही होगा कि संरचनाओं को ढहने और बनते रहने दिया जाना चाहिये वे जड़ हुई स्थित्र हुईं कि उनमें काई पनपने लगती है और धीरे धीरे वे पवित्रता और आस्था जैसी चीज़ों मे तब्दील होकर हमारे जीवन मे से जीवनी शक्ति खींचने लगती हैं।
अत: बहुत ज़रूरी है कि इस संरचनाओं और संस्थाओं की पवित्रता मे अन्ध विश्वास न किया जाए क्योंकि यह आप भी स्वीकार कर रही हैं कि वह संरचना भर है।संरचना है तो मानव की ही बनाई हुई, तो वह उसे ढहा भी सकने का अधिकारी होना चाहिए...और संरचना है इसलिए वह दोषमुक्त नही कही जा सकती ...भले ही धर्म ही क्यों न हो।
इसलिए पुन: कहूंगी कि सबसे पहले धर्म - कोई सबसे पवित्र चीज़ है - मे विश्वास रखना छोड़ना होगा। धर्म की आम आदमी वाली परिभाषा मे जाना ही ठीक होगा क्योंकि बाकी बातें वाकई भ्रमित करती हैं,अमूर्त होने से दिक्कत पैदा करती हैं।
जहाँ तक बात है कि मानवीयता ही धर्म है। यह एक और परत खोलता है।वही बात कि आप हिन्दू , मुस्लिम , बौद्ध या किसी भी धार्मिक संरचना से आज़ाद हुए और उसकी जगह एक और को स्थापित कर दिया।यह निर्भरता अपनी आत्मिक, वैचारिक , मानसिक कमज़ोरी दर्शाता है। ठीक भी है।मानवता हमारी अपनी ज़िम्मेदारी भी है, कर्तव्य है समाज का हिस्सा होने के नाते।उसके साथ न निभा सकने की छूट जैसा कुछ सम्भव नही।

रंजना said...

स्वप्नदर्शी जी , बड़ा ही सुखद लगा सुलझे विचारों वाला यह पोस्ट पढना....
वैसे तो अपनी रूचि, संस्कार और सुविधा के हिसाब से किसी भी चीज का अर्थ लोग निकालते हैं,पर उस सबमे " धर्म " को लोगों ने सर्वाधिक विवादस्पद बना दिया है...लेकिन सबसे अफ़सोस की बात यह है कि यदि इसके व्यापक और गूढ़ अर्थ को जान समझ कर फिर लोग अपनी राय दें,तो वो सभीके लिए बड़ा ही कल्याणकारी होगा...पर यह अधिकांशतः होता नहीं.... धर्म को संकुचित अर्थों में प्रयुक्त करने वाले ही इसे विवादस्पद बनाते हैं.

दरअसल लोग पंथ और धर्म में बड़े कन्फ्यूज होते हैं...अजित जी ने गूढ़ बातों को बड़े ही सुन्दर ढंग से संक्षेप में कह दिया है.....

अजित वडनेरकर said...

आस्तिक और नास्तिक को सिर्फ ईश्वर और धर्म से जो़ड़ कर देखना संकुचित नज़रिया है। आस्तिक और नास्तिक के अर्थ इससे कहीं व्यापक हैं। उतना ही जितना सकारात्मकता और नकारात्मकता में हैं। आस्तिक में स्वीकार भाव है। वह जीवन की सकारात्मकता में विश्वास करता है। रूढ़ अर्थों में धर्मप्राण न होते हुए भी मनुष्य आस्तिक होता है, हो सकता है। मैं किसी अन्य धर्म की आलोचना करू, आपकी पूजा-प्रणाली पर आक्षेप न करू, समभाव की बात करूं, भरोसा रखूं, ये सब आस्था के विषय हैं और इस मार्ग पर चलनेवाला ही सच्चा आस्तिक है। इसमें मेरा ईश्वर और तेरा ईश्वर कहीं नहीं है। सृष्टि की हद हमारे सौर मंडल के पार नहीं हो सकती, हो ही नहीं सकती यह अनास्था का विषय है मगर सौरमंडल की सीमा से परे भी सृष्टि है यह आस्था का विषय है। लगातार नव-सृजन नवाचार में जुटा मनुष्य आस्तिक नहीं है तो क्या है ? नास्तिक वह नहीं है जो ईश्वर को नहीं मानता बल्कि वह है जो जिसकी सुबह नकार से होती है। “ये नहीं हो सकता, वो नही हो सकता” से अपने दिन की शुरूआत करनेवाले ही नास्ति भाव में विश्वास रखते हैं। वे नास्तिक हैं। इस दुनिया की अच्छाइयों का श्रेय उन्हें ही दिया जाएगा जो “ हो सकता है” अर्थात अस्ति की भावना में यकीन रखते हैं। ये सिर्फ दृष्टिकोण की बात है। अगर प्रचलित अर्थों में ही समाधान तलाशने हैं तो वे भी मिल जाएंगे मगर कभी तो दायरा व्यापक करना ही होगा ? पृथ्वी सूर्य की परिधि में घूमती है, सूर्य नहीं इस रूढ़ मान्यता से मुक्ति पाने में एक छोटे समूह की आस्था ने ही सफलता पाई। आज चांद-सितारों से आगे मानव के जाने का रास्ता प्रशस्त किया है।
धर्म को अपनी नई पहचान नहीं बनानी है। हमें नजरिया बदलना है। आलमारी में रखे कुछ मर्तबानों पर गलत लेबल चिपक गए हैं...धीरे-धीरे इन्हें ठीक करना है। बहुत सारी खीझ, बहुत सारी हताशा, बहुत सारा गुस्सा इससे कम हो जाएगा। बात तो दृष्टिकोण की है। उदार दृष्टिकोण। शिक्षा, रहन-सहन, संस्कार, धर्म, मान्यता हर मामले में। अब धर्म के प्रचलित अर्थ से ही लगाव है, नास्तिक-आस्तिक के रूढ़ अर्थो पर बहस करने से भी अगर सार्थक निष्कर्ष निकलता हो तो भी अच्छी बात है। पर कहने से कोई नास्तिक हो भी जाए तो क्या आगे बढ़ पाएगा ? प्रगति का रिश्ता आस्था से ही है, अनास्था से नहीं। आस्तिक ही बढ़ते हैं, चाहे वे मूर्ति पूजक न हों। राम-रहीम का जाप न करते हों।

अजित वडनेरकर said...
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Anonymous said...

