Thursday, April 16, 2009

शैशव के दिन

जो बीत गयी 

पिछले अंश से आगे ...... 

मेरे बड़े भाई-लबार भैया-का असली नाम प्रद्युम्न है। जब वह छोटे थे तो बहुत शैतानी करते थे। एक बार घर में एक फल बेचने वाला आया। भैया उससे एक पैसे में ढेर सारा अंगूर लेना चाहते थे। फल बेचने वाला इसके लिये तैयार नहीं हुआ। भैया ने क्रोधित होकर उसकी पीठ पर कस के एक घूँसा मारा और पूछा, "अंगूर देते हो या नहीं?”

भैया, अब तो देना ही पड़ेगा। मार थोड़े ही खानी है,” फल वाला बोला।

            बड़े ताऊजी ने भैया की इस हरकत को देख कर कहा, “अरे, यह लड़का तो पूरा लबार( दादा) है।" तब से भैया का पुकारने का नाम लबार पड़ गया।

            हमारा एक बड़ा-सा दुमंज़िला घर था जिसके पास से ही, लगभग पचास मीटर की दूरी पर एक रेलवे लाइन गुज़रती थी। हमारे घर की ऊपरी मंज़िल पर तीन कोनों पर तीन कमरे थे। हर कमरे का विशिष्ट अर्थ-सूचक अलग-अलग नाम था। जो कमरा लाइन की तरफ पड़ता था, उसे बनरहवा बंगला यानी बंदर वाला कमरा कहते थे। उस तरफ बेल और कैथे के बड़े बड़े पेड़ थे जिन पर बंदरों का जमावड़ा रहता था। कभी- कभी उनकी सभा बंगले के भीतर भी होती थी। उस बंगले में जाना खतरे से खाली नहीं होता था। पर जब कभी बंदर वहाँ नहीं होते थे और हम वहाँ पहुँच जाते थे तो बंदर दूर ही रहते थे। यानी, जो कमरे में पहले पहुँच जाए, कमरा उसका, वाला कानून चलता था। दूसरे कमरे का नाम था पुरबहवा बंगला यानी पूरब की तरफ वाला कमरा। यह कमरा उत्तर-पूर्व की तरफ था। इसके बगल में से रास्ता जाता था और रास्ते के बगल में अशोक का एक पेड़ था। तीसरे कमरे को, जो दक्षिण-पूर्व की ओर था, सँपहवा बंगला कहते थे यानी साँपों वाला कमरा क्योंकि यहाँ अकसर छोटे- छोटे साँप दिखाई दे जाते थे। सँपहवा बंगले में पाँच दरवाजे थे। तीन दरवाजे जंगल की ओर खुलते थे और दो दरवाज़े दोनों तरफ के आँगन (टैरेस) की तरफ। एक तरफ का आँगन छोटा था। उसमें किनारे किनारे सीमेंट की तीन-तीन कुर्सिया सी बनी थीं। आँगन के परले सिरे पर सीढ़ी थी जिससे उतर कर साथ में ही बनी संस्कृत पाठशाला में जाया जा सकता था। दूसरा आँगन काफी लंबा था जो इस बंगले को बाकी दोनों भीतर वाले बंगलों से जोड़ता था। हमारे घर के बीच में एक बड़ा सा आँगन था। आँगन में जो कच्ची ज़मीन थी,  उस पर एक चबूतरा बना हुआ था जिस पर बैठ कर हमलोग दातुन वगैरह करते थे। कुँआ घर के बाहर था और घर की ज़रूरत का पानी उसमें से भर कर नौकरानियाँ लाती थीं।

            हमारी माँ सख्त मिज़ाज़ की महिला थीं, बहुत अनुशासनप्रिय। उनसे हमलोग डरते थे। चाचा का स्वभाव इससे ठीक उल्टा था। वह बहुत स्नेही और उदार पिता थे और हम बच्चे उनसे काफी खुले हुए थे। मेरी माँ को फूलों का बहुत शौक था। आँगन के चबूतरे के किनारे किनारे उन्होंने गेंदे के फूल लगा रखे थे। मैं छोटी ही रही होऊँगी क्योंकि यह घटना मुझे याद नहीं है, मैंने ज़बानी सुनी भर है। माँ के शौक से अनजान मैं अकसर गेंदे के फूल तोड़ कर खेला करती थी। माँ परेशान रहती, थीं कि रोज़ उनके खिले-अधखिले फूल कौन तोड़ ले जाता है। एक दिन माँ ने मुझे फूल तोड़ते देख लिया। बस, मेरी तो शामत ही गई। माँ ने आव देखा ताव़ मुझे उठा कर कच्ची ज़मीन पर पटक दिया। फ़्राक में समेटे मेरे सारे फूल बिखर गए। मैं ज़ोर से चीख कर फिर एकदम खामोश हो गई। शायद माँ का रौद्र रूप देख कर दहशत में गई थी। मेरी एक बूआ चबूतरे पर बैठी दातुन कर रही धीं। उन्होंने दौड़ कर मुझे गोद में उठा लिया और माँ पर ज़ोर से बिगड़ीं,

"बिटिया से बढ़ कर फूल हो गए हैं तुम्हारे लिए? सारे फूल उखाड़ कर फेंक दूँगी। इतना गुस्सा आता है तुम्हें?” माँ को तब तक शायद अपनी ज्यादती का अहसास हो गया था। वह चुपचाप बूआ के सामने से हट गईं। मैंने यह कहानी बूआ से सुनी थी। मैं तो बहुत छोटी थी। मुझे भला क्या याद रहता। मुझे तो शायद यह भी पता नहीं रहा होगा कि मुझे सज़ा किस बात की मिल रही है। पर मुझे लगता है कि उस दिन ज़रूर बाद में माँ ने मुझे गोद में बिठा कर प्यार किया होगा।

