Monday, June 29, 2009

आओ उतारें दिमाग के जाले..

सूरत, पालमपुर, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, छतरपुर....ये शहरों के नाम नहीं हैं। इन नामों से दर्द रिसता है आजकल। एक...दो...तीन...चार...पांच...सिलसिला जारी है. ईव टीजिंग, रेप, मर्डर... जिंदा जला देना, मारकर फेंक देना. एक ख़ौफ खत्म नहीं होता, एक का दर्द थमता नहीं कि दूसरी घटना तैयार. जिस देश में हर 27 मिनट में एक महिला रेप विक्टिम हो उस देश की स्त्रियों की सुरक्षा के बारे में आसानी से सोचा जा सकता है.

अब मुद्दे को $जरा पलटकर देखते हैं। लड़कियों का आकाश काफी बड़ा हो रहा है। लड़कियों को ढेर सारी आजादी मिल रही है. हर क्षेत्र में उनका वर्चस्व बढ़ता जा रहा है. हर परीक्षा में वे बाजी मार रही हैं. इससे बेहतर और भला क्या होगा?

एक बार फिर मामले का रुख़ पलटते हैं और देखते हैं समाज की प्रतिक्रिया - लड़कियों के साथ होने वाली घटनाओं के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं. क्योंकि
- वे बेवक्त घर के बाहर घूमती हैं.
- ऐसी नौकरियों का चुनाव करती हैं जो उनके स्त्रीत्व के खिलाफ हैं.
- उनके कपड़े, रहन-सहन, रंग-ढंग सब उनके साथ होने वाली घटनाओं के लिए जि़म्मेदार हैं.
- वे खुद अपने खिलाफ माहौल तैयार करती हैं। मसलन, कहीं वे छोटे कपड़े पहनती हैं, कहीं वे ड्राइवर के साथ रात में अकेले निकल जाती हैं। कभी वे किसी के साथ हंसकर बातें करके उसे आमंत्रित करती हैं. यानी दोष उनका ही है, उनके साथ होने वाली दुर्घटनाओं के लिए.

यह आज का सच है. स्त्रियों की आ$जादी भी, हर पल होने वाली घटनाएं भी और उन घटनाओं पर आने वाली प्रतिक्रियायें भी. आज देश के हालात वो नहीं हैं, जो दस बरस पहले, बीस बरस या पचास बरस पहले थे. आज हालात बहुत बदल चुके हैं. सामाजिक स्तर से लेकर आर्थिक स्तर तक में परिवर्तन आया है. शिक्षा के स्तर में सुधार आया है. गर्ल एजुकेशन का प्रतिशत काफी बढ़ा है. प्रति व्यक्ति आय में खासी वृद्धि हुई है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बा$जार की निगाहें हम पर लगी हुई हैं. कानूनों की स्थिति बेहतर हुई है. दहेज, संपत्ति का अधिकार, तलाक, लिव इन रिलेशनशिप जैसे कानूनों ने समाज को खुला न$जरिया दिया है जीने का, सोचने का. फिर भी...
जी हां, फिर भी क्या सचमुच न$जरिया खुला है? कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता. अगर ऐसा होता तो महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के आंकड़े लगातार बढ़ न रहे होते. रेप केसेस की बढ़ी हुई संख्या सारी प्रगतिशीलता की चुगली करने के लिए काफी है. सड़कों पर निकलने वाली हर लड़की के कटु अनुभव प्रगतिशीलता की दुशाला तार-तार करने के लिए काफी हैं. कॉलेज कैम्पस में बढ़ती अभद्रता, अश्लीलता और गुंडागर्दी को रोकने के लिए लड़कियों के कपड़ों पर पाबंदी लगाने जैसे तुगलकी फरमान सारी आधुनिकताओं की असलियत सामने लाने के लिए काफी हैं.
स्त्रियों के साथ घटने वाली इन घटनाओं के बाद के बारे में की जाने वाली चर्चाएं भी काफी दहलाने वाली होती हैं. वे भी किसी अपराध से कम नहीं होती. आमतौर पर हर घटना के बाद कहीं न कहीं से स्त्री को ही कम$जोर सिद्ध करने की कोशिश की जाने लगती है.
अरे, वो तो थी ही ऐसी. उसके साथ यही होना था. भला बताइये, ऐसे कपड़े पहनकर घूमेंगी तो क्या होगा?
देर रात तक घूमेंगी (भले ही ऑफिस के काम से) तो और क्या होगा? ऐसे न जाने कितने अभद्र किस्म के दिल को चीरकर रख देने कमेंट्स हमारे बहुत आसपास से आते हैं. यानी पढ़े-लिखे समाज से. क्या पढऩा-लिखना सिर्फ डिग्रियां हासिल करना होता है?
दिमाग के जाले साफ हो सकें ऐसी कोई किताब कभी लिखी जायेगी क्या?
कब तक कोट, पैंट, टाई पहनकर सोलहवीं शताब्दी की सोच में जीता रहेगा यह समाज. क्या सचमुच कपड़ों में, व्यवहार में अश्लीलता होती है. कब तक अपनी कुंठाओं का ठीकरा स्त्रियों के सिर फोड़ा जाता रहेगा. सारी परंपराएं, नैतिकताएं, संस्कार, धर्म-कर्म, समाज की जिम्मेदारी स्त्रियों के सर पर कब तक लादी जाती रहेंगी?
$जरा पूछिये उनसे कि रेप या ईव टीजिंग का शिकार होने वाली लड़कियों में से कितनी जीन्स वालियां होती हैं और कितनी साड़ी या सूट वालियां। मूर्खतापूर्ण तर्कों के पीछे कब तक असली सवालों को छिपाया जाता रहेगा. आखिर कब तक?
-प्रतिभा कटियार.
( २९ जून को i-next में प्रकाशित )

