Friday, April 24, 2009

बाबा-दादी की कहानी

जो बीत गयी-शकुन्तला दूबे की आत्मकथा

मैं अपनी दादी के बहुत करीब थी। दादी भी मुझे बहुत मानती थीं। घर में ऐसा माना जाता था कि माँ के सभी बच्चों में सुंदरता बाँटते हुए ईश्वर ने सबसे ज्यादा कंजूसी मुझे बनाते समय की थी। माँ बहुत सुंदर थीं और उनकी सुंदरता का अंश मुझे छोड़ कर मेरे सभी भाई-बहनों को मिला था। पर दादी हमेशा कहती थीं कि मैं माँ के बच्चों में सबसे ज्यादा अच्छी किस्मत वाली सिद्ध होऊँगी क्योंकि मेरी शकल अपने पिता से मिलती थी। मैं अपनी दादी की लाड़ली पोती थी और हमेशा उनके साथ रही। यहाँ तक कि एक बार माघ का पूरा महीना हम दोनों ने साथ-साथ प्रयाग में बिताया था, जब हमारे परिवार का कोई और सदस्य हमारे साथ नहीं था। उनके सब कामों की ज़िम्मेदारी कुछ बड़े होते ही मैंने सँभाल ली थी।
मैं बचपन से दादी के पास ही सोया करती थी। सोते समय दादी तरह तरह की कहानियाँ सुनाया करती थीं, कुछ आपबीती, कुछ जगबीती। मुझे उनकी बातें सुनना बहुत अच्छा लगता था। अपनी बातें सुनाते समय जब दादी को नींद आने लगती और वह चुप होने लगतीं तो मैं पूछ्ती, “फ़िर क्या हुआ, दादी?” और दादी फ़िर से कहानी शुरू कर देतीं। बाबा और उनके पिता, परबाबा को मैंने कभी देखा नहीं, पर दादी से ही मैंने उनके जीवन की कहानी बहुत विस्तार से सुनी थी।
मेरे परबाबा दीवान थे, किस रियासत के, यह मुझे याद नहीं है। उनके परिवार में अधिक समृद्धि नहीं थी पर पारिवारिक व्यवस्था ठीक-ठाक चल रही थी। उनका सबके साथ व्यवहार अच्छा था जिसके चलते उनके अपने आस-पास के लोगों से अच्छे संबंध थे।
उन दिनों हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था। उस समय यहाँ शासन करना आसान नहीं था। इतना बड़ा क्षेत्र और यातायात व्यवस्था बिलकुल लचर। शासकीय सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिये या तो बैलगाड़ियाँ थीं, या फ़िर नावें जो नदी के मार्ग से सामान और लोगों को ले जाया करती थीं। अपना राज्य चलाने के लिये अंग्रेज़ शासक समर्थ भारतीयों का इस्तेमाल किया करते थे। एक बार अंग्रेज़ हाकिम को बहुत सी बैलगाड़ियों की आवश्यकता पड़ी। परबाबा ने यह ज़िम्मेदारी उठा ली और रातोंरात उन्हें सैकड़ों बैलगाड़ियाँ मुहय्या करा दीं। अंग्रेज़ हाकिम ने प्रसन्न होकर परबाबा को तीन पुरस्कार दिये। पहला पुरस्कार था, चौधरी की उपाधि। दूसरे पुरस्कार के रूप में उपाध्याय खानदान के सात खून माफ़ कर दिये गये। अंग्रेज़ बहादुर का परबाबा को दिया हुआ तीसरा पुरस्कार-जिसने हमारे परिवार का जीवन बदल दिया- अट्ठाइस मील लंबा-चौड़ा जंगल था, बिना किसी लगान और मालगुज़ारी के। यह व्यवस्था पुश्त-दर-पुश्त के लिये थी। यह पुरस्कार परबाबा के लिये वरदान साबित हुआ। उस वन-संपदा से उन्होंने बहुत संपत्ति अर्जित की। धीरे-धीरे वह तीन सौ गाँवों के मालिक बन गए। इन गाँवों से सालाना मालगुज़ारी तीन लाख रुपये आती थी। मेरे परबाबा मध्यम वर्ग से ऊपर उठे थे, इसलिये उनकी कठिनाइयों से अवगत थे। नतीज़तन वह उस समय के आम ज़मींदारों की तरह अपनी रियाया के लिये आतंक नहीं थे, बल्कि वह उन्हें अपनी संतान की तरह समझते थे और उनके सुख-दुख में शामिल होते थे। इस कारण गाँव वाले भी उनकी बहुत इज़्ज़त करते थे।
