Monday, July 13, 2009

जब सरकार ही करवाती हो कौमार्य परीक्षण तो कैसे कायम होगा जेन्डर बैलेंस

Govt holds virginity test for MP bride

इसे हमारे समय की विडम्बना ही कहा जाएगा कि केन्द्र सरकार एक तरफ तो जेन्डर बैलेंस पर ज़ोर दे रही है वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश सरकार पिछड़ेपन की ऐसी मिसालें कायम कर रही है कि क्या कहिए।ऊपर दिए लिंक की खबर बताती है कि भोपाल मे गत 26 जून को गरीब कन्याओं के सामूहिक विवाह के समय मंडप मे जाने से पहले सभी 151 दुल्हनों के वर्जिनिटी टेस्ट कराए गए।
इस खबर के बाद मेरी दो मूल आपत्तियाँ हैं ।सरकार का अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने क गलत तरीका और दूसरा सरकार का सामाजिक बदलाब और सामाजिक मुद्दों के प्रति दकियानूसी नज़रिया !

इस खबर मे सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात है भोपाल के डिस्ट्रिक्ट कलक्टर की । वे मानते हैं कि क्योकि यह
मामला पैसे से जुड़ा है इसलिए कुछ महिलाएँ इसका फायदा उठाती हैं।इसलिए यह सावधानी बरती गयी है।

अब इस घटना और इस स्टेट्मेंट का पोस्ट मार्टम किया जाए ज़रा कि क्या निकल कर आता है।

मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के अंतरगत सामूहिक विवाह होते हैं जिसमे शायद प्रति विवाहित जोड़ा 6.5 हज़ार रुपए दिए जाते हैं।किसी के लिए वैवाहिक जीवन की शुरुआत करने मे यह रकम कितनी बड़ी है यह समझदारों को दिखाई ही दे रहा होगा।लेकिन व्यापक रूप से देखा जाए तो सरकार की ओर से करोड़ों रुपए इस नाम पर निकलता है।कन्यादान मुख्यमंत्री कर रहे हैं तो निश्चित रूप से वर को सौंपी जाने वाली दुल्हन की गारंटी भी उन्हे ही लेनी पड़ेगी।वर्ना उनकी बदनामी होगी{ जैसा कि पिछले साल हुआ था बकौल डिस्ट्रिकट कलक्टर कि एक महिला ने विवाह मंड्प मे ही शिशु को जन्म दे दिया था।मानो नौ माह की गर्भवती विवाह करने वाले को दिखाई ही नही दी थी, खैर , उसे भी अपने आने वाले शिशु के लिए आर्थिक सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन होता तो वह यहाँ 6,500 रुपए लेने नही आती}

सो कुल मिलाकर जब सरकार बेचारी महिलाओं पर इतना उपकार कर रही है और कुछ लड़कों के सर ऐसी गरीब बेसहाराओं की ज़िम्मेदारी मढ कर अपने फर्ज़ से मुक्ति पा रही है तो उसका पूरा दायित्व बनता है कि दहेज -वहेज न सही कम से कम विर्जिनिटी की तो गारंटी ले!!

अब आय जाए कुछ महिलाओं द्वारा इसका फायदा उठाने की बात। भई , अब जब आप भूखे का पेट भरने की बेसिक ज़िम्मेदारी भी पूरी नही करेंगे तो स्त्री के आगे 6.5 हज़ार की ऐसी बड़ी रकम हथियाने की और क्या तरकीब बची रह जाती है।कोई सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, नौकरी की गारंटी, कुछ बेरोज़गारी भत्ता उन्हे न मिलता हो तो अनपढ गरीब महिला ऐसे विवाहों का ही तो फायदा उठाएगी । क्यों !! इस रकम से उसकी सात पुश्तें पल जाने वाली जो हैं !जिस देश मे स्त्री 10 - 50 रुपए मे शरीर बेचने को मजबूर हो अपना पेट भरने के लिए वहाँ जीवन मे एक बार ऐसा विवाह करके कम से कम वह चन्द दिन आर्थिक अभावों के बिना काट सकती है{निश्चित रूप से चतुर सरकार इस बात का तो खयाल रखती ही होगी कि एक ही महिला बार बार , हर साल ऐसा फायदा उठाने न पहुँच जाती हो}

पहले आप किसी को मजबूर बनाएँ और फिर उसकी मजबूरी को अपराध की संज्ञा भी दें तो फिर उस मजबूरी की , माने अपराध की सज़ा भी दें या कम से कम उसे मजबूरी के और गहरे दल दल मे धँसा दें !!

