Thursday, June 18, 2009

द्वि लिंगी समाज संरचना मे समलैंगिकों का सगर्व उद्घोष - दिल्ली 28 जून

मुझे हैरानी नही होगी अगर आप यह कहें कि हमारी युवा पीढी गेय प्राइड परेड को आजकल के फैशन का एक एक्स्प्रेशन मानती हो।गेय , लेस्बियन होना ट्रेंडी होना हो।फिर भी , बहुत सी ऐसी अस्मिताएँ हैं जो अपनी सेक्सुअल ओरियंटेशन को लेकर या तो हीनता बोध मे जीती हैं या हमेशा दुविधा मे पड़ी रहती हैं क्योकि यह दुनिया तो केवल दो लिंगो के लिए बनी है - स्त्री लिंग और पुल्लिंग ।अपनी लैंगिक अस्मिता के प्रति मनुष्य कितना सजग है इस पर बात बहुत लम्बी चलाई जा सकती है।मर्दानगी होना , मर्दानगी न होना...नपुंसकता ..बांझपन ....समलैंगिकता ....तृतीय लिंग होना ........समाज के हाशिए पर पटक देता है। इस बाइनरी संरचना से बाहर निकलना उतना ही मुश्किल है जितना इसके बीच रहना अपनी अस्पष्ट लैंगिक पहचान के साथ।
मेरा कतई इरादा नही कि मै इन दो विषयों को मिलाऊँ और स्त्री आन्दोलन को गेय -लेस्बियन या समलैंगिक अधिकारों की लड़ाई से जोड दूँ । पर आप मानें या न मानें ..... ऐसी हर अस्मिता जिसे मुख्यधारा से हमेशा उपेक्षा मिली है वह उपेक्षा के एक अदृश्य सूत्र से जुड़ जाती हैं।
फिलहाल दिल्ली अपनी दूसरी गेय प्राइड परेड के लिए तैयार हो रही है। उसके आयोजक उसे इस बार और भी नए रंग देने मे जुटे हैं।ऐसे मे स्पष्ट रूप से खुद को स्त्री पुरुष की परिभाषा मे सहज महसूस करना एकदम से आहत होता है और महसूस होता है कि लैंगिक अस्मिता {सेक्सुअल आइडेंटिटी } का क्या महत्व है ? हम जिस हिकारत से हिजड़ों को अपने समाज मे देखते आए हैं और अब भी देखते ही हैं ....क्या वे हिजड़े भी इस द्वी लिंगी सामाजिक संरचना मे हाशिए पर नही हैं? इस तरह की परेड मे क्या वे जन्म पर बधाइयाँ गाने वाले , सिग्नल पर भीख मांगने वाले भी शामिल होते होंगे? इस बार हम ज़रूर देखना चाहेंगे।
लैंगिक पहचान की यह समस्या किस तरह देखी जाए जबकि यह भी दिखाई दे जाता है कि कुछ मुद्दे एक खास राजनीतिक टोन लिए हैं या किसी प्रभाव के तहत एक खास वर्ग{ जिनकी मूल चिंता कभी रोज़ी रोटी की न रही हो} के बीच शौकिया भी पनप जाते हैं ।जिस खास तबके मे बलात्कारी पति के कसूर स्वीकार कर लेने पर भी पत्नी उसे निर्दोष मान रही हो मानो यह उनके लिए यह कोई अप्रूव्ड किस्म का व्यवहार हो।


इस मुद्दे मे पेंच बहुत है। एक सवाल यह भी कि गेय - ट्रांसजेंडर - लेसबियन होना अपने आप मे किन्ही ढांचों , संरचनाओं को अस्वीकारना है तो फिर शादी जैसी संरचना के लिए क्या बेचैनी होनी चाहिए?अक्सर खबर सुनती हूँ दो लड़कीयाँ आपस मे शादी करना चाहती हैं या दो पुरुष मिलकर बच्चा गोद लेना चाहते हैं ।

क्या हम वाकई कोई कमेंट करने से पहले इस मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करते हैं ?

ऐसे मे हम इस गे प्राइड परेड को किस तरह देखेंगे ?

21 comments:

Sanjay Grover said...

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है !
सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला ।
(निदा)

डॉ .अनुराग said...