मेरे बाबा मेरे परबाबा की एकलौती संतान थे। उनका नाम रखा गया था गुरुचरण। एकमात्र पुत्र होने के कारण उनके पिता के उन पर स्नेह की सीमा नहीं थी। एक बार उनके ज़िद पकड़ लेने पर पिता उन्हें अपने साथ कचहरी लेते गए- खूब सजा-धजा कर। हाथों में सोने के कड़े, गले में सोने की चेन, उँगलियों में अंगूठियाँ, रेशमी अचकन और चूडी़दार पायजामा, नौ-दस साल के बाबा उस समय छोटे-से दूल्हे नज़र आ रहे थे। अंग्रेज़ हाकिम उन्हें देख कर चकित हो गया। उसने परबाबा से पूछा,
“पंडित, तुम्हारे साथ यह कौन है?”
“हुज़ूर, आपका ही बच्चा है,” परबाबा ने कहा।
“अच्छा, तो यह तुम्हारा लड़का है। पर क्या तुम्हें अपने लड़के से प्यार नहीं है?” हाकिम ने मुस्करा कर पूछा।
“क्या बात करते हैं हुज़ूर? इसमें तो मेरी जान बसती है,” वह हड़बड़ा कर बोले।
“तो फ़िर इसे इतने जेवरात क्यों पहना रखे हैं? इन्हीं के कारण एक दिन इसकी जान जा सकती है,” हाकिम ने कहा। बात बाबा की समझ में आ गई। घर आकर उन्होंने एलान कर दिया,
“आज से परिवार का कोई बच्चा सोने का जेवर नहीं पहनेगा।”
आज तक परिवार में परबाबा के इस आदेश का पालन हो रहा है।
बाबा के सयाने होने पर परबाबा ने धूमधाम से उनका विवाह किया। समयोपरांत बाबा सात पुत्रों के पिता बन गए। परबाबा का आँगन पोतों की किलकारियों से भर गया। तभी न जाने किस बात पर बाबा की अपनी पत्नी से अनबन हो गई। अनबन भी ऐसी कि अचानक बाबा घर छोड़ कर लापता हो गए। परबाबा हतबुद्ध थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इतने लाड़-प्यार में पला उनका बेटा इस प्रकार सब सुख-समृद्धि को लात मार कर कैसे चला गया? क्या खाता होगा, कहाँ सोता होगा? जिसने कभी अपने हाथ से लेकर एक गिलास पानी भी नहीं पिया था, वह दरिद्रता और नितांत अकेलापन कैसे झेल रहा होगा? परबाबा की चिंता और उद्विग्नता का कोई ठिकाना नहीं था। उन्होंने बेटे की तलाश में शहर- दर-शहर, गाँव- दर-गाँव आदमी दौड़ाए। तीर्थ- स्थानों, मठों, सन्यासियों के आश्रमों में लोग भेजे। हर जगह निराशा हाथ लग रही थी। देखते- देखते तीन साल बीत गए। उस मायूसी और उदासी के आलम में भी आशा की एक हल्की रेखा परबाबा के मन में बनी हुई थी। एक दिन परबाबा को चित्रकूट से एक तार मिला, “तुरंत चले आइये।”
