Wednesday, July 8, 2009

LGBT-एक अदृशय जमात के हक मे

समलैंगिकता याने गे-लेस्बियन संबंधो की शब्दावली मेरे जीवन मे पहले-पहल राही मासूम रज़ा की किताब "कटरा बी आरजू ",  निराला की "कुल्ली भट्ट", और श्री-लाल शुक्ल की "राग दरबारी " को पढने के बाद आयी थी, तकरीबन बीस बरस पहले। "कटरा बी आरजू" को पढ़कर भय और "राग-दरबारी" के "मास्साब " को लेकर दैन्य भाव एक किशोर मन मे जागा था। बाद के सालो मे "लियानार्दो दी विंची" और फ़िल्म रोल के आविष्कारक "जॉर्ज ईस्ट्मेन" और कई दूसरे ख्यातीलब्ध लोगो के गे होने का पता चला। और रोचेस्टर सिटी मे ईस्ट्मेन का घर बनाम संग्रहालय भी देखने का मौका आया. "विंची" और ईस्ट्मेन दोनों के बारे मे कुछ प्रचलित विश्वास भी है की दोनों परफेक्टनिस्ट थे, और कुछ दर्जे तक आत्म-मोहित भी, और इसीलिये औरतों के बजाय मर्द उन्हें ज्यादा आकर्षित करते थे।
बाद के बरसो मे कई लोगो को देखकर अक्सर उनके "गे-पने" को लेकर शक होता था, पर मर्यादा के चलते कभी पूछा नही। गे-लेस्बियन संबंधो और हाशिये पर फेक दी गयी सेक्सुअल अस्मिता और ३७७ का ज़िक्र "मंटो और चुगताई " की कहानियों मे पढा " पर किसी को इसका शिकार होते हुए देखने की कोई स्मृति नही है।

मेरा परिचय और दोस्ती "गे-लेस्बियन " लोगो से कोर्नेल कैम्पस मे हुयी और इन संबंधो पर खुली बहसे भी हुयी। इत्तफाकन इस दोस्ती की शुरुआत एक हिन्दुस्तानी लड़की से हुयी, जिससे हिन्दुस्तान, नारी विमर्श और राजनीती पर बात शुरू हुयी, और यकीनन उसकी तीक्ष्ण बुद्धी और सामाजिक संवेदनशीलता दोनों ने मुझे प्रभावित किया। एक भरोसे की दोस्ती के बाद उन्होंने मुझे अपने लेस्बियन होने के बारे मे बताया और एक खुले और सम्मान भरे महाल मे हमने इस पर कई बहसे की। इन बहसों मे कई चीजे मुझे पता चली। एक ये की जैसे ब्राहमण को दलित का दर्द नही दिखता, अपमान नही दिखता वैसे ही द्वीलिंगी लोगो के लिए "गे" अदृशय है। और एक गे ही दूसरे गे" को पहचान सकता है। गे-लेस्बियन कम्युनिटी मे इसे रेडार की तर्ज़ पर "गेडार" कहा जाता है। बाद के दौर मे जब कभी सड़क पर चलते हम दोनों साथ होते तो मैं लोगो को देखकर अंदाजा लगाने की कोशिश करती की कौन गे है.... और मेरी मित्र मेरे गेडार को रेटिंग देती। इस बात से ये अनुभव मुझे वाकई सिखा गया की एक ऐसे समाज मे जह्ना आप बहुसंख्यक है, या फ़िर स्वीकृत व्यवस्था का हिस्सा है, आपकी अपनी ज्ञानेंद्रिया और समझ पर भी अल्पसंख्यक अस्मिताओं को देखने के लिए परदे पड़ जाते है।
हिन्दुस्ताने गे जो मेरे मित्र बने और उनकी वजह से कई दूसरे गे लोगो से जो बातचीत हुयी. उसने मेरे सामने दो सवाल खड़े किए की क्या ये सिर्फ़ पश्चिम का अनुकरण है, और क्या मौजूदा समलैंगिक दावेदारी का कोई भारतीय कंटेक्स्ट है? तमाम लोगो की तरह मैं भी मानती थी की इसका इलाज़ सम्भव है। तीसरी दुविधा मेरे भीतर नही थी कि जानवर इसका अपवाद है, क्योंकि थोड़ी बहुत जानकारी रिसर्च की थी। आज पलटकर सोचती हूँ तो मेरा मन अपने उन मित्रो के लिए थोड़ी और इज्ज़त से भर जाता है की उन्होंने मेरे अटपटे और कुछ हद तक एक खाके मे फिट सवालों का बड़े धैर्य से ज़बाब दिया.