मंदिर जाने वाले अधिकतर लोग नास्तिक हैं, और ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाले भी आस्तिक हैं.

मनुष्य मंदिर अपने अन्दर के किसी डर या स्वार्थ के कारण ही अमूमन जाता है, वर्ना धार्मिकता का ईश्वर और तथाकथित धर्म से क्या सम्बन्ध?

धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है, संसार की किसी और भाषा में इसका पर्यायवाची नहीं है. और धर्म का अर्थ 'रिलिजन' (पंथ) नहीं होता. वो तो हम ही हैं जिन्होंने एक व्यापक शब्द को अति-संकुचित कर दिया है.

मुझे ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह है पर मुझे आस्तिकता पर पूर्ण विश्वास है, और मैं धार्मिक होने का प्रयास कर रहा हूँ.

संसार में नास्तिकों की भरमार है, इनमे ईश्वर को मानाने वाले और न मानने वाले सभी शामिल हैं. आस्तिक बिरले ही मिलते हैं, और ज़रूरी नहीं की वे ईश्वर या किसी पंथ पर विश्वास रखते ही हों.

सुजाता said...

विवेक जी ,
धर्म क अर्थ चाहे कितना ही व्यापक हो , है वह एक संरचना ही जिसे मानव ने ही बनाया है।उसमे खामियाँ हैं जैसे किसी भी मानव निर्मित संरचना मे हो सकती हैं।धर्म को लेकर पवित्रता जैसे भाव सोच की सीमाएँ बन जाते हैं।

Sanjay Grover said...

बात शुरु हुई थी कि स्त्री अगर नास्तिक हुई तो क्या वह आजाद हो जाएगी। अब आपको क्या लगता है कि यहां नास्तिक शब्द किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है ? मेरे, आपके या आम प्रचलित मान्यताओं के ? पहले हम यह तय करलें फिर बहस दोबारा शुरु कर लें ? अन्यथा तो, माफ कीजिएगा, यह बहस बिलकुल बेमतलब और बेतुकी हो चुकी है।

स्वप्नदर्शी said...
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अजित वडनेरकर said...


मेरी इच्छा है कि ये बहस सिर्फ़ आस्तिकता और नास्तिकता के बचकानेपन से बाहर निकले और एक बड़े धरातल पर आस्था, धर्म और जीवन मूल्यों की बहस बने।


संजयजी, उक्त पंक्ति के मद्देनजर ही इस चर्चा में था। आपने राह दिखाई तो अब मैं इसमें नहीं हूं। क्या करें, अपनी समझदानी छोटी है?
जै जै

स्वप्नदर्शी said...

Ajit jee bane rahe bahas me. aur sanjay jee bhee. Ham sabkee samvedanaa ek aise samaj ko gadane kee hee hai, jo manushy maatr ke samman aur barabaree par khadaa ho.

Dr. Amar Jyoti said...

धर्म की पारम्परिक भूमिका सदैव से ही यथास्थिति को बनाये रखने की और कमज़ोरों के दमन शोषण को सह्य बनाने की रही है। यह अलग बात है सामाजिक विकास के साथ-साथ ही धर्म की सत्ता का क्षरण भी होता गया। धर्म का उन्मूलन और मानव की मुक्ति अन्योन्याश्रित हैं। नारी की मुक्ति भी मानव-मुक्ति के संघर्ष से अलग रहते हुए सम्भव नहीं है।

ताहम... said...

धर्म एक विचारधारा है, जो किसी सत्ता की घोषणा करती है, यदि स्त्री नास्तिक होती भी है, और वो नारीवादी या ऐसे ही किसी स्त्री समर्थकों से जुड़ जाए तो वह भी आज़ाद चिंतन नहीं होगा। दूसरी बात नास्ति और आस्तिक के अलग अलग जगह पर अलग अर्थ होते हैं, भारतीय दर्शन शास्त्रों में चुनांचे बौद्ध, जैन, चार्वाक वेद विरोधी हैं अतः वे भी नास्तिक हैं, परन्तु दयानंद सरस्वती के अनुसार वेदों को छोड़कर कोई भी बात पूर्ण नहीं है। हम तर्कों के मध्यम से अपनी बात रख सकते हैं, मगर यहाँ हजारों लोग हैं, जो इसपर हजारों परिभाषाएं देते हैं। मैं सहमत हूँ कि स्त्री को आज़ाद होना चाहिए,परन्तु यह शर्त थोडी अजीब है कि नास्तिक होकर, हलाँकि मैं लेख पर बिल्कुल भी आक्षेप नहीं कर रहा हूँ। परन्तु मेरा मानना यही है कि चिंतन के लिए कुछ छोड़ना या किसी से जुड़ना बिल्कुल आवश्यक नहीं है, मौलिक चिंतन होना ज़रूर होना चाहिए परन्तु।


Nishant kaushik...

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...