किसी गरीब कन्या के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण , शिक्षा, बेरोज़गार होने की हालत मे मासिक भत्ता या नौकरी की व्यवस्था ....जैसे हल ही कामयाब हल हो सकते हैं न कि उनका विवाह करा के उनकी ज़िम्मेदारी किसी के सर मढ देना ताकी वे जीवन भर लाचारों की तरह किसी के चूल्हे फूंकती रहे और झापड़ खाती रहें।

सरकार ही जहाँ वर्जिनिटी टेस्ट कराती हो वहाँ अशिक्षित , गरीब , आम जनता तो क्या समझदारों को भी कौमार्य के भूत से मुक्त नही किया जा सकेगा।यह पिछली सदियों मे जाने का नही इस सदी को पिछले भूतों से मुक्त करने का समय है। यह कौमार्यता के मिथों को तोड़ने का समय है या उसे मज़बूत करने का ?और यह स्थिति तब है जब कि विज्ञान ही साबित कर चुका है कि हाइमेन का भंग होना प्रथम सम्भोग से ही नही होता इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे कि साइकलिंग करना ,जिमनास्टिक्स , तैराकी जैसी शारीरिक मशक्कत वगैरह ।

सरकारी नौकरियों , ऊंचे प्रशासनिक पदों और मंत्री बनने के लिए यह शर्त अनिवार्य हो जानी चाहिए कि आपने जीवन मे समाजशास्त्र का अध्ययन किया हो और कुछ सोशल वर्क किया हो।जितना ऊंचा पद हो समाज के बीच काम करने और अध्ययन करने के अनुभव को बढा देना चाहिए। जिन लोगों की बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो कि उन्हे सामाजिक समस्याओं के निदान के लिए ऐसे भेड़- बकरी वाले हल सूझते हों उनका ऐसे पद पाना और उन पदों पर बने रहने देना हमारी बद किस्मती ही है।

24 comments:

Neeraj Rohilla said...

सुजाता,
इस विषय पर कल शायद बी बी सी अथवा कहीं और पढ़ा था और ठीक यही विचार मेरे मन में भी आये थे, लेकिन उसके बाद कहीं और पढ़ा तो पता चला कि वे कौमार्य का परीक्षण नहीं बल्कि केवल ये जांच रहे हैं कि स्त्री गर्भवती तो नहीं, और इसके पीछे उनका ये तर्क कि शादीशुदा युगल इस योजना का फायदा न उठायें| मेरा ये कहने का अर्थ सिर्फ कुछ और जानकारी देना है जो मैंने पढी थी|

व्यक्तिगत रूप से, मेरी समझ में दोनों ही प्रकार की जांच औचित्यहीन है| इस प्रकार का विचार के पीछे किसी तर्क की गुंजाइश नहीं हो सकती|

सुजाता said...

धन्यवाद नीरज !

आपने सही कहा कि इस सबके पीछे तर्क नही खोजा जा सकता , सरकार का ऐसे फूहड़ हो जाना मुझे हज़म नही हो रहा। जिन करोड़ो रुपयों को इस बेवकूफी भरे काम मे खर्च करके वाहवाही लूटने की कोशिश की जा रही है उन्ही करोड़ॉ रुपयों से उन 151 स्त्रियों का करियर और शिक्षा सम्पूर्ण हो सकती थी।वे आत्मनिर्भर हो सकती थीं।एक सही सन्देश समाज मे जाता कि आप खुद को मज़बूत बनाने की कोशिश करेंगी तो सरकार भी उसमे पूरा सहारा देगी आपको !

L.Goswami said...