समलेगिकता एक तरह का मेडिकल डिसऑर्डर है... ओर इसके रोगियों में' डिनायल 'की टेंडेंसी कोमन है...इस इश्तेहारी ज़माने में 'गे प्राइड परेड' को भी एक समूह का डिनायल मान ले....ये इनका डिफरेंट होने का एक तरीका है
जहाँ तक बलात्कारी पति के समर्थन की बात आती है हमें महान क्लिंटन याद आते है जिनके मोनिका से कैसे संबंध बने उस पर कई बेस्ट सेलर बिके..कइयो की रोयल्टी में सुना है मोनिका आज भी हिस्सेदार है ..उन्ही क्लिंटन की बीवी दोबारा चुनाव में कड़ी हुई.जीती....ओर ये वही देश है जो अपने यहाँ सबसे ज्यादा बुद्दिजीवी होने का दावा करता है ...वैसे ये दीगर बात है की कॉमन सेंस बुद्दिजीवियों की भी दुश्मन रही है ..वही क्लिंटन हमारे देश में कई बार आये ....किसी संस्था के सिरमोर बनकर....सम्मान लेकर वापस चले गए ..अब कल को कोई नया फैशन का एक्स्प्रेशन आ जाये तो अलग बात है...

हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा said...

मर्दानगी होना , मर्दानगी न होना...
इसी के साथ स्त्रैण गुण न होना भी जोड़ लिया जाए ताकि लैंगिक विकलांगता और गे या लेस्बियन स्थितियों को भिन्नता से परिभाषित करने में आसानी हो। तीसरा लिंग कुदरती तौर पर होता ही नहीं है या तो मनोशारीरिकरोग है या लैंगिक विकलांगता......

सुजाता said...

अनुराग जी ,

मै वाकई इस मुद्दे पर बहुत सोच मे पड़ी हूँ।मेडिकल डिसऑर्डर मानते ही यह मानना होगा कि इसे इलाज की ज़रूरत है।माने यह प्राइड का विषय नही है बल्कि असहायता का विषय है कि हम ऐसे ही है और हमे ऐसे ही स्वीकार करो !
तब एक बात और उभर कर आती है कि सभी मनुष्य सिर्फ अपनी सेक्शुअल ओरियंटेशन मे ही नही न जाने कितने तरह के व्यवहारों मे बेहद फर्क होते हैं ..जब तक वे व्यवहार सार्वजनिक न हों जाएँ वे सगर्व मुख्यधारा मे सम्मान पाते हैं।शाइनी आहूजा का बलात्कारी होना शायद समाज को उतना नया या व्यवस्था विरोधी नही लगे जितना किन्ही समलैगिकों का खुद को समलैन्गिक कहना लग सकता है। क्या वजह है ? केवल यही न कि आपके समाज मे विपरीत लिंगी कामुकता ही को मान्यता प्राप्त है।लैंगिक सम्बन्धों का केवल वही तरीका स्वीकार्य है फिर चाहे वह बलात्कार ही क्यों न हो!
कभी लगता है कि यह केवल मानकीकरण के कारण पैदा समस्या है।हमने लैंगिक अस्मिता और लैंगिक सम्बन्धों के कुछ मानक तय किये हैं और उनसे विचलित होने वालों को हम स्वीकार नही करना चाहते।
क्या सभी तरह के मानसिक डिसऑर्डर एक खास मानक से विचलन नही हैं? माने आप पागल को समाज के लिए खतरनाक मान कर उसे आइसोलेट कर सकते हो ...लेकिन एक षडयंत्रकारी, धेखेबाज़ , फ्रॉड इंसान ,बात बात पर लड़ने वाला उत्पीड़क अहंकारी स्वार्थी ,सत्ता का भूखा इनसान हमे समाज के लिए खतरा नही दिखाई देता बल्कि उसे समाज मे प्रतिष्ठा और स्म्मान प्राप्त होता है।क्योंकि दर असल समाज मे मानक व्यवहार क्या हों यह तय करने वाला भी कोई शक्तिशाली स्वार्थी उत्पीड़क वर्ग ही होता है। अगर यह मानक तय करने वाला वर्ग पागलों का हो तो शायद हम उनके मानको मे फिट नही होंगे और हमे आइसोलेट कर दिया जाएगा ।

क्या समस्या केवल इतनी नही है कि हमारे पास हमारे पास नापने तौलने परिभाषित करने के औजारों की कमी है इसलिए हमारे औजार की क्षमता से बाहर होते ही हम किसी बात को डिसॉर्डर मान कर उसे ट्रीट करना शुरु कर देते हैं।
विविधताओं के लिए हमारे समाज के स्ट्रक्चर मे जगह नही है और यही जगह क्रियेट करने के लिए ऐसे एक्स्प्रेशन सामने आते हैं।

इस विषय पर आपसे और जानना चाहती हूँ !

