Tuesday, April 21, 2009

ब्रांट बहनों की कहानी

 

 वन्दना पांडे

बहुत बचपन में अंग्रेज़ी में एक उपन्यास का संक्षिप्त रूपांतर पढ़ा था, जिसका नाम था 'जेन आयर'| किताब मुझे इतनी अच्छी लगी थी कि कुछ बड़े होने पर मैंने उस किताब को मूल रूप में अंग्रेज़ी में पढ़ा, कई बार पढ़ा| किताब की नायिका जेन आयर,  उसकी बचपन की सहेली हेलेन बर्न्स  और नायक रोचेस्टर को मैं आज तक नहीं भूली हूं|

            किशोरावस्था में मैंने  एक और उपन्यास पढ़ा 'वदरिंग हाइट्स'| इसकी कहानी शुरू से अंत    तक त्रासदीपूर्ण थी, पर ऐसी थी जिसने ह्फ़्तों मेरे दिमाग पर अधिकार जमाए रखा| प्रतिनायक क्लिफ़ का स्वयं को बर्बाद कर देने वाला प्रेम मुझे भीतर तक हिला गया|

            जब मैंने जाना कि यह दोनों पुस्तकें दो बहनों (शार्लोट और एमिली ब्रांट)  के द्वारा  लिखी गई हैं तो विस्मय हुआ| मन में एक जानने उत्सुकता जागी कि ऐसा कौन सा भाग्यशाली परिवार होगा जहां ऐसी प्रतिभाशाली बेटियों ने जन्म लिया होगा| पर जब उनके बारे में पढ़ा तो जाना कि मेरी दोनों प्रिय लेखिकाएं दुर्भाग्य की गोद में खेल कर बड़ी हुई थीं| उनके अपने जीवन की कहानी अपने उपन्यासों से कम मार्मिक और दुखद नहीं थी| उनकी रचनाओं के पात्र उनके अपने जीवन से जुड़े हुए थे| जेन आयर में खुद शार्लोट की छवि थी, हेलेन बर्न्स में उसकी बड़ी बहन मारिया की और एमिली के उपन्यास के नायक हेथक्लिफ़ में उसके भाई ब्रैनवेल की | बहुत सारे अन्य चरित्र भी उनकी ज़िंदगी से जुड़े हुए थे|

            इन दोनों उपन्यासों का कई अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, हिन्दी में भी| इन कहानियों पर हिन्दी में फ़िल्में भी बनी हैं| जेन आयर पर आधारित बहुत पहले एक फ़िल्म बनी थी 'संगदिल' जिसमें नायक की भूमिका निभाई थी दिलीप कुमार ने| 'वदरिंग हाइट्स' पर आधारित फ़िल्म 'दिल दिया दर्द लिया' की प्रमुख भूमिकाएं दिलीप कुमार, वहीदा रहमान और मनोज कुमार ने निभाई थीं|  दूरदर्शन पर 'वदरिंग हाइट्स' पर आधारित एक धारावाहिक भी प्रसारित हुआ था (नाम मुझे अब याद नहीं है) जिसमें हेथक्लिफ़ की भूमिक आशुतोष राणा ने निभाई थी|

            अपनी  प्रिय लेखिकाओं के जीवन की कहानी चोखेर बाली के पाठकों के साथ बाँटना चाहती हूँ|                          

 

 

                     ब्रांट बहनों की कहानी    

 

            उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध....इंग्लैंड के एक छोटे से कस्बे हावर्थ में एक निर्धन पादरी, रेवरेंड पैट्रिक ब्रांट, अपनी पत्नी मारिया, पाँच बेटियों (मारिया, एलिज़बेथ, शार्लोट, एमिली और ऐन) और एक बेटे (ब्रैनवेल) के साथ रहा करते थे। धन का अभाव बहुत था फ़िर भी पांचों बच्चे माँ के स्नेह भरे आंचल तले  पल रहे थे|