आपके शीर्षक को पढ़ कर मैं पहले हंसी फिर सरकार की अज्ञानता पर दुखी हुई क्या किसी पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध ही इस तथाकथित कौमार्य के मिथक के ध्वस्त होने का कारन होता है ..अगर नीरज जी की बात सच है तब कुछ संतोष किया जा सकता है,अगर नही तब क्या एम पि सरकार में सब अनपढ़ गंवार ही हैं ..दूसरी बात क्योंकि शादी के लिए लड़कियों /लड़कों का चयन ग्राम स्तर पर होता है इसलिए अगर कोई मामला फर्जी मिले तो इसके लिए आंगन वाडी और आशा कार्यकर्त्ता को दण्डित किया जाय तो स्थितियां आराम से सुधर सकती है क्या गांव में रहने वाली महिला कार्यकर्त्ता इतना भी नही जानेगी की कौन सी महिला विवाहित है और कौन अविवाहित ..छिः...कितना वाहियात है यह सबकुछ ..अब हम प्रगतिशील कहलायेंगे. ..भारत अब अग्रसर हुआ प्रगति की रह पर.

Rachna Singh said...

Last year two pregnent woman were found and haunted by media in one such event . it was then there was heated debate on few news channels and may this is the repurcussion .

corrupt govt officials bring already married couples in the program and then they share the "booty " with them .

its again media who is trying to say its a virginity test because like neeraj i also read about this and when i read in depth on various sources i found the test was for pregnancy and not virginity

Rachna

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

हमारा मानना तो हमेशा रहा है कि कुंडली आदि के मिलान से अच्छा है कि लड़के-लड़की दोनों की मानसिक और मेडीकल जाँच होनी चाहिए।
अब इस तरह के टेस्ट????? क्या कहा जाये?

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...
This comment has been removed by the author.
स्वप्नदर्शी said...

"यह पिछली सदियों मे जाने का नही इस सदी को पिछले भूतों से मुक्त करने का समय है। यह कौमार्यता के मिथों को तोड़ने का समय है या उसे मज़बूत करने का?

sahmat.

Unknown said...

यह बात सही है कि इन लड़कियों का प्रेगनेंसी टेस्ट कि्या गया है, वर्जिनिटी टेस्ट नहीं…। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि गांवों में कई बार कम उम्र में शादी हो चुकी होती है। कहीं सरकार "बाल विवाह" करवाने के आरोप में न घिर जाये, या फ़िर कोई मक्कार अधि्कारी "फ़र्जी जोड़े" न पेश कर दे… ऐसे में सरकार को "चैनलों" द्वारा की गई फ़जीहत से बचने का यह बचकाना मार्ग ढूँढा गया है…, और चैनलों/पत्रकारों से कौन नहीं डरता। :)

ab inconvenienti said...

इस खबर का स्त्रोत क्या है? मनगढ़ंत कुछ भी? अपने सन्दर्भ की हायपरलिंक या स्केन की गई कॉपी लगायें कृपया. बिना स्त्रोत की जानकारी दिए ख़बरों का सन्दर्भ देना अफवाह फैलाने या प्रोपेगेंडा करने जैसा ही है.

मध्यप्रदेश में सरकारी योजनाओं के तहत सामूहिक विवाहों में नवविवाहित जोड़ों को कुछ कैश के साथ गृहस्थी शुरू करने का सामान जैसे बर्तन, पलंग वगैरह भी देती है. इसी के लालच में कमज़ोर परिस्थिति वाले पहले से ही शादीशुदा जोड़े भी फिर से शादी रचा लेते हैं. योजना शुरू होने के बाद ऐसे कई मामले सामने आए हैं.

और लवली कुमारी की आंगनवाडी कार्यकर्ता को दंड देने की बात हास्यास्पद है. एक आंगनवाडी की कार्यकर्ता को बहुत ही साधारण मासिक तनख्वाह पर अकेले ही आंगनवाडी की सार संभाल, आसपास की गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों का रिकॉर्ड रखना, नियमित सर्वे करना, टीकाकरण, नर्सरी, अफसरों के दौरों की तैयारी, सरकारी जागरूकता अभियानों में सक्रिय भागीदारी, ग्रामीण महिलाओं को शिक्षित करना, बाल विवाह रोकना, ग्रामीण बच्चों के पोषण की व्यवस्था, परिवार नियोजन ........ यानि एक जान हज़ार काम! उसपर यह भी पक्की और नवीनतम जानकारी रखना की गाँव का कौन युवा विवाहित है, और कौन कुंवारा? उसपर डेढ़ दो लाख ग्रामीणों पर केवल एक या दो आंगनवाडी कार्यकर्ता. अगर हर इच्छुक जोड़े को खुद के अविवाहित होने का सुबूत मांगा जाए तो कोई भी सामूहिक विवाह में नहीं आ पायेगा. अगर बिना वजह आँगनवाड़ी कार्यकर्ता जानकारी के आभाव रोडे अटकाए तो उसकी शिकायत हो जायेगी, निलंबन और बर्खास्तगी भी हो सकती है.

