Wednesday, August 5, 2009

क्या आज भी जरूरत है रक्षा करने वाले भाइयों की!?

आज रक्षा बंधन है। बहनें भाइयों को राखियां बांध रही हैं। सुबह से ही यह सिलसिला शुरू हो जाता है। इसीलिए कोई 10 बजे जब मैं निकली तो सड़कें रोज के मुकाबले काफी खाली-खाली सी थीं। एक लाल बत्ती पर मेरी नज़र बगल वाली गेहुंए रंग की एक लंबी गाड़ी पर पड़ी, जिसे एक बुजुर्ग महिला- कम से कम 70-75 साल की- चला रहीं थीं। मुझे हमेशा अच्छा लगता है ऐसे नजारे देखना कि औरत मोटर गाड़ी चलाए और पुरुष बगल में बैठे। मुझे समझ में आती है कि स्टीयरिंग व्हील पर बैठी औरत की ताकत। उसके हाथ में ताकत है- स्टीयरिंग के जरिए गाड़ी को मैनिपुलेट करने की, जाहे जहां ले जाने की, अपने काबू में रखने की! और साथ बैठे लोग हमेशा निर्भर-से लगते हैं।

तो उस दिन देखा उन बुज़ुर्ग महिला को जो लाल बत्ती पर रुकी कार के स्टीयरिंग व्हील पर थी और लगातार बातें किए जा रही थी, मुस्कुराती जा रही थी। बीच-बीच में कनखियों से बगल में नजर डाल लेतीं। ट्रैफिक और बत्ती पर उनका पूरा ध्यान था।

बगल की सीट पर उनसे भी ज्यादा बुजुर्ग बैठे थे, जिनके चेहरे पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिख रही थी। उनकी नजर सिर्फ लाल बत्ती वाले खंबे पर टिकी थी। एकाध मिनट तक मैं यह दिलचस्प दृष्य देखती रही। फिर बत्ती हरी हो गई। मैने उनकी गाड़ी को पहले जाने दिया। इसमें मेरा स्वार्थ भी था। उस सुंदर दृष्य को थोड़ी देर और देख पाने का लालच था।

पर जैसे ही गाड़ी कुछेक फुट आगे बढ़ी, उस दृष्य में कुछ और दिलचस्प चरित्र जुड़ गए। कार में पीछे वाली सीट पर, जिसे मैं अब तक देख नहीं पाई थी, दो युवक बैठे थे और वह महिला संभवतः उन्हीं से बातें कर रही थी। उन दो युवा, सक्षम पुरुषों के रहते उस महिला का खुद, पूरे आत्मविश्वास से कार चलाना!

रक्षा बंधन जरूर एक मीठा त्यौहार है, भाई-बहन के मिलने का, गिलों-शिकवों, मान-मनौवल, प्यार-मनुहार का। लेकिन सोचिए तो भला- क्या ऐसी महिलाओं को जरूरत है रक्षा करने वाले भाइयों की?

25 comments:

ghughutibasuti said...

सहमत हूँ।
घुघूती बासूती

Unknown said...

यह तब की बात है जब मैं आफिस में काम करता था. रक्षाबंधन के दूसरे दिन जब में आफिस पहुंचा तब मेरे एक सिख सहकर्मी बहुत उत्तेजित नजर आये. पूछने पर उन्होंने अपनी व्यथा व्यक्त की. उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन का त्यौहार उन्हें बहुत बुरा लगता है. कोई नारी अपनी सुरक्षा के लिए किसी पुरुष को राखी बांधे, यह नारी जाति का घोर अपमान है. नारी किसी मामले में पुरुष से कम नहीं है. उसे किसी पुरुष से सुरक्षा की जरूरत नहीं है. मैंने उनकी हाँ में हाँ मिलाई. वह थोडा शांत हुए. तभी चपरासी उन की एक चिट्ठी लेकर आया. उन्होंने वह चिट्ठी छुपाना चाही पर एक और सहकर्मी ने यह देख लिया कि उस लिफाफे पर राखी शब्द लिखा हुआ था. बाद में पता चला कि उनकी पत्नी ने अपने भाई को राखी भेजी थी जो किसी कारण से वापिस आ गई. इस लिफाफे को उन्होंने स्वयं कुरिअर किया था. बेचारे बहुत शर्मिंदा हुए.

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World said...

Nice one.

