Wednesday, April 22, 2009

ब्रांट बहनों की कहानी-3

पिछले भाग से आगे

उस समय के संकुचित और दकियानूसी विक्टोरियन माहौल में किसी लड़की के लिये इज़्ज़त के साथ जीने का एक ही तरीका माना जाता था- कि वह विवाह करके अपने पति के घर चली जाए और उसके घर व बच्चों की देख-भाल में जीवन बिता दे। पर किसी लड़की की शादी होने के लिये यह भी ज़रूरी था कि उसके पास कुछ ज़मीन-जायदाद या रुपया-पैसा हो। उस समय के अधिकतर पुरुष किसी स्टेटस वाली लड़की को ही पत्नी के रूप में पाना चाहते थे। ब्रांट बहनें इस दोहरी शर्त के आगे लाचार थीं| उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं था जो उन्हें उनके भविष्य के प्रति आश्वस्त करता। रुपये-पैसे का दूर-दूर तक नामो-निशान ही नहीं था, सो उनसे कोई शादी का प्रस्ताव रखे, यह तो सवाल ही नहीं उठता था। यूँ भी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की जद्दोज़हद कम नहीं थी। पादरी पिता के रहते कम-से-कम सर पर छत और खाने-पीने की सहूलियत, मामूली ही सही, पर थी। खुदा न खास्ता उन्हें कुछ हो गया तो वे सड़क पर आ जाएंगी, यह वे भी जानती थीं, और उनके पिता भी। भाई तो पहले से पिता पर आश्रित था। सो उन्हें किसी भी तरह अपनी आजीविका का प्रबन्ध करना था |
इस तरह की मध्यमवर्गीय निर्धन और अविवाहित लड़कियों की आजीविका का एक ही ज़रिया था उन दिनों, कि वे किसी रईस खानदान के बच्चों की गवर्नेस बन जाएं और कुछ सालों का अनुभव प्राप्त करने के बाद किसी बोर्डिंग स्कूल में अध्यापिका बन जाएं। ऐसी लड़कियों के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती थी अपना एक छोटा-मोटा स्कूल खोल लेना। और कोई रास्ता सामने न पाकर ब्रांट बहनों ने भी चाहे-अनचाहे उस राह पर चलना शुरू कर दिया। यह अनुभव उनके लिये कुछ अच्छा नहीं रहा। गवर्नसें क्योंकि गरीब खानदान की हुआ करती थीं, उनके साथ न उनके विद्यार्थी बच्चे अच्छा सलूक करते थे न उनके अमीर माँ-बाप और परिवार के अन्य सदस्य। शिक्षित होने के बाद भी उन्हें नीची निगाह से देखा जाता था और उनकी इज़्ज़त करने की जगह उनसे मामूली नौकर की तरह व्यवहार किया जाता था। वेतन भी उन्हें बहुत कम मिलता था| बौद्धिक रुचि रखने वाली ब्रांट बहनों का इस वातावरण में दम घुटने लगा। वे जल्दी से जल्दी अपने घर लौट जाना चाहती थीं। पिता का घर उनके लिए एक शरणस्थल था जहाँ वह एक दूसरे के सहारे अपनी ज़िन्दगी गरीबी में ही सही, पर शांति से गुज़ार सकती थीं। पर आर्थिक कठिनाइयों के चलते कई साल तक ऐसा करना संभव नहीं हो पाया। कुछ अधिक कमाई हो सके, यह सोच कर उन्होंने अपने घर के पास लड़कियों का एक बोर्डिंग स्कूल खोलने की योजना बनाई| ऐसा स्कूल खोलने के लिये फ़्रेन्च और जर्मन भाषा का ज्ञान ज़रूरी था, इसलिए शार्लोट और एमिली इन भाषाओं को पढ़ने के लिये साल भर के लिये ब्रसेल्स गईं|
वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने अपना स्कूल खोलने की बहुत कोशिश की पर उनका घर शहर से दूर होने के कारण उन्हें छात्राएं नहीं मिलीं| बहनें बहुत निराश हुईं, फ़िर भी अपनी कठिन ज़िंदगी से जूझना उन्होंने ज़ारी रखा| समाज उनकी गरीबी और लाचारी के कारण उन्हें हिकारत के भाव से देखता था | वे जिस जुझारूपन से अपनी परिस्थितियों से लड़ रही थीं, वह भी प्रशंसा की बजाय आस-पास के लोगों के लिये नापसन्दगी और उपहास का कारण था | साहित्य रचना का शौक ही उनका एकमात्र सहारा था जो कभी-कभी उन्हें सारी तकलीफ़ों के परे एक काल्पनिक संसार में ले जाता था, जहाँ सिर्फ़ वे होती थीं और होते थे उनके गढ़े हुए चरित्र।
इक्कीस वर्ष तक ब्रांट परिवार की देख-भाल करने के बाद उनकी पालनकर्त्ता मौसी श्रीमती ब्रैनवेल का सन १८४२ में निधन हुआ तो ब्रांट बहनों ने पाया कि मौसी के पास जो थोड़ी-बहुत जायदाद थी, उसे वे अपनी भांजियों- शार्लोट, एमिली और ऐन के नाम वसीयत कर गयी थीं। उस समय शार्लोट छ्ब्बीस, एमिली चौबीस और ऐन बाइस वर्ष की थी। मौसी की जायदाद बहनों ने बडी़ कृतज्ञता और राहत के साथ स्वीकार की। इन कुछ पैसों के भरोसे बहनें काम छोड़ कर पिता के घर वापस आ गईं और पूरी तरह साहित्य रचना में जुट गईं। उन्हें यह उम्मीद थी कि रचनात्मक तृप्ति के साथ-साथ इन रचनाओं के छपने से उनकी कुछ आय भी हो सकेगी जो उनके लिये आजीविका का एक सम्मानपूर्ण साधन होगी।
आगे का रास्ता आसान नहीं था। उस समय महिलाएं साहित्य के क्षेत्र में नहीं के बराबर थीं और मध्यमवर्गीय लड़कियाँ तो खैर थीं ही नहीं। लिखी हुई, तैयार रचनाओं के प्रकाशक ढूँढ़ना टेढ़ी खीर था। शार्लोट ने अपनी कुछ रचनाएं प्रकाशकों को भेजीं पर बिना पढे़ ही उसकी रचनाएं वापस कर दी गईं। शार्लोट ने एक बार अपनी कुछ कविताएं उस समय के प्रसिद्ध साहित्यकार राबर्ट साउथी के पास उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए भेजीं। उत्तर आया,
“साहित्य- रचना औरतों की आजीविका का साधन नहीं हो सकती और होनी भी नहीं चाहिए। अगर औरत अपने सामाजिक रूप से तय (घर-परिवार की देख-भाल संबंधी) कर्तव्यों को ढंग से निभा रही हो, तो उसे फ़ुर्सत ही नहीं मिलेगी कि वह कुछ लिखे। यहां तक कि उसके पास एक अभिरुचि के तौर पर या सिर्फ़ मनोरंजन के लिये भी लिखने का समय नहीं बचेगा।”
अर्थात अगर कोई स्त्री कुछ लिख रही है तो वह निश्चित तौर पर अपने समाज द्वारा निर्धारित दायित्वों की अवहेलना कर रही है! यही उस समय के करीब-करीब सभी बुद्धिजीवियों का मंतव्य हुआ करता था| पर शार्लोट ब्रांट ने हिम्मत नहीं हारी। कई बार रचनाएं प्रकाशकों द्वारा अस्वीकृत हो जाने के बाद उसे एक नया उपाय सूझा। अगर साहित्य की दुनिया पुरुषों की मिल्कियत है तो क्यों न हम बहनें उसमें पुरुष बन कर स्थान बनाएं? शार्लोट ने अपना कलमी नाम रखा करेर बेल, एमिली बनी एलिस बेल औए ऐन हो गई ऐक्टन बेल | शार्लोट ने तय किया कि तीनों बहनों की कविताओं का एक मिला-जुला संग्रह प्रकाशन के लिये तैयार किया जाए | एमिली, जो स्वभाव से संकोची और अन्तर्मुखी थी, पहले अपनी कविताएं भेजने में हिचकिचाई, पर शार्लोट ने आखिरकार उसे मना ही लिया| सन १८४६ ई. में ऐन, एमिली और शार्लोट ब्रांट ने अपना एक मिला-जुला कविता संग्रह पुरुष-सुलभ छ्द्म नामों (ऐक्टन, करेर और एलिस बेल) के साथ छपने भेजा। कविताएं अच्छी थीं, कोई आश्चर्य नहीं था कि वह संग्रह स्वीकृत हो गया और छप भी गया। किताब छ्पने के बाद जब उसकी पहली प्रतियाँ जब उनके हाथों में आईं, तो ऐन, एमिली और शार्लोट की खुशी का ठिकाना न रहा। पुस्तक हालाँकि व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हुई, लड़कियाँ और भी उत्साह से लिखने में जुट गईं।