आपको बात समाज में सेक्स के मानदंडों पर कहनी थी, और उस बात को कहने का कोई प्रसंग नहीं मिला तो मध्य प्रदेश सरकार के बारे में मंगढ़नत और बेसरपैर की खबर ही बना दी. जबकि असली बात वही है जिसका उल्लेख नीरज रोहिल्ला और रचना सिंह ने अपने कमेन्ट में किया है.

सुजाता said...

ab inconvenienti ,
पहली ही लाइन मे आपको लिंक नही दिखा इसमे मेरा क्या दोष ! लिंक भी अंग्रेज़ी के हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार के पहले पेज का है।
खैर ,
नीरज जी के कमेंट की आखिरी लाइन से आप सहमत नही है न हों बौखलाइए नही!वैसे गरीब लड़कियों की भलाई के नाम पर सामूहिक विवाह कराना ही सबसे बड़ी फूहड़ता है उस पर से उनका गर्भ/यौन परीक्षण !!
यह स्त्री गरिमा का सवाल है उम्मीद है आप एक पति और पिता की हैसियत से इसे समझने की कोशिश करेंगे !

सुजाता said...

यहाँ खबर का पता दोबारा चेप रही हूँ

http://www.hindustantimes.com/StoryPage/StoryPage.aspx?sectionName=HomePage&id=d94b322f-b886-4b44-832f-457453dd5b2f&Headline=Govt+holds+virginity+test+for+MP+brides

शोभना चौरे said...

sujataji
ak sshakt aalekh .ldkiyo ko shikshit kar unko aatm nirbhar bana
ak achha kadm hoga .shadi ko unki samsyao ka hal mankar yojnaye ko anjam dena hi unki bhlai karna nhi hai .is me hmara bhuchrchit t.v. dharavahik balika vadhu bhi sirf shadi ko hi manak bna baitha hai .
aur grameen samaj me inka asar teji se ho rhaa hai .
apke likh ka antim bhag behd srahneey hai .
dhnywad

L.Goswami said...

@ab inconvenienti जी आंगन वाडी कार्यकर्ताओं और आशा /सहिया के बारे में आपने केवल एक पक्ष देखा, एक सच यह भी है की जहाँ उनका मानदेय कम होता है वहीँ ३-४ बच्चे रोज ४० -५० बच्चों का राशन खा जाते हैं ध्यातव्य हो की आँगन वाडी में ४० बच्चे होने पर ही उसकी मान्यता रद्द नही की जाती आप झारखण्ड आयें मैं आपको यह दिखाती हूँ की कैसे उंच स्तारिये अधिकारीयों को पैसे दे दे कर इनकी मान्यता बचाई जाती है, दण्डित तो उन सभी को किया जाना चाहिए जो इस अपराधिक कर्म में लिप्त पाए जाते हैं, पर मेरा कहना यह है की अगर रूट लेवल पर कार्य करने वालों को इनकी जिम्मेवारी सौंपी जाये तब ही इस समस्या का समाधान होगा.क्यों लाखों की आबादी में ४०-५० बच्चे भी ये कार्यकर्ता नही जुटा पते इसकी तह तक जाना जरुरी है. आंकडों का रोना रोने से कुछ नही मिलने वाला आज हर सरकारी संस्था में कर्मचारियों की कमी है पर इसके लिए हम कार्य की गुणवता पर प्रशनचिंह नही लगा सकते.सिर्फ एक गर्भपाती महिला को प्रसव के समय पर अस्पताल पहुँचने का २००-३०० रुपये मानदेय एक सहिया को मिलता है क्या इनसे इन कामों की आशा नही की जा सकती ? भले ही कुछ मानदेय के साथ.

Razi Shahab said...

achcha likha aapne

अजित वडनेरकर said...