बहुत ज़द्दोजहद के बाद एक समझ बनी है कि एक मायने मे गे एक अदृश्य जमात है, जिसे बाकी लोग देखना नही चाहते, सुनना नही चाहते और उनका वजूद परिहास , घृणा, और शर्मिन्दगी का प्रतीक बन जाता है. LGBT ग्रुप एक साथ दो अंतर्विरोधों का सामना करता है, लगातार। एक उस इच्छा का कि उनके वजूद को सम्मान जनक जगह मिले, वों अदृशय जमात स्वीकृत हो । गे-परेड के आयोजन को इसी सन्दर्भ मे देखना होगा.

दूसरी तरफ़ परिवार और समाज और कानून की तरफ़ से द्वीलिंगी खांचे मे फिट होने का दबाव, लगातार उनके अदृशय होने की शर्ते बुनता है। कुछ हद तक इन सभी ने मिलकर hidden symbolism को बढावा दिया। इनमे से कुछ जानकारियाँ, दाहिने कान मे बाली, सतरंगी छाता, और हर शहर, कसबे मे कुछ जगहे, जहाँ लोग मिलते है। एक उदाहरण दिल्ली का कंबन पार्क है, पालिका मे। जाने कितनी बार वहाँ जाना हुया होगा मेरा पर मेरे लिए इस अदृशय जमात को देखना सम्भव नही था। इस लिहाज़ से बहुत से गे-मित्रो ने अपने-अपने symbols हर धर्म मे खोजे हुए है, अगर यह्ना लिखा जाय तो शायद बहुत लोग अपने विश्वासों को लेकर आहत हो। सो ये सवाल कुछ हद तक पाठको पर उनके लिए जो पूर्वाग्रही नही है , यही छोड़ दिया जाय। अगर कमजोर लोगो का और सताए हुए लोगो का संबल है आस्था है, तो गे-लोगो को भी यंहा संबल ढूढने का, अपने रोल मॉडल ढूँढने का हक है।

दूसरा, सवाल जिसे पहलू वाले चंद्रभूषण जी ने उठाया है वों गे आन्दोलन के आक्रामक रेडिकलिज्म के बोध के साथ जुड़ा हुआ है, और आमतौर पर समलैंगिक होना, ऊंचे तबकों के कई दूसरे शौकों- मसलन ड्रग्स, रैश ड्राइविंग और रेव पार्टीज के समकक्ष दिखना है। मेरा मानना है कि जिस तरह का दमन और दबाव इन लोगो पर है, बिना संगठित हुए और बिना आक्रमक हुए उनका काम नही चलेगा। इस आन्दोलन की ज़रूरत और दूनिया मे जनतंत्र का आज का ढांचा दोनों इसके लिए मुफीद माहौल बनाते है। तमाम दबे-कुचलों के आन्दोलन चाहे वों दलित आन्दोलन हो, नारी आन्दोलन हो, या नक्सल आन्दोलन और दूनिया भर मे फैले अराजक, आक्रमक आन्दोलन उनकी अपनी जमीन है, और अपने भटकाव भी है। गे-आन्दोलन भी इन्ही सब का शिकार होगा, आखिरकार ये विसंगति तो मानव सभ्यता की है, गे इससे कैसे बचेंगे?

