Wednesday, August 26, 2009

जीना ऐसे भी

राजकिशोर
सौदामिनी को मैं तब से जानता हूं जब उसने बीए भी नहीं किया था। वह कोई कठिन कविता या निबंध का अर्थ समझने के लिए हमारे घर आती थी। उसकी आंखों में एक खास किस्म की चमक थी। वह चमक दूर से ही कहती थी कि यह लड़की बहुत आगे जाएगी। एक बार निराला की एक भक्ति-कविता पढ़ कर सौदामिनी ने पूछा था, इस जमाने में भी ऐसी कविताएं क्यों लिखी जाती हैं। लिखी जाती हैं, तो स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई क्यों जाती है? शिक्षा विभाग के अधिकारी ऐसे बौड़म मूल्य हमारे जीवन में क्यों भरना चाहते हैं? अपना जीवन तो हमें ही चलाना है। इसमें प्रभु क्या कर लेंगे? मैंने उसे बताया कि निराला जी वेदांती थे। इसलिए वे ऐसी कविताएं लिखते थे। सौदामिनी ने कहा, ‘सर, मैं निराला जी का सम्मान करती हूं। उनकी बहुत-सी कविताएं मुझे पसंद हैं। पर वेदांत ? नो। यह एक फाल्स विचारधारा है। आत्मा-परमात्मा का जमाना चला गया। अब हम खुद अपने ईश्वर हैं। लेकिन क्लास में इस बात की और इशारा तक नहीं किया जाता। साहित्य के हमारे शिक्षक भी खुद वेदांती नहीं हैं। कम से कम उनकी जीवन चर्या में तो वेदांत की कोई झलक हमें दिखाई नहीं देती। पर यह भक्ति वाली कविता वे इस तरह पढ़ाते हैं जैसे पूरी क्लास को वेदांती बना कर छोड़ेंगे।’ सौदामिनी से बीच-बीच में संपर्क होता रहा। कभी-कभी उसका फोन भी आ जाता था। उसके बारे में मेरे पास आखिरी समाचार यह था कि वह किसी विश्वविद्यालय में पढ़ा रही है। वही सौदामिनी पिछले हफ्ते हमारे घर आई, तो उसका स्वस्थ भरा-पूरा शरीर देख कर आंखें जुड़ा गर्इं। वह मेरे लिए कुछ नई पुस्तकें भी लाई थी। हालचाल जानने के बाद मैंने पूछा, अपने पतिदेव को साथ नहीं लाई? वे क्या करते हैं? सौदामिनी ने बताया, ‘वे एक विज्ञापन कंपनी चलाती हैं। आज वे भी मेरा साथ आने वाली थीं, पर अचानक एक जरूरी मीटिंग आ जाने से सुबह ही निकल गर्इं।’ वह बड़ी गंभीरता से बोल रही थी, पर जाहिर था कि वह भीतर ही भीतर अपनी हंसी रोक रही है। मैं भी विस्मित हुआ, ‘क्या? तुम दोनों लेस्बियन तो नहीं हो?’ सौदामिनी ने अपनी आवाज में कोई रंग लाए बिना कहा, ‘ मैं जानती थी कि आप यह सवाल जरूर पूछेंगे। सभी पूछते हैं। नहीं, हम लेस्बियन नहीं हैं।’ मैंने स्पष्ट किया, ‘दरअसल, दो स्त्रियों के साथ-साथ रहने और परिवार जैसा बसाने से मन में पहला सवाल यही आता है। मेरे अपने शब्दकोश में लेस्बियन होना गाली नहीं है। इसलिए तुम्हें मेरे सवाल से नाराज नही होना चाहिए। यह एक असाधारण बात जरूर है, इसलिए पूछ बैठा।’ सौदामिनी ने शांत स्वर में, लेकिन कुछ तुर्शी के साथ कहा, ‘हां, यह असाधारण बात है। साधारण बात यह है कि पत्नी बनने के बाद स्त्री पति की गुलाम हो जाए। पति की अतार्किक बात न मानने पर पिटती रहे। साधारण बात यह है कि पत्नी पति के सचिव की तरह काम करे और अपने कैरियर की चिंता न करे। पति के रिसर्च करने में सहायक बने और खुद लिखना-पढ़ना छोड़ दे। मैंने दो विवाह किए, दोनों का निचोड़ यही है।’ उसकी पीड़ा ने मुझे विचलित कर दिया। मैंने जानना चाहा, ‘तुम्हारे पति की कहानी भी कुछ ऐसी ही है क्या?’ सौदामिनी – ‘सर, कहानी सभी की एक जैसी ही है। कोई-कोई जाहिर कर देती है, ज्यादातर इस उम्मीद में चुप रहती हैं कि आगे शायद आगे बेहतर दिन आएंगे। यह उम्मीद उनके बूढ़ी हो जाने तक बनी रहती है। लेकिन आप हमें पति-पत्नी तो न कहें। पति और पत्नी शब्दों के उच्चारण में हैसियत का जो फर्क तरंगित होता है, वह हमें मंजूर नहीं है। हम बराबरी की हैसियत से साथ हैं। हममें न कोई पति है, न कोई पत्नी है। या तो हम दोनों पति हैं या हम दोनों पत्नियां हैं। परिवार में वर्ग विभाजन को हमने खत्म कर दिया है।’ सौदामिनी ने अपनी जीवन साथी श्वेता के बारे में जो कुछ बताया, वह भी कम विचलित करने वाला नहीं था। श्वेता ने एक फ्रेंच लड़के से शादी की थी। उन्हें एक बच्चा भी हुआ। बच्चा होने के बाद ही उसका पति इधर-उधर मुंह मारने लगा। जब बात बहुत आगे बढ़ गई, तो एक दिन पति को बैठा कर श्वेता ने उससे बातचीत की। इस पर वह उखड़ गया। कहने लगा कि तुम इंडियन्स बहुत दकियानूस हो। यह मेरी पर्सनल लाइफ है, इससे तुम्हें क्या मतलब? तुम भी चाहो तो मल्टिपुल रिलेशन्स बनाओ, मैं बिलकुल एतराज नहीं करूंगा। श्वेता ने कहा, रिलेशन तो हो। मैं तुम्हारी तरह फ्लर्ट नहीं कर सकती। उसने कहा, फ्लर्टेशन इज द स्पाइस ऑफ लाइफ (फ्लर्ट करना जिंदगी को मसालेदार बनाए रखता है)। श्वेता ने जवाब दिना, जिंदगी मेरे लिए मसाला नहीं है। इसके बाद दोनों में तनातनी रहने लगी। आखीर में तलाक हो गया। सौदामिनी ने बताया, ‘अब श्वेता और उसका लड़का तथा मैं साथ-साथ रहते हैं। फ्लैट भी हम दोनों ने पैसा मिला कर खरीदा है।’ मुझे अफसोस हुआ, ‘गलती उस नालायक फ्रेंच की थी, नतीजा भुगत रहा है बच्चा। उसके सिर पर पिता का साया नहीं है।’ सौदामिनी फिर तुनक गई, ‘एक पुरुष और एक स्त्री के स्थान पर दो स्त्रियों का साया क्या कुछ कम है? उसके दो-दो माएं हैं। वह हमारे प्यार-दुलार से बहुत खुश रहता है। और, स्त्री-पुरुष की तरह दो पुरुष या दो स्त्रियां घरबार क्यों नहीं बसा सकते