Monday, April 27, 2009

खांटी घरेलू औरत

अगस्त 2000 में राजेन्द्र यादव का एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था जिसमे उन्होने मनु जी के लिए दो विशेषण नत्थी किए थे"लगभग भाजपायी" और "खांटी घरेलू औरत"। ये दो विशेषण मन्नू जी की मित्रों को काफी नागवार गुज़रे और कथाकार ममता कालिया ने इस पर कई कविताएँ लिख डालीं। इनमे से एक यहाँ प्रस्तुत है।लेकिन कविता देशकाल से परे है व्यष्टि से समष्टि की बात कहती है।मन्नू भंडारी कोई भी पत्नी हो सकती है और राजेन्द्र यादव कोई भी पति।मेट्रो शहरों मे बेशक कुछ घरों मे स्थितियाँ बदल गयी हैं पर मेरा मन नही मान पाता क्योंकि अभी लगभग इन्ही स्थितियों मे मैने अपनी एक मित्र को 12 साल बाद जीवन के कठोर फैसले लेते देखा है।यह कविता पढते उसकी अकेली लड़ाई और बार बार संशय मे मुझसे पूछना कि "मैने ठीक किया न ?" मुझे याद आ रहे हैं।मित्र खांटी घरेलू औरत से कब इतनी अस्मितावान हो गयी उसके बेहद करीब रहते पता ही नही चला।


कस्बे से आयी खांटी

ममता कालिया


खा-पीकर अपने कृतघ्न पेट पर हाथ फेरते,

डकार मारते,परिवार के पुरुष ने कहा,

दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी,

परे तुम वहीं की वहीं रही ,

खांटी घरेलू औरत !


उस रात थोड़ा रोने
और सबके सो जाने के बाद
उसने गर्म कपड़ों के ट्रंक मे पड़ी

अपनी डिग्रियाँ निकालीं

उठाया अखबार ,किए आवेदन ,हुआ चयन ,

आला कुर्सी पर आसीन हुई
पति ने शातिर चुप्पी साधी,लिए फायदे ,

उसको दी कर्तव्य तालिका,और कायदे
पुरुष जब मौका मिलता कह देता
' यह बिलकुल कोरी आयी थी
कस्बे की छोरी आयी थी
मैने इसे जतन से गढा,पढाया,योग्य बनाया
आला कुर्सी तक पहुँचाया


कितना भी दफ्तर सम्भाल ले
नई अक्ल के तीर मार ले
मैं हूँ इसका छवि निर्माता
छाप नियंता
अभिनव नारी का अभियंता'


उसने अपने आप बांटकर ,

दो कर डाला

दफ्तर मे वह नीति नियामक
कुशल प्रशासक
घर मे उसकी वही भूमिका
सदियों स जो रहती आई
समझ गयी वह
असली विजय वहाँ पानी है
बाकी दुनिया बेमानी है

उसने ऊंची एड़ी के सैंडल उतार
एक बार फिर
अपने रंग उड़े स्लीपर पहन लिए
वह रसोई मे घुसी
उसने अपनी उंगलियों को नीम्बू निचोड़नी बनाया
और कलाइयों को सिलबट्टा
वह पिस गयी पुदीन मे
छन गयी आटे मे
वह कोना कोना छँट गयी
वह कमरा कमरा बँट गयी

उसने अपनी सारी प्रतिभा
आलू परवल मे झोंक दी
और सारी रचनात्मकता रायते मे घोल दी
उसने स्वाद और सुघन्ध का

सम्वतसर रच दिया
लेकिन पुरुष ने उससे कभी नही कहा
'शुक्रिया'





सन्दर्भ - खांटी घरेलू औरत ,
पृ. 98-99
ममता कालिया,
कथादेश - मासिक पत्रिका जनवरी 2009
सम्पादक - हरिनाराण
दिल्ली

19 comments:

Anil Kumar said...

पूरा प्रकरण तो मुझे नहीं मालूम चल पाया, लेकिन स्त्री को "वस्तु" समझने की मानसकिता से भारत को छुटकारा पाना होगा।

आर. अनुराधा said...

सुजाता, अगर वह पूरा साक्षात्कार पढ़ने को मिल सके तो संदर्भ ज्यादा अच्छी तरह समझ आएगा। वैसे, वक्तव्य का जवाब वक्तव्य से भी दिया जा सकता है। क्या ऐसा कुछ हुआ था, क्या वह उपलब्ध है? जिनके वक्तव्य कई लोगों के लिए मायने रखते हैं, उनके विचार ऐसे होंगे...

