Wednesday, April 15, 2009

जो बीत गयी

काफी दिनो पहले वन्दना पांडे ने मुझे बताया कि उनकी माताजी शकुंतला दूबे की आत्मकथा "जो बीत गयी" प्रकाशित हो चुकी है। यह हमारे लिए हर्ष की बात है! इसी आत्मकथा मे से कुछ अंश यहाँ सिलसिलेवार प्रकाशित करते रहेंगे।आज प्रस्तुत है यह भूमिका  और एक  किस्त !




भूमिका

इस पुस्तक की लेखिका, अपनी माँ के बारे में क्या लिखूँ? उनका परिचय तो यह पुस्तक ही है। दो-तीन साल पहले एक बार जब मैं अपने मायके गोरखपुर गई, तो मैंने माँ को अपने जीवन की कहानी को एक डायरी में लिपिबद्ध करते पाया। साहित्यिक क्षेत्र में उनकी रचनात्मकता से मैं बचपन से परिचित रही हूँ, हालाँकि उनकी कविताएँ और कहानियाँ अधिकतर अप्रकाशित ही रहीं और केवल परिवार जन ही उनकी कृतियों का आनंद उठा सके। कारण शायद यह था कि अपने भावों को शब्दों में उतार देना ही उनकी रचनात्मक वॄत्ति (क्रिएटिव अर्ज) को संतुष्ट करने के लिये काफ़ी था। अपनी कॄतियों को छपा हुआ देखना उन्हें कभी बहुत ज़रूरी नहीं लगा।
मैंने उनकी जीवनी, यानी बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक में पैदा हुई एक लड़की के बचपन और कैशोर्य की कहानी को बहुत दिलचस्प पाया। पर माँ की इस रचना के साथ भी वही बंदिश थी- इसको सिर्फ़ वही लोग पढ़ सकते थे जो उनके आस-पास थे, जिन्हें वह अपनी डायरी पढने के लिये दे सकती थीं। मुझे ऐसा लगा कि इस कहानी को अगर मैं टाइप कर दूँ और इसकी कुछ प्रतियाँ बना दूँ तो इस कहानी को परिवार के वे सदस्य और करीबी लोग भी पढ़ सकेंगे जो गोरखपुर में नहीं रहते या जिन्हें वहाँ आने-जाने का अवसर नहीं मिलता। माँ को मैंने अपने मन की बात बताई तो उन्होंने अपने स्वभाव के अनुरूप कहा, “क्यों परेशान होती हो? क्या करना है इसे टाइप करके? जिसे पढ़ना होगा, इस डायरी से ही पढ़ लेगा।”
फ़िर भी मैंने इसे कंप्यूटर पर टाइप करना शुरू कर दिया। इसे देवनागरी लिपि में टाइप करने में तकनीकी सहयोग मुझे अपनी बेटी नेहा और दामाद विक्रम से मिला जो कंप्यूटर के क्षेत्र में मेरे मार्गदर्शक हैं। टाइप की हुई पांडुलिपि को पुस्तक रूप में परिणत और प्रकाशित करने का दायित्व मेरे बडे़ भाई विवेक (बरुन ) ने उठाया। हमारे इस सम्मिलित प्रयास का परिणाम यह पुस्तक है। अगर इसे पढ़ने में और लोगों को भी उतना आनंद आयेगा, जितना मुझे आया था, तो समझूँगी कि हमारा प्रयास सफल हुआ।
यह कहानी माँ के जीवन के पूर्वार्ध भर की है, यानी माँ के आधे जीवन से भी कम की। यदि उन्होंने आगे की भी कहानी लिखी, तो उसे भी लिपिबद्ध करने की कोशिश अवश्य करूँगी।

वन्दना ( विद्या )

शैशव के दिन

मेरा जन्म सन १९३३ ई. में अगहन पूर्णिमा के दिन अयोध्या के सरयूबाग नामक स्थान में हुआ था। जिस दिन मैं इस धरती पर आई़, उस दिन दो और बातें खास हुई थीं। पहली बात यह हुई कि मेरे मँझले ताऊजी का, जो उसी दिन कुछ आम के पौधे लेकर उन्हें रोपने के लिए गाँव जा रहे थे, गाँव जाना मेरे आने की वजह से रुक गया। लिहाज़ा उन्होंने उनमें से एक पौधे को घर के आँगन में ही, जिसका आधा फ़र्श पक्का और आधी ज़मीन कच्ची थी, रोप दिया। तो इस तरह मेरे साथ ही उस आम के पौधे का भी हमारे घर में प्रवेश हुआ। दूसरी बात यह, कि मेरे जन्म पर मेरी दादी बिल्कुल उदास नहीं हुईं, जैसा कि आमतौर पर उस समय की औरतें घर में लड़की के जन्म पर हुआ करती थीं। मेरी माँ- जिन्हें हम बच्चे माई कहा करते थे- को मुझसे पहले दो बेटियाँ हो चुकी थीं, मेरी अरुंधती जिज्जी और सावित्री जिज्जी। सावित्री जिज्जी के जन्म पर दादी बहुत निराश हुई थीं।उन्हें लगा था कि पोते का मुँह देखना शायद उनके भाग्य में नहीं था। पर दो बहनों के बाद मेरे बड़े लबार भैया का जन्म होने से उनकी यह साध पूरी हो गई, इसलिये मेरा होना उन्हें अखरा नहीं। मेरे बाद एक और भाई गंगा बाबू का जन्म हुआ और फिर दो छोटी बहनों सरोज और रेनू का। बड़ी जिज्जी मुझसे बारह साल और सावित्री जिज्जी पाँच साल बड़ी थीं। सरोज मुझसे चार साल और रेनू मुझसे सोलह साल छोटी थी। यानी हम सात भाई बहन अट्ठाइस साल के अंतराल में फैले हुए थे।


5 comments:

ghughutibasuti said...

रोचक लगी अब तक की कहानी। आगे पढ़ने की इच्छा है।
घुघूती बासूती

श्यामल सुमन said...

किसी भी माता के लिए अद्भुत है यह भेंट।
उनके जीवन काल की घटना सभी समेट।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Unknown said...

praarambh bahut rochak hai aur kathaa kaa pravaah bhee.

Shikha Deepak said...

कथाक्रम और शैली दोनों ही रोचक लगी। आगे कि कड़ियों का इन्तजार रहेगा।

Anonymous said...

रोचक लगी.... इंतज़ार रहेगा अगली कड़ियों का.

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