Saturday, August 8, 2009

लिंग समता के मायने

सृष्टि के आरम्भ से ही नर व नारी एक दूसरे के पूरक रहे हैं। यह बात इस तथ्य से बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि यदि नर व नारी दोनों में से कोई भी एक न हुआ होता तो सृष्टि की रचना ही सम्भव न थी। कुछेक अपवादों को छोड़कर विश्व में लगभग हर प्रकार के जीव-जन्तुओं में दोनों रूप नर-मादा विद्यमान हैं. समाज में यह किवदन्ती प्रचलित है कि भगवान भी अर्द्धनारीश्वर हैं अर्थात उनका आधा हिस्सा नर का है और दूसरा नारी का। यह एक तथ्य है कि पुरूष व नारी के बिना सृष्टि का अस्तित्व सम्भव नहीं, दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं किन्तु इसके बावजूद भी पुरूष व नारी के बीच समाज विभिन्न रूपों में भेद-भाव करता है। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप “लिंग समता” अवधारणा का उद्भव हुआ अर्थात “लिंग के आधार पर भेदभाव या असमानता का अभाव”।

जैविक आधार पर देखें तो स्त्री-पुरूष की संरचना समान नहीं है। उनकी शारीरिक-मानसिक शक्ति में असमानता है तो बोलने के तरीके में भी । इन सब के चलते इन दोनों में और भी कई भेद दृष्टिगत होते हैं। इसी आधार पर कुछ विचारकों का मानना है कि -“स्त्री-पुरूष असमता का कारण सर्वथा जैविक है।” अरस्तू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि - “स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव के कारण स्त्रियाँ हैं” तो संत थॉमस ने स्त्रियों को “अपूर्ण पुरूष” की संज्ञा दी। पर जैविक आधार मात्र को स्वीकार करके हम स्त्री के गरिमामय व्यक्तित्व की अवहेलना कर रहे हैं। प्रकृति द्वारा स्त्री-पुरूष की शारीरिक संरचना में भिन्नता का कारण इस सृष्टि को कायम रखना था । अतः शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि से सबको समान बनाना कोरी कल्पना मात्र है। अगर हम स्त्रियों को इस पैमाने पर देखते हैं तो इस तथ्य की अवहेलना करना भी उचित नहीं होगा कि हर पुरूष भी शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि के आधार पर समान नहीं होता। अतः इस सच्चाई को स्वीकार करके चलना पडे़गा कि जैविक दृष्टि से इस जगत में भेद व्याप्त है और इस अर्थ में लिंग भेद समाप्त नहीं किया जा सकता।

इसमें कोई शक नहीं कि लिंग-समता को बौद्धिक स्तर पर कोई भी खण्डित नहीं कर सकता। नर-नारी सृष्टि रूपी परिवार के दो पहिये हैं। तमाम देशों ने संविधान के माध्यम से इसे आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है पर जरूरत है कि नारी अपने हकों हेतु स्वयं आगे आये। मात्र नारी आन्दोलनों द्वारा पुरुषों के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण व्यक्त करने से कुछ नहीं होगा। पुरूषों को भी यह धारणा त्यागनी होगी कि नारी को बराबरी का अधिकार दे दिया गया तो हमारा वर्चस्व समाप्त हो जायेगा। उन्हें यह समझना होगा कि यदि नारियाँ बराबर की भागीदार बनीं तो उन पर पड़ने वाले तमाम अतिरिक्त बोझ समाप्त हो जायेंगे और वे तनावमुक्त होकर जी सकेंगे। यह नर-नारी समता का एक सुसंगत एवं आदर्श रूप होगा ।
कृष्ण कुमार यादव

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

सृष्टि के आरम्भ से ही नर व नारी एक दूसरे के पूरक रहे हैं।

इस वाक्य पर आपत्ति है। आज विज्ञान का युग है। और प्राथमिक जीवों में लिंग भेद नहीं है। मनुष्य तो बहुत बाद में अस्तित्व में आया है। लेकिन जब लिंग भेद के कारण जैविक विकास अवरुद्ध होने लगा तो जीव लिंग भेद आया। लिंग भेद में भी प्राथमिक जीव उभय लिंगी थे। बाद में लिंग पृथक हो गए। भिन्न भिन्न वातावरण मे अनुकूलन के द्वारा अपनी शारीरिक क्षमताओं को विकसित किए प्राणी आपस में मिल कर यह सब अपनी संतानों को और अधिक सक्षम बना सकते थे। इस कारण लिंग व्यवस्था जैविक विकास के एक विकसित चरण में उत्पन्न हुई। लेकिन इस व्यवस्था में लिंग के कारण सामाजिक भेद गलत हैं। हालांकि वे भी समाज विकास के एक स्तर पर प्रकट हुए हैं और उन का समाप्त होना अवश्यंभावी है। इस लिए हमें आगे की और देखते हुए विकास की अगली मंजिल के लिए प्रयास करने चाहिए न कि पीछे लौटने या यथास्थिति बनाए रखने के।

Ashok Kumar pandey said...