काफी हद तक रोहिल्लाजी की बात सही है। मध्यप्रदेश में चल रही इस योजना में कई घपले सामने आए थे। पूर्व विवाहित पात्रों ने ही इसके तहत लाभ उठाने के लिए विवाह का आवेदन किया।
शायद इससे पार पाने के लिए ही यह फूहड़ तरीका खोजा गया हो...पर इसके अलावा और क्या तरीका था उनके पास?

अर्कजेश said...

बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक घटना है! सरकार ऐसी योजनायें बनाती है जिसमें उसकी ज्यादा से ज्यदा पब्लिसिटी हो और उसमें घपले की सम्भावना भी ज्यादा हो ।

महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने की दिशा मे योजनायें बनाने की अपेक्षा सरकारें उनका विवाह कराने में लगी है । वो भी साढे छह हजार रुपए । यह हास्यास्पद है ।

वजह जो भी लिकिन विवाह पूर्व, कौमार्य/गर्भ परीक्षण नारी की गरिमा के खिलाफ़ है ।

समाज में तो गर्भ परीक्षण कराकर तो शादियां नहीं की जातीं ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

कौमार्य परीक्षण सरासर गलत है। इसमें घनघोर लैंगिक भेदभाव और अन्याय निहित है। पुरुष वर्ग के लिए ऐसे किसी परीक्षण की जरूरत क्यों नहीं समझी जाती?

लेकिन यदि ‘विवाह’ के लिए चुने गये जोड़े पहले से ही शादी-शुदा पाये जाय और दुल्हन पहले से ही गर्भवती हो या माँ बन चुकी हो तो यह भी विडम्बनापूर्ण है। ऐसी गड़बड़ी को रोकने के लिए ‘गर्भ का परीक्षण’ करा लेने के अतिरिक्त क्या उपाय है यह भी सुझाव आना चाहिए था।

यह कहना कि साढ़े छः हजार का सहयोग कोई बड़ा सहयोग नहीं है उन गरीबों के जले पर नमक छिड़कना है। इस धनराशि को पाने के लिए यदि वे अपनी वैवाहिक अथवा मातृत्व की सच्चाई छिपाकर विवाह मण्डप में खड़े होने का दुस्साहस कर रहे हैं तो निश्चित रूप से यह धनराशि उनके लिए छोटी नहीं है।

सुजाता said...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said.. ऐसी गड़बड़ी को रोकने के लिए ‘गर्भ का परीक्षण’ करा लेने के अतिरिक्त क्या उपाय है यह भी सुझाव आना चाहिए था।
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सिदद्धार्थ जी ,
सरकार इतनी भोली और बेवकूफ तो नही है।सबसे पहले तो इस तरह विवाह करा के किसी बेसहारा स्त्री की ज़िम्मेदारी से सरकार का मुक्ति पा जाना ही अपने आप मे किन्ही पुरुषो और स्त्रियों के साथ धोखेबाज़ी है।सरकारें विवाह कराने के लिए नही होतीं।
इसमे कूदने की उसे ज़रूरत ही क्या है ?समाज के किसी सदस्य को संरक्षण देने के लिए कदम निहायत फूहड़ है।

दूसरी बात ,
शादी मे झूठ और धोखे की बिना पर आसानी से एक कानूनी केस बनता है जो तलाक का तो पुख्ता आधार हो ही सकता है।यह डर तथाकथित "फायदा उठाने वाली स्त्रियों" को दिया जा सकता था क्योंकि वे देहाती , ट्राइबल स्त्रियाँ शायद यह सब न जानती होंगी!

Dr. Amar Jyoti said...

कौमार्य परीक्षण बर्बर, पुरु्षवादी,सामन्ती मानसिकता के प्रतीक के अतिरिक्त कुछ भी नही है। यह वही मानसिकता है जिसके चलते लेडी डायना को भी विवाह से पहले अपना कौमार्य परीक्षण करवाना पड़ा था। और यह मानसिकता हमारे संस्कारों में इतनी गहरी पैठ चुकी है कि सुजाता जी जैसी प्रगतिकामी एवम बहादुर महिला भी यह सफ़ाई देती नज़र आती हैं कि 'विज्ञान ही यह साबित कर चुका है कि हाइमेन का भंग होना प्रथम सम्भोग से ही नहीं होता……। असली प्रश्न स्त्री की अस्मिता, उसके अपने शरीर पर उसके स्वत्वाधिकार का है। 'कौमार्य भंग'संयोग वश हुआ हो, जबरन,या स्वेच्छा से;वह स्त्री का नितान्त निजी मामला है जिसमें ताक-झांक करने का अधिका्र किसी को भी नहीं होना चाहिये। इतना प्रासंगिक और संवेदनशील प्रश्न उठाने के लिये बधाई और साधुवाद।

Sanjay Grover said...