14 comments:

ओम आर्य said...

bahut hi sahi sawaal kiya aapane ............asali mudde ko hameshaa se hi dabaaya jata raha hai .............bahut satic

अनिल पाण्डेय said...

ye purushon ki atmkuntha ki nishani hai....stri ki azadi sahan nahi ho rahi hai......aur mera pratibha ji se nivedan hai ki wo in shahron mein Bhopal aur Jabalpur ko bhi shamil karein....ye bhi kunthit logo ke shahar hain..sharm ati hai kya in harkaton mein lipt log aaine mein apna chehra dekh pate honge...apni maa bahon ke samne kaise jate honge...

सुजाता said...

प्रतिभा जी
एक अच्छी पोस्ट के लिए बधाई!
दिमाग मे जाले हैं ये वे मान ही लें तो साफ हो ही जाएँ फिलहाल तो वे मानना नही चाहते कि दिमाग मे उनके जाले हैं क्योंकि वे साफ ही हैं , गन्दे भी नही हो सकते यह अहंकार है।
मेरे हिसाब से उनके जाले साफ करने वाली कोई किताब नही,हम अपने दिमाग साफ करते चलें और आकाश को और अधिक विस्तार देते चलें !
और यह समझ लें अच्छी तरह कि ठीकरा हमेशा स्त्रियों के सिर फोड़े जाने के पीछे की मंशाएँ क्या हैं ?

अजय कुमार झा said...

प्रतिभा जी..जहां तक मैं समझता हूँ की ये स्थिति आज अचानक नहीं बनी है..और इसलिए तात ही इसका निदान भी संभव नहीं है..मानसिकता बनते बनते बंटी है ...तो यदि आज मैं अपने पुत्र को सिखाता हूँ की उसे कल को किसकी इज्जत कैसे करनी चाहिए ..तो ही वो कल जाकर ये समझ पायेगा..हाँ आज मेरा खुद का चरित्र कैसा है ...बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है ..ये किसी भी सूरत में नहीं भुलाया जा सकता की ये जो लोग भी करते हैं..कर रहे हैं...हमारे आपके..इसी समाज के बीच किसी न किसी परिवार के बीच रह कर ही कर रहे हैं..तो इंसानियत को दुबारा से इंसानियत का पाठ padhaanaa होगा...

ghughutibasuti said...

बहुत सही लिखा है। जाले साफ़ कैसे हों जब अपने जालों पर उन्हें गर्व है। हमें खेत और स्वय को जानवर ही जब मान बैठे हैं तो हमें बाढ के भीतर रहने की ही सलाह दे देते हैं। यहाँ तो बाढ भी और बाढ व खेत बोने वाला खेत को चर जाता है!
घुघूती बासूती

शोभना चौरे said...

बहुत साल पहले अक कहानी पढ़ी थी मुझे नाम और लखिका याद न्ही आरहे है |उसमे अक दंपति को कोई संतान न्ही थी तो वो वो अपने भाई और भाभी देवर को बहुत प्यार करते है देवर भी स्याना होता है अचानक देवर कोकेंसर हो जाता है उसका बहुत इलाज होता है कीटू वो कुछ ही दीनो का मेहमान होता है तो उसकी सारी इच्छएे पूरी की जाती है उस्कीी शारीरिक इच्छा भी अक दिन के लिए भाभी पूरी कर दी जाती है किंतु उसका लालच बढ़ता है अब भाभी अपने पति से भी न्ही कह पाती और उसका केंसर भी ठीक होने लगता है |
इस कहानी को लेकर उस समय कुछ मित्र मंडली मे चर्चा हुई तो हम महीलाओ की सहानुभूति भाभी की तरफ़ थीकिंतु अक महनुभाव का कहना था की उस भाभी की ही आंतरिक इच्छा रही होगी ,आज जब जालो की बात चली तो बरबस मुझेयाद आया और पुरुषो की मानसिकतओर पंगु सोच पर हैरानी भी क्योकि उस मंडली मे उनकी पत्नी भी क्चऔरे@गमाल.कॉमथी .

Satish Saxena said...

बहुत बढ़िया लेख !

कुश said...

सात साल की बच्ची से बलात्कार.. बारह साल की बच्ची से बलात्कार.. यहाँ तक की डेढ़ साल की बच्ची से बलात्कार हुआ है? इन्होने कैसे कपडे पहने होंगे?

ये टिपण्णी मैंने इस ब्लॉग पर की थी

Sanjay Grover said...

