Thursday, April 23, 2009

ब्रांट बहनों की कहानी-4


पिछले भाग से आगे



ब्रांट बहनों ने अपने जीवन में बहुत दुख झेले थे, फ़िर भी उन्होंने अपने भाई की तरह अपने मन में समाज और अपनी परिस्थितियों के प्रति आक्रोश और कुंठा को नहीं पलने दिया| वे अपने आस-पास के लोगों के प्रति हमेशा कोमल और सहृदय रहीं, उनके प्रति भी जो उनके दुख का कारण बने थे| पिता ने उनके प्रति कभी स्नेह नहीं जताया पर हमेशा, आर्थिक रूप से स्वतन्त्र हो जाने बाद भी, वे उनके प्रति स्नेहिल रहीं और पूरे मन से उनकी देख-भाल व सेवा किया करती थीं| भाई ब्रैनवेल से, जिसे उनका सहारा बनना चाहिये था, उन्हें जीवन भर दुख, क्लेश और परेशानी के सिवा कुछ नहीं मिला| फ़िर भी उस पर उनका स्नेह और करुणा थी| उनकी नौकरानी टैबी बूढ़ी हो जाने के कारण घर का काम करने में थक जाती थी| उसका काम कम करने के लिये एमिली सुबह-सुबह सबके उठने से पहले उठ कर रसोंई में चली जाती थी और उसका काफ़ी काम निबटा देती थी| टैबी की आँखें कमज़ोर हो गई थीं, इसलिये आलू छीलते समय छिलके के कुछ भाग बाकी रह जाते थे, फ़िर भी वह यह काम नयी कम उम्र की नौकरानी को नहीं देना चाहती थी| उसे दुख न हो इसलिये यह काम नयी नौकरानी को न देकर शार्लोट स्वयं टैबी की आँख बचा कर उन छिलकों को हटा दिया करती थी| और यह सब करना एमिली और शार्लोट ने तब भी ज़ारी रखा जब वे अपनी रचनात्मक गतिविधियों में निहायत व्यस्त थीं|
इस बीच घर का बेटा ब्रैनवेल ब्रांट, जो कला के क्षेत्र में असफल हो जाने के कारण निराश और क्षुब्ध था, आजीविका के लिये आखिरकार एक क्लर्क की नौकरी करने लगा। पर कुछ ही दिनों बाद रुपए पैसे के हिसाब में गड़बड़ी पाए जाने के कारण उसे निकाल दिया गया। पिता की समाज में जो इज़्ज़त थी उसके कारण किसी तरह वह जेल जाने से बच सका। अगली नौकरी उसने ट्यूटर की की, यानी वह एक अमीर परिवार के घर रहते हुए उनके बच्चों को पढाने लगा। उसकी नशे की आदत अब भी बरकरार थी। इस नई नौकरी के दौरान वह अपनी मालकिन (श्रीमती राबिन्सन) के प्रेम में पड़ गया। अधेड़ उम्र की मालकिन ने भी चोरी-छिपे इस प्रसंग में उसे बढ़ावा दिया। आखिरकार एक दिन बूढ़े मालिक पर इस प्रेम-प्रसंग का भेद खुल गया। ज़ाहिर है कि ब्रैनवेल को नौकरी से निकाल दिया गया। अपमानित और दुखी ब्रैनवेल अपने घर वापस आ गया। कुछ दिन बाद भाग्यवश श्री राबिन्सन का देहांत हो गया। ब्रैनवेल को आशा बंधी कि शायद अब उसे अपनी प्रेमिका, और उसके सहारे जीने का एक कारण मिल जाएगा। उसकी यह आशा निराशा में बदल गई जब श्रीमती राबिन्सन ने एक पत्र लिख कर उससे अपना नाता सदा के लिये तोड़ दिया यह कह कर, कि वह उससे संबन्ध रख कर अपने पति की जायदाद से बेदखल नहीं होना चाहतीं। ब्रैनवेल पूरी तरह टूट गया। उसमें अपनी बहनों जैसा जुझारूपन नहीं था। वह डिप्रेशन का शिकार हो गया और नशे में और भी ज्यादा डूब गया | एक बार नशे के लिए उसने इतना अधिक उधार ले लिया कि उसके फ़िर से जेल जाने की नौबत आ गई। परिवार ने किसी तरह उसका कर्ज़ चुका कर उसे बचाया। जीवन से हार मान चुका ब्रैनवेल अब सारा समय घर में ही रहने लगा| एक रात उसने अपने कमरे में आग लगा कर आत्महत्या की कोशिश भी की। समय पर पता चल जाने के कारण उसे बचा लिया गया और तबसे उसके सोने की व्यवस्था उसके पिता के कमरे में कर दी गई। शार्लोट अपने भाई की करतूतों से बहुत निराश और दुखी थी और नाराज़ भी| ऐन उसकी पागलपन से भरी हरकतों और बातों के कारण उससे डरने लगी थी| पर एमिली अब भी एक बच्चे की तरह उसकी देखभाल करती थी और उसे सँभालती थी।
