Wednesday, August 12, 2009

वन्देमातरम की स्वर लहरियाँ बिखेरतीं 6 सगी मुस्लिम बहनें

पिछले दिनों मुस्लिमों द्वारा वन्देमातरम् न गाने के दारूउलम के फतवे पर निगाह गई तो उसी के साथ ऐसे लोगों पर भी समाज में निगाह गई जो इस वन्देमातरम् को धर्म से परे देखते और सोचते हैं। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने तो ऐसे फतवों की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए यहाँ तक कह दिया कि वन्देमातरम् गीत गाने से अगर इस्लाम खतरे में पड़ सकता है तो इसका मतलब हुआ कि इस्लाम बहुत कमजोर मजहब है। प्रसिद्ध शायर अंसार कंबरी तो अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं-मस्जिद में पुजारी हो और मंदिर में नमाजी/हो किस तरह यह फेरबदल, सोच रहा हूँ। ए.आर. रहमान तक ने वन्देमातरम् गीत गाकर देश की शान में इजाफा किया है। ऐसे में स्वयं मुस्लिम बुद्धिजीवी ही ऐसे फतवे की व्यवहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ए.जेड. कलीम जायसी कहते है कि इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत का हुक्म है, मगर यह भी कहा गया है कि माँ के पैरों के नीचे जन्नत होती है। चूंकि कुरान में मातृभूमि को माँ के तुल्य कहा गया है, इसलिये हम उसकी महानता को नकार नहीं सकते और न ही उसके प्रति मोहब्बत में कमी कर सकते हैं। भारत हमारा मादरेवतन है, इसलिये हर मुसलमान को इसका पूरा सम्मान करना चाहिये।

वन्देमातरम् से एक संदर्भ याद आया। हाल ही में मेरे पति कृष्ण कुमार यादव के जीवन पर जारी पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘‘ के पद्मश्री गिरिराज किशोर द्वारा लोकार्पण अवसर पर छः सगी मुस्लिम बहनों ने वंदेमातरम्, सरफरोशी की तमन्ना जैसे राष्ट्रभक्ति गीतों का शमां बाँध दिया। कानपुर की इन छः सगी मुस्लिम बहनों ने वन्देमातरम् एवं तमाम राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा क्रान्ति की इस ज्वाला को सदैव प्रज्जवलित किये रहने की कसम उठाई है। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, बन्धुत्व एवं सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव से ओत-प्रोत ये लड़कियाँ तमाम कार्यक्रमों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। वह 1857 की 150वीं वर्षगांठ पर नानाराव पार्क में शहीदों की याद में दीप प्रज्जवलित कर वंदेमातरम् का उद्घोष हो, गणेश शंकर विद्यार्थी व अब्दुल हमीद खांन की जयंती हो, वीरांगना लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस हो, माधवराव सिन्धिया मेमोरियल अवार्ड समारोह हो या राष्ट्रीय एकता से जुड़ा अन्य कोई अनुष्ठान हो। इनके नाम नाज मदनी, मुमताज अनवरी, फिरोज अनवरी, अफरोज अनवरी, मैहरोज अनवरी व शैहरोज अनवरी हैं। इनमें से तीन बहनें- नाज मदनी, मुमताज अनवरी व फिरोज अनवरी वकालत पेशे से जुड़ी हैं। एडवोकेट पिता गजनफरी अली सैफी की ये बेटियाँ अपने इस कार्य को खुदा की इबादत के रूप में ही देखती हैं। 17 सितम्बर 2006 को कानपुर बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित हिन्दी सप्ताह समारोह में प्रथम बार वंदेमातरम का उद्घोष करने वाली इन बहनों ने 24 दिसम्बर 2006 को मानस संगम के समारोह में पं0 बद्री नारायण तिवारी की प्रेरणा से पहली बार भव्य रूप में वंदेमातरम गायन प्रस्तुत कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। मानस संगम के कार्यक्रम में जहाँ तमाम राजनेता, अधिकारीगण, न्यायाधीश, साहित्यकार, कलाकार उपस्थित होते हैं, वहीं तमाम विदेशी विद्वान भी इस गरिमामयी कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