‘चोखेर बाली’ से मेल आने से पहले ही मैंने इस पोस्ट को पढ़ लिया था।
कई बार सरकारों और समाजों की सोच और अमल तथा उन पर आए लेखकीयों/प्रतिक्रियाओं/टिप्पणियों आदि को देखकर इतनी खिन्नता होती है कि कुछ कहने-सुनने का मन ही नहीं होता। (यहां मेरा मतलब सिर्फ ब्लाग से नहीं है।)
‘‘ग़रीब लड़कियों की शादी’’ मतलब !? क्या जिनसे शादियां हुईं वे लड़के सबके सब अमीर थे !
पैसे सिर्फ लड़कियों को दिए जा रहे हैं और परीक्षण भी सिर्फ लड़कियों के हो रहे हैं तो क्या यह दहेज नहीं हुआ ? क्या सरकार पर दहेज को बढ़ावा देने का मामला नहीं बनता ? जिन सरकारों(और समाजों) की मंशा दहेज देते रहने की हो उसे खत्म करने की नहीं, उनसे तो हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि पति के मरने के बाद पत्नी के सती होने का खर्चा उठाने को भी वे खुशी-खुशी तैयार हो जाएंगीं।
‘‘भावनाओं’’ को समझिए।
और अगर यह दहेज नहीं है तो इसे ‘‘गरीब युवाओं/जोड़ों का विवाह कहा जाए ( गरीब लड़कियों का नहीं) और परीक्षण लड़का-लड़की दोनों का होना चाहिए।
और जो दहेज को लेकर हमारे ‘‘प्रगतिशील’’ समाज की असली मानसिकता को समझना है तो पिछले दिनों ‘कस्बा’ पर रवीशकुमार की दहेज पर लिखी गयी एक पोस्ट का हश्र देखिए:-
(http://naisadak.blogspot.com/2009/06/blog-post_23.html)
शायद वे (सरकारें) ये कहना चाहते हैंः-
हम तो हैं ही दाता
अपने बराबर ही देंगे तुम्हें भी
शुकर करो और प्रार्थना करो कि
हमारी दान देने की योग्यता और विनम्रता
ऐसे ही बनी रहे
और तुम्हें कभी कोई परेशानी न आए
माँगने और पाने में
(तुम माँगती रहो हम देते रहें)
(http://www.anubhuti-hindi.org/anjuman/s/sanjay_grover/hamari_kitabon_me.htm)

Sanjay Grover said...

‘चोखेर बाली’ से मेल आने से पहले ही मैंने इस पोस्ट को पढ़ लिया था।
कई बार सरकारों और समाजों की सोच और अमल तथा उन पर आए लेखकीयों/प्रतिक्रियाओं/टिप्पणियों आदि को देखकर इतनी खिन्नता होती है कि कुछ कहने-सुनने का मन ही नहीं होता। (यहां मेरा मतलब सिर्फ ब्लाग से नहीं है।)
‘‘ग़रीब लड़कियों की शादी’’ मतलब !? क्या जिनसे शादियां हुईं वे लड़के सबके सब अमीर थे !
पैसे सिर्फ लड़कियों को दिए जा रहे हैं और परीक्षण भी सिर्फ लड़कियों के हो रहे हैं तो क्या यह दहेज नहीं हुआ ? क्या सरकार पर दहेज को बढ़ावा देने का मामला नहीं बनता ? जिन सरकारों(और समाजों) की मंशा दहेज देते रहने की हो उसे खत्म करने की नहीं, उनसे तो हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि पति के मरने के बाद पत्नी के सती होने का खर्चा उठाने को भी वे खुशी-खुशी तैयार हो जाएंगीं।
‘‘भावनाओं’’ को समझिए।
और अगर यह दहेज नहीं है तो इसे ‘‘गरीब युवाओं/जोड़ों का विवाह कहा जाए ( गरीब लड़कियों का नहीं) और परीक्षण लड़का-लड़की दोनों का होना चाहिए।
और जो दहेज को लेकर हमारे ‘‘प्रगतिशील’’ समाज की असली मानसिकता को समझना है तो पिछले दिनों ‘कस्बा’ पर रवीशकुमार की दहेज पर लिखी गयी एक पोस्ट का हश्र देखिए:-
(http://naisadak.blogspot.com/2009/06/blog-post_23.html)
शायद वे (सरकारें) ये कहना चाहते हैंः-
हम तो हैं ही दाता
अपने बराबर ही देंगे तुम्हें भी
शुकर करो और प्रार्थना करो कि
हमारी दान देने की योग्यता और विनम्रता
ऐसे ही बनी रहे
और तुम्हें कभी कोई परेशानी न आए
माँगने और पाने में
(तुम माँगती रहो हम देते रहें)
(http://www.anubhuti-hindi.org/anjuman/s/sanjay_grover/hamari_kitabon_me.htm)