ब्रैनवेल का सबसे ज़्यादा ख्याल हमेशा उससे साल भर छोटी बहन एमिली ने रखा और वही उसके सबसे ज़्यादा करीब भी थी। शायद इसकी वजह यह थी कि सब तीनों बहनों में वह सबसे ज़्यादा अकेली और सामाजिक सबन्धों से दूर थी| उसके मित्रों की संख्या बहुत छोटी थी और वह किसी से मिलना जुलना अधिक पसन्द नहीं करती थी| अपने घर से बाहर या दूर जाना भी उसे अच्छा नहीं लगता था| एमिली के अपने अकेलेपन ने उसे अपने अभागे असफल भाई की कुंठा, निराशा और असफलता के अहसास की बाकी सब परिवार के लोगों से कहीं ज़्यादा समझ दी थी| उसके मन में अपने हारे हुए भाई के प्रति सहानुभूति, करुणा और दया थी| वह हर तरह से अपने भाई को सान्त्वना देने का प्रयास करती रहती थी| रात देर तक उसके घर लौटने का इंतज़ार करती थी, और जब वह नशे में चूर घर लौटता था तो सहारा देकर उसे उसके कमरे तक ले जाती थी|
जब ब्रांट बहनों को अपने छ्द्म नामों के साथ साहित्य के क्षेत्र में सफलता मिलने लगी थी, तभी उन्होंने तय कर लिया था कि अपनी सफलता वे अपने परिवार में किसी और पर ज़ाहिर नहीं करेंगी। उन्हें डर था कि उनकी सफलता देख कर ब्रैनवेल का असफलता का अहसास और भी गहरा जायेगा और वह और भी ज़्यादा डिप्रेस हो जाएगा। ब्रैनवेल को जीवन भर पता नहीं चला कि उसकी बहनें कितनी प्रतिभाशाली हैं, उनकी लिखी किताबें प्रकाशित हुई हैं और सफल भी हुई हैं।
अपनी पहली सफलता, यानी पहली पुस्तकें छपने के साल भर बाद अंततः सन १८४८ के मध्य में शार्लोट और ऐन लंदन जाकर अपने प्रकाशक से मिलीं और उस पर अपना सही परिचय ज़ाहिर किया। अन्तर्मुखी एमिली, जो लोगों से मिलना-जुलना पसन्द नहीं करती थी, उनके साथ नहीं गई थी। प्रकाशक ने पहली बार जाना कि दुनिया जिन्हें सफल लेखक समझती है, वास्तव में वे तीन युवा लड़कियाँ हैं। उसके आश्चर्य का ठिकाना न था। लेखिकाओं ने छ्द्म नाम से लिखना ज़ारी रखा।
ब्रैनवेल का अपने शरीर के साथ किया हुआ दुर्व्यवहार अधिक दिन तक नहीं चल सका। नशे की आदत और अनियमित जीवन से क्षीण हुई देह ने उसका साथ छोड़ दिया और सन १८४८ के सितम्बर में ३१ वर्ष की कम उम्र में उसने दुनिया छोड़ दी। इस मृत्यु का सबसे गहरा आघात कोमल और कवि हृदय की स्वामिनी एमिली को लगा। भाई की शवयात्रा में शामिल होने बाद उसने घर से निकलना ही छोड़ दिया। माँ और दो बहनों पहले ही खो चुकी एमिली अपने प्रिय और लगभग हमउम्र भाई को खोने के दर्द से वह कभी उबर नहीं सकी। उसने लिखना छोड़ दिया और पहले से भी ज़्यादा चुप रहने लगी| वह बीमार पड़ गई पर शार्लोट के लाख कहने के बाद भी इलाज कराने को तैयार नहीं हुई। ऐसा लगा कि जैसे उसमें जीने की चाह ही खत्म हो गई। शार्लोट बेबसी के साथ छोटी बहन को अपने दुख में घुलते देखती रही। भाई के निधन के कुल तीन महीने बाद ही दिसम्बर में एमिली ने भी महज़ ३० वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा ले ली। “वदरिंग हाइट्स ” उसका प्रथम और अंतिम उपन्यास रहा, जो इतना श्रेष्ठ है कि आजतक उसकी गणना अंग्रेज़ी भाषा के महानतम उपन्यासों में की जाती है। इस रचना के बाद उसने जो अगला उपन्यास लिखना शुरू किया था, वह अधूरा ही रह गया| उसका इतनी जल्दी इस संसार को छोड़ जाना अंग्रेज़ी साहित्य का बहुत बड़ा दुर्भाग्य कहा जा सकता है। अगर जीवन ने एमिली को और समय दिया होता, तो निश्चय ही उसके हाथों और भी उत्कृष्ट कविताओं और उपन्यासों की रचना होती|
एमिली के अंतिम दिनों में शार्लोट ने अपनी डायरी में लिखा,
“एमिली की बीमारी ठीक होने का नाम नहीं लेती और उसकी खामोशी मुझे और भी बेचैन कर देती है। उससे कुछ पूछना बेकार है, कोई जवाब नहीं मिलता। उससे भी ज़्यादा बेकार है उसके इलाज की कोशिश करना- वह कोई इलाज करने को तैयार ही नहीं होती। उसकी नब्ज़ तेज़ रहती है, उसकी खांसी दिल दहला देने वाली है और वह थोड़ा भी हिलने-डुलने से हाँफने लगती है।.... अपने पूरे जीवन में किसी काम को करने में उसने ज़्यादा देर नहीं लगाई थी। वह हर काम झटपट करने वालों में थी। इस दुनिया से जाने में भी उसने देर नहीं लगाई। जल्दी- जल्दी हमें छोड़ कर चली गई। मैंने इस तरह किसी को जाते नहीं देखा, पर सच कहूँ तो मैंने किसी भी क्षेत्र में उसके जैसा कोई नहीं देखा।”
