Tuesday, May 12, 2009

बिना माँ के बड़ी होने वाली लड़कियां

इतने
कठोर शीर्षक का मैं
विरोध करता हूँ
लेकिन
इसे शायद ऐसा ही होना है
क्योंकि ये जीवन है कितनी ही लड़कियों का
जिन्हें बड़ा होना होता है
बिना किसी सहारे
ख़ुद के ही दम पर
पार पाना होता है दुनिया से
और ख़ुद से भी

उनके कुछ शुरूआती क़दमों तक
वे माएँ उनके साथ रही
फिर खो गईं
किसी ऐसे बहुत बड़े अंधेरे में
जिसे पारिभाषिक रूप से हम मृत्यु भी कह सकते हैं
वे छोड़ गई पीछे
अपनी ही कोख से जन्मे
डगमगाते पाँव
जिन्हें धरती को इस्तेमाल करना भी नहीं आता था

वे छोड़ गईं उन्हें
जैसे अचानक ही तेज़ हवा चलने पर
आँगन में
अधूरी छोड़नी पड़ जाती है
कोई रंगोली

जो पीछे रह गईं वे कुछ कोंपलें थी
धूप और हवा में हिलती हुई पूरे उत्साह से
हर किसी को लुभाती
कभी-कभी तो अचानक ही उन्हें चरने चले आते
मवेशी
अपना मजबूत जबड़ा हिलाते

वे भय से काँप कर
अपने आपसपास की बड़ी पत्तियों के पीछे
सिमट जातीं

अपने पहले स्त्राव से घबरायी
दौड़ती जातीं
पड़ोस की किसी बुआ या चाची के घर
मदद के वास्ते
तो ऐलान हो जाता
मुहल्ले भर की औरतों में ही
कि बड़ी हो गईं हैं अब अमुक घर की बछेिड़यां भरपूर
और उनके पीछे तो कोई लगाम भी नहीं

क्या वे सिर्फ़ लगाम ही बन सकती थीं
जो चली गईं
असमय ही छोड़कर
और जो बची रहीं वे भी आख़िर क्या बन पायीं?

बहुत कठोर लेकिन आसान है यह कल्पना
एक दिन
ये लड़कियां भी माँ बनेंगी
और उसी राह चलेंगी
दुनिया में रहते या न रहते हुए भी
बहुत अलग नहीं होगा इनका भी जीवन

इतने कठोर अन्त का भी
मैं विरोध करता हूँ
लेकिन इस प्रार्थना के साथ -

मेरी कविता में उजाला बनकर आयें
वे हमेशा
वैसी ही खिलखिलाती
शरारती
और बदनाम

और मैं उजागर करता रहूँ जीवन
उनके लिए
लेकिन
अपनी किसी अनहुई बेटी की तरह
हमेशा ही
दिल की गहराइयों में कहीं
सोचकर रखूं
उनके लिए एक नाम!




--
शिरीष कुमार मौर्य
डी.एस.बी. परिसर
नैनीताल
263 002

11 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

वे माँ को जानती हैं तब जब खुद जनती हैं और माँ बन जाती हैं।

Ankita Chauhan said...

क्या वे सिर्फ़ लगाम ही बन सकती थीं

kuch aise prashn jinke uttar dhoodne se bhi nahi milte...

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

कौन समझा है आज तक और कौन समझेगा आज भी,
जिसने जाना, जिसने समझा, बस देह ही समझा,
अब जनने चलीं हूँ मैं खुद एक देह को तब जाना,
क्या है मोल इस शरीर का, क्या है मोल लड़की का।

Anonymous said...

क्या चाहते हो मित्र....कविता तो कुछ कह ही नहीं पाई...इतनी भावुकता....कि गलदश्रु प्रवाहित हो रहे हैं......मांस प्रेमी हैं...खाइए...खाट पर बैठ कर....

ghughutibasuti said...

यह कविता बहुत अच्छी लगी।
बिन माँ की बेटियाँ भी बड़ी हो ही जाती हैं, चाहे थोड़ी अधिक सहमी, थोड़ी अधिक भयभीत रहकर ही।
घुघूती बासूती

स्वप्नदर्शी said...

Jab tak samvedaanye jindaa hai, ye ladakiyaa bhee rastaa dhoondh lengee........

Unknown said...

बहुत अच्छी कविता है। हकीकत को उकेरती हुई। सच को बयां करती हुई। शीर्षक भी खींचने में सक्षम रहा...शानदार रचना

अनिल कान्त said...

The Best !!

शोभना चौरे said...

bi n ma ki beti .
pichke se gal ,dhansi huai ankhe ,
kbhi nana ke ghar me pli to mami ne bhukha sulaya |dadi ke ghar me pli to chachi ne bhukha sulaya pita ki itni himamat nhi jo apni ptni se apni beti ke liye lad ske bdi hui to tars khakr rishte daro ne shadi samsya ka hal smjhkar kar di par jeevn pryant bin ma ki beti ki udasi hi hothopar bani .

आनंद said...

मार्मिक कविता,
इससे भी मार्मिक शोभना चौरे की टिप्‍पणी...
इसे मैं हिंदी में टाइप कर देता हूँ -

बिन माँ की बेटी
पिचके से गाल, धँसी हुई आँखें,
कभी नाना के घर में पली तो मामी ने भूखा सुलाया।
दादी के षर में पली तो चाची ने भूखा सुलाया।
पिता की इतनी हिम्‍मत नहीं जो अपनी पत्‍नी से
अपनी बेटी के लिए लड़ सके।
बड़ी हुई तो तरस खाकर रिश्‍तेदारों ने
शादी समस्‍या का हल समझकर कर दी।
पर जीवनपर्यंत बिन माँ की बेटी की उदासी ही होठों पर बनी रही।

- आनंद

Unknown said...

वे छोड़ गईं उन्हें
जैसे अचानक ही तेज़ हवा चलने पर
आँगन में
अधूरी छोड़नी पड़ जाती है
कोई रंगोली

ye panktiyaa bahut achchhe banee hai lekin pooree kavitaa naa to samasyaa hee ban paayee naa samaadhaan. mei khud ek aisee hee betee ka pitaa hoon aur mujhe dar lagtaa hai 3 maah baad vo 18 saal ke ho jayegee aur abhee tak vo ye naa jaan paayee hai ki toofaan se pahle rangoli koi aur banaa rahee thee aur use poora kisee aur ne kiyaa hai.

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