खैर, यह तो सुनी-सुनाई कहानी है, पर माँ की सख्ती की ऐसी भी कहानियाँ हैं जो मुझे याद है। हमारे यहाँ जाड़े में मिट्टी की बनी बोरसी में आग जलाई जाती थी जिसके किनारे बैठ कर हम लोग हाथ सेंकते थे। आग बुझ जाने के बाद भी उसमें कुछ आँच बची रह जाती थी जिससे वह काफी देर तक गरम रहती थी। एक बार मैंने ऐसी ही बुझी हुई बोरसी को लाँघने को सोचा और उसे लाँघ भी लिया। फिर तो मेरा उत्साह बढ़ गया और मैं बार बार उसे फलाँगने लगी। कुछ देर तक सफलता से मेरा यह सरकस चलता रह़ा पर आखिर में एक बार चूक हो ही गई। मेरा पैर बोरसी में पड़ गया और बोरसी उलट गई। गरम राख और कोयले से मेरा पैर काफी जल गया। माँ को पता चला तो आकर उन्होंने और तो कुछ किया नहीं, मेरी पीठ पर दो घूँसे और जड़ दिए जैसे वही मेरा इलाज हो। मेरे पैर में बड़े- बड़े फफोले पड़ गए थे। मुझे याद है, रोज़ नियम से उस पर मरहम-पट्टी चाचाजी किया करते थे। धीरे धीरे मेरा पैर ठीक हो गया।

            एक और घटना याद आती है। हमारे यहाँ पुजारी किस्म की एक महिला रहा करती थीं जिन्हें भक्तिन कह कर पुकारा जाता था। भक्तिन इलाहाबाद की रहने वाली थीं पर कार्तिक महीने में

कार्तिक नहाने और परिक्रमा करने वह अयोध्या जाया करती थीं। उनके खाने पीने की व्यवस्था हमारे ही यहाँ होती थी। वह स्वपाकी थीं यानी अपना भोजन स्वयं पकाती थीं। उनके साथ कई बार मैं भी सरयू नहाने जाया करती थी। उनके पूजा के सामान में एक छोटा सा बर्तन था जो घड़े जैसा दिखता था। मुझे लगता था कि वह मेरी गुड़िया के लिए ठीक रहेगा। मैने उनसे वह घड़ा माँगा तो उन्होंने मना कर दिया। फिर एक दिन वह घड़ा गायब हो गया। घड़ा किसने लिया होगा यह तो भक्तिन समझ ही गईं। वह मेरी गुड़िया के घर में से वह घड़ा निकाल लाईं और माँ से मेरी शिकायत भी कर दी। फिर एक कचहरी बैठी जिसमें भक्तिन वादी थीं, माँ और मेरी दोनों बड़ी बहनें जज और जूरी बन कर कुर्सी पर बैठी थीं और मैं किसी संगीन जुर्म के मुज़रिम की तरह सबके बीच में खड़ी थी। मेरा जुर्म तो सिद्ध हो ही चुका थ़ा बस दण्ड निर्धारित होना शेष था। अंततः तीनों न्यायाधीशों ने मुझे सज़ा सुनाई, “पचास बार कान पकड़ कर उठक-बैठक करो।

             मैंने कान पकड़ कर उठक-बैठक शुरू कर दी, करती गई, करती गई। पता नहीं कब तक करती गई। मुझे तो तब तक गिनती आती नहीं थी, गिनने का काम दण्डाधिकारियों का था और वे सज़ा देकर मेरे बारे में भूल ही गये थे। मेरे पैर काँपने लगे, साँस फूलने लगी पर जब तक रोका नहीं जात़ा, मैं भला कैसे रुक सकती थी। एक बार पैर ज़ोर से काँपा और मैं कैसे धराशायी हो गई मुझे नहीं पता। होश में आई तो खुद को चारपाई पर पाया। चाचा शाम को आए, मुझे देखा, सब कहानी सुनी और माँ पर बहुत बिगड़े। माँ को चाचाजी की डाँट पड़ रही थी और मुझे उनका डाँटना बहुत अच्छा लग रहा था। मेरा मन कर रहा था कि चाचाजी उन्हें और डाँटें, और डाँटें।

6 comments:

Shikha Deepak said...

बचपन की मीठी मीठी शरारतें ...........अब आगे पढने का मन हो रहा है। जल्दी लिखियेगा।

आभा said...

बेहद रोचक वर्णन। किंतु लबार का सही अर्थ होता है झूठा, असत्य, मिथ्याभिमानी, गप्पी। ताऊजी ने आपके गप्पी भाई को गुंड़ा बना दिया। एक पद है-मिलि तपसिंह संग भएसि लबारा।

समयचक्र said...

समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान,कितना बदल गया इन्सान साथ में आपकी चिठ्ठी भी

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शँकुतला दुबे जी का सँस्मरण, बहुत बढिया लगा -
- लावण्या

शोभना चौरे said...

शकुंतालजी की आत्म कथा बहुत हीरोचक लग रही है मानो हमारा ही अतीत हो मे कहना चाहूंगीं हम लोग भी चार बहने और ऐक भाई है मे सब्से बड़ी हू
मेरे पहले दो भाई ऐक डेढ़ साल का होकर ओए ऐक 6 महीने काहोकर शांत हो गया परन्तु हमरी मा ने हमेशा ह्म लड़कियो पर गर्व किया हालाकी हमने ऐसे कोई
कम नही किए उन्होने हमरी भाभी को भी लड़की ही माना |
वंदनाजी को बधाई

tor potky chody said...

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