तिरंगे कपड़ों में लिपटी ये बहनें जब ओज के साथ एक स्वर में राष्ट्रभक्ति गीतों की स्वर लहरियाँ बिखेरती हैं, तो लोग सम्मान में स्वतः अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं। श्रीप्रकाश जायसवाल, डा0 गिरिजा व्यास, रेणुका चैधरी, राजबब्बर जैसे नेताओं के अलावा इन बहनों ने राहुल गाँधी के समक्ष भी वंदेमातरम् गायन कर प्रशंसा बटोरी। 13 जनवरी 2007 को जब एक कार्यक्रम में इन बहनों ने राष्ट्रभक्ति गीतों की फिजा बिखेरी तो राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा डा0 गिरिजा व्यास ने भारत की इन बेटियों को गले लगा लिया। 25 नवम्बर 2007 को कानुपर में आयोजित राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में इन्हें ‘‘संस्कृति गौरव‘‘ सम्मान से विभूषित किया गया। 19 अक्टूबर 2008 को ‘‘सामाजिक समरसता महासंगमन‘‘ में कांग्रेस के महासचिव एवं यूथ आईकान राहुल गाँधी के समक्ष जब इन बहनों ने अपनी अनुपम प्रस्तुति दी तो वे भी इनकी प्रशंसा करने से अपने को रोक न सके। वन्देमातरम् जैसे गीत का उद्घोष कुछ लोग भले ही इस्लाम धर्म के सिद्वान्तों के विपरीत बतायें पर इन बहनों का कहना है कि हमारा उद्देश्य भारत की एकता, अखण्डता एवं सामाजिक सद्भाव की परम्परा को कायम रखने का संदेश देना है। वे बेबाकी के साथ कहती हैं कि देश को आजादी दिलाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम क्रान्तिकारियों ने एक स्वर में वंदेमातरम् का उद्घोष कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया तो हम भला इन गीतों द्वारा उस सूत्र को जोड़ने का प्रयास क्यों नहीं कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं समरसता की भावना से परिपूर्ण ये बहनें वंदेमातरम् एवं अन्य राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा लोगों को एक सूत्र में जोड़ने की जो कोशिश कर रही हैं, वह प्रशंसनीय व अतुलनीय है। क्या ऐसे मुद्दों को फतवों से जोड़ना उचित है, आप भी सोचें-विचारें !!
(चित्र में- वन्देमातरम का गान करती 6 सगी मुस्लिम अनवरी बहनें)

आकांक्षा यादव

22 comments:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

यह बात उन लोगों को सोचनी चाहिए जो कहते हैं कि मुसलमान किसी की पूजा नहीं करते फिर वे चाहे मुसलमान हों या फिर मुसलमानों के हितैषी हिन्दू। असल में इस देश में दलितों की तरह ही मुसलमानों को वोट बैंक समझा गया है। खुद मुसलमानों ने भी ऐसी नियति बना रखी है।
हमारे शहर उरई में एक मुस्लिम परिवार है जिसमें उनके सभी लड़कों के नाम रघुवीरध् रघुनाथ आदि हैं। सारे नाम राम नाम पर आधारित हैं। कोई बवाल नहीं, कोई फतवा नहीं।
धरती माता की, जन्म स्थली की पूजा करने पर कौन सा पाप? सरस्वती वंदना करने पर कौन सा पाप? बन्देमातरम गाने पर कौन सा पाप?
अब इसे कौन समझायेगा?
कहीं न कहीं हम भी इस तरह के विवाद को हवा देते हैं। भारत की लड़कियों ने वन्दे मातरम गाया तो वह इस कारण प्रशंसनीय हो गया कि उसे मुस्लिम लड़कियों ने गया? सोचिए। अगर इसे हिन्दू लड़कियों ने गाया होता तो समारोह में आये तमाम गणमान्य नागरिकों ने न तो तवज्जो दी होती औश्र न ही उसकी प्रशंसा की होती?
वन्दे मातरम गाने की प्रशंसा क्यों? मात्र मुस्लिम लड़कियों के गाने के कारण? वाह!

http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/ said...

