Thursday, August 13, 2009

सूअर फ्लू के बहाने : मारक दवा?

मुझे अक्सर घर से फ़ोन आते है, स्वाइन फ्लू से बचने के लिए, उससे ये अहसास होता है कि भय या तो बहुत ब्यापक है या फ़िर मीडीया के ज़रिये अतिरंजना करके फैलाया गया.
"स्वाइन फ्लू" सर्दी जुकाम वाले वायरस "influenza वायरस" का ही एक नया strain H1N1 है, और इसके symptoms भी काफी कुछ सर्दी जुखाम वाले ही है। पहले ये अनुमान था कि ये स्ट्रेन सूअर से मनुष्य मे संकर्मित हुआ है, और इसी के चलते ये नाम पडा। ये स्ट्रेन दो या तीन तरह के अलग-अलग वायरस से मिलकर बना है। कुछ उसी तरह जैसे दो साल पहले बर्ड -फ्लू वाला स्ट्रेन आया था। ये कोई अभी की घटना नही है। एक जानवर से दूसरे मे अक्सर बीमारियों का संक्रमण होता है, और जानवरों से मनुष्य या इसके विपरीत के भी कई उदाहरण है। एक उदाहरण तपेदिक यानी टी. बी. , भी है जो पशुपालन के नतीजे के तौर पर मनुष्य ने गाय-भैसों से पायी है। दूसरी बीमारी एड्स है जो एक तरह के बंदरो से मनुष्य मे संकर्मित है।

स्वाइन फ्लू ,ये एक नया strain है, और हमारा शरीर अभी इसे ठीक से पहचानता नही है, इसीलिये प्रतिरोध की क्षमता बढ़ते हुए आपेक्षाकृत थोडा ज्यादा समय लगेगा। इस वायरस की पहचान आसानी से की जा सकती है, क्योकि जीनोम सीकेकुएंस हो चुका है, पर शायद रेडी-गो टाइप की किट्स का बाज़ार मे पर्याप्त मात्रा मे होने मे कुछ समय लगेगा। टेस्ट होना और इलाज़ होने मे अन्तर है। अगर स्वाइन फ्लू का टेस्ट positive भी है, फ़िर भी अन्य वायरस से होने वाले सर्दी जुखाम की तरह कोई मारक इलाज़ इसका सम्भव नही है। वायरस से जनित बिमारियों के लिए मशहूर है "की बिना इलाज़ सात दिन, इलाज़ करके एक हफ्ते का समय" फ्लू को ठीक होने मे लगता है।
फ्लू के लिए सबसे कम नुकसानदेह इलाज़ फ्लू वैक्सीन है, जो कोई दवा नही बल्की हमारी प्रतिरोध क्षमता को बढाने का एक तरीका है, अन्य सभी टीको की तरह।
हालाकि पिछले १० साल मैंने हर साल फ्लू वैक्सीन ली है, और हर सीज़न मे फ्लू के एक से अधिक बार हुआ है। फ्लू का टीका वास्तव मे फ्लू बचाने मे कितना कारगर हुया है, ये यकीन के साथ अपने अनुभव से मैं नही कह सकती। सिर्फ़ इतना हुया है, कि शायद symptoms थोड़े कम तीव्र हुए हो। ७ दिन की बजाय ५ दिन मे फ्लू ठीक हो गया हो। जिस तरह से बैक्टीरीया जनित बीमारियों से बचाव वैक्सीन से हो जाता है, वायरस के ऊपर वैक्सीन या टीका ज्यादा असर करता नही इसका प्रमुख कारण ये है कि वायरस अतिसूक्ष्म जीनोम वाले और बड़ी जल्दी-जल्दी बदलने की क्षमता रखते है। इतनी की ६ महीने मे एक वायरस के १० नए strain बन सकते है, और एक वैक्सीन को बनने मे भी कम से कम ३-४ महीने लगते है। जो मूल वायरस को लेकर वैक्सीन बनायी जाती है, अगले सीजन तक वों इतना बदल चुका होता है, कि वैक्सीन पूरी कारगर नही होती। आज सायंस इतनी तरक्की की है, हजारो की संख्या मे वायरस के जीनोम की सीकुएंस हमारे पास है, और पहले के मुकाबले कुछ हद तक ये अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले सीजन मे कौन सा strain होगा। और कुछ इसी आधार पर हर साल के लिए नयी फ्लू वैक्सीन बनती है। पर ये अनुमान १००% सही नही होता, और अलग-अलग मौसम और भोगोलिक परिस्थितियों मे अलग-अलग strains होंगे और कोई एक टीका काम नही करेगा। इस फ्लू का भी सबसे सक्षम इलाज़ मनुष्य के अपने भीतर की प्रतिरोधक क्षमता ही है। इसीलिये संतुलित भोजन, व्यायाम , साफ़-सफाई, हँसना, और तनाव मुक्त होना जैसी मामूली चीजे सबसे ज्यादा कारगर होंगी।
1। मुह पर रूमाल रखकर खांसे,
2. इधर-उधर थूके,
3. बार साबुन से हाथ धोये,
4. और बीमार हो तो कम से कम लोगो से मिले।
5. खूब पानी पिए, और
6. अपने को ज्यादा नही थकाए तो ये संभावना सब के लिए थोड़ी से घट जायेगी।