ब्रांट परिवार पर आई विपदाएं अभी समाप्त नहीं हुई थीं। एमिली के मरने के एक महीने के अंदर ही ऐन बीमार पड़ गई। पता चलने पर कि उसे क्षय रोग हो गया है, शार्लोट अपनी एक सहेली के साथ उसे हवा-पानी बदलने स्कारबरो नाम के स्थान पर ले गईं। कोई उपाय काम नहीं आया। सन १८४९ के मई महीने में ऐन ने २९ वर्ष की छोटी सी उम्र में आखिरी साँस ली। ज़िन्दगी ने ऐन को अपने पहले उपन्यास 'एग्नेस ग्रे' के बाद सिर्फ़ एक और उपन्यास लिखने और प्रकाशित करने का समय दिया था जिसका नाम था-टेनेंट आफ़ द वाइल्डफ़ेल हाल' |
आठ महीने के अंतराल में अपनी दो बहनों और भाई को खो देना शार्लोट के लिए बहुत बड़ी त्रासदी थी। उसने दुखी होकर अपनी डायरी में लिखा,
“ यह गाँव, आस पास फ़ैले हुए हरे-भरे मैदान, दूर दिखाई देती पर्वत श्रृंखलाएं आज भी उतनी ही सुन्दर हैं जितनी पहले थीं| मैं अब भी टहलने जाती हूं पर अब प्रकृति मुझे कोई आनंद नहीं देती| हर पेड़, हर पौधा मुझे उन सब अपनों की याद दिलाता है जिनके साथ कभी मैंने इन सबका आनन्द उठाया था| जिन्हें इन्सान प्यार करता है, उनके बिना जीने में कोई खुशी नहीं रह जाती…
इस दुख से निज़ात पाने का केवल एक तरीका शार्लोट को आता था-उसने फ़िर से अपने आप को लिखने में व्यस्त कर लिया| उसने दो और उपन्यास लिखे- 'शर्ली' और 'विलेट' | शार्लोट ने युवावस्था में एक बार, जब वह ब्रसेल्स में फ़्रेन्च सीखने गई थी,तब अपने स्कूल के मालिक से प्यार किया था, पूरे दिल दे किया था, पर उसका वह प्यार एक तरफ़ा और असफल ही रहा था| उस घटना से उसे ऐसी चोट लगी कि उसने बाद में मिला कोई विवाह का प्रस्ताव(उसको मिली सफलता के बाद ऐसे प्रस्तावों की कमी नहीं रही थी) बरसों तक स्वीकार नहीं किया| अंततः जब अड़तीस साल की उम्र में उसने अपने पिता के जूनियर श्री निकोल्स, जो वर्षों से उसे चाहते आये थे, से शादी का फ़ैसला किया, तो उसके पिता इस शादी के लिये राज़ी नहीं हुए| शार्लोट का अब परिवार में पिता के अलावा कोई नहीं रहा था और वह उन्हें भी खोना नहीं चाहती थी| उसने भारी मन से निकोल्स को शादी के लिये मना कर दिया| साल भर बाद रेवरेंड ब्रांट ने बेमन से शादी के लिये उसे इजाज़त तो दे दी पर कहा कि वह स्वयं अपने गिरजाघर में उनकी शादी नहीं कराएंगे| यहाँ तक कि वह उसकी शादी में शामिल भी नहीं हुए|
घरेलू खुशी ज़्यादा दिन शार्लोट के भाग्य में नहीं थी| शादी के कोई आठ महीने बाद ही क्षयरोग से उसकी मृत्यु हो गई | अपने अंतिम दिन जब एक बेहोशी भरी नींद के बाद जब उसने आँखें खोलीं तो अपने ऊपर झुके अपने पति को सजल नेत्रों के साथ ईश्वर से प्रार्थना करते पाया| वह बोली,
'' मैं मरने तो नहीं जा रही हूं न? भगवान हमें अलग नहीं करेगा| हम एक साथ कितने खुश हैं|”
यही उसके आखिरी शब्द थे| कुछ देर बाद उसने सदा के लिये आंखें मूँद लीं|
तब तक शार्लोट का चौथा उपन्यास 'एम्मा' आधा ही लिखा जा सका था| उसका सबसे पहले लिखा गया उपन्यास 'प्रोफ़ेसर' उसकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हो सका|
एमिली, ऐन और शार्लोट, सबने अल्पायु में और असमय इस दुनिया से विदा ली पर उनकी गिनी चुनी रचनाओं ने उन्हें अमर बना दिया है| उनका अपना जीवन एक संघर्ष की गाथा है समाज के दुहरे मानदंडों के खिलाफ़ और उसके द्वारा पैदा की गई अन्यायपूर्ण परिस्थितियों के खिलाफ़, जिसे उन्होंने हर मुश्किल के बावज़ूद जीत कर दिखाया| उन्होंने समाज की बनी- बनाई रीतियों में बंध कर जीना अस्वीकार कर दिया और अपनी प्रतिभा का विकास करके एक सम्मानपूर्ण जीवन जिया| उनका यह संघर्ष एक प्रेरणा है हर उस इन्सान के लिए जो अपनी परिस्थितियों से हारने के बजाए उनसे लड़ने के लिये उठ खड़ा होता है|