रामायण के लिए जमात से अलग होना मंजूर- दाऊद खां
नवापारा-राजिम ! अगर जमात निंदा नहीं करती तो मैं आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता। उक्त बातें वृंदावन कुंज में रामायण पाठ के लिए नवापारा पधारे दाऊद खां ने पत्रकारों से कही। जब उनसे पूछा गया कि क्या आपके समाज ने रामायण पाठ के लिए आप पर पाबंदी नहीं लगाई? इस पर उन्होंने कहा कि समाज के लोगों ने तो बहुत विरोध किया, पर मैंने रामायण नहीं छोड़ा। साथ ही उन्होंने यहां तक कहा कि रामायण छोड़ो नहीं तो जमात से बरतरब (बर्खास्त) कर दिए जाओगे तो उन्होंने कहा कि मैं जमात में हूं कहां? जो मुझे बरतरब करोगे। फिर भी मैंने समाज वालों से कहा कि रामायण को हम छोड़ना तो चाहते हैं मगर रामायण हमको नहीं छोड़ती। इस पर उन्होंने बच्चों की शादियों के लिए सामाजिक दिक्कतें आने की भी बात बताई, लेकिन मैं इन बातों से घबराया नहीं। मैं तो यह मानता हूं जो पैदा करता है वह लड़के-लड़कियों का इंतजाम भी करता है और इसी बात को समाज को महसूस कराना चाहता था और मैंने अपनी दो बेटियों और एक बेटे की शादी करके दिखा दिया। हालांकि मेरे बच्चों की शादियों में समाज के 25 प्रतिशत लोग ही शामिल हुए थे मैं इससे भी संतुष्ट था। मैंने अपने बच्चों की शादी के दौरान उनके ससुराल वालों से यह भी कह दिया था कि मैं खाना नहीं खिला सकता भोजन कराऊंगा और मेरे बच्चों के ससुराल वालों ने इस बात को स्वीकार किया और बच्चों की शादी भी हो गई। मेरी दो बेटियां और एक बेटा है जिसमें से एक बेटी के. खान रायपुर में अपर कलेक्टर है तो दूसरी बेटी बगरू निशा सागर में एसडीएम है। लड़का अयूब खां को इन्सपेक्टर की नौकरी मिली थी और उसकी पदस्थापना भी धमतरी में ही हुई थी। लेकिन उसने यह नौकरी छोड़कर एक दुकान का संचालन कर रहा है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आपकी पत्नी ने भी कभी इसका विरोध नहीं किया? इस पर उन्होंने कहा कि न तो मेरी पत्नी को कभी कोई आपत्ति थी और न ही शादी से पहले मेरे ससुर को। शादी के पूर्व मेरे ससुर को इन सब बातों की जानकारी थी।
इसके बाद भी उन्होंने अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में दिया।
