Sunday, March 8, 2009

अब आजीवन कारावास की सजा भोगेंगे ये कामान्ध गुरु !

घुघूती बासूती

महिला दिवस पर......

पाटन में गुरु के चोले में घूमते थे बलात्कारी ! अब आजीवन कारावास की सजा भोगेंगे ये गुरु !


यदि अमानुषिकता की, गुरु के नाम को कलंकित करने की कोई प्रतिस्पर्धा हो तो पाटन के टीचर्स ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट के ये छह अध्यापक सबको मात देते हुए गर्व (शायद उन्हें गर्व ही था ) से यह स्पर्धा जीत सकते हैं। दुर्भाग्य से यह लज्जाजनक घटना मेरे राज्य में किसी एक अध्यापक के किन्हीं कमजोर क्षणों की कहानी नहीं है। न ही एक अपराधी की एक विरले अपराध की कहानी। यहाँ तो दाल में कुछ काला नहीं सारी की सारी दाल काली ही नहीं, दुर्गंधयुक्त थी। और यह एक दिन नहीं परोसी गई, बार बार परोसी गई। इसे निगलने का दुर्भाग्य था अध्यापिका बनने के सपने सजाए छात्रा किशोरियों का। 


सोचिए, कौन माता पिता अपनी बेटियों को केवल बारहवीं पढ़ाकर अध्यापिका बनाना चाहेंगे ? अधिकतर लोग कम से कम स्नातक करवाकर ही अध्यापन की ट्रेनिंग देना चाहेंगे। ये कोई समाज के प्रतिष्ठित, धनवान लोग तो शायद नहीं होंगे। साधारण लोग व अधिकतर ये वे लोग होंगे जो गरीबी से बाहर निकलने की ईमानदार व सम्मानित राह खोजते होंगे। बहुत से दलित या पिछड़ी जातियों के भी होंगे। सरकारी कॉलेज, फीस शायद न या नाम मात्र की (गुजरात में सरकारी संस्थानों में फीस नाम मात्र की है और लड़कियों के लिए नहीं ही है।), छात्रावास की बहुत कम खर्चे में समुचित व्यवस्था, कल के सुनहरे सपने, जब अनपढ़ माता पिता भी गर्व से कह सकते कि उनकी बेटी अध्यापिका है। बहुत सी छात्राओं के लिए उनकीअध्यापिकाएँ ही रोल मॉडेल रही होंगी। शायद बहुत सी के लिए जीवन में सबसे सम्मानित व पढ़ी लिखी व्यक्ति उनकी अध्यापिका ही रही होगी।


चमकती आँखों मे भविष्य के सुनहरे स्वप्न लिए ये किशोरियाँ पाटन के DIET-PTC ( District Institute of education and Training BTC ट्रेनिंग की तरह) के छात्रावास में दो वर्ष के लिए पढ़ने के लिए गईं होंगी। उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि जिन अध्यापकों के कन्धों पर इन्हें अध्यापिका बनाने का भार है और जिनके संरक्षण में रहकर वे ट्रेनिंग लेने आई हैं वे उन्हें सैक्स ट्रेनिंग देने को लालायित हैं। ये कामान्ध अध्यापक, एक नहीं, दो नहीं, पूरे छह, इन्हें अपनी छात्राएँ कम व अपनी वासना का खिलौना अधिक मानते रहे। समाचार पत्रों में ५ फरवरी २००८ से इस विषय में लज्जाजनक समाचार आते रहे हैं।