दिनेशराय द्विवेदी said...

यही तो अन्तर्विरोध है कि अभी भी बहनों को रक्षा के लिए भाइयों की जरूरत है।
यह जरूरत समाप्त होगी तब जब कोई भी भाई किसी का भक्षक न बने।
रक्षाबंधन पर शुभकामनाएँ! विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

Unknown said...

"जरूरत नहीं है" ऐसा कहना थोड़ा अजीब लगता है, दुनिया और इंसान बद से बदतर होते जा रहे हैं… ऐसे में जरूरत तो है, लेकिन "बहन पर हावी न हो जाने की" सीमा तक। ये कहना भी कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण ही होगा कि हर काम महिला कर सकती है…।
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एक काल्पनिक घटना - दहेज मांगने के झूठे केस में फ़ँसाये गये अपने भाई के समर्थन में, चार बहनों ने भाभी के घर जाकर उसे जमकर पीटा और भाई के साले को बन्धक बनाकर रख लिया, जब तक कि उसने वह केस वापस नहीं ले लिया :) :)
दूसरी काल्पनिक घटना - बिरादरी से बाहर जाकर भाई के प्रेम-विवाह से नाराज़ दो बहनों ने अपनी भाभी को जिन्दा जलाया और भाई को अपाहिज बनाया… :) :)
"महिला सशक्तीकरण" की यह चरम सीमा होगी…
कृपया इसे मजाक के तौर पर लें… :)

समयचक्र said...

रक्षाबंधन पर शुभकामनाएँ..

Sanjay Grover said...

सुरेश चंद गुप्ता जी की बात समझ नहीं आयी। राखी उनकी पत्नी ने अपने भाई को भेजी थी। विपरीत विचार पति (सिख सहकर्मी) के थे। अब वे ज़बरदस्ती अपने विचार पत्नी पर लागू करें, कर पाएं, ज़रुरी तो नहीं। (अगर मैं बात को ठीक से समझ पाया हूं तो।)

जितेन्द़ भगत said...

बहुत अच्‍छा चि‍त्रण कि‍या। ऐसे वि‍वरणों से मन खुश तो होता ही है।

Unknown said...

AJAB-GAJAB

Unknown said...

AJAB-GAJAB

Sonalika said...

आपका प्रश्‍न उचित है लेकिन मुझे लगता है राखी का सम्‍बंध सिर्फ रक्षा करने तक ही सीमित नहीं है। यह भाई बहन के रिश्‍ते को अटूट बनाता है हालांकि दो बहने एक दूसरे को बिना राखी बांधे ही ज्‍यादा करीब होती हैं। वैसे दुनिवाई कामों को करने में सक्षम महिला को एक मानसिक सुरक्षा की जरुरत भी होती है तो विभिन्‍न रिश्‍तों के माध्‍यम से उसे मिलते हैं कभी पिता के रूप में तो कभी भाई के रूप में तो कभी पति के रूप में। हम अपनी ताकत के मद में इतने भी चूर न हो जाएं कि रिश्‍तों की मिठास भूल जाएं। यूं भी इस मतलबी दुनिया में कुछ रिश्‍ते ही है जो जीने की प्रेरणा देते रहते हैं।

प्रकाश गोविंद said...

jo mai kahana chaahta tha wo Sonalika ji ne bahut sundarata se pahale hi kah diya.

aabhaar

आर. अनुराधा said...

प्रकाश गोविंद और सोनालिका,
कृपया अंतिम पैरा को फिर से पूरा पढ़ें-- "रक्षा बंधन जरूर एक मीठा त्यौहार है, भाई-बहन के मिलने का, गिलों-शिकवों, मान-मनौवल, प्यार-मनुहार का। लेकिन सोचिए तो भला- क्या ऐसी महिलाओं को जरूरत है रक्षा करने वाले भाइयों की? "

यह 'मानसिक सुरक्षा' हर एक को चाहिए, पुरुष को भी। और सिर्प पुरुष ही वह मानसिक सुरक्षा दे सकते हैं ऐसा नहीं है। इसलिए मेरा कहना सिर्फ यह है कि "भाई द्वारा बहन की सुरक्षा" पर जो खास तवज्जो दी जाती है उससे अलग भी सोचा जाना चाहिए। लेकिन मैंने यह नहीं कहा है कि भाई की जरूरत नहीं है। मेरा मतलब सिर्फ इस physical protection के concept से है जिसकी जरूरत ऐसे मौकों पर कतई नहीं है। और औरतों को भाई, पिता, पति की तथाकथित सुरक्षा की इस बैसाखी की आदत भी छोड़नी चाहिए।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