डॉ .अनुराग said...

सुजाता जी
प्रकति ने स्त्री -पुरुष की दैहिक सरंचना मनुष्य को उसके देहिक व्यवहार के लिए की है ..उससे इतर क्रत्य कई रोगों को जन्म देता है .सवाल यहाँ मान्यता का नहीं है ...मनुष्य इस लिए पशुओ से अलग है क्यूंकि उसने एक समाज की रचना की .जिसके कई नियम है .सार्वजनिक जीवन जीने के..हमारे व्यवहार में जब ऐसे लक्षण प्रकट होने लगे जो दूसरे प्राणियो के लिए भी गलत हो ओर .एक नए रोग की उत्पत्ति करे .तो वे खतरनाक है....
किसी भी मानवीय समाज में बलात्कार स्वीकार्य नहीं है तभी तो हम उसे सजा के तौर पे आइसोलेट करते है समाज के लिए खतरा मानकर .....
षडयंत्रकारी, धेखेबाज़ , फ्रॉड इंसान ,बात बात पर लड़ने वाला उत्पीड़क अहंकारी स्वार्थी ,सत्ता का भूखा इनसान सभी समाज के लिए खतरा है .पर वे अनदेखे खतरे है .अस्पष्ट ...हमारे आपके बीच ...आसानी से न पहचाने जाने वाले ...ये वर्तमान समय की विडंबना है की पैसे ओर सत्ता की ताकत सम्मान के पर्पोशनाली चलती है ..पर शायद ये मूल विषय से अलग हटकर है ..जिन पर एक अलग बहस की जा सकती है ...
'गे प्राइड परेड' ...मेरे लिए सिर्फ अपने सेक्शुअल ओरियंटेशन एक्सप्रेस करने का एक सार्वजनिक तरीका है ....समाज की बेहतरी का नहीं.....
ऐसी विविधता जो समाज के स्ट्रक्चर की बेहतरी के लिए हो हमेशा स्वागत योग्य है ....उसका स्पेस हमेशा रहा है .रहेगा...चाहे उसकी शुरुआत बरसो पहले गेलिलियो के प्रथ्वी को गोल कहने से हुई हो....या डार्विन के सिद्धांत से ...

कुश said...

पता नहीं क्यों पर खुद को गे, लेस्बियन या बाय सेक्सुअल कहना फैशन सा बनता जा रहा है.. यदि कोई गे या लेस्बियन है तो उसे लोगो को बताने की कोई जरुरत नहीं.. शायद उनका ये मानना हो कि इस तरह की परेड से उन लोगो को हिम्मत मिलेगी जो गे या लेस्बियन हो.. मुझे नहीं पता इसकी क्या वजह है? लेकिन हाँ अनुराग जी से सहमत हूँ समाज की बेहतरी में तो इनका कोई योगदान नहीं है.. पर इतना जरुर कहूँगा की हिजडा जैसा शब्द यदि दुनिया में ना रहे तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी.. श्याम बेनेगल की फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर में रवि झाँकल ने हिजडे का किरदार निभाया है जिसे राजनीति में आकर देश की सेवा करनी है.. सही अर्थो में कहे तो ये मुख्यधारा में जुड़ने का प्रयास है.. ये किरदार फिल्म का सबसे मजबूत किरदार था..