बहुत से शिक्षाविद् यह मानते हैं कि केवल वार्षिक परीक्षा छात्रों की क्षमता का सही आंकलन नहीं करती। वर्ष भर छात्रों के द्वारा कक्षा में की गई मेहनत, गृहकार्य, कक्षा में प्रतिदिन दिए गए उत्तर व टेस्ट में लिए गए अंक आदि छात्र का बेहतर आंकलन करते हैं। इसकी अपेक्षा वार्षिक परीक्षा में कोई भी कक्षा में अनुपस्थित रहने वाला,सोने वाला या ऊधमी छात्र भी अन्तिम दिनों में घोटा लगाकर या नकल करके अच्छे अंक पा सकता है। इसीलिए बहुत से संस्थानों में आंतरिक मूल्यांकन का प्रावधान रखा जाता है। इसका दुरुपयोग अपने प्रिय छात्र को अधिक अंक देने के लिए किया जा सकता है यह तो कल्पना की जा सकती है। किन्तु छात्राओं के साथ बलात्कार, यौन उत्पीड़न के लिए किया जा सकता है यह तो किसी ने दुःस्वप्न में भी नहीं सोचा होगा। यहाँ आंतरिक मूल्यांकन ५ या १०% ना होकर ४५ % थी। यह इतनी अधिक है कि छात्राओं को अच्छे अंक देने का प्रलोभन और उससे प्राप्त होने वालीसरकारी प्राइमरी स्कूल में नौकरी का प्रलोभन या खराब अंक देने का भय दिखाकर अध्यापक अपनी मनमानी करते रहे और किसी को भी पता नहीं चला। यहाँ अध्यापकों ने घिनौनेपन की सारी सीमाएँ पार करते हुए जो किया वह देख तो शायद पॉर्न निर्माता भी दाँतों तले उँगली दबा लें।


यहाँ छात्राओं को कूट शब्द सिखाए जाते थे और सलाह दी जाती थी कि ये शब्द वे अपनी वरिष्ठ छात्राओं से सीखें। प्रत्येक कूट शब्द जैसे, चाय, कॉफी, भोजन, ओ के, TLM ( Teaching Learning Material) का कोई विशेष अर्थ होता था जिसका वे कक्षा में बेबाकी से उपयोग करते रहते थे। विज्ञान का अध्यापक कक्षा में कहता था कि कुछ TLM(अन्तः वस्त्र ) दिखाओ तो मैं तुम्हें अच्छे अंक दूँगा। छात्राओं को चाय, कॉफी,ओ के व भोजन (जिनका यह अर्थ बिल्कुल नहीं था ) का निमन्त्रण अधिक अंक पाने के लिए दिया जाता था। वहाँ कम्प्यूटर कक्ष इनकी विलासिता व अमानवीय ढंग से यातना देने का केन्द्र बना हुआ था। जाँच के दौरान कम्प्यूटरों में प्रचुर मात्रा में पॉर्न सामग्री जो छात्राओं को दिखाई जाती थी मिली।


इन अध्यापकों का भाँडाफोड़ तब हुआ जब एक १९ वर्षीया, शायद तब १८ वर्षीया छात्रा बार बार बेहोश होने लगी। यह छात्रा गरीब, दलित, भूमिहीन कृषि मजदूर की पांच संतानों में से एक थी। ९ नवम्बर २००८ से इस छात्रा का चार बार छह अध्यापकों द्वारा सामूहिक बलात्कार हुआ था। उसे धमकाया जाता था कि उनकी बात न मानने पर उसे अनुत्तीर्ण कर दिया जाएगा। उसकी मानसिक व शारीरिक बुरी हालत के कारण उसकी सहपाठिनों को उसके बलात्कार की बात उससे पता चली। ३१ जनवरी को छात्राओं ने अपने अध्यापकों के विरुद्ध लिखित शिकायत कॉलेज अधिकारियों को दी। ४ फरवरी को एक छात्रा ने फोन करके अपने तथा बहुत से अन्य अभिभावकों को कॉलेज बुलाया। जब उन्हें सारी बात पता चली तो उन्होंने अध्यापकों की जमकर पिटाई की और उन्हें पुलिस को सौंप दिया। ५ फरवरी को यह समाचार समाचार पत्रों में आया।


यह केस एक विशेष फास्ट ट्रैक सेशन कोर्ट में ले जाया गया। यहाँ गवाही देते समय व वकील द्वारा क्रॉस एक्ज़ामिनेशन के दौरान यह छात्रा दो बार बेहोश हो गई। चार्जशीट में ३७ छात्राओं के बयान भी हैं। ६ मार्च २००९ यानि लगभग १३ महीने में माननीया सुश्री न्यायाधीश एस सी श्रीवास्तव ने इन छह अध्यापकों को आजीवन कारावास की सजा व १०,००० रुपए पीड़िता को देने का आदेश दिया।