जब उनसे पूछा गया कि आप नमाज अदा करते हैं या नहीं? इस पर उन्होंने कहा कि मौलाना साहब ने भी यही बात मुझसे कही थी कि कम से कम नमाज तो पढ़ लिया करो। तब मैंने उनसे कहा कि नमाज होती है, पढ़ी नहीं जाती। मैं तो साल में सिर्फ दो बार नमाज अदा करता हूं पहला ईद में और दूसरा बकरीद में। परिवार के बच्चों ने कभी आपके इस कार्य का विरोध नहीं किया? तब उन्होंने कहा कि जब मेरी पत्नी विरोध नहीं कर पाई तो मेरे बच्चे कैसे विरोध करते। मैं अपना धर्म निभाता हूं बच्चे अपना धर्म निभाते हैं। रामायण की जिज्ञासा आपमें कैसे जागी? इस पर 1983 में शिक्षकीय कार्य से सेवानिवृत्त हुए दाऊद खां ने कहा कि मेरे गुरू शालिग्राम द्विवेदी और पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी की प्रेरणा से मेरी जिज्ञासा रामायण में जागी। उन्होंने कहा कि जब मैं एमए प्रथम वर्ष में था तब मेरे गुरू ने मुझे रामायण की एक गुटका दी और कहा कि इसे रात में पढ़ना। अगर समझ में आए तो ठीक वरना वापस कर देना। मैंने पुस्तक का जैसे ही पृष्ठ खोला उसमें सबसे पहला शब्द शंभु, प्रसाद, सुमति, हीय, हुलसी इन पांचाें शब्दों को पढ़ा। इन पांचों शब्दों में शंभु का अर्थ शंकर, प्रसाद का अर्थ प्रसाद, सुमति का अर्थ अच्छी बुद्धि या सलाह ये तो समझ में आ गया लेकिन हीय और हुलसी ये शब्द का अर्थ समझ नहीं आया और मैंने पुस्तक बंद कर रख दी। लेकिन रात भर मुझे नींद नहीं आई। मैं अपनी कल्पना में खोया रहा और सोचता रहा कि मुझे शिक्षक बनना है और मैं दो शब्दों का अर्थ नहीं खोज पा रहा हूं तो फिर शिक्षक बनकर बच्चों को क्या पढ़ाऊंगा। यह सोचकर मैं रात भर जागता रहा और फिर जब मैंने पुस्तक वापस की तो मैंने अपने गुरूजी से कहा कि मुझे सब कुछ तो समझ में आ गया लेकिन दो शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाया। गुरूजी ने लेकिन शब्द को पकड़ लिया और कहा जिसके मन में लेकिन की जिज्ञासा हो वह सब कुछ कर सकता है और वह जिज्ञासा तुममें नजर आ रही है। गुरूजी ने हीय और हुलसी की परिभाषा बताते हुए कहा हीय यानी हृदय और हुलसी का अर्थ आनंद से है। इसके बाद गुरूजी ने रामायण की तीन परीक्षाएं दिलवाई प्रथमा, मध्यमा और उत्तम। जिसमें मुझे इलाहाबाद से रामायण रत्न की डिग्री भी मिली।
डॉ. महेश परिमल