रंजना said...

सुजाता जी,यह बड़ी ही अच्छी बात है की आप स्त्री की गरिमा और अधिकारों के प्रति बहुत ही सजग हैं.....परन्तु आपसे एक निवेदन है की अपने दृष्टिकोण को तनिक वृहत्तर करें....किसी भी घटना तथ्य में से सनसनी निकालने वाला दृष्टिकोण अपनाने से बचें...इससे होगा यह की जब स्त्री सरोकार के गंभीर मसले पर आप बात करेंगी तो आपकी बात समस्त स्त्री जाति की बात होगी और आपकी बात का वजन बहुत बढेगा,उसे प्रत्येक मंच पर गंभीरता से लिया जायेगा.......

अब देखिये, यहाँ बात को कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया आपने......यह सही है क्या ??????
इस तरह के कार्यक्रमों की जमीनी हकीकत से आप कितनी रूबरू हुई हैं,आप ही बताएं ? मुझे लगता है यदि आप हुई होतीं तो हरगिज इस मुद्दे को यूँ घुमाकर न उछालतीं.

आर. अनुराधा said...

तीन निश्कर्ष निकलते हैं-
1) "महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने की दिशा मे योजनायें बनाने की अपेक्षा सरकारें उनका विवाह कराने में लगी है । वो भी साढे छह हजार रुपए ।"
"सबसे पहले तो इस तरह विवाह करा के किसी बेसहारा स्त्री की ज़िम्मेदारी से सरकार का मुक्ति पा जाना ही अपने आप मे किन्ही पुरुषो और स्त्रियों के साथ धोखेबाज़ी है।सरकारें विवाह कराने के लिए नही होतीं। इसमे कूदने की उसे ज़रूरत ही क्या है ?"

2) कौमार्य परीक्षण हो या किसी के गर्भवती होने की जांच, दोनों ही प्रकार की जांच औचित्यहीन है| इस प्रकार का विचार के पीछे किसी तर्क की गुंजाइश नहीं हो सकती|

3)अगर यह विवाह ही है तो इसके लिए इतनी धूम-धाम पैसे का लेन-देन (दुलहन के अलावा टेंट, सजावट आदि के लिए) किसलिए? यानी कहानी फिर वहीं आती है कि 'गरीबों' की शादी करा दी और पैसा अपनी जेब में डाला। वैसे साढ़े छह हजार होते क्या हैं, जो सरकार इस तरह बांटे और वाह-वाही लूटे। इसी धन से युवाओं को पढ़ा सके, नौकरी-पेशे के काबिल बना सके तब तो बात है।
और शादी के बाद क्या होना है- और बच्चे, जिन्हें पालने की क्षमता न उन माता-पिता को होगी न वो समझ पाएंगे कि ज्यादा हाथ का मतलब ज्यादा मुंह और पेट भी होता है।

नई पीढ़ी said...

क्या हम २१ वीं सदी में रह रहे है....नहीं..नहीं.../ ऐसा तो आदिम युग में भी नहीं होता होगा.

अनुप्रिया के रेखांकन

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