9 comments:

L.Goswami said...

मार्मिक ..बांधे रखने वाली कहानी ..अगले अंक का इन्तिज़ार है

admin said...

ब्रांट बहनों की प्रेरक दास्‍तान जान कर अच्‍छा लगा। समाज ऐसे ही लोगों से प्रेरणा लेता है और आगे बढता है।

-----------
मॉं की गरिमा का सवाल है
प्रकाश का रहस्‍य खोजने वाला वैज्ञानिक

Vandana Pandey said...

अंतिम ब्रांट बहन, शार्लोट ब्रांट की मौत के साथ ही यह कहानी समाप्त हो गई, लवली जी| हाँ, उनका डेढ़ सौ साल से भी पहले रचा साहित्य अभी भी जीवित है, और उनमें लिखी कहानियाँ अभी भी चल रही हैं और शायद सदा चलती रहेंगी|

Atmaram Sharma said...

आदरणीय वंदना जी,

ग्रांट बहनों की मार्मिक कहानी पढ़कर उनके उपन्यासों को पढ़ने की उत्सुकता है. क्या वे हिंदी में उपलब्ध हैं?

सादर
आत्माराम

Vandana Pandey said...

शार्लोट ब्रांट के उपन्यास 'जेन आयर'का विद्या सिन्हा द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद राजकमल प्रकाशन ने सन 2002 में प्रकाशित किया है।

Atmaram Sharma said...

आदरणीय वंदना जी,

जानकारी देने के लिए बहुत आभारी हूँ.

आपके इस पूरे आलेख को मैं गर्भनाल में प्रकाशित करने की अनुमति चाहता हूँ. उचित समझें तो अपना ईमेल पता देने का निवदेन है, ताकि इस बारे में अलग से सूचित किया जा सके. मेरा ईमेल है - atmaram.sharma@gmail.com

सादर
आत्माराम

L.Goswami said...

khair...sundar kahani thi ..padhwane ka dhnyawaad.

FrozenLove said...

aankhein bhar aayi...

Anupam Dixit said...

ब्रांट बहनों की कहानी तो है ही मार्मिक लेकिन आपने लिखी भी बढ़िया तरीके से है। वुदरिंग हाइट्स मैंने किशोरावस्था में पढ़ी थी और उस समय रवीद्रनाथ एवं शरतचंद्र की रचनाएँ भी । इन किताबों ने मिल कर उस समय की मनःस्थिति पर गहरा प्रभाव डाला था। सोचता हूँ की साहित्य का आनद लेने की सही उम्र किशोरावस्था ही है ।

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