Sanjay Grover said...

vaise is post ka STRI-MUKTI se kya sambandh hai ?

आर. अनुराधा said...

??????
स्त्री मुक्ति के अलावा भी इस पोस्ट का मकसद समझ में नहीं आया। वे बहनें तो सहज ही सभी देशभक्ति के, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत गाए जा रही हैं, फिर हम उन्हें अलग करके क्यों देख रहे हैं? क्या उनका गायन विलक्षण है, या सिर्फ मुसलमान होना? क्या वे हिंदू होतीं तो इस तवज्जो के लायक नहीं होतीं? अगर मुसलमान होना उन्हें हमसे अलग करता है तो फिर इस अलगाव को जारी रखने वाले हम किस मुंह से सर्वधर्म समभाव, और, सबसे ज्यादा - देश की धर्मनिरपेक्षता के दावे कर सकते हैं?

PS: मेरे मन में एक विचार आया कि इन बहनों के सारे कार्यक्रम राजनेताओं के आस-पास ही क्यों हुए जहां इन्हें सराहा गया?

Shyama said...

लगता है वन्दे मातरम पर यहाँ भी विवाद चल रहा है....पर मेरी निगाह में लीक तोड़ कर आगे आने वाली इन लड़कियों की प्रशंसा करनी चाहिए. स्त्रियाँ फतवों के बंधन को मानने की बजाय तोड़ रही हैं, क्या इसे स्त्री-मुक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह सही है की वे बहनें तो सहज ही सभी देशभक्ति के, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत गाए जा रही हैं, फिर हम उन्हें अलग करके क्यों देख रहे हैं?...शायद इसलिए की वे बन्धनों व फतवों की परवाह नहीं करती. समाज के मठाधीशों को उनका चेहरा दिखाती हैं.
मेरे मन में एक विचार आया कि इन बहनों के सारे कार्यक्रम राजनेताओं के आस-पास ही क्यों हुए जहां इन्हें सराहा गया?.........ऐसा नहीं है मानस-संगम के कार्यक्रम में देश-विदेश के प्रख्यात साहित्यकार व रंगकर्मी जुटते हैं, जहाँ ये हर साल प्रस्तुति देती हैं. इनमें गिरिराज किशोर, अच्युतानंद मिश्र, कमेंटेटर जसदेव सिंह जैसे लोग भी शामिल होते हैं. इन लोगों ने भी इन्हें सराहा.

S R Bharti said...

हिन्दू-मुस्लिम के पलडे पर तौलने की बजाय फतवों की भीड़ में ऐसे कार्यों की सराहना की जानी चाहिए. इन युवा महिलाओं के जज्बे को सलाम !!

Unknown said...
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Unknown said...

आकांक्षा जी की हर पोस्ट दिलचस्प होती है. प्रिंट-मीडिया उनकी अधिकतर पोस्ट को तो हाथों-हाथ लेता ही है, यहाँ भी पाठक-वर्ग उनकी पोस्ट पर अपने नायब कमेंटों से अच्छा विमर्श खडा करते हैं. बधाई हो आकांक्षा जी !!

Anonymous said...

महिलाएं नित नए कदम उठा रही हैं, चाहे वह हिन्दू हों या मुस्लमान. चोखेरबाली के माध्यम से महिलाओं के ऐसे क़दमों की सराहना हो रही है, यह अच्छी बात है. धर्म के बंधनों के विपरीत वंदेमातरम गायन कर जिस तरह इन ६ सगी मुस्लिम बहनों ने राष्ट्र भक्ति का परिचय दिया है, वह काबिले-तारीफ है. आकांक्षा यादव को इस प्रस्तुति के लिए साधुवाद.

Sanjay Grover said...

मुझे मालूम था कि सवाल उठाया तो यही होगा। बात आंकाक्षाजी के कैरियर और प्रतिष्ठा वगैरह तक पहुंच गई। सवाल यह है कि मुस्लिम स्त्रियों द्वारा वंदेमातरम गाने से स्त्रियों का भला कैसे होगा !?
क्या पाकिस्तान में हिंदू स्त्रियों द्वारा पाकिस्तान का राष्ट्रगीत गाने से वहां स्त्रियों की दशा सुधर जाएगाी। जहां तक फतवे तोड़ने की बात है तो तसलीमा से ज़्यादा किसी ने यह किया होगा !? कहां है वह ? उसे भी बुलाईए न इन छः स्त्रियों के साथ। इतना छोटा स्टेज तो नहीं ही होगा कि एक ‘मुस्लिम
स्त्री’ और न खड़ी हो सके ?

Sanjay Grover said...

और क्या वंदेमातरम न गाने का यह फ़तवा सिर्फ स्त्रियों पर लागू किया गया था ? मुन्नवर राना ने इस फ़तवे का विरोध किया तो क्या वे ‘पुरुष-मुक्ति’ कर रहे हैं ?

Sanjay Grover said...

और क्या वंदेमातरम न गाने का यह फ़तवा सिर्फ स्त्रियों पर लागू किया गया था ? मुन्नवर राना ने इस फ़तवे का विरोध किया तो क्या वे ‘पुरुष-मुक्ति’ कर रहे हैं ?