कुछ पोजीटिव चीजे जो गे-परेड को लेकर एक बंद समाज मे उभरेंगी, वों है कि माता-पिता "मेल बच्चों" के योन शोषण की संभावनों के लिए शिक्षित हो जायेंगे। और शायद कुछ बच्चे इसका शिकार होने से बच जाय। कुछ स्त्रिया भी बच जाय, गे पुरुषो के साथ शादी के बंधन मे बंधने से। और शायद कुछ पुरूष भी बच जाय, जबरदस्ती और अनजाने मे हुयी शादियों से। दूसरी बात गे-विजीबिलिटी शायद कुछ हद तक दो जेंडर के दो ध्रुवो पर टिके विभाजन को ख़त्म कर दे, जैसे कौन कैसे कपडे पहने? कैसी चाल ढाल रखे, पुरूष रोये नही और स्त्रीयों के लिए रोना ही एक तरीका बचे अपनी मर्जी चलाने का. शायद मनुष्य पर थोपे गए रोज़ ब-रोज़ के ये ज़बरदस्ती के मूल्य टूट जाय, थोड़ी सी साँस लेने की जगह सबको मिले।और तीसरी बात, की शायद वों जगह हमारे समाज मे थोड़ी सी और बढ़ जाय जह्ना दो विपरीत लिंगी सहज दोस्त बन सके, सामाजिक दबाव न झेले, और अपनी लैंगिक पहचान से ऊँचे उठकर एक इंसान की तरह एक दूसरे के साथ बर्ताव कर सके। हर महिला और पुरूष को विपरीत लिंगी दोस्तों को भाई-दीदी/कजिन मे तब्दील न करना पड़े। कुछ गे-पुरूष मित्रो की मजाक मे कही बात की "यू आर सफ़र विद मी" कुछ हद तक सही भी है, की ये दोस्ती की उन संभावनाओं को जन्म देती है, जह्ना इस बात का डर नही रहता की कब कौन विपरीत लिंगी मित्र unintended/ undesired lover ya rapist की तरह अचानक से अवतरित हो जाय। इस बात का कतई ये मतलब नही है की "heterosexual " मर्द और औरते अपनी लैंगिक पहचान से ऊपर नही उठ सकते या विपरीत लिंगी दोस्तिया उनके लिए नही है। कुछ उठ जाते है, कुछ हमेशा वही डूबे रहते है।

गे लोगो पर लिखना और उनके बारे मे मेरे लिखने का मकसद भी सिर्फ़ इतना है कि कुछ पूर्वाग्रहों की बुनियाद हिल सके, और उन्हें हम एक मनुष्य की गरिमा के साथ स्वीकारे। एक documentary "khush" हिन्दुस्तानी सन्दर्भ को समझने के लिए अच्छी है, और कुछ किताबे भी जिनमे हिन्दुस्तानी समलेंगिको ने अपने अनुभव समेटे है। मेरे लिए ख़ुद जियो, औरो को उनके हिसाब से जीनो दो ही एक बेहतर अप्रोच है, और इस दूनिया मे इतनी विषमताये है, कुछ प्रकृति की और कुछ मानव की बनायी हुयी। फ़िर भी हम जाती की, लिंग की, भूगोल की, सीमाओं को तोड़ते हुए एक दूसरे की तरफ़ हाथ बढाते है। प्रेम होता है, दोस्ती होती है, मिलजुल कर काम करते है। इन्ही बहुत सी विषमताओं मे से एक गे या लेस्बियन होना भी है

12 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय के बाद पहला संतुलित आलेख हिन्दी में पढ़ रहा हूँ। स्वप्नदर्शी जी को बधाई। वास्तविकता यह है कि समलैंगिकता या तो शारीरिक बनावट की मजबूरी है या फिर सामाजिक वातावरण से उत्पन्न एक रोग। पहली स्थिति में इस मजबूरी को स्थान देना ही होगा। क्यों कि वह तो प्रकृति की देन है उस के लिए इंसानी समाज को किसी को सजा देने का क्या अधिकार है? यदि यह रोग है तो उसे चिकित्सा की आवश्यकता है। दोनों ही स्थितियों मे इसे अपराधिक मानने का कोई कारण नहीं है। उच्चन्यायालय का निर्णय सही है। इस वास्तविकता को स्वीकार करना पड़ेगा। साथ ही इस सामाजिक-प्राकृतिक विचलन को न्यूनतम बनाए रखने के लिए समाज को सजग हो कर उपाय भी करने होंगे।

चंद्रभूषण said...

