Wednesday, August 26, 2009

नही पिता !

नीला प्रसाद

जितना आप सोचते हैं

उतना आसान नहीं है

एक पेड़ को मनचाहा आकार देना

या अपनी बेटी को गढ़ना..

वह एक नन्हा सा बिरवा

जिसे आपने उगाया

आपकी आंखों के सामने बढ़ती है

और धीरे धीरे फैलती हुई

एक आकार लेना शुरू करती है

कि आप अपने आदर्शों, मान्यताओं, तरीकों

और परंपराओं की कुल्हाड़ी ले

बड़ी उतावली से उसे छीलना छांटना

शुरू कर देते हैं

कि कहीं वह फैल न जाए

आपके अनचाहे आकार में

बिना इस चिंता के

कि इस प्रक्रिया में वह आपसे

मन से बहुत दूर न चली जाए

आप भूलते हैं

कि हर बार

जैसे ही उसे छीलकर

काट कर उसकी टहनियां

आप अलग हटते हैं

अपना काम खत्म जान

वह एक बार फिर से जनमना शुरू करती है

अंदर ही अंदर

अबकी बार कम फैलाते हुए

अपनी विद्रोही टहनियां बाहर

पर जड़ें ज्यादा अंदर जमाते हुए

आप चाहते हैं कि वह ठीक वैसे ही बढ़े

जैसे आपका सपना है

पर आप भूलते हैं

कि उतना आसान नहीं है

प्रकृति को मुट्ठी में बंद कर

उगने उमगने से रोकना

या एक टहनी को

आसमान की ओर मुंह कर

अलग अलग दिशाओं में फैल

छांहदार वृक्ष बनने से टोकना..

नहीं पिता

उतना आसान नहीं है

अपनी बेटी को मनचाहे रूप में गढ़ना!!

.........


कवयित्री का परिचय, बकलमखुद -

  • जन्म और शिक्षा रांची में.
  • आजीविका के लिए अफसरी.फिलहाल कोल इण्डिया लिमिटेड में कार्मिक प्रबंधक.
  • 16 की उम्र से राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं, अखबारों, आकाशवाणी रांची और बाद में रांची दूरदर्शन से जुड़ी रही
  • जनसत्ता,कथादेश ,इरावती मे कई लेख व कहानियाँ प्रकाशित
  • अब नेट की दुनिया से भी जुड़ने और पहले कहानी संग्रह के लिए प्रकाशक तलाशने का इरादा.

6 comments:

संगीता पुरी said...

नहीं पिता

उतना आसान नहीं है

अपनी बेटी को मनचाहे रूप में गढ़ना!!

सुंदर रचना .. बहुत सटीक लिखा है .. बधाई !!

Dr. Shashi Singhal said...

nahI pitaa aasaan nahI hai beTI ko apane manchaahe roop me gadhanaa ,
nIlaa prasaad kI kavitaa kI ye laaine bahut sateek hai | isame ek beti ke man ke bhaavo v usame dukh ko badee bebaakee se ubaaraa hai
|

शोभना चौरे said...

ak nai soch ,nai disha purne sandrbh me .
abhar

Fauziya Reyaz said...

behad khoobsurat...bahut hi sachhi aur gehri rachna...mere paas aur shabd nahi hain...dil ko chhoo liya

Chandan Kumar Jha said...

बहुत हीं भावपूर्ण रचना.

M VERMA said...

कि उतना आसान नहीं है
प्रकृति को मुट्ठी में बंद कर
उगने उमगने से रोकना
गहरी संवेदना और एक प्रवाह मे बहने और कहने का अन्दाज बहुत सुन्दर.

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