Tuesday, June 16, 2009

ईव-टीजिंग और ड्रेस कोड

कालेज लाइफ का नाम सुनते ही न जाने कितने सपने आँखों में तैर आते हैं। तमाम बंदिशों से परे वो उन्मुक्त सपने, उनको साकार करने की तमन्नायें, दोस्तों के बीच जुदा अंदाज, फैशन-ब्रांडिंग और लाइफ स्टाइल की बदलती परिभाषायें....और भी न जाने क्या-क्या। कालेज लाइफ में मन अनायास ही गुनगुना उठता है- आज मैं ऊपर, आसमां नीचे।

पर ऐसे माहौल में यदि शुरूआत ही बंदिशों से हो तो मन कसमसा उठता है। दिलोदिमाग में ख्याल उठने लगता है कि क्या जींस हमारी संस्कृति के विपरीत है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि मात्र जींस-टाप पहन लेने से वो प्रभावित होने लगती है? क्या जींस न पहनने भर से लड़कियां ईव-टीजिंग की पीड़ा से निजात पा लेंगीं। दरअसल कानपुर के कई नामी-गिरामी कालेजों ने सत्र प्रारम्भ होने से पहले ही छात्राओं को उनके ड्रेस कोड के बारे में बकायदा प्रास्पेक्टस में ही फरमान जारी किया है कि वे जींस और टाप पहन कर कालेज न आयें। इसके पीछे निहितार्थ यह है कि अक्सर लड़कियाँ तंग कपड़ों में कालेज आती हैं और नतीजन ईव-टीजिंग को बढ़ावा मिलता है। स्पष्ट है कि कालेजों में मारल पुलिसिंग की भूमिका निभाते हुए प्रबंधन ईव-टीजिंग का सारा दोष लड़कियों पर मढ़ देता है। अतः यह लड़कियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने को दरिंदों की निगाहों से बचाएं।

आज के आधुनिकतावादी एवं उपभोक्तावादी दौर में जहाँ हमारी चेतना को बाजार नियंत्रित कर रहा हो, वहाँ इस प्रकार की बंदिशें सलाह कम फरमान ज्यादा लगते हैं। समाज क्यों नहीं स्वीकारता कि किसी तरह के प्रतिबंध की बजाय बेहतर यह होगा कि अच्छे-बुरे का फैसला इन छात्राओं पर ही छोड़ा जाय और इन्हें सही-गलत की पहचान करना सिखाया जाय। दुर्भाग्य से कालेज लाइफ में प्रवेश के समय ही इन लड़कियों के दिलोदिमाग में उनके पहनावे को लेकर इतनी दहशत भर दी जा रही है कि वे पलटकर पूछती हैं-’’ड्रेस कोड उनके लिए ही क्यों ? लड़के और अध्यापक भी तो फैशनेबल कपड़ों में कालेज आते हैं, उन पर यह प्रतिबंध क्यों नहीं?‘‘ यही नहीं तमाम कालेजों ने तो टाइट फिटिंग वाले सलवार सूट एवं अध्यापिकाओं को स्लीवलेस ब्लाउज पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया है। शायद यहीं कहीं लड़कियों-महिलाओं को अहसास कराया जाता है कि वे अभी भी पितृसत्तात्मक समाज में रह रही हैं। देश में सत्ता शीर्ष पर भले ही एक महिला विराजमान हो, संसद की स्पीकर एक महिला हो, सरकार के नियंत्रण की चाबी एक महिला के हाथ में हो, यहाँ तक कि उ0 प्र0 में एक महिला मुख्यमंत्री है, पर इन सबसे बेपरवाह पितृसत्तात्मक समाज अपनी मानसिकता से नहीं उबर पाता।

