Tuesday, August 11, 2009

क्षमता

शोभना चौरे जी ने यह कविता चोखेरबाली के लिए भेजी है। आप पढें व टिप्पणी दें !


वो जन्म से ही
मेरे साथ थी
जन्मते ही रोई
तो कहने लगे
गजब की है?
इसके रोने की क्षमता |

माँ की गोदी से
बाहर आ जाती
ऐसी थी मेरे हाथ पैर
मारने की
अपूर्व क्षमता |

घंटो दूध न मिलने पर
माँ के काम में कभी
बाधक न बनी
मेरी भूखे रहने की
अपूर्व क्षमता |

नन्हा भाई आया
तो पिता के भेदभाव
पूर्ण व्यवहार से
कभी आहत नही हुई
मेरे प्यार करने की
अपूर्व क्षमता|

मेरे सांवलेपन को
कभी भी हरा न कर पाई
मेरे गुणवान होने की
अपूर्व क्षमता

ससुराल में फिरकनी
कि तरह
धूमकर काम करते हुए भी
तानो कि बौछार से नही हारी
मुस्कुराने कि मेरी
अपूर्व क्षमता |

कहने को एक रथ के
दो पहिये है हम
पर रथ को अकेले ही
खीच लेने की
अपूर्व है मेरी क्षमता |

पति को न जाने कौनसे ?
गम में शराब पीने कि
लत हो गई
पर मुझमे है , हर गम
को पीने कि
अपूर्व क्षमता |

पिता ने नाम दिया
पति ने भी नाम ही दिया
पर इस नाम को
सार्थक करने की है
मेरी ही अपूर्व क्षमता |









14 comments:

निर्मला कपिला said...

पर मुझमे है , हर गम
को पीने कि
अपूर्व क्षमता |
पर मुझ मे इतनी सुन्दर कविता के लिये कम्मेन्त देने की क्षमता नहीं है लाजवाब बधाई

रचना त्रिपाठी said...

शोभना चौरे जी को बहुत-बहुत धन्यवाद।
इस कविता को पढ़ने के वाद हर नारी को अपने उपर गर्व होगा।

Arshia Ali said...

शानदार छमता.
{ Treasurer-T & S }

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

BADHAI nahin kahen is par......kahen
SACHCHI BAAT JO LAGBHAG HAR PARIWAR MEN DIKHTI HAI.

स्वप्न मञ्जूषा said...

shobhna ji,

aap mein likhne ki bhi apoorv kchamta hai..
ye kavita nahi har naari ki khahani hai aur abhimaan dilati hai aapki yah kavita.. bahut bahut dhnyawaad is ahsaas ko yaad dilaane ke liye..
aabhar.

Ashok Kumar pandey said...

बेहद गहरा तंज़

मज़बूरियां कब क्षमता बन जाती हैं पता ही नहीं चलता…

सुजाता said...

कविता मे जो कटाक्ष है वही कविता का केन्द्रीय बिन्दु है।अपनी क्षमता पर गर्व किसी को भी होना तो चाहिए लेकिन इस मजबूरी से जन्मी क्षमता के महिमामंडन से बचना भी बहुत ज़रूरी है !

Girish Billore Mukul said...

adbhut
swagtey

स्वप्नदर्शी said...

कविता अच्छी है, पर ये सूरत बदलनी चाहिए!!
जितनी ज़ल्दी और जितनी ज्यादा जगह हो सके!
और इसका ग्लोरीफिकेशन तो नही ही होना चाहिए।

Vandana Pandey said...

सुजाता और स्वप्नदर्शी से सहमत हूँ। इस क्षमता का प्रयोग इन अन्यायपूर्ण परिस्थितियों को बदलने के लिये होना चाहिये। सहनशीलता एक सीमा तक ठीक है। उसके बाद अन्याय को प्रश्रय देने वाली बन जाती है। स्त्री की सहनशीलता का गुणगान करके सदियों उसे दबाया गया है। सोचने की बात है कि अपने कंधे पर बैठा कर अपने अपाहिज पति को वेश्या के घर ले जाने वाली बेहुला को महासती की पदवी से क्यों नवाज़ा गया। उसकी अपूर्व सहनशीलता के कारण ही न?

Vipin Behari Goyal said...

बहरहाल इस छमता को नमन

k.r. billore said...

shobhnaji,,yahi to vanita-vishwa ki sarthkta ko bayaan karta hai ,,,aapki rachna sunder hai,,,badhaiyaa,,,kamna mumbai,,,

आलीन said...

अच्छी कविता है. सच्चाई बखानती है. पर अब सहने की इस क्षमता को महिमामंडित करने की बजाय इससे विद्रोह का स्वर उठना चाहिए. कविता में भी, निजी जीवन में भी.
नीला

Unknown said...

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