अगले साल शार्लोट ने अपना पहला उपन्यास, ’प्रोफ़ेसर' छपने के लिए भेजा पर प्रकाशकों ने उसे अस्वीकृत कर दिया। शार्लोट बिना निराश हुए उसे एक के बाद दूसरे प्रकाशक के पास भेजती रही और साथ ही अपना दूसरा उपन्यास, ’जेन आयर,’ लिखने में जुट गई। यह उपन्यास पूरा हुआ और उसे छपने के लिए स्वीकार भी कर लिया गया। सन १८४७ ई के अगस्त में उपन्यास 'जेन आयर' प्रकाशित हुआ। लेखक के रूप में उस पर नाम छपा था करेर बेल का, जो शार्लोट का छ्द्म नाम था। किताब छपने के दो महीने बाद शार्लोट को अपने पहले उपन्यास की प्रतियाँ मिलीं और चार महीने बाद अपना पहला पारिश्रमिक शार्लोट के हाथ में पहुँचा। उस समय उपलब्धि का जो अहसास उसे हुआ वह शब्दातीत था। जब उसने पहली बार पिता को बताया कि उसकी लिखी एक पुस्तक प्रकाशित हो गई है तो अपनी बेटियों की रचनात्मक प्रतिभा से अनजान रेवरेंड ब्रांट ने इस बात पर विश्वास ही नहीं किया, जब तक शार्लोट ने अपने 'जेन आयर' की एक प्रति और उस पर प्रकाशित कुछ समालोचनाएं उनके हाथ में नहीं थमा दीं|
लगभग उन्हीं दिनों, उसी वर्ष के अंत में ऐन और एमिली को भी सफलता मिली | ऐन का पहला उपन्यास 'एग्नेस ग्रे' ऐक्टन बेल के छ्द्म नाम से और एमिली पहला उपन्यास 'वदरिंग हाइट्स' एलिस बेल के छ्द्म नाम से प्रकाशित हो गया। जेन आयर एक उत्कृष्ट कोटि का उपन्यास था और साहित्य जगत में बेहद चर्चित और व्यावसायिक रूप से सफल हुआ। 'वदरिंग हाइट्स' पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आईं पर चर्चित वह भी हुआ| वह एकदम अलग तरह का, पाठक को झकझोर देने वाला उपन्यास था|
तीनों बहनें खुश थीं। छ्द्म नामों के चलते शोहरत मिलने का तो सवाल ही नहीं था पर उनकी रचनाओं को लोग पढ़ रहे थे और कुछ रायल्टी की रकम भी हाथ आ रही थी। यही उन्हें प्रेरित करने के लिये काफ़ी था। बहनें पूरी मेहनत से से उच्च कोटि के साहित्य की रचना में व्यस्त हो गईं। भावुक एमिली की रुचि कविताओं में अधिक थी। वह मार्मिक और दिल छू लेने वाली कविताएं लिखा करती थी। ब्रांट बहनों की रचनाएं सिर्फ़ उनकी महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति नहीं थीं| लिखना उनके लिये एक ज़रूरत थी, उनकी रचनात्मकता उनकी आत्मा का पोषण करती थी | लिखना उनके लिये जीने का एक तरीका था|

2 comments:

ab inconvinienti said...

प्रेरणास्पद जीवनी... संघर्ष तपाकर हमें और निखारता है, अगर हम हौसला बनाए रखें. ब्रांट बहनों की संघर्ष कथा की सीख यही है की सच्ची प्रतिभा अपना रास्ता तलाश ही लेती है.

Vandana Pandey said...

Dhanyavaad aapko.

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