पर मुझे लगता है इस तरह की गे प्राइड पूरी तरह से प्रायोजित होती है.. जो हमें नज़र आ रहा है वो दरअसल है नहीं.. सुना है पुणे में सेक्स टॉयस खुले आम मिलते है.. ये भी एक पनपती हुई इंडस्ट्री है जो भारत में अपने कदम रख चुकी है.. जेपेनीज डॉल्स के बारे में पूरी दुनिया जानती है.. भारत में इस तरह की कोई चीज़ अभी तक है नहीं.. पर यदि हो तो शाइनी आहूजा जैसे लोग बलात्कार करना बंद करेंगे? अगर जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाने को ही बलात्कार कहा जाता है तो कितने ही घरो में रोज़ रात बलात्कार होते है.. और स्त्रिया इन बलात्कारियों की लम्बी उम्र के लिए करवा चौथ के व्रत भी रखती है

खैर, गे लेस्बियन, बाय सेक्सुअल या स्ट्रेट होना पर्सनल चोयस है.. शादी करना, नहीं करना, बच्चा गोद लेना.. भी नितांत निजी है.. हा इतना जरुर है कि ऐसे लोगो को समाज पीठ पीछे पसंद नहीं करता है या मजाक उडाता है.. पर महंती समाज की अवधारणा के चलते कुछ भी संभव नहीं है.. जहाँ पर कुछ महंत नुमा लोग सबको अपने विचारो के अनुरूप चलाना चाहते है. उन्होंने कभी कोई नियम बना दिए थे जो अभी तक चले आ रहे है.. उन महंतो के उत्तराधिकारी आज भी जिन्दा है.. और हम सामन्ती प्रथाओ को अपने कंधे पर ढोते हुए.. भगवान विष्णु के अवतार लेने का इन्तेज़ार कर रहेहै

Sanjay Grover said...

आप एक बच्चे को इस तरह पालें कि उसे समाज, परिवेश, परिवार, पड़ोस कोई भी एक शब्द भी ईश्वर के बारे में न बताए। 15-16 की उम्र का होते-होते जब वह बच्चा ईश्वर को मानने वाले समाज के बीच जाएगा तो उसे ‘ईश्वर-ईश्वर’ रटते लोग पागल और अजूबे नहीं लगेंगे। लेकिन बहुमत तो ईश्वर वालों का है। तो हो सकता है कि बहुमत और अन्य दवाबों (जैसे कि अपनी अलग सोच रखने वालों को पत्थर मारने वाले और किसी भी हद तक गिरकर परेशान करने वाले लोग) के चलते वह आत्मविश्वास खो बैठे। तो होगा क्या ! मेडिकल डिसआॅर्डर तो यहां बहुमत से तय होते हैं। अंततः वह बच्चा ही पागल कहाएगा। पत्थर मारने वाले वहशी नहीं।
गे परेड से समाज को नुकसान भी क्या है !? दहेज, फिजूलखर्ची, पार्कों और पर्यावरण को रौंदती शादियां क्या इसलिए फायदेमंद हैं कि हमें इनकी आदत हो चुकी है या हमारी मानसिकता के अनुकूल हैं ! जिस समलैंगिकता ( होमोसैक्सुएलिटी ) को आज लोग बाहर कहीं से आया हौवा समझते हैं वही हाथरस के (जहां मेरा जन्म हुआ) पहलवानी अखाड़ों के अंदर और बाहर, उस वक्त भी, निद्र्वन्द भाव से सीना ताने घूमा करती थी। मेरे जैसे शक्ल से ( और अक्ल से भी ) मासूम ( दूसरे शब्दों में ‘चिकने’ )लड़के तक उस माहौल में लड़कियों की तरह ही डरे-सहमे घूमा करते। कुछ शिकार भी हो जाया करते थे। आपकी जानकारी के लिए तब वहां न कोई गे परेड निकलती थी न ही अमेरिका से कोई जत्था अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए आया करता था।

गैलीलियो को अपने वक्त में माफी मांगनी पड़ गयी थी। आज साढ़े तीन सौ साल बाद चर्च ने उन्हें जाने किस मजबूरी में स्वीकार किया है। क्या हम फिर साढ़े तीन सौसाल बाद फिर वही करेंगे कि- ‘समलैंगिकता ! मामूली बात पर इतना हल्ला ? अरे हमारे ग्रन्थ और साहित्य तो इससे भरे पड़े हैं।’ क्या आप मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ या चेखव की कहानी ‘वार्ड नं. सिक्स’ या इस्मत की ‘लिहाफ’ को भी फैशन का ऐक्सप्रेशन भर मानेंगे !?
अगर 95 लोग पचासियों सालों से‘सर नीचे पांव ऊपर’ किए खड़े हैं और उन्होंने इस ‘कला’ को साध लिया है तो उन्हें तो पांच सीधे खड़े लोगों की सामान्य हरकतें भी ‘डिनायल की टेंडेंसी’ लग सकती हैं।

Sanjay Grover said...