जिस व्यक्ति ने तार दिया था, वह परबाबा का ही भेजा हुआ एक खोजी था जो तीन साल से अपने युवा मालिक की तलाश में लगा हुआ था और अब उन्हें ढूढ़ते हुए चित्रकूट आ पहुँचा था। पहले तो यहाँ भी निराशा ही उसे हाथ लगी। एक रात को वह एक आश्रम में, जहाँ वह रात बिताने गया था, बैठ कर सोच रहा था कि अब कहाँ का रुख करे। तभी उसकी नजर एक लंबे कद के आदमी पर पड़ी जो सिर तक चादर ताने सो रहा था। बाबा भी खासे लंबे कद के थे, इसलिये उसके मन में संदेह जागा कि कहीं यही उसके बाबू तो नहीं? चेहरा ढका था इसलिये वह किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहा था। उसने धीरे से पैर की चादर खिसकाई। बिवाइयों से भरे रूखे पैर। यह बाबू नहीं हो सकते, उनके पैर तो कितने कोमल थे, उसने सोचा। फ़िर भी पूरी रात जागता वह उस व्यक्ति के उठने की राह देखता रहा। सुबह जब वह व्यक्ति चादर हटा कर बैठा तो खोजी ने उसे पहचान लिया- यह तो उसके बाबू ही हैं। तीन साल के कठिन जीवन की छाप उनके चेहरे और शरीर पर पड़ी थी- रूखे लम्बे बाल, दुबला हो गया चेहरा और शरीर- लेकिन यह थे उसके बाबू ही। बाबा भी उसे देख कर चौंके। उन्होंने पूछा,
“तुम यहाँ कैसे?”
“आपको लेने आया हूँ,” उसने कहा।
“मैं वापस नहीं जाऊँगा,” बाबा बोले।
“तब मैं भी यहीं रहूँगा। आप घर छोड़ कर चले आये और मैं तीन साल से आपकी तलाश में दर-दर भटक रहा हूँ। अब आपके बिना कैसे लौट सकता हूँ? मैं आपका सेवक हूँ। आपके साथ रहूँगा और आपकी सेवा करूँगा। आपको छोड़ कर मैं कहीं नहीं जाऊँगा,” खोजी ने दुखी होकर कहा।
बाबा उसके आँसू देख कर द्रवित हो गए और उसे अपने साथ रहने की अनुमति दे दी। इंसान ही थे। इतने सालों बाद घर के किसी आदमी को देखा था, तटस्थ नहीं रह सके। मौका पाते ही उस व्यक्ति ने परबाबा को तार देकर वहाँ बुला लिया। परबाबा अपने कुछ शुभचिंतकों को लेकर तुरंत चित्रकूट के लिये रवाना हो गए। वहाँ पहुँचने पर उन्हें पता चला कि आश्रम में उन दिनों स्वामी दयानंद सरस्वती आये हुए हैं और बाबा उनसे सन्यास की दीक्षा लेने के इरादे से उनके पास गए हैं। परबाबा तुरंत स्वामी जी के दरबार में पहुंचे। उन्होंने वहाँ बाबा को बैठे देखा। इतने सालों बाद बेटे को देख कर पिता की आँखों में गंगा-जमुना की बाढ़ सी आ गई। मुँह से कुछ कह नहीं पा रहे थे। स्वामी जी ने ही पूछा,
“आप इस तरह रो क्यों रहे हैं? बात क्या है?”
“ये जो सामने बैठे हैं, मेरे बेटे हैं, मेरी एकमात्र संतान। घर से नाराज होकर चले आये हैं। तीन साल से इनकी तलाश में मैंने आकाश-पाताल एक कर दिये। आज जाकर मिले हैं। इनके बिना मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा है। मैं इन्हें लेने आया हूँ। आप इन्हें समझाएं कि यह मेरे साथ वापस चलें। इन्हें जो भी शिकायत होगी, मैं दूर कर दूँगा,” परबाबा बोले।
स्वामी जी ने कातर पिता की ओर देखा और फ़िर पुत्र की ओर देख कर बोले,
“क्या कहते हो?”
“मैं तो आपके पास सन्यास की दीक्षा लेने की आशा से आया हूँ,” पुत्र ने कहा।
