Friday, April 17, 2009

शैशव के दिन - आगे की कथा

जो बीत गयी - शकुंतला दूबे की आत्मकथा 

पिछले अंक से आगे....... 

माँ का व्यवहार अपने सभी बच्चों के साथ ऐसा ही सख्त था। हाँ, लड़कों को उस समय  की पुरुष-सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के चलते कुछ रियायत ज़रूर मिल जाती थी। मुझे सावित्री जिज्जी ने बताया था कि एक बार जब बहुत बचपन में माँ मे उनकी जम कर पिटाई की थी तो उन्हें इतना गुस्सा आया था कि उन्होंने रोते-रोते माँ को धमकी दी थी, “ठीक है, अभी मार लो हमको। जब मैं बड़ी हो कर माई बनूंगी और तुम सावित्री बनोगी, तो देखना तुम्हारी कैसी पिटाई करती हूँ।

            माँ का गुस्सा इतना तेज था कि मैं कुछ परेशानी होने पर उनके पास जाने की बजाय अपनी बड़ी बहनों के पास जाना ज्यादा ठीक समझती थी। उन पलों में भी, जब माँ शांत और स्नेहिल हुआ करती थीं, मैं उनसे खुल कर कुछ कह नहीं पाती थी। यह स्थिति तब तक रही जब तक मैं बड़ी नहीं हो गई। माँ के इस तरह के स्वभाव की क्या वजह रही होगी, नहीं जानती। पर उस छोटी सी उमर में ही मैंने एक बात पक्के तौर पर तय कर ली थी, वह ये कि मैं ऐसी माँ नहीं बनूंगी। जब मेरे बच्चे होंगे तब मैं उन्हें खूब प्यार करूँगी, उनकी दोस्त बनूंगी और वह अपने दिल की हर बात बिना डरे मुझसे कह सकेंगे।

            पहले मेरी बड़ी बहन अरुंधती जिज्जी मेरी देख-भाल किया करती थीं। फ़िर उनकी शादी हो गई और वह ससुराल चली गईं। उनके जाने के बाद मेरी और मेरी छोटी बहन सरोज की देख-भाल की ज़िम्मेदारी मेरी दूसरे नंबर की बहन सावित्री जिज्जी पर गई। सावित्री दीदी के बाल खूब घने और लंबे थे। मुझे उनके बाल बहुत अच्छे लगते थे, खासकर उनकी मोटी लंबी चोटी। मैंने एक दिन उनसे कहा कि आप मेरी भी अपने जैसी लंबी चोटी बना दीजिए। जिज्जी ने मुझे बहुत समझाया कि मेरे बाल अभी बहुत छोटे हैं, उनसे मेरी उनके जैसी चोटी नहीं बन सकती पर बाल- हठ तो बाल-हठ। मैं अपनी बात पर अड़ गई। अंत में जिज्जी ने इस विषम समस्या का हल निकाला। उन्होंने माँ की एक पुरानी साड़ी ली जिसकी किनारी का रंग काला था। उस किनारी को मेरे बालों में गूँथ कर उन्होंने मेरी एक लंबी- सी चोटी बना दी और कहा, “देखो, तुम्हारी चोटी मुझसे भी लंबी हो गई। 

            मै दिन भर अपनी चोटी लहराती सब जगह घूमती रही। लोग मुझे और मेरी चोटी को देख कर हँसते रहे, पर मैं अपनी लंबी चोटी को पाकर बहुत खुश थी।

            मेरे घर के पूरब की तरफ खूब घना जंगल था। उसमें तमाम तरह के पेड़ थे- बेर,  आँवला, कटहल़, फालसा, कनेर और और भी बहुत तरह के पेड़। जंगल घना जरूर था पर बहुत बड़ा नहीं था। जंगल के बाद खेतों का सिलसिला शुरू हो जाता था और इन खेतों के बीच से होकर परिक्रमा का रास्ता जाता था।