स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...

Anyway, I also feel that it has nothing to do with women freedom but has shown some personal choice to recite a "Deshgeet".

गिरिजेश राव, Girijesh Rao said...

अच्छी जगह लगती है। आना पड़ेगा।

'हिन्दू लड़कियाँ और नमाज'का मुद्दा यहाँ अप्रासंगिक और भटकाव लाने वाला है। वैसा ही जैसा नववेदवार्ता,कल्कि,मैत्रेय आदि वाले मंचों पर होता है।

नमाज मुख्यत: सामूहिक उपासना होती है। यदि सार्वजनिक रूप से सामूहिक नमाज पढ़नी है तो पहले मुसलमान होना पड़ेगा। सराहना और आलोचना के प्रश्न तो गौड़ हो जाएंगे। विषय और चर्चे के जज्बे को देखें। वन्दे मातरम को बुतपरस्ती से जोड़ने के तर्क जैसी ही यह दलील है।

सुखद है कि गाड़ी हिंचकोले खाते हुए भी पटरी से उतर नहीं रही है।

वन्दे ईश्वरम vande ishwaram said...

ईश्वर हमें सद्बुधि दे, क़ुरआन के अनुसार माँ के पेर के नीचे जन्नत तो बाप जन्नत का दरवाजा होता हे, कितनी तरह की माएँ बनाओगे, कभी जानवर को कहते हो माँ कहो जबकि उसके नर को बाप नहीं कहते, चलो धरती के इस छोटे होते जा रहे टुकड़े को माँ कहेगे बाप किसे कहलवओगे?

स्वप्नदर्शी said...
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Sanjay Grover said...

तू ंिहंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया,
हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया।
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती,
हमने कहीं भारत, कहीं ईरान बनाया।।

जो तोड़ दे हर बंद वो तूफान बनेगा,
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।

ये दीन के ताज़र ये वतन बेचने वाले,
इंसान की लाशों के कफन बेचने वाले।
ये महलों में बैठे हुए क़ातिल ये लुटेरे,
कांटों के एवज रुहे-चमन बेचने वाले।।

तू इनके लिए मौत का एलान बनेगा,
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।

मुझे तो साहिर का लिखा यह गीत कहीं ज़्यादा अर्थपूर्ण लगता है। ‘‘जो तोड़ दे हर बंद वो तूफान बनेगा,’’........
किसी को घेरकर, डराकर, फुसलाकर.... उसे उसके कुंए से निकालकर अपने कुंएं में डाल लेना... हो सकता है देशभक्ति हो.....राजनीति हो......कुछ भी हो पर मानवता तो नहीं है। फिर नारी-मुक्ति तो दूर की बात है।

Dr. Brajesh Swaroop said...

बड़ी बेहतरीन पोस्ट लगाई आकांक्षा जी. आप समाज की प्रतिनिधि ऐसी बातों को चुनती हैं जो इस भीड़-भाड़ वाली दुनिया में अलग रूप में दिखती है...बधाई !!

Hari Shanker Rarhi said...

काश !समाज़ में ऐसी सोच वाले बहुसंख्यक होते .याद आया-
अन्धेरों को क्यों धिक्कारें,
अच्छा हो एक दीप जलाएं.

Asha Joglekar said...

it is special as most of the Muslims object to singing of Vande mataram by saying they only can bow before Allah as Kuran orders this. Against this these GIrls have taken a bold step showing that religion and nationality are two different things and should not be confused. Hats off to them.

वन्दे ईश्वरम vande ishwaram said...

bhaiyon mene jo ooper baap ke bare men likha woh quran men nahin balke Allah ke Sandeshta Muhammad ne kaha he..... quran men to maan aur baap par isse behtar baten hen...kaho to bataoon?

allah is khata par mujhe maaf kare.

अनुप्रिया के रेखांकन

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