सुजाता said...

अनुराधा जी ,

यह कविता प्रकरण से परे अधिक महत्वपूर्ण महसूस हुई मुझे क्योंकि यह किसी एक राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी के विवाह की ही बात नही है।जितने भी सामाजिक खांचे तोड़ कर कोई प्रेमी युगल शादी करे लेकिन विवाह की संरचना मे घुसते ही वह उस संरचना के हिसाब से दी गयी भूमिका निभाता है । न पति अपने पतिपन से बाज़ आता है और न स्त्री बार बार याद दिलाए जाने वाले पत्नीपन की नियति से मुक्त हो पाती।

फिर भी,
वह साक्क्षाकार कथादेश के ही अगस्त 2000 के अंक मे प्रकाशित हुआ था और यहाँ जिस अंक का सन्दर्भ है वह मन्नू भंडारी पर केन्द्रित विशेषांक है।

डॉ .अनुराग said...

वो पूरा अंक संजो कर रखने योग्य है....उससे ये पता चलता है की कागजो पर शब्दों के जाल बुनने में आसमानी लोग असल जिंदगी में भीतर से ...कितने बौने होते है ....वैसे भी मै दो लोगो का कायल हो गया हूँ....एक सुधा अरोडा का .दूसरा मन्नू भंडारी जी का ...

Anonymous said...

किसी फूहड़ सौंदर्यबोध से लथपथ, फालतू सी कविता, एक फूहड़ चित्रण....क्या हो गया है चोखेर बाली को । न कोई कायदे की पोस्ट न विचार ही। लगता है यह धोखेर बाली है।

अर्चना said...

Anonymous ji ki tippani mujhe chakit kar gayi.Khiar, main kisi wiwaad men nahin padana chaahati. maine jab is kawita ko'kathaadesh' men padha tha,main ise apane aas-paas ke logon ko sunaane ko lobh nahin rok paayi thi.Isamen soundaryabodh hai ya nahin, ye main nahin janati, lekin yah jis chij ka bodh karaati hai,wah tilmila dene ke liye kaafi hai.

अर्चना said...

Anonymous ji ki tippani mujhe chakit kar gayi.Khiar, main kisi wiwaad men nahin padana chaahati. maine jab is kawita ko'kathaadesh' men padha tha,main ise apane aas-paas ke logon ko sunaane ko lobh nahin rok paayi thi.Isamen soundaryabodh hai ya nahin, ye main nahin janati, lekin yah jis chij ka bodh karaati hai,wah tilmila dene ke liye kaafi hai.

स्वप्नदर्शी said...

"Vicharaarth" ya kuch aisee hee patrikaa me Rajendra Yadav aur Manu Bhandaaree ko Back to back "jeevan jaise mene dekhaa" chhapaa tha, kareeb 2005-2006 ke aas-paas.

Do vyakti hai, aur dono lekhak, aur hindi ke achchhe lekhak.

Apanaa jeevan bhee dono ne apanee marzee se chunaa, jiyaa aur ab buDaape me alag ho gaye hai.

Dono me se kisee ek ko dosh denaa kam se kam mujhe uchit nahee lagta.

mere liye dono kaa lekhan "behtareen quality " kaa hai. aur ek paThak ke batuar unke nizee jeevan me bahut jyaadaa interest mujhe nahee hai.

Sanjay Grover said...

इस संदर्भ में ‘देशकाल’ पर एक प्रश्न मैंने भी यादवजी से पूछा था जोकि जवाब सहित यहां प्रस्तुत है। शायद आपको प्रासंगिक लगे। (http://www.deshkaal.com/Ask.aspx?id=163200971041125)