“तुम्हारी वय अभी सन्यास के लिये उचित नहीं है। ईश्वर ने तुम्हारे निमित्त बहुत काम रख छोड़े हैं। तुम्हारे पास धन प्रचुर मात्रा में है और श्रम करने की सामर्थ्य भी तुममें है। अपने लिये सभी करते हैं, तुम अपनी देश और अपनी संस्कृति के लिये कुछ करो। विदेशियों के शासन में संस्कृत भाषा का क्षरण हो रहा है, तुम इसके उत्थान के लिये प्रयास करो। संस्कृत पाठशालाएं खुलवाओ, लोगों को संस्कृत पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करो। अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करो। यही तुम्हारे लिये मेरी दीक्षा है और यही सही अर्थों में तुम्हारा धर्म है,” स्वामी जी बोले।
बाबा पिता के साथ घर लौटने के लिये मान गए। गुरू का आदेश तो था ही, शायद स्नेही पिता की व्यथा ने भी उन्हें पिघला दिया। या फ़िर तीन साल के कठिन यायावरी जीवन से मुक्त होने की एक राह मिली। नाराज होकर गए थे, अपने-आप लौटने में शायद उनका अहम आड़े आता रहा हो। अब पिता स्वयं उन्हें मना कर ले जाने आये थे। पर लौटने के लिये बाबा ने तीन शर्तें रखीं। पहली शर्त यह कि पिता उन्हें अनुमति दें कि वह घर लौटने के बाद तीन संस्कृत पाठशालाएं खुलवाएंगे। दूसरी यह, कि वह एक मंदिर बनवाएंगे, जिसमें श्री कृष्ण भगवान की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा स्वयं स्वामी दयानंद के अपने हाथों से करें। स्वामी दयानंद ब्राह्म थे, मूर्ति पूजा के विरोधी, पर बाबा के आग्रह को टाल न सके। उन्होंने वचन दिया कि वह ठीक समय पर मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा के लिये मंदिर पहुँच जायेंगे। तीसरी शर्त कठिन थी। बाबा अपनी पत्नी से कोई संबंध नहीं रखना चाहते थे और इस विषय में कोई दबाव उन्हें मंजू़र नहीं था। पुत्र- वियोग का दुख सह चुके परबाबा दूसरी बार बेटे को खोना नहीं चाहते थे। उन्होंने बिना बहस किये बाबा की सारी शर्तें मान लीं और उन्हें घर ले आए। बेटे का मन संसार में लगा रहे और वह फ़िर सन्यास की ओर न खिंचे, इसलिए कुछ दिन बाद उन्होंने बेटे के सामने दूसरी शादी करने का प्रस्ताव रखा। बाबा इसके लिए सहमत हो गए। बाबा की दूसरी शादी एक गरीब परिवार की सुंदर कन्या से हुई।
बाबा ने अयोध्या में एक संस्कृत पाठशाला खुलवाई, जिसके साथ में मंदिर भी बना। इस मंदिर के उदघाटन के समय स्वामी दयानंद जी वहाँ पधारे और उन्होंने मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा स्वयं की। दो और पाठशालाएं मिर्ज़ापुर और प्रयाग में खोली गईं। बाबा ने पैतृक हवेली छोड़ दी जिसमें उनकी पहली पत्नी अपने सात बेटों के साथ रहती थीं और अयोध्या की पाठशाला के ऊपर घर बनवा कर दूसरी पत्नी के साथ रहने लगे। यहीं पर मेरी नयी दादी ने एक पुत्र को जन्म दिया।