यह न्याय पीड़िता के शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक घावों को भर नहीं सकता परन्तु देश में न्याय है व साहस से अपनी लड़ाई लड़ने से और कुछ नहीं तो वहशियों को दंडित करसलाखों के पीछे पहुँचाया जा सकता है, यह सांत्वना और विश्वास तो देता ही है। अब कम से कम यह आशा तो की जा सकती है कि हमारी बच्चियों का शोषण करने वालों में से जैसे छह को अपनी सही जगह पर पहुँचाया गया वैसे ही ऐसे अन्य अपराधियों को भी पहुँचाया जाएगा।


इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक दिल दहला देने वाली घृणित बात जो है वह यह है कि इन वहशियों ने छात्राओं पर अपने नियन्त्रण का दुरुपयोग कर अपने अध्यापक जैसे सम्मानित पद व छात्राओं व समाज के विश्वास का भी बलात्कार किया। एक लड़की या स्त्री सड़क पर चलते हुए अपने पर होने वाले हमले के प्रति संशकित व जागरुक रहती है। जब यह हमला घर में पिता, भाई, संरक्षक या विद्यालय में अध्यापक ही जिनपर उसका अटूट विश्वास होता है, कर दें तो वह कैसे बच सकती है? ऐसे में यह केवल स्त्री का ही नहीं, विश्वास व समाज की नींव का ही नृशंस बलात्कार है। शायद ये आततायी हत्यारों से भी गए गुजरे हैं।


क्या कोई उस असहाय किशोरी की मनोदशा की कल्पना कर सकता है? कैसे वह तिल तिलकर प्रतिदिन अन्दर ही अन्दर थोड़ा थोड़ा मरती होगी। कैसे वह अगले दिन उनकी कक्षा में जाने का साहस जुटा पाती होगी। जिस अध्यापन को उसने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था उसी में इतनी क्रूरता व गंदगी देख उसके हृदय पर क्या बीतती होगी।


प्रश्न अनेक हैं। क्या छात्राओं के कॉलेज में कुछ अध्यापिकाएँ नहीं होनी चाहिएँ थीं? क्या हमारे प्रदेश में अध्यापिकाओं की कमी है? यदि है तो देश के अन्य भागों से उनकी नियुक्ति करना क्या असंभव था? क्या हमारी बच्चियों को आदमखोरों के हवाले इतनी सुगमता से किया जा सकता है?


यह लेख एक वर्ष पहले भी लिखा जा सकता था परन्तु सबकुछ इतना अविश्वनीय था और मैं अपराध सिद्ध होने की प्रतीक्षा कर रही थी। अभी भी यही कामना है कि कोई निर्दोष दोषी ना सिद्ध हुआ हो। किन्तु इतनी छात्राओं ने उनके विरुद्ध गवाही दी है। कम्प्यूटर में सबूत मिले हैं। फिर भी अपनी तरफ से समाचार पत्रों द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर यह लेख लिखा है। यदि कोई गल्ती हुई हो तो अनजाने में ही हुई है, जानबूझकर या नमक मिर्च लगाने के उद्देश्य से नहीं। 


माता पिता से विनती करती हूँ कि अपनी बच्ची/ बच्चे को सिखाएँ कि कोई भी स्पर्श या बात यदि उन्हें असहज करे तो वे उसका विरोध करें व माता पिता को बताएँ। छोटी हरकतों से ही ऐसी प्रवृत्ति के लोग बड़ी हरकतों पर उतर आते हैं। उन्हें आरम्भ में ही रोकने व उनसे प्रश्न करने से उनकी हिम्मत शायद इतना आगे बढ़ने की न हो पाए। किसी पर भी इतना विश्वास न करें कि वह उनका अनुचित लाभ उठा सके। आज न तो लड़कियाँ सुरक्षित हैं न छोटे लड़के।


आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पीड़िता व अन्य छात्राओं को बधाई व शुभकामनाएँ! भविष्य में भी वे ऐसे ही साहस के साथ अन्याय के विरुद्ध लड़ें व अच्छी अध्यापिकाएँ सिद्ध हों यही कामना करती हूँ।


----यह लेख घुघुती बासूती से साभार 

3 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

isi tarah se saja milne lage to kuchh theek ho.

मुनीश ( munish ) said...

This article must appear in print media as well.

Unknown said...

एक दिल और दिमाग को झकझोरने बली कहानी और बेहद संतुलदृष्टिकोण. इस देश मे अगर अन्याय की ऐसी कड़ी सजा सभी अपराधियों को मिल जाए तो ऐसे लोगों का दुराचरण का दुस्साहस ना हो.

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