सवाल अभी भी अपनी जगह है। क्या जींस-टाप ईव-टीजिंग का कारण हैं ? यदि ऐसा है तो माना जाना चाहिए कि पारंपरिक परिधानों से सुसज्जित महिलाएं ज्यादा सुरक्षित हैं। पर दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। ग्रामीण अंचलों में छेड़खानी व बलात्कार की घटनाएं तो किसी पहनावे के कारण नहीं होतीं बल्कि अक्सर इनके पीछे पुरुषवादी एवं जातिवादी मानसिकता छुपी होती है। बहुचर्चित भंवरी देवी बलात्कार भला किसे नहीं याद होगा ? हाल ही में दिल्ली की एक संस्था ’साक्षी’ ने जब ऐसे प्रकरणों की तह में जाने के लिए बलात्कार के दर्ज मुकदमों के पिछले 40 वर्षों का रिकार्ड खंगाला तो पाया कि बलात्कार से शिकार हुई 70प्रतिशत महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनीं थीं।

स्पष्ट है कि मारल-पुलिसिंग के नाम पर नैतिकता का समस्त ठीकरा लड़कियों-महिलाओं के सिर पर थोप दिया जाता है। समाज उनकी मानसिकता को विचारों से नहीं कपड़ों से तौलता है। कई बार तो सुनने को भी मिलता है कि लड़कियां अपने पहनावे से ईव-टीजिंग को आमंत्रण देती हैं। मानों लड़कियां सेक्स आब्जेक्ट हों। क्या समाज के पहरुये अपनी अंतरात्मा से पूछकर बतायेंगे कि उनकी अपनी बहन-बेटियाँ जींस-टाप में होती हैं तो उनका नजरिया क्या होता है और जींस-टाप में चल रही अन्य लड़की को देखकर क्या सोचते हैं। यह नजरिया ही समाज की प्रगतिशीलता को निर्धारित करता है। जरूरत है कि समाज अपना नजरिया बदले न कि तालिबानी फरमानों द्वारा लड़कियों की चेतना को नियंत्रित करने का प्रयास करें। तभी एक स्वस्थ मानसिकता वाले स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है।
आकांक्षा

11 comments:

श्यामल सुमन said...

धीरे धीरे बदल रहा सामाजिक परिवेश।
जाग्रत महिला हो रहीं नहीं रहेगा क्लेश।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.

Anonymous said...
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Anonymous said...

ईव-टीजिंग के बहाने एक गंभीर विवेचन करती पोस्ट.वैसे भी आपकी हर पोस्ट मुद्दों को बारीकी से उठाती है.

Shyama said...

आपने बहुत सही लिख कि कालेजों में मारल पुलिसिंग की भूमिका निभाते हुए प्रबंधन ईव-टीजिंग का सारा दोष लड़कियों पर मढ़ देता है। दरअसल यह समस्या किसी एक शहर या कॉलेज की नहीं है, हर कहीं दोष लड़कियों को ही दिया जाता है. पित्रसत्तात्मक समाज अपने दोषों की तरफ नहीं देखता....एक सही विषय पर आपने बहस आरंभ की है...बधाई.

Sanjay Grover said...

अश्लीलता को लेकर एक और मजेदार तथ्य यह है कि बढ़ते-बदलते समय के साथ-साथ इसको नापने-देखने के मापदंड भी बदलते जाते हैं। 1970 में जो फिल्म या दृश्य हमें अजीब लगते थे, अब नहीं लगते। आज बाबी पर उतना विवाद नहीं हो सकता, जितना ‘चोली के पीछे’ पर होता है। आज साइकिल, स्कूटर, कार चलाती लड़कियां उतनी अजीब नहीं लगतीं, जितनी पांच-दस साल पहले लगती थीं। मिनी स्कर्ट के आ जाने के बाद साधारण स्कर्ट पर एतराज कम हो जाते हैं।