जब नयी दादी के पैर भारी हुए थे, तो वह सारे परिवार से दूर अकेली थीं। लिहाज़ा उन्होंने अपनी मदद और साथ के लिए अपनी पंद्रह साल की छोटी बहन को अपने पास बुला लिया। ऐसा करना आगे चल कर उनकी बहुत बड़ी भूल साबित हुआ। मेरे बाबा अपनी सुंदरी साली पर ऐसे मुग्ध हुए कि उनसे विवाह करने को आतुर हो उठे। विचित्र बात थी। जो आदमी सन्यास लेने चला था, वह इतना संसारी निकला कि दो पत्नियों के होते हुए अपने से बीस वर्ष छोटी बालिका को पाने की कामना करने लगा। जब बाबा ने अपने श्वसुर के सामने उनकी छोटी वाली बेटी से विवाह करने का प्रस्ताव रखा तो दादी के पिता यह सुन कर स्तब्ध रह गए। वह अपनी कम उम्र की किशोरी बेटी का हाथ एक पैंतीस साल के, दो बीवियों और आठ बेटों वाले दूल्हे के हाथ में नहीं देना चाहते थे। उन्होंने कहला दिया कि लड़की को काट कर कुएं में डाल दूँगा पर उसकी शादी तुमसे नहीं करूँगा। उनके इंकार से बाबा तिलमिला गए। बाबा पुरुष-प्रधान समाज के समर्थ और धनी व्यक्ति थे। उन्हें 'न' सुनने की आदत नहीं थी और अपनी सही-गलत, हर बात मनवाना भी उन्हें आता था। बाबा ने श्वसुर को धमकी दी कि यदि उनकी शादी छोटी लड़की से नहीं की गई तो वह उसकी बड़ी बहन का त्याग कर देंगे। उन्होंने मँझली दादी को यह कह कर उनके मायके भेज दिया कि वापस आएं तो छोटी बहन को लेकर, अन्यथा वहीं रहें। क्या ज़माना था, लड़कियाँ न हुईं, गाय-भैंस हो गईं। जब चाहा रखा, जब चाहा निकाल दिया।
मँझली दादी के सामने विषम परिस्थिति थी। बाबा अपनी इस ज़िद और धमकी को लेकर गंभीर थे, यह तय था, आखिर वह अपनी पहली पत्नी को पहले ही छोड़ चुके थे। उस समय के समाज में परित्यक्ता का जीवन बिताना अत्यंत अपमानजनक और दुखदायी था। अपने और अपने बेटे के भविष्य की खातिर दादी ने अपनी छोटी बहन को अपनी सौत बनाना स्वीकार कर लिया। यही नहीं, इस बात के लिए उन्होंने अपने पिता को राज़ी किया यह सब कह कर कि
“बड़ा घराना है, छोटी को कभी धन की कमी नहीं रहेगी। उसकी देख-भाल करने के लिए मैं तो वहाँ हूँ ही। आखिर वह मेरी छोटी बहन है, मैं उसे बड़े प्यार से रखूँगी, मेरा विश्वास कीजिए। अगर आप नहीं मानेंगे तो मेरा जीवन नर्क हो जाएगा। मैं भी तो आपकी ही बेटी हूँ, आप मेरे बारे में एक बार भी नहीं सोच रहे हैं। जब मुझे इस शादी से कोई एतराज़ नहीं है, तो आप क्यों मना कर रहे हैं,” आदि- आदि। अंततः निरुत्तर मजबूर पिता ने हाँ कर दी और पन्द्रह साल की किशोरी बालिका की शादी पैंतीस साल के अपने जीजा से हो गई। दादी बताती थीं कि सबकी शादी में गाने गाए जाते हैं, ढोलक बजती है, पर उनकी शादी में पूरा परिवार उनके दुर्भाग्य पर आँसू बहा रहा था।

पिछले अंश यहाँ पढ सकते हैं ।


2 comments:

Shikha Deepak said...

वह दौर ही ऐसा था जब ऐसी घटनाएं होती रहती थी............आप का लेखन इतना रोचक है कि अगले अंक की प्रतीक्षा रहती है।

शोभना चौरे said...

apne itni shj shelly me ghtnao ka vivrn diya hai man karta hai pdhte hi jau
agle ank ki prtiksha rhegi
abhar

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...