@मुझे हमेशा अच्छा लगता है ऐसे नजारे देखना कि औरत मोटर गाड़ी चलाए और पुरुष बगल में बैठे। मुझे समझ में आती है कि स्टीयरिंग व्हील पर बैठी औरत की ताकत। उसके हाथ में ताकत है- स्टीयरिंग के जरिए गाड़ी को मैनिपुलेट करने की, जाहे जहां ले जाने की, अपने काबू में रखने की! और साथ बैठे लोग हमेशा निर्भर-से लगते हैं।

अनुराधा जी, मैं आपकी निर्भीक और साहसी लेखनी का हमेशा कायल रहा हूँ। लेकिन आपने ऊपर जो बात कही है उससे कुछ असहमत होने का मन कर रहा है, इसलिए नहीं कि बात गलत है बल्कि इसलिए कि इससे वही दृष्टिकोण पोषित हुआ जान पड़ता है जिसका चोखेर बाली विरोध करती है। एक नारी के रूप में आपको यह अच्छा लगता है कि नारी गाड़ी चलाए और बगल में बैठा पुरुष ‘निर्भर सा’ लगे। फिर तो आपभी वही कर रही हैं जो करने के लिए पुरुष पर तमाम आरोप लगते हैं। गाड़ी चलाना अच्छी बात है, यह कौशल सबके भीतर होना चाहिए। पुरुष की अपेक्षा नारियाँ कम गाड़ी चलाती हैं जो अनुपात बढ़ना चाहिए। लेकिन जो नहीं चला पाते वे एक ड्राइवर रख लेते हैं। ड्राइवर अपनी अन्य जरूरतों के लिए मालिक पर निर्भर हो जाता है।

आपके इस दृष्टान्त से तो यही लगता है कि गाड़ी चला रहे पति के बगल में बैठकर पत्नी एक प्रकार से ‘निर्भर रहने की कुंठा’ से ग्रस्त हो जाती होगी। मुझे नहीं लगता कि ऐसी संकुचित बात पति-पत्नी के मन में पैदा होनी चाहिए। मनुष्य का सामाजिक जीवन विभिन्न प्रकार के रिश्तो को साथ लेकर चलता है। इन रिश्तों का आधार पारस्परिक सहयोग और समर्थन का होता है, लेन-देन का होता है। यदि सभी अपने आप को असंपृक्त, आत्मकेन्द्रित सम्पूर्ण इकाई के रूप में मान लें तो रिश्ते बेमानी हो जाएंगे। सभी एक दूसरे से अलग-थलग पड़ जाएंगे। मेरा वोट तो उनके साथ है जो आपस में भावनात्मक लेन-देन के मजबूत रिश्तों से बँधे रहना चाहते हों, कुछ देना और कुछ पाना चाहते हों।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा said...

सिद्धार्थ जी से पूरी तरह सहमत हूं। मुझे जब भी बहन के साथ जाने का मौका मिलता है तो वही गाड़ी चलाती है। अच्छा लगता है दोनों को। बिना किसी कुंठा के।

Unknown said...

लगता है मैंने कुछ ज्यादा ही "सन्तुलित" टिप्पणी दी है, अब तक कोई मेरा विरोध करने क्यों नहीं आया? :) :)
(इसे भी एक हल्के-फ़ुल्के मजाक के तौर पर लें)

Ashok Kumar pandey said...

सुरेश जी आप इतन मूर्खतापूर्ण और पूर्वाग्रह ग्रस्त बात करते हैं कि वह अपनेआप में लाज़वाब है।

मुझे लगता है कि अब ज़रूरत रिश्तों केलोकतांत्रिकरण की है।

रक्षा वाले कन्सेप्ट में ही स्त्री के कमज़ोर और कमतर हो्ने का एहसास है।

Unknown said...

अशोक पाण्डेय जी, सुरेश नाम से कन्फ़्यूज़न हो रहा है, आखिर आप किस सुरेश को मूर्ख और पूर्वाग्रही कह रहे हैं… पहले स्पष्ट करें, फ़िर जवाब देने के बारे में सोचा जायेगा… :) :)

कुश said...