लेकिन एक अर्ज़ आंकाक्षा जी से भी करुंगा कि यह ‘‘मां-बहिन-बेटी-देवी’’ वाले चिंतन से कोई फायदा होना होता तो अब तक हो गया होता। देवताओं की भी जब नीयत खराब होती है तो वे पसंदीदा महिलाओं के पतियों का रुप धर परनारियों/ऋषि-पत्नियों से समागम कर लेते हैं (इंद्र-अहिल्या प्रसंग)।

शोभना चौरे said...

dress code se koi fark nhi pdta ldko ki vikrat mansikta par .1970 -73me jab ham school coleg jate the tab bhi ldko ki chedkhanni utni hi thi jitni kiaaj hai .ham to school me slwar kameej aur coleg me sadi phnkar jate the aur dono kndho par palla hota tha .jab tk ghar ki gli me n phuch jaye tb tk sans atki rhti thi .

Udan Tashtari said...

अभी एक दिन अखबार में यह खबर पढ़ी और तभी दिमाग में यह विचार कौंधा था कि यह कैसा समस्या का निदान? क्या मात्र जींस टॉप पर प्रतिबन्ध और मोबाइल पर प्रतिबन्ध उन लड़कों को रोक पायेगा जो महज लफ्फाजी में किसी भी लड़की को छेड़ कर जाने कौन सा सुख प्राप्त करते हैं. ऐसे बीमार युवाओं का यह उपचार है कि महिलाओं और युवतियों को प्रतिबन्धित करो. फिर तो महिलाओं का घर से निकलना ही बंद कर देना चाहिये तो सारे इस श्रेणी के अपराध रुक जायेंगे. जाने किसकी सोच का नतीजा है यह प्रतिबन्ध. होना तो यह चाहिये कि ऐसे शहोंदों को पकड़कर पीटो और वह अपराध की श्रेणी में नहीं जायेगा-देखो, फिर कौन हिम्मत जुटाता है छेड़छाड़ की.

बेहद अफसोसजनक निर्णय है. इसका पुरजोर विरोध होना चाहिये या फिर हर कालेज की चाहे वो युवकों का हो या युवतियों का, यूनिफॉर्म प्रिस्क्राइब करो. हालांकि इससे कुछ होना जाना नहीं है.

विचारणीय आलेख.

कडुवासच said...

... प्रभावशाली व प्रसंशनीय लेख है, .... छेडछाड-छींटाकशी की घटनाएँ तो होते रहती हैं इसके पीछे पहनावे को दोष देना उचित नहीं है ! ... साथ-ही-साथ यह भी अत्यंत आवश्यक है कि पहनावे में फूहडपन व अश्लीलता का समावेष न हो तो मान-मर्यादा प्रभावी हो जाती है !!!!!

डॉ .अनुराग said...

ये सब अपनी फ़्रसटेशन निकालने के तरीके है...बीमार दिमाग के ..उन्हें अहमियत ही मत दीजिये....

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World said...

एक सही विषय-वस्तु को उठाती सार्थक पोस्ट.

स्वप्न मञ्जूषा said...

एक बहुत बड़ी सार्थक और सामयिक समस्या को उठाती है आपकी यह पोस्ट.. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने ..
भारत में अब नवयुवतियों को ड्रेस-कोड का पालन करना होगा, मन व्यथित हुआ जानकार, यह कैसा दिमागी-दीवालियापन है, क्या हमारे देश के पुरुष वर्ग का चरित्र इतना शिथिल है की वह मात्र लड़कियों के कपड़ों की लम्बाई-चौड़ाई पर टिका हुआ है, जबकि पश्चिम में कपड़ों का प्रयोग महिलाएं कितना और कैसे करती हैं किसी से छुपा नहीं फिर भी यहाँ के पुरुष वर्ग का चरित्र बहुत ऊँचा है, इस ड्रेस-कोड की भर्त्सना केवल नारियों को नहीं पुरुषों को भी करना चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ और सिर्फ पुरुषों की कमजोरी दर्शाता है और कुछ नहीं, उँगलियाँ आपकी ओर हैं, हमारी ओर नहीं.....

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