आप एक बच्चे को इस तरह पालें कि उसे समाज, परिवेश, परिवार, पड़ोस कोई भी एक शब्द भी ईश्वर के बारे में न बताए। 15-16 की उम्र का होते-होते जब वह बच्चा ईश्वर को मानने वाले समाज के बीच जाएगा तो उसे ‘ईश्वर-ईश्वर’ रटते लोग पागल और अजूबे नहीं लगेंगे। लेकिन बहुमत तो ईश्वर वालों का है। तो हो सकता है कि बहुमत और अन्य दवाबों (जैसे कि अपनी अलग सोच रखने वालों को पत्थर मारने वाले और किसी भी हद तक गिरकर परेशान करने वाले लोग) के चलते वह आत्मविश्वास खो बैठे। तो होगा क्या ! मेडिकल डिसआॅर्डर तो यहां बहुमत से तय होते हैं। अंततः वह बच्चा ही पागल कहाएगा। पत्थर मारने वाले वहशी नहीं।
गे परेड से समाज को नुकसान भी क्या है !? दहेज, फिजूलखर्ची, पार्कों और पर्यावरण को रौंदती शादियां क्या इसलिए फायदेमंद हैं कि हमें इनकी आदत हो चुकी है या हमारी मानसिकता के अनुकूल हैं ! जिस समलैंगिकता ( होमोसैक्सुएलिटी ) को आज लोग बाहर कहीं से आया हौवा समझते हैं वही हाथरस के (जहां मेरा जन्म हुआ) पहलवानी अखाड़ों के अंदर और बाहर, उस वक्त भी, निद्र्वन्द भाव से सीना ताने घूमा करती थी। मेरे जैसे शक्ल से ( और अक्ल से भी ) मासूम ( दूसरे शब्दों में ‘चिकने’ )लड़के तक उस माहौल में लड़कियों की तरह ही डरे-सहमे घूमा करते। कुछ शिकार भी हो जाया करते थे। आपकी जानकारी के लिए तब वहां न कोई गे परेड निकलती थी न ही अमेरिका से कोई जत्था अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए आया करता था।

गैलीलियो को अपने वक्त में माफी मांगनी पड़ गयी थी। आज साढ़े तीन सौ साल बाद चर्च ने उन्हें जाने किस मजबूरी में स्वीकार किया है। क्या हम फिर साढ़े तीन सौसाल बाद फिर वही करेंगे कि- ‘समलैंगिकता ! मामूली बात पर इतना हल्ला ? अरे हमारे ग्रन्थ और साहित्य तो इससे भरे पड़े हैं।’ क्या आप मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ या चेखव की कहानी ‘वार्ड नं. सिक्स’ या इस्मत की ‘लिहाफ’ को भी फैशन का ऐक्सप्रेशन भर मानेंगे !?
अगर 95 लोग पचासियों सालों से‘सर नीचे पांव ऊपर’ किए खड़े हैं और उन्होंने इस ‘कला’ को साध लिया है तो उन्हें तो पांच सीधे खड़े लोगों की सामान्य हरकतें भी ‘डिनायल की टेंडेंसी’ लग सकती हैं।

स्वप्नदर्शी said...

I will write a detailed post about this.

But sooner or later The FIVE SEXES will be acceptable in civilized society.

In brief I will bring out one positive contribution of LGBTG group to the society. They have broken the social stereotypes of gender based
concepts that have nothing to do with biology, but are product of the social learning and cultural learning.

Like defining male and female on the basis of their
--length of Hair
-dress code
-behavior (example: male aggressive, female docile, male logical, women impulsive etc.)
-division of labor (e.g. House wife and bread winner)

Some of these stereotypes were also challenged by women to gain equality in social and economic front.

In gender politics both women and LGBTs are second category citizen and they have a reason to support common issues to bring equality and respect to all human beings
-irrespective of their cast, creed, religion, gender or sexual orientation.

अर्कजेश said...