पहले ही रिश्तो की गर्माहट कम होती जा रही है.. ऐसे में राखी बंधवाने को जरुरत कहना ठीक नहीं लगता.. जरुरत तो मुझे भी नहीं है कि सड़क पार करते वक़्त पापा अब भी मेरा हाथ पकडे.. पर उनका हाथ पकड़ना प्रेम का एहसास कराना है.. राखी इस जस्ट अ एक्स्प्रेसन ऑफ़ फीलिंग्स..

श्रुति अग्रवाल said...

अनुराधा आपकी बातों और तथ्यों से पूरी तरह सहमत हूँ....लेकिन यहाँ परदेस में अपनों की कमी खासी अखरती है। मैं भी मानती हूँ राखी प्यार का त्यौहार है सिर्फ सुरक्षा को तवज्जों देना बिलकुल गलत है।

Ashok Kumar pandey said...

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दोनों बांधे एक दूसरे को राखी?

और सुरेश जीआप कन्फ़्यूज ना हों…हम आपसे ही मुखातिब थे।

Unknown said...

सुबह कुछ जल्दी में था, बात पूरी नहीं कर पाया. बहुत दुःख होता है आज के समाज की स्थिति देख कर. जिस समाज में बहन भाई के साथ सुरक्षित न हो, वहां राखी बाँधने का क्या मतलब रह जाता है? जिस समाज में बेटी पिता के साथ सुरक्षित न हो उस समाज का क्या अर्थ है? आज भारतीय समाज एक बहुत ही कठिन दौर से गुजर रहा है. भारतीय समाज के सब अंग, आज अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार समाज पर चोट कर रहे हैं, कोई उसे बचाने की कोशिश नहीं कर रहा. जिस रास्ते पर भारतीय समाज आज चल रहा है उस पर तो उसका अस्तित्व ही मिट जाएगा.

आर. अनुराधा said...

सिद्धार्थ जी, गगन जी,
एक सीधी सी बात में कुंठा कहां से आ गई भइ? आपके ही विचारों को आगे बढ़ाऊं तो इतने समय से महिला बगल में बैठ कर कुंठित होती रही, ऐसा आप समझते हैं, पर तब आपको उसकी कुंठा नहीं समझ में आई, लेकिन जब पुरुष को उस जगह बिठाया गया तो वह आपको कुंठित लगने लगा?! खैर।

एक छोटा सा फौरी सर्वे कर लीजिए। खुद सड़क पर चलते या गाड़ी चलाते वक्त नहीं, क्योंकि उस समय पूरे सीन को एक झलक देख कर नहीं समझा जा सकता। अपने घर के आस-पास देखिए- कितने वाहन मालिक हैं, उनमें से कितनी महिलाएं हैं। और जिन घरों में पुरुष वाहन मालिक हैं/ भी हैं, उनमें कितनी महिलाएं वाहन चलाती दिखती हैं और पुरुषों के मुकाबले कितनी बार? या फिर अपने परिचित सर्कल में महिलाओं से यातायात पर चर्चा कीजिए। उनकी, घर में वाहन होते हुए भी ज्यादातर पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर होने का कारण समझने की कोशिश कीजिए। बात पानी की तरह साफ हो जाएगी कि आम तौर पर सुविधा होने के बावजूद महिलाओं को कथित सुरक्षा के नाम पर वाहन चलाने/ सीखने से हतोत्साहित ही किया जाता है।

Unknown said...

इस लेख पर टिप्पणी कर्ने मे़ मुझे बहुत खराब लग रहा है २ कारणो़ से -
राखी के इस पावन पर्व को एक वेहद उथले तर्क से बेमानी बताया जा रहा है.

आज आपने कार चलाती बुजुर्ग महिला को देखा और लगा अब महिलाओ़ को पुरुश से किसी तरह की मदद नही चाहिये. मेरा विनम्र निवेदन है कि किन्ही उदाहरणो़ से समूची तस्वीर के बारे मे़ गलत धारणाये मत बनाइये.

राखी से सिर्फ़ बहिन की रक्षा ही नही जुडी है बल्कि बचपन की यादे़, अनुराग, सद्कामनये और प्रार्थनाये़ भी जुदी हुइ है़.

Arshia Ali said...

सामयिक प्रश्न.
{ Treasurer-T & S }

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