संजय ग्रोवर दिल्ली, दिल्ली(भारत) से

आपका प्रश्न:
क्या हिन्दी साहित्य-समाज में आप अकेले ऐसे साहित्यकार हैं जिसने पत्नी को सताया (?) व अन्य संबंध रखे !? ज़रुर आपसे भी बड़े-बड़े धुरंदर होंगे। फिर सारी ‘‘ख्याति’’ आपके हिस्से क्यों आती है !? क्या इसकी वजह अन्यत्र कहीं छुपी है ? क्या यह संभव नहीं कि कुछ लोग बहुत ही शातिराना ढंग से मन्नूजी का इस्तेमाल कर रहे हों !?
उत्तर:-
ज़रूर कर रहे हैं, मगर इसके पीछे सिर्फ़ व्यक्तिगत कारण नहीं हैं। मेरे ख़िलाफ़ जो एक विरोधी वातावरण पिछले दसियों साल से बना है, उसी मानसिकता में ये लोग मेरी कमज़ोरियाँ और कमियाँ तलाशा करते हैं और उन्हें ही बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं। धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, कमलेश्वर किसी के संबंध अपनी पहली पत्नियों से बिगड़े ही नहीं बल्कि काँता भारती ने तो एक निहायत ही अपमानजनक पुस्तक रेत की मछली लिख डाली। अगर मैं मन्नू के साथ अच्छे पति की तरह नहीं रह पाया तो क्या मुझे इस चुनाव का अधिकार नहीं है कि एक अच्छे मित्र की तरह उसके साथ संबंध बनाकर रखूँ, जो आज भी हैं। बाहर हम दोनों को साथ देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि हम अलग-अलग रहते हैं।
(यहां, न जाने क्यूं, यादवजी, जीवित मित्रों के पत्नी-प्रसंग छुपा गए हैं !)

admin said...

ममता जी की कविता पढवाने के लिए आभार।

----------
S.B.A.
TSALIIM.

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

ममता कालिया जी की कविता बहुत ही प्रासंगिक है. खांटी घरेलू औरत इस फत्बे का जो शब्द विन्यास है वो थोडा हिकारत वाला है वरना इसे अनुवाद करे तो शुद्ध गृहलक्ष्मी कोई बुरा नाम नहीं है. इसे अंगरेजी मे कहें pure house wife तो भी बुरा नहीं लगता. खैर ये सब सच है हममे से अधिकतर के लिए. मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव तो वहाना है हम सब अपने अंतर मे झांके इससे कविता की जड़ें दिखाई देंगी.

Sanjay Grover said...

हरिजी, यह आत्मस्वीकार स्वागत-योग्य है और हमारे जैसे मुल्कों में अंत्यंत आव”यक भी है जहां स्थितियां कुछ ऐसी हैं कि जो सबसे बड़ा पापी है वही ‘‘फुल-कांफिडेंस’’ के साथ पहला पत्थर मारने का ‘‘हौसला’’ रखता है।

Anonymous said...

ज्ञानोदय और ज्ञानपीठ के लिए आप भी जुगाड़ बैठा लें कथादेश के संपादक जी भी बैठा ही रहे हैं। नहीं तो 2007 में किताब में छपी कविता क्यों छापते वे। आखिर अफसरों और उनकी बिवियों से कब बचेगा साहित्यिक संसार

Anonymous said...

kya KATHADESH me sampadak bhi hai?main to suna hai baukhlaye birahmanwadi RSSi wrat-karwa aurtoN aur chadma-pragatisheel-pandito ke mukhauton ke peechhe chhupkar aadhunik aur maulik chetna ko chhalpurvak maar giraane ki koshishon ka kayartapurn chhayawadi khel khel rahe hai.

Asha Joglekar said...

So called diggaj logon kee soch kitani choti ho saktee hai.

इंसान said...

सही बात है। छोटी सोच वाले ही उच्चवर्णीय कहलाते आए हैं। वे सोचते हैं कि छोटी सोच छोड़ देने से हमारा कथित उच्च-वर्ण चला जाएगा, इसलिए छोटी सोच को कसकर पकड़े हैं। और इंसान को इंसान मानने को तैयार नहीं।

इंसान said...

अगर संपादक (?) हरिनाराण के पहले पंडित शब्द और जोड़ दें तो धंुध काफी छंट जाएगी और साफ हो रहेगा कि हिंदी साहित्य में जमे ज़माने भर के पत्नी-प्रताड़को, माता-मारकों और बहिन-बंधकों को छोड़, सिर्फ राजेंद्र यादवों और मन्नू भंडारियों को ही ‘‘प्रसाद’’ से क्यों नवाज़्ा जाता है !

Astrologer Sidharth said...

सादगी, सौन्‍दर्य और उसका दर्प भी।
बहुत सुंदर

कविता के लिए आभार।

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