समलैंगिकता कोई नई बात नहीं है, यह सभ्यता के प्रारंभ से है, जब से विषमलैंगिकता है | हर समाज में यह प्राचीन काल से ही विद्यमान थी | यूनान में यह आम थी | प्लेटो ने तो यहाँ तक कहा है कि आदमी और औरत के बीच प्रेम असंभव है | खजुराहो के मंदिरों में भी समलैंगिक मूर्तियाँ हें |

जहां तक मेडिकल disorder की बात है तो यह कोई chromosomes में changes का disorder नहीं है| और यदि disorder है भी तो क्या आप इन्हें समंदर में फेंकना चाहेंगे क्योंकि इसका इलाज तो कोई है नहीं सिवाय इसकी कि इनके व्यवहार को मान्यता दी जाए यह अपनी लैंगिक अस्मिता की खोज है |

मान्यता मिलना या न मिलना तो वर्चस्व की बात है | अरस्तु ने कहा कि महिलाओं के ३१ दांत होते हें और सबने मान लिया | हिजडे हास्यास्पद इसलिए हैं, क्योंकि उनकी संख्या मर्दों और औरतों के मुकाबले कम हैं | कुछ नस्लों को हीन इसलिए माना जाता है क्योंकि वे सीधे-साधे थे और सत्ता के लिए उस स्तर तक नहीं गिर पाए |

इसी तरह महिलाओं को भी पित्रसत्तात्मक समाज में हीन माना गया | जो अभी भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं |

बहुमत सच ही हो हमेशा ऐसा नहीं होता | जब दमित-वंचित अपनी आवाज उठाते हैं तो उसे राजनीति से जोड़ा जाता है | आखिर ये लोग भी समाज का हिस्सा हैं | और इन्हें भी पूरा अधिकार है, उसी सम्मान और स्वीकार्यता से रहने का |

एड्स इसी सोच का परिणाम है कि समलैंगिक वर्ग को समाज से ख़त्म कर दिया जाए |
जैसा कि एड्स वाइरस का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिकी सेना के समलैंगिकों को ख़त्म करने के लिए किया गया था | यह वाइरस अमेरिकी सरकार द्वारा प्रायोजित था |

यदि समलैंगिकता बढ़ रही है तो आज नहीं तो कल इसे हर देश को स्वीकाराना ही पड़ेगा |
क्योंकि वैसे भी समाज उस दिशा में जा रहा है जहां लैंगिक पहचान अब उतनी स्पष्ट नहीं रह जाने वाली है |

उन्मुक्त said...

कुछ समय पहले, मैंने एक चिट्ठी आईने, आईने, यह तो बता – दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन नाम से प्रकाशित की थी, जिस पर इस विषय पर चर्चा की थी। जब प्रकृति स्वयं थोड़ी विषम (asymmetrical) है; जब वह स्वयं थोड़ी तिरछी (skewed) है तो हम यह क्यों चाहते हैं कि हमारे मानवीय रिशतों मे सम्मिति (symmetry) हो, वे हमेशा सीधे हों| यदि उनमे कहीं विषमता हो तो उसे स्वीकारना चाहिये|

अनूप शुक्ल said...

लेख के बहाने अच्छी टिप्पणियां भी पढ़ने को मिलीं।

Sanjay Grover said...

कृपया मेरी दूसरी टिप्पणी के निम्न हिस्से को सुधार कर पढ़ें वरना ग़लतफळमी होने की भी संभावनाएं हैं:-
आप एक बच्चे को इस तरह पालें कि उसे समाज, परिवेश, परिवार, पड़ोस कोई भी एक शब्द भी ईश्वर के बारे में न बताए। 15-16 की उम्र का होते-होते जब वह बच्चा ईश्वर को मानने वाले समाज के बीच जाएगा तो उसे ‘ईश्वर-ईश्वर’ रटते लोग पागल और अजूबे नहीं लगेंगे क्या !? लेकिन बहुमत तो ईश्वर वालों का है। तो हो सकता है कि बहुमत और अन्य दवाबों (जैसे कि अपनी अलग सोच रखने वालों को पत्थर मारने वाले और किसी भी हद तक गिरकर परेशान करने वाले लोग) के चलते वह आत्मविश्वास खो बैठे। तो होगा क्या ! मेडिकल डिसआॅर्डर तो यहां बहुमत से तय होते हैं। अंततः वह बच्चा ही पागल कहाएगा। पत्थर मारने वाले वहशी नहीं।

Sanjay Grover said...