            कार्तिक महीने में एक दिन अयोध्या में परिक्रमा होती थी।  परिक्रमा मतलब पूरे शहर का चक्कर लगाना। परिक्रमा दो तरह की होती थी, एक चौदह कोस की और एक पाँच कोस की। एक कोस का मतलब है दो मील। उस दिन हम बच्चे जंगल के उस पार पेड़ के नीचे बैठ कर परिक्रमा की भीड़ देखा करते। बड़ा मज़ा आता था। रंग बिरंगे कपड़े पहने हुए ढेर सारे लोग। साधु-मंडली करताल, झाँझर और मंजीरा लेकर भजन करते हुए परिक्रमा करती थी। देहात की महिलायें भी भजन गाती हुई चलती थीं। हम सारा दिन उन लोगों को देखते हुए बिता देते। सिर्फ़ खाना खाने घर जाते थे। उस दिन हमें इसके लिए कोई डाँट भी नहीं पड़ती थी। एक त्योहार का सा नज़ारा रहता था।

            ऐसा ही एक परिक्रमा का दिन था। सावित्री जिज्जी ने बड़े शौक से मेरे लिए फ़्रिल वाला फ्राक बनाया था, बिना बाँहों वाला। जिज्जी ने मुझे वही फ्राक पहन कर परिक्रमा देखने जाने के लिए कहा। मैंने फ़्राक पहनी तो मुझे कुछ जँची नहीं। मेरी बाँहें खुली थीं जो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने तय किया कि मैं पहले पूरी आस्तीन की कमीज़ पहन कर उसके ऊपर से फ्राक पहनूंगी। जिज्जी ने बहुत समझाया कि इस तरह तो मैं बिल्कुल बेवकूफ़ लगूंगी पर फिर वही बाल- हठ। मैं अपनी ज़िद पर अड़ी रही और आखिरकार कमीज़ के ऊपर ही फ्राक पहन कर परिक्रमा देखने गई। वहाँ परिक्रमा का बंदोबस्त करने के लिए कुछ पुलिस वाले बैठे थे। उनमे से एक ने मुझसे कहा "बेटी, फ्राक तो तुम्हारी बहुत सुंदर है पर तुमने इसके नीचे कमीज़ क्यों पहन रखी है?” तब मुझे लगा कि मुझे जिज्जी की बात मान लेनी चाहिए थी। पर अब तो जो पहन लिया, वह पहन लिया। मैं दिन भर उसी जोकरनुमा वेशभूषा में रही।

            हमारे घर में अनाज तोलने के लिए अलग-अलग माप के कई बाट थे- पाव क़े, आधा सेर के, सेर के आदि। एक दिन मैंने जिज्जी से बाल- सुलभ जिज्ञासा से पूछा कि यह बाट कैसे बनाये जाते हैं। जिज्जी को शरारत सूझी। उन्होंने मुझे बताया कि बाट ठठेरे की टट्टी से बनते हैं। ठठेरा यानी लोहे और अन्य धातुओं से बर्तन बनाने वाला व्यक्ति। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने उनसे पूछा कि बाट अलग-अलग साइज़ के कैसे बनते हैं। उन्होंने कहा कि जब बड़ा ठठेरा टट्टी करता है तो बड़ा बाट बनता है और छोटे की टट्टी से छोटा। मैंने उनकी बात पर विश्वास कर लिया। कुछ दिनों के बाद हमारे खेतों से फसल कटी। खेतों से लाया अनाज तोला जा रहा था। मैं चाचा के पास खड़ी इस प्रक्रिया को देख रही थी। अनाज की अधिकता की वजह से बड़े-बड़े बाटों का प्रयोग किया जा रहा था। मैंने उस दिन पहली बार पंसेरी यानी पाँच सेर का बाट देखा। मैंने चकित होकर चाचा से पूछा "चाचा, इसके लिए कितने बड़े ठठेरे ने टट्टी की होगी?” चाचा ज़ाहिर है कि मुझसे भी ज्यादा चकित हुए। उनके पूछने पर मैंने जिज्जी का दिया हुआ ज्ञान उन पर प्रकट कर दिया। जिज्जी की पेशी हुई, उन्हें डाँट पड़ी़ और उसके बाद मुझे बाट बनाने की सही प्रक्रिया समझाई गई।

2 comments:

Shikha Deepak said...

लेखन शैली में ऐसा प्रवाह है जो पढने वाले को बांधे रखता है।

रवीन्द्र प्रभात said...

अत्यंत सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाईयाँ!

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...