            रेवरेंड ब्रांट का स्वभाव बहुत ही रूखा, सख्त और बहुत हद तक सनकी भी था| सादगी का उन्हें ऐसा जुनून था कि एक बार उन्होंने अपनी बीवी की रेशम की पोशाक को  कैंची से कतर डाला और एक बार किसी रिश्तेदार द्वारा उनके बच्चों को उपहार-स्वरूप दिये गए सुन्दर रंगीन जूतों को आग में झोंक दिया था| वह हमेशा एक पिस्तौल अपने साथ रखते थे| अपने गुस्सैल स्वभाव को वह ज़्यादातर नियन्त्रण में रखते थे पर कभी- कभी गुस्सा आने पर पिस्तौल से हवा में गोलियाँ चलाया करते थे| वह घर में भी अकेले रहना पसन्द करते थे और रात का खाना अपने कमरे में अकेले खाते थे| सुबह के नाश्ते और दिन के खाने का समय ही ऐसा होता था जब वह बच्चों के साथ होते थे और वह भी वे गम्भीर भाव से चुपचाप खाते हुए बिताते थे| उनका आदेश था कि परिवार का रहन- सहन, वेश-भूषा और खान-पान, सभी एकदम सादे होने चाहिए। उनका मानना था कि अच्छे बच्चों का काम अपनी पढ़ाई करना और बाकी समय बिलकुल चुपचाप रहना है|

            बच्चे अभी छोटे ही थे कि परिवार पर एक गाज़ गिरी| बच्चों की माँ अड़तीस वर्ष की अल्पायु में कैन्सर से ग्रस्त होकर चल बसी|  घर चलाने और छः बच्चों ( जिनमें सबसे बड़ी लड़की महज़ सात बरस की और सबसे छोटी कोई साल भर की दुधमुँही बच्ची थी) की परवरिश करने की ज़िम्मेदारी स्वेच्छा से माँ से सात वर्ष बड़ी अविवाहित मौसी एलिज़बेथ ब्रैनवेल ने संभाल ली। बिन-माँ के बच्चे एक निहायत सख्त स्वभाव के पिता और नियमों की कायल मौसी के अनुशासन में पलने लगे। बच्चे बिना किसी विशेष सुख-सुविधा के और बचपन की शरारतों , हँसी -मज़ाक, खेल-कूद तथा माँ की ममता- इन सभी से रहित एक अभावमय वातावरण में बड़े हो रहे थे। कठिन परिस्थितियों ने उन्हें एक-दूसरे के बहुत करीब ला दिया। लड़कियाँ एक-दूसरे का सहारा और मित्र बन गईं और अपने भाई पर तो सारी की सारी बहनें जान छिड़कती थीं। इंग्लैंड में उस समय समाज की संरचना पितृसत्तात्मक थी| उस समय की रीति और विचार धारा के अनुरूप पिता की सारी उम्मीदें अपने इकलौते बेटे पर टिकी थीं- बेटियाँ तो उनके लिये सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ थीं| 

            बच्चे कुछ बडे हुए तो उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रश्न उठा|  रेवरेंड ब्रांट की हैसियत ऐसी नहीं थी कि वह अपने सारे बच्चों को किसी सामान्य स्कूल में भेज सकें | सो उन्होंने अपनी बड़ी चार बेटियों को, जो स्कूल जाने लायक हो गई थीं, शिक्षा प्राप्त करने के लिये एक ऐसे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया जहाँ गरीब घरों की लड़कियाँ रहती थीं और उन्हें मुफ़्त में, बिना किसी फ़ीस के पढ़ाया-लिखाया जाता था। 

(पोस्ट अत्यधिक लम्बी हो जाती ,इस लिए दो भाग मे बांट दिया है, अगला हिस्सा आज शाम तक पोस्ट हो पाएगा)

8 comments:

अजित वडनेरकर said...

बहुत दिलचस्प। अगली कड़ी की प्रतीक्षा है।
शुक्रिया...

आभा said...

संघर्ष हमेशा काम आता है....खास कर लेखकों के।

आर. अनुराधा said...

शाम कब होगी?

वर्षा said...

एक साथ ही पूरी कहानी होनी चाहिए थी।

मोना परसाई said...

अच्छी प्रस्तुति,अगले हिस्से का इंतजार है .

डा० अमर कुमार said...

इनका नाम देखते ही, मैं दौड़ा चला आया..
मेरा पढ़ा हुआ पहला उपन्यास एमिले ब्रान्टे का ही था,
फिर.. फिर तो मैं दीवानों की तरह इनके उपन्यास खोजा करता रहा !
बड़ा भला लग रहा है, इन्हें यूँ याद दिलाये जाना !

Anonymous said...

बढ़िया

Vandana Pandey said...

उत्साह वर्धन के लिये आप सबका धन्यवाद|
डा अमर कुमार जी, एमिली ने खाली एक उपन्यास लिखा था| उनकी बाकी रचनाएं कविताएं हैं

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