Sunday, July 19, 2009

औरत-एक वजूद!

- सीमा स्वधा

सीमा स्वधा को मैं सिर्फ इस कविता के जरिए जानती हूं। लेकिन जब औरत से जुड़ी कोई भी बात किसी भी रूप में आए तो उसे आपसे साझा किए बिना नहीं रहा जाता। अस्तु, ये कविता...

औरत
धीरे-धीरे उतरती है
मर्द की जिंदगी में
और शुमार हो जाती है
आदत की तरह.

कभी खौलती है
वजूद में/चाय की तरह
कभी बिखरती है/हर कश के साथ
धुयें की मानिंद.

बहती है कभी रंगों में
जिंदगी की सच्चाई बन
दहक-लाल-गर्म.

थरथराती है कभी/सांसों में
इच्छाओं की
ज्वार भाटा बन.

गोया
पत्नी वजूद नहीं
एक वस्तु हो/जिसे गढा हो
भले ही इश्वर ने
पर/इतना लचीलापन भी जरूरी है
कि मर्द ढाल सके
वक्त-बेवक्त/अपनी सुविधा
और कायदे के सांचे में.

8 comments:

ताहम... said...

ये नहीं कहूँगा की कविता अच्छी है,,कविता तो है ही अच्छी, परन्तु कविता के पीछे निहित उद्देश्य बहुत अच्छा है, कम से कम यह तो समझ में आना चाहिये की औरत को रहस्यमय क्यूँ बना दिया गया है,,??.. चुनांचे कविता का जो बिम्ब है वह स्त्री विवेचन है अतः शब्द प्रयोग और अभिव्यक्ति जैसे खतरनाक शब्दों का प्रयोग यहाँ वाजिब नहीं है..अच्छा सोचा है..अच्छा लिखा भी है..






मुझे पता है

स्त्री--

देह के अंधेरे में

बिस्तर की

अराजकता है ।

स्त्री पूंजी है

बीड़ी से लेकर

बिस्तर तक

विज्ञापन में फैली हुई । "dhumil"




Nishant kaushik

जितेन्द़ भगत said...

मर्द के अनुरूप स्‍त्री के ढलते जाने की प्रक्रि‍या को बेहतरीन शब्‍दों में व्‍यक्‍त कि‍या गया है। अच्‍छी कवि‍ता।

स्वप्न मञ्जूषा said...

गोया
पत्नी वजूद नहीं
एक वस्तु हो/जिसे गढा हो
भले ही इश्वर ने
पर/इतना लचीलापन भी जरूरी है
कि मर्द ढाल सके
वक्त-बेवक्त/अपनी सुविधा
और कायदे के सांचे में.

सिर्फ पत्नी ही क्यों ..
ढलना और ढलते जाना तो बस शुरू हो जाता है..
महसूस तब होता है जब खुद का वजूद खो जाता है

बहुत खूबसूरती से हमें हमारे खो जाने का अहसास करा दिया ....

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत ही सुन्दर और प्रभावी अभिव्यक्ति। पर इसी 'आदत'के बारे में दुष्यन्त कुमार ने कुछ ऐसे कहा है:-
एक आदत सी हो गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती

शोभना चौरे said...

is lchilepan ko aadmi ne apni aadt me shumar kar liya hai .ak din aisa bhi ho jaye is aadt se vo lchilapan bhi apne andar pa jaye .taumr ke sati ka asr ho jay .
sundar abhivykti.

Asha Joglekar said...

बहुत ही सटीक वर्णन औरत का और उसके मर्द के इच्छानुसार ढलते जाने का ।

सौरभ के.स्वतंत्र said...

अनुराधा जी,
सीमा स्वधा भी साहित्यकार बिरादरी से ही आती हैं. पर हैं एक छोटे से शहर से. हौसला बुलंद है. लिखती हैं-छपती हैं. पहली कहानी 'उसका सच' ने ही इन्हें सहारा समय कथा चयन २००४ में उपराष्ट्रपति के हाथो सम्मान दिलाया था. उसके बाद तक़रीबन सभी राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकओं में छपती रही/ छप भी रही हैं . हाँ, यह दीगर बात है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित लेखिका नहीं है. पर एक पहचान तो है. कोशिश जारी है..अँधेरी सुरंग से गुजरकर उजाला मिलता ही है यह जरूरी नहीं है. हमने एक ब्लॉग भी इधर बनाया है.. आप www.uskasach.blogspot.com जरूर जाएँ और और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें..

आपका ही
सौरभ के.स्वतंत्र

Incognito Thoughtless said...

Behtareen Rachna....Sadhuwad....

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