स्वप्नदर्शी, आपका लेख थॉट-प्रोवोकिंग है। सहज बुद्धि की अपनी सीमाएं होती हैं। इसे बदलने में सदियां लग सकती हैं लेकिन खुद से संघर्ष करके भी मुझे लगता है कि इस चुनौती को मैं अपने दिमाग में एक सूक्ष्म माइनॉरिटी के लिए जगह बनाने, उसके प्रति संवेदनशील होने तक ही सीमित रख पाऊंगा। शॉपनहॉवर को बतौर दार्शनिक मैं पसंद नहीं करता लेकिन उसकी इस बात का कायल हूं कि दो मूल चिंताएं ही सभी जीवों की सारी वृत्तियों का मूल हैं- एक, खुद को बचाना और दो, अपनी जाति को बचाना। इवोल्यूशन का लॉजिक भी इसके अलावा और भला क्या हो सकता है। मुझे लगता है, समलैंगिकता का इन चिंताओं से मेल जरा कम ही बैठता है। मैं इसे अप्राकृतिक नहीं कहता लेकिन इसे अपेक्षाकृत कम प्राकृतिक मानते हुए इसके प्रति सहज होने का प्रयास करूंगा।

Akanksha Yadav said...

Nice Article.

अभिषेक मिश्रा said...

maine swapndarshi ji ke blog swapndarshi men isi post par 2 tippaniyan ki hain aap chahen to vahan ja sakte hain.

ravishndtv said...

वाकई बेहतर तरीके से संवाद किया गया है इस लेख में।

स्वप्नदर्शी said...

@ Chandrabhushanji
I think you got the point. This is our limit, and nothing more is required.

आर. अनुराधा said...

ऐसे संवेदनशील मसले पर स्वप्नदर्षी से ऐसे ही संतुलित लेख की उम्मीद थी। क्यों न ये विचार और व्यापक मंच से भी कहे जाएं।

डॉ .अनुराग said...

सन २००९ में आज़ादी के लगभग साथ सालो बाद जब शोषण की चैन बदल गयी है ..इसके मुहाने पर खड़े लोग बदल रहे है .. .टूटे दरकते परिवार एकालवाद की ओर बढ़ रहे है ,जीर्ण शीर्ण हो चुके समाज में अपना चरित्र खोजते व्यक्ति इधर उधर भटक रहे है .मानवीय सम्बन्ध बाजारवाद की ओर बढ़ रहे है ...अलग अलग भूखंडो की मांग करते इस राष्ट में जहाँ इसे एक रखने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है ..इस समाज में जिसके कई जटिल ढाँचे है ...जिसे केवल बहुइसंख्यक ओर अल्पसंख्यक में विभाजित नहीं किया जा सकता ...इसके कुछ नियम किन्ही जाति/धर्म के आधार पर बनाये नहीं गए है ...वे इसकी बेहतरी के लिए है ..जैसे विवाह एक ऐसी परंपरा है....हम जब समाज में रहते है तो केवल अधिकारों की बात नहीं करते उसकी जिम्मेवारी की भी बात करते है ... हैरान हूँ की हम किसी एक समूह के सेक्सुअल बिहेवियर को मान्यता दिए जाने से .हम एक निर्णय में कैसे सीधे सीधे सरोकार तलाश लेते है ...कैसे हम उसे सामजिक दस्तावेज मान लेते है ..कितनी जल्दी किसी किसी क्रांति की सुगबुगाहट भांप लेते है ......
किसी भी सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में समाज के हर तबके की भागीदारी राय इसलिए जरूरी है क्यूंकि जाने अनजाने इससे उनपे या उनकी आने वाली पीड़ी पे इससे पड़ने वाले प्रभाव की व्याख्या का महत्त्व है...कुल मिलकर इस विषय को सवेदनशीलता से हेंडल करने की जरुरत है नाकि तुंरत फुरंत किसी नतीजे पे पहंचने की ...

वैसे बतोर एक डॉ भारत में ऐड्स रोगियों की जो संख्या है उसमे पहले नंबर पे जो प्रतिशत है वो इंटर वेनस ड्रग अबुसर का है .दूसरा अगर यौनिक व्य्योव्हार की बात करे तो उसमे परसेंटेज मेन टू मेन सेक्स करने वाले का है ......

Rangnath Singh said...

really, this is the best article on this issue yet...

Sanjay Grover said...

Asantulan se bhare desh aur samaaj meN waaqai ye ek santulit lekh hai.

ज्योति सिंह said...

sabne jo kaha un baaton se main bhi sahmat hoon .uni baat ko kya kahoon .itna jaroor kahungi ki is blog pe aakar bahut si baate janne ko mili .do lekh padhi achchha laga .

अनूप भार्गव said...

एक अरसे के बाद इस ब्लौग पर आना हुआ । लेख अच्छा और संतुलित लगा ।

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