जिसे भी बता सके, उससे कहे की बहुत डरने की ज़रूरत नही है, कुछ सावधानी बरते!
फ्लू के बारे मे अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखे.

दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष ये है कि अकेले अपने दम पर, अपनी जेब की दम पर इसका मुकाबिला करना सम्भव नही है
खासतौर पर बाज़ार और मुनाफे के सरोकारों मे लगा मीडीया इस सच को कभी सामने नही लाएगा. ये एक संक्रमित बीमारी है, और अमीर-गरीब, स्त्री पुरूष, काले-गोरे का भेद नही करेगी। १०० करोड़ जनसँख्या वाले देश मे व्यक्तिगत हाईजीन अगर एक चौथाई तबका फोलो भी करे तब भी ख़ुद को बचा नही पायेगा। अपने-अपने द्वीप मे हम नही रहते, और इसीलिये, अपने और अपनो को बचाने की इस मुहीम का सबसे कारगर हिस्सा, मास्क खरीदने, फ्लू के मंहगे टेस्ट के पीछे भागने की बजाय पुब्लिक हायजीन को ठीक करने मे हमारा थोडा -बहुत योगदान , सहयोग हो सकता है। और ये एक आदमी के बूते की बात नही है, बल्की कई लोगो का मिलाजुला अपने-अपने स्तर पर प्रयास हो सकता है। इतिहास की महामारियों, जिनमे प्लेग काफी कुविख्यात है, का सबसे बड़ा प्रतिरोध पब्लिक स्पेस मे लोगो की सामूहिक भागीदारी के जरिये साफ़-सफाई का ही रहा है।

आज़ादी की लड़ाई के साथ सामाजिक सारोकार की और आमजन की भागीदारी एक और मुहीम महात्मा गांधी ने चलाई थी। वों थी सफाई अभियान। पढ़े-लिखे, छात्र और नागरिको को शहरी और सार्वजानिक स्थलों की सफाई मे भागीदार बनाना। गरीब बस्तियों मे शिक्षा और स्वास्थ्य संबन्धी जानकारी इसका प्रचार करना, शिक्षा और सूचना को समाज के कमजोर हिस्सों तक पहुचना और सबके लिए सार्वजनिक जीवन को बेहतर बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करना।
मात्र साठ सालो मे उस परम्परा के बिम्ब भी आज़ाद भारत मे नयी पीढी के पास नही है। सामजिक सारोकार का सारा ठेका हमने NGOs को दे दिया है, और ख़ुद अपने-अपने दब्डो मे सिमटते चले गए है।

आज़ादी की पूर्वसंध्या पर जब देश मे बहुत से लोग स्वाइन फ्लू के आतंक से घिरे है, अपनी जेबों मे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को तलाश रहे है, और बाज़ार कुछ असली नकली मास्क और तमाम तरह की चीजों को बेचने मे लगा है, और मीडीया का काम सिर्फ़ सनसनी फैलाना भर है, मुझे लगता है की ब्लॉग जैसे सीमित मंच से ही सही, अपनी इस भूली-बिसरी परम्पराये जो आजादी के आन्दोलन के साथ शुरू हुयी थी, को याद करने का ये सटीक समय है। इस अवसर पर एक दूसरे को शुभकामनाये दे और एक दूसरे की राजनैतिक, सामाजिक आज़ादी की और स्वास्थ्य की कामना करे ? और इसे बरकरार रखने के लिए कुछ प्रयास करे!

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

साहस बढ़ाने वाली जानकारी।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

महत्वपूर्ण जानकारी से भरी हुए एक प्रेरक पोस्ट।

कोई भी अपने सामाजिक सरोकारों से विलग होकर अच्छा जीवन नहीं जी सकता। हमें अपने हिस्से की सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभानी ही होंगी।

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