अनूप शुक्ल ने प्रोत्साहित किया सो जी चाहा कि एक रुकी हुई बात और निकल जाने दूं। फिलहाल समलैंगिकों की सभी श्रेणियों को छोड़ दीजिए। पहले लैंगिक विकलांगों (हिजड़ों) की बात कर लीजिए। उनके होने में उनका अपना क्या कसूर है !? हिजड़ों के बारें में अगर हम सभी पूर्वाग्रह हटाकर सोचें तो ‘‘मां-बाप द्वारा बच्चों के निस्वार्थ भाव से पालन-पोषण’’ को लेकर हमारी सभी बनी-बनायी, रटी-रटायी धारणाएं चूर-चूर होकर गिर पड़ती हैं। सिर्फ सामाजिक मान्यताओं और डरों से घबराकर अपने ’’कलेजे के टुकड़ों’’ को सदा-सर्वदा के लिए किसी अज्ञात में फेंक देना ! कैसी भयानक क्रूरता! अक्षम्य अपराध! हिजड़ों ने आखिर क्या बिगाड़ा है समाज का !? कमियां और अक्षमताएं समाज और परिवार की और भुगतते हैं नन्हें मासूम विकलांग। उनका पूरा जीवन एक गाली बना दिया जाता है। क्यों ? तथाकथित सहिष्णुता का ‘‘सच्चा सत्व’ सामने आ जाता है। जहां आए दिन तरह-तरह नमूने, सम्प्रदाय, राजनीतिक दल, धर्म, नट, मदारी, बाजीगर, नीम-हकीम, ओझा-बाबा रैलियां, जुलूस, कीर्तन, मजमे लगा-लगाकर सड़कों, पार्कों, मैदानों और अन्य सार्वजनिक स्थलों को रौंदते रहते हैं, वहां हेय-सी गेय-परेड से इतना डर और हंगामा !? शक होता है। सवाल उठते हैं मन में।

Sanjay Grover said...

एक और बात उठती है मन में। कई लोग पूछ रहे हैं कि समाज की बेहतरी में इनका क्या योगदान है !? तो क्या जो स्त्री या पुरुष समलैंगिक नहीं हैं उन सभी का समाज की बेहतरी में योगदान है !? क्या उनको होना मात्र ही समाज को बदल देने या सुधार देने वाली महान घटना है !? समाज की बेहतरी में योगदान व्यक्तिगत समझ, इरादे और और अमल पर निर्भर करता है न कि स्त्री, पुरुष या समलैंगिक या हिजड़ा होने पर। शादी करके बच्चे पैदा कर देना फिर किसी भी तरह उन्हें ‘‘कमाऊ’’ बनाकर उनकी भी शादियां करवाकर उनके बच्चों के बड़े होने का इंतज़ार इसलिए करना कि फिर उनकी भी शादियां करवाकर हम गली-गली यह गा सकें कि ‘‘देखो हमने कितना महान सामाजिक जीवन जिया’’ और फिर यह गर्व करना कि हमने कुत्ते-बिल्लियों से कुछ बहुत इतर और महान सामाजिक कृत्य कर डाला है, मेरी समझ में तो आता नहीं।

KK Yadav said...

Nice Post.

आर. अनुराधा said...

"आप पागल को समाज के लिए खतरनाक मान कर उसे आइसोलेट कर सकते हो ..."

"क्या वे हिजड़े भी इस द्वी लिंगी सामाजिक संरचना मे हाशिए पर नही हैं?..."

पागल को "खतरनाक" मानना और आइसोलेट करना अपने आप में पागलपन है। इसे सब समझ चुके हैं और इसके विकल्पों पर लगातार काम चल रहा है। ऐसी हरकतें अब खबर बनती हैं। इस तरह के वाक्य इस गंभीर चर्चा में ठीक नहीं लगते।

और हिजड़ों की बात करें तो कभी सोचना चाहिए कि हिजड़े हमारे देश में ही इतने क्यों नजर आते हैं, किसी विकसित देश में क्यों नहीं? क्या ऐसी शारीरिक विकलांगता के प्रति हमारे देश के, इस रेस के लोग ज्यादा प्रवण हैं? नहीं।

