Tuesday, May 5, 2009

मै नारी हूँ

हे पुरुष, मैने ही जनम दिया है तुझे
पहचान ले मुझे
मै नारी हूँ ।
सहा है तेरे हिस्से का दर्द
कभी माँ, कभी बहन, कभी बेटी बनकर ।
हमेशा बचाया है तुझे संसार के आघातों से
पिता की डाँट से, चाहे झूट से या सांच से
मैने ही फैलाई है तुझ पर अपने आँचल की छाया
लुटाई है भरपूर ममता और माया, माँ हूँ ऩ ।
राखी बाँधी है तुझे अपनी रक्षा के लिये
पर तेरे कई इलजाम हैं अपने सर लिये
की है तेरी ही रक्षा कई बार, बहन हूँ तेरी ।
कभी अपने नन्हें हाथों से तेरा चेहेरा है सहलाया
तुझमें कोमलता का अहसास जगाया
अपनी पैजनिया से गुंजाया तेरा आँगन
तुतले बोलों से भिगोये तेरे नयन
बेटी जो हूँ ।
और ये सारे के सारे दायित्व निभाये हैं मैने पत्नी बन कर
जीवन अपना तुझ पर वार कर, सारे सुख तेरी झोली में डाल कर
पत्नी का धर्म निभाया है
एक बिनती है
जब कभी अंदर का वहशीपन जागे
नारी का दिखे सिर्फ शरीर
आँखों के आगे
तब
याद कर लेना अपनी माँ बहन पत्नी बेटी
उसका भी सम्मान करना जो
कह रही होगी
मै नारी हूँ ।

10 comments:

MEDIA GURU said...

achhi rachana.

श्यामल सुमन said...

नारी जीवन के बहुरंगी आयाम को दिखलाती रचना। वाह।।

रूप तेरे हजार, तू सृजन का आधार।
माँ की ममता भी तुझमे, बहन का भी प्यार।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

दिनेशराय द्विवेदी said...

कविता अच्छी है. लेकिन नारी के इन सब रूपों के अतिरिक्त एक रूप उस के व्यक्तित्व का है जहाँ वह समाज को अपना स्वतंत्र योगदान करती है। वह रूप जब तक सब से ऊपर स्थापित न होगा, नारी अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकेगी।

MANVINDER BHIMBER said...

कविता अच्छी है....... जीवन के बहुरंगी आयाम को दिखलाती रचना।

Anonymous said...

सन 1898 में यह कविता पहली बार पढ़ी थी। अब लगता है कि इसका शीर्षक ‘मैं नारा हंू’ होना चाहिए। क्यों कि बिना तर्क और विवेक के बार-बार कुछ बातों को दोहराते जाना नारेबाज़ी ही ज्यादा लगती है। यहां भाई दिनेशराय द्विवेदी की टिप्पणी काबिले-गौर है। मां-बहिन-बेटी-देवी और घर्म का जो असली जाल है जब तक हम उससे नहीं निकलेंगे, स्त्री-मुक्ति की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। क्योंकि यह सब तो हमारे यहां भारतीय संस्कृति के नाम पर सैकड़ों सालों से चल ही रहा है, फिर किसी नारी-मुक्ति आंदोलन या चोखेर बाली की जरुरत ही क्यों आ पड़ी। जो नारियां अपने जैसी बल्कि अपने से भी भंयकर समस्याओं से गुजर रहे लोगों जैसे दलित-पिछड़े, लैंगिक विकलांग आदि से सहानुभूति की बजाय नफरत करती हैं, मुक्ति की उनकी बेसिक समझ पर तो वैसे भी संशय ही होता है।
वैसे कविता अपने-आप में बुरी नहीं है।

P.N. Subramanian said...

.माँ को हमारे श्रद्धा सुमन अर्पित हैं

संगीता पुरी said...

जब कभी अंदर का वहशीपन जागे
नारी का दिखे सिर्फ शरीर
आँखों के आगे
तब
याद कर लेना अपनी माँ बहन पत्नी बेटी
उसका भी सम्मान करना जो
कह रही होगी
मै नारी हूँ ।
क्‍या खूब लिखा है ..

अनिल कान्त said...

mujhe kavita bhi achchhi lagi aur bhaav bhi ...behtreen

रवीन्द्र दास said...

itni bhavukta aur dayniyta kyon?

रचना त्रिपाठी said...

जब कभी अंदर का वहशीपन जागे
नारी का दिखे सिर्फ शरीर
आँखों के आगे
तब
याद कर लेना अपनी माँ बहन पत्नी बेटी
उसका भी सम्मान करना जो
कह रही होगी
मै नारी हूँ ।


बहुत खूब...।

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