Friday, July 31, 2009

बेटियाँ

चाहते हैं बेटों को, जनम जाती हैं बेटियाँ,
बोते हैं बेटों की फसल, उग आती हैं बेटियाँ

नाम देते हैं बेटों को, नाम करती हैं बेटियाँ
आराम
देते हैं बेटों को, काम करती हैं बेटियाँ

भंवर में छोड़ देते हैं बेटे, किनारा देती हैं बेटियाँ
सलाह- राय देते हैं बेटे, सहारा देती हैं बेटियाँ

ज़िन्दगी भर करो बेटों को, अहसान मानती हैं बेटियाँ
माँ बाप की हर मजबूरी को पहचानती हैं बेटियाँ

धक्का देती है ज़िन्दगी,तो थाम लेती हैं बेटियाँ
दूर हों या पास, माँ बाप का नाम लेती हैं बेटियाँ

बोझ उठा कर भी बोझ कहलाती हैं बेटियाँ
खामोशी से दुख सारे सह जाती हैं बेटियाँ

ज़ुल्म और अन्याय ये कब तक सहेंगी बेटियाँ?
आँखों की ओट आखिर, कब तक रहेंगी बेटियाँ?

14 comments:

Vinay said...

अति सुन्दर रचना है!

सौरभ के.स्वतंत्र said...

कलम की कटारी ऐसे ही चलाइए..और उकेरते रहिये जीवन की सचाइयों को..
मैं तो इस रचना पर फ़िदा हो गया..

ghughutibasuti said...

बहुत सही लिखा है। मुझे आज तक यह बेटों की चाहत समझ में नहीं आई।
घुघूती बासूती

Science Bloggers Association said...

Jeevan ke katu satya ko uker diya aapne.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

M VERMA said...

बहुत सुन्दर्

dr amit jain said...

अगर हो इतनी परेशानी ,
तो क्यों जनती हो बेटा


,शायद यही से शुरु होता है भेदभाव

स्वप्न मञ्जूषा said...

बस हम सिर्फ इतना कहेंगे की यह कटु सत्य है और घर-घर की कहानी है, कहते है ज़माना बदल रहा है लेकिन बेटियों के प्रति बर्ताव अब तक तो नहीं बदला आगे हरि इच्छा...
समाज की एक ज्वलंत समस्या को आईना दिखाती है आपकी कविता..
बहुत ही सही और खरी बात कह दी आपने...बधाई..

Shailesh said...

बेहतरीन... पढ़ कर बहुत आनंद आया... बहुत सही कहा..

अंत की दो पंक्तिया.. ग़ज़ल मै सही नहीं बैठती..

काफिया बिगड़ गया है..

सादर
शैलेश

जितेन्द़ भगत said...

बेटि‍यों पर लि‍खी गई सुंदरतम कवि‍ता में से एक।

अनुराग अन्वेषी said...

बोये जाते हैं बेटे
और उग आती हैं बेटियां
खाद-पानी बेटों में
और लहलहाती हैं बेटियां
एवरेस्ट की ऊंचाइयों तक ठेले जाते हैं बेटे
और चढ़ आती हैं बेटियां
रुलाते हैं बेटे
और रोती हैं बेटियां
कई तरह गिरते हैं बेटे
संभाल लेती हैं बेटियां
सुख के स्वप्न दिखाते बेटे
जीवन के यथार्थ बेटियां
जीवन तो बेटों का है
और मारी जाती हैं बेटियां
- नंद किशोर हटवाल

वंदना पांडेय जी,
आपने जो कविता पोस्ट की है, उसे इस रूप में मैंने पढ़ी है काफी पहले। मेरी जानकारी के मुताबिक यह कविता नंद किशोर हटवाल की है। वैसे, मैं यह देखकर दंग हूं कि अलग-अलग जगह पर बैठे दो लोग एक जैसा कैसे सोच लेते हैं। सोचने का क्रम भी तकरीबन एक-सा ही है। सच तो यह है कि इस सोचने को संयोग कहूं या रचना की चोरी - मैं तय नहीं कर पा रहा। वैसे, मेरी जानकारी अधूरी और अधकचरी हो सकती है, इससे मैं इनकार नहीं कर रहा।

अनुराग अन्वेषी said...

मुझे मेरे ब्लॉग पर इस कविता का लिंक भी मिल गया। १० मार्च की रात यह कविता मैंने पोस्ट की थी। लिंक दे रहा हूं
http://anuraganveshi.blogspot.com/search?q=%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%AF%E0%A5%87+%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%87+%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82+%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A5%87&submit=%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%B9+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A4+%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%82+%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%82

स्वप्नदर्शी said...

I agree with अनुराग अन्वेषी. This poem seems to be very close to "Hatwaal's poem".

and indeed there are more than one version of "Hatwaals poem" itself

Unknown said...

अक्सर ऐसा होता है. चाहना कुछ होती है, मिलता कुछ है. बैसे बेटा हो या बेटी, जो समय पर साथ दे वह ही सही है.

Vandana Pandey said...

अन्वेषी जी,
मुझे नहीं याद आता कि कभी मैंने हटवाल जी की यह रचना पढी है। वैसे पढती बहुत हूं और सभी रचनाओं का याद रहना मुश्किल है। हो सकता है कि पढी हो और इसका काफ़िया मेरे अवचेतन में रह गया हो।
भाव दोनों कविताओं का एक ही है पर यह भाव कोई नया नहीं है। लगभग सभी बेटियों के मन में यह भाव कहीं न कहीं कुंडली मारे छुपा बैठा होता है, जो समय समय पर बाहर निकल आता है। मुझे, और मेरे समय की बहुत सी बेटियों को लगता है कि मांगने पर भी माता-पिता ने मुझे वे अवसर और सुविधाएं नहीं दीं जो मेरे भाइयों को बिना मांगे दे दी गईं। इसके बावज़ूद मेरे और मेरे जैसी बेटियों के मन में अपने वृद्ध माता-पिता के लिये भाइयों की अपेक्षा कहीं ज़्यादा चिंता और परवाह है।
कविता के शब्द मेरे ही हैं। पहली दो पंक्तियां हटवाल जी की कविता से काफ़ी मिलती जुलती हैं, यह संयोग ही है। मेरी कविता में शब्द कुछ और भी थे जो छोड दिये थे यह सोच कर कविता कुछ ज़्यादा बेटा-विरोधी हो गई है। सब बेटे माता पिता को नज़र अंदाज़ नहीं करते। कई बेटे मां-बाप का बहुत खयाल रखते हैं। फ़िर भी बात उठ ही गयी है तो वह पंक्तियां भी लिख रही हूं।


पुरानी सोच की बलि चुपचाप, चढ़ जाती हैं बेटियाँ
फ़िर भी मां-बाप के लिये सबसे लड़ जाती हैं बेटियाँ

सुबह से ही घर के काम-काज में जुटती हैं बेटियाँ
नाइंसाफ़ी के अंधेरों में चुपचाप घुटती हैं बेटियाँ

सभी पाठकों और प्रतिक्रिया लिखने वालों के प्रति आभारी हूँ।

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...