क्या किसी ने दुनिया की किसी पत्रिका में, वेबसाइट पर, ब्लाग पर, भाषणों में, प्रवचनों में.....कभी कुछ ऐसा पढ़ा या सुना है जिसमें पुरुषों को शालीन कपड़े पहनने की सलाह दी गयी हो !

अजय झा जी की बात भी विचारणीय है। पुत्र को बचपन से ही जो ‘मर्दाना’ अहंकार मिला होता है उसमें उसकी मां और अन्य स्त्रियों की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। मगर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वे स्त्रियां भी अपने परिवार, परिवेश और समाज द्वारा किए गए अनुकूलन से संचालित होती हैं।

ज़्यादा सोचने पर कई बार लगता है कि कोई भी मुद्दा या समस्या इतने साफ या एकपक्षीय नहीं होते कि हम सांसदों की तरह भीड़ में घुसकर किसी एक के खिलाफ ‘कांय-कांय’ मचा दें।

सभी सांसद भी तो ‘कांय-कांय’ वाले नहीं होते।

अर्कजेश said...

चीजें बाहर बदल गईं हैं |जैसे की रहन-सहन, खान-पान, आवागमन और मनोरन्जन के साधनलेकिन आदमी का मन तो वही है, पुराना वाला | । इसलिये जब यह कहा जाता है कि "आज भी" तो इसका कुछ खास अर्थ नहीं है । एक बात यह भी है कि घटनाएँ अब ज्यादा उजागर हो रही हें , होतीं पहले भी थीं | जागरूकता के चलते |
और उस पर अब धार्मिक भय भी नहीं रहा यद्यपि इसकी भूमिका गलत चीजों पर नियंत्रण करने में कितनी थी यह विवादास्पद है |

बल्कि आज तो हर तरफ़ विक्रित सेक्स tv, DVD, INTERNET PAR सुलभ है, जो आदमी को और कल्पनाशील बना रहा है ।

नैतिकता के बन्धन ढीले होते जा रहे हैं । ऐसे में पुलिस का भय और महिलाओं का सक्षम होना ही ise रोक सकता है । क्योंकि ज्यादातर लोग इन्हीं वजहों से रुके हुए होते हैं ।

अब सवाल यह है कि बलात्कार को कैसे रोका जा सकता है । तो इसकी शुरुआत बचपन से ही हो जिससे अगली आने वालि पीढी कुछ बेहतर बन सके । aur tab tak ke liye kade kaanoon banaaye jaayen |

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

jaale ?
schmuch aaj hum jalo ke sansar me rah rahe hai! har or stree hi shikar ho rahi hai , kyo ? kyonki purush doshi hokar bhi pak saf hai aur stree narak ka dwar ! pahle hame jale saf karne ki shuruaat karni hogi apne ghar se, apne bachcho se aur sab se pahle khud se . tabhi ye jale khatm ho payenge .
ek sulagte swal ke liye badhai sweekar ho .

के सी said...

ये सवाल दीखते भले ही समझदारी भरे हैं पर प्रतिभा जी सच कहती हैं ये मूर्ख सवाल हैं बल्कि वे कठोर सच भी कहती हैं कि ऐसे सवालों को गढा जाता है ये मूल प्रश्नों से ध्यान हटाये जाने का एक अलग तरीका है. स्त्री देह को उपभोग की वस्तु में पूर्ण तब्दील किये जाने का अभियान जारी है इसमें संस्कारवादी सबसे आगे हैं किन्तु वे धर्म रक्षक अपने तीर पेड़ की ओट से ही चलाते हैं.

Shantanu said...

हम सोचते हैं हम खुद को बदलेंगे, हम सोचते हैं वक़्त को बदलेंगे, लेकिन बदलते वक़्त के साथ हमने ये नहीं सोचा कि हमारे साथ क्या क्या बदलाव आयेंगे, शायद आज कि नारी इसी दौर से गुज़र रही है, उसे ये समझ में आ गया है सफलता क शार्टकट है, भले ही शार्टकट वाली इस सफलता कि उम्र छोटी ही क्यूँ न हो, उससे यही चाहिए..गाँव के परदे से शहर कि मिनी मिक्रो तक..नारी खुद सब करना चाहती है.....पता नहीं आने वाले वक़्त में वो कहा तक जायेगी....बस इंतज़ार...वैसे प्रतिभा जी आपकी कही बातों से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ...फिर भी ये ज़रूर है....कि आपकी कलम से निकले शब्द....मेरा मतलब है..की बोर्ड से टाइप हुए शब्द जो भी हो एक जादू तो हैं ही....!!!!

Ankita Chauhan said...

जाले
वो कभी साफ़ नहीं हो सकते..
उन्हें आज साफ़ करो
कल कोई मकडी फिर से उन्हें बुनने लगेगी
तो काम बस जाले साफ़ करने से पूरा नहीं होगा
हमें उन मकडियों को भी खोजना होगा
और
ख़त्म करना होगा
जो इन जालो के संसार में खुद तो रहती ही हैं
हमें भी हमेशा उसमे फसायें रहती हैं...

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