दरअसल यह भी एक पेशा हो गया है। हिजड़े खुद स्वीकार करते हैं कि वे गरीब परिवारों से बच्चों को मांग कर, खरीद कर या अपहरण करके ले जाते हैं ताकि उन्हें क्रूर "सर्जरी" के जरिए हिजड़ा बनाकर उनसे कमाई की जा सके। प्राकृतिक रूप से हिजड़ा होना समाज में उतना अपमानजनक या निकृष्ट नहीं होता कितना हिजड़ा "बन कर" उसका प्रदर्षन करके लोगों की भावनाओं (डर, जुगुप्सा, उत्सुकता, ....) को उकसाना और उनकी एवज में पैसे पाना। इसलिए हिजड़ा होने से ज्यादा किसी को हिजड़ा बनाए जाने पर ज्यादा हल्ला होना चाहिए।


और जो जनाब यह सोचते हैं कि "जेपेनीज डॉल्स के बारे में पूरी दुनिया जानती है.. भारत में इस तरह की कोई चीज़ अभी तक है नहीं.. "

तो उन्हें कहना चाहूंगी कि यह हमारे "पाक-साफ, पवित्र" देश में , मेरी खुदकी जानकारी में 23 साल से है। मुझसे ज्यादा बुजुर्ग इससे पहले के इतिहास से वाकिफ होंगे।

Sanjay Grover said...

जिस तरह मांग/छीन/खरीद/बेचकर हिजड़े बनाए जाते हैं उसी तरह बहला/फुसला/खरीद/बेचकर
वेश्याएं और कालगल्र्स भी बनती और बनायी जाती हैं। ऐसे भी अनुभव हैं कि एक मोहल्ले में अकेली रहती महिला, जिसके घर खुले आम खास तरह के लोगों का आना-जाना है और सारे मोहल्ले को एतराज है और एक आदमी जो खुले दिमाग का और इसे उस महिला का व्यक्तिगत मामला मानकर चुप रहता है, एक दिन वही महिला दबंगो के उकसाने पर कुछ वर्णगत पूर्वाग्रहों के चलते उस व्यक्ति को परेशान करना शुरु कर देती है। एक अन्य ‘आंखिन देखी’ मिसाल में कई बार दलित या जमादार उसी व्यक्ति से मेहनताना भी ज्यादा लेता है और काम भी ठीक से नहीं करता, जो उससे आदरभाव से या मानवीय ढंग से पेश आता है। गाली देने वालों का वह काम भी जल्दी करता है और मेहनताना न भी मिले तो बुरा नहीं मनाता। इन सब की अपनी मजबूरियां भी है और समझ भी। ये समझ और हालात एकाएक नहीं बदल जाने वाले। इसका मतलब यह तो नहीं इन कुछेक (या कुछ और भी ज़्यादा)
कारणों के चलते हम आंदोलनो के विरोधी हो जाएं या ऐसों से सहानुभूति रखना छोड़ दें। उक्त संदर्भों में हमें व्यापक परिप्रेक्ष्य में ज्यादा उदारता के साथ देखना पड़ता है।
और अपने ताज़ा अनुभवों और समाज की मानसिकता पर लगातार नज़र बनाए रखने के चलते मैं यह तो बिलकुल नहीं मान सकता कि.....
************प्राकृतिक रूप से हिजड़ा होना समाज में उतना अपमानजनक या निकृष्ट नहीं होता*****

अभी दो-तीन महीने पहले मैंने गैर-साहित्यकारों में अपने सबसे समझदार दोस्त को फोन पर जब यह बताया कि यार, एक ब्लाग हिजड़ों का भी है तो पहले-पहल तो वह बिलकुल वही हंसी हंसा जो दसवीं-बारहवीं में मै हिजड़ों पर अपनी रुढ़ मानसिकता के चलते हंसा करता था। बाद में दोस्त भी इस मुद्दे पर गंभीर हो गया।

Dev said...

आप सबको पिता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ...
DevPalmistry

Asha Joglekar said...

Medical dis-order तो है ही चाहे मानने वाले माने या ना माने यह एक abnormality है । क्यूं कि जीव जगत का उद्देश्य है propagation of species और वह जिससे साध्य नही होता तो वह abnormality हुई । इससे उनके अधिकार खत्म नही होते । इसी तरह हिजडे़, नपुंसकता वंध्यत्व भी हैं । पर इससे उनके जिंदगी जीने में थोडा सा तो फर्क पडता है ।

Sanjay Grover said...

मैं आपसे आदरपूर्वक जानना चाहूंगा ‘‘जीवजगत का यह उद्देश्य’’ किसने कब तय किया।
मुझे वाकई नहीं मालूम।

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

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