दिनेश जी से सहमत हूं।
असल में यह जो बाकी क्षमताओं के भेद हैं वे भी सामाजिक व्यस्थाओं से ही पैदा हुए हैं।
आज जेन्डर समानता का अर्थ होना चाहिये चयन तथा अन्य चीज़ों के स्तर पर विभेदों की पूर्ण समाप्ति।

Rachna Singh said...

सृष्टि के आरम्भ से ही नर व नारी एक दूसरे के पूरक रहे हैं।

I have in all my posts on naari blog have objected to this because only husband and wife can fall in this category but
man - woman are 2 individual identites and they are equal in all respects .

स्वप्नदर्शी said...

I think we should not mix up the biological differences and the gender bias that exist in human society. The biological difference is not the basis of inequality, otherwise it should reflect in the other species as well, but in general the female in many species are more aggressive and capable and also dominate in many instances.

Also, human beings have found purpose other than reproduction in their life and its not the sole purpose. Scientifically it is possible for women to reproduce without male and in future may be neither is required. a small fraction of human cells can reproduce organs and even complete human being in lab.
I also agree with rachna that in social setting men and women are complete individual and not the halves of each other.

Arvind Mishra said...

Interesting Discussion !

Asha Joglekar said...

Nar naree ek doosare ke poorak hai yahee sahee hai kum se kum biologically ek ke bina doosara apoorn hai iseeliye stree ko apoorn purush kahana galat hai.

They have individual identities that are complimentary to each other and deserve equal respect and rights.

hem pandey said...

'मात्र नारी आन्दोलनों द्वारा पुरुषों के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण व्यक्त करने से कुछ नहीं होगा। पुरूषों को भी यह धारणा त्यागनी होगी कि नारी को बराबरी का अधिकार दे दिया गया तो हमारा वर्चस्व समाप्त हो जायेगा। उन्हें यह समझना होगा कि यदि नारियाँ बराबर की भागीदार बनीं तो उन पर पड़ने वाले तमाम अतिरिक्त बोझ समाप्त हो जायेंगे और वे तनावमुक्त होकर जी सकेंगे। यह नर-नारी समता का एक सुसंगत एवं आदर्श रूप होगा ।'

- सही निष्कर्ष.

आर. अनुराधा said...

जैविक अंतर के बहाने जेंडर बायस की थ्योरी हमेशा आगे बढ़ाई जाती रही है। और इसके सपोर्ट में कई तरह के तर्क लाए जा सकते हैं। पर दोनों में फर्क करके देखना होगा। स्वप्नदर्शी की बात से सहमत हूं। इंसान ने पुनरुत्पादन के कई और तरीके ढूंढ लिए हैं और पुनरुत्पादन के अलावा भी कई भूमिकाएं अपने लिए खोज ली हैं। ऐसे में स्त्री-पुरुष के पूरक होने का सिद्धांत कई जगह कमजोर साबित होता है। वैसे, मुझे लगता प्रकृति में किसी-न-किसी को कमजोर और बलवान होना ही पड़ता है। यह किस-किस मामले में हो, यह अलग बात है। तभी तो सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट की थ्योरी काम कर पाएगी।

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World said...

Yatharth ke dharatal par likhi gai ek nayab post.

Unknown said...

There is on spiritual & one psychological angle to it.
The psychological angle is that the woman was always more competible sexually than a man. Since the woman has to bear much bigger pains during child bearing; she has been equally well compensated by nature in the matters of pleasure. Man since ages have feared this & as a reation behaves in his outward life with whatever we call as 'Male Ego'.
The Spiritual angle is there are not two but 'one'. The only cause of misery is separation. The more sseparate you feel the more audacious your behaviour. on the contrary the more inclusive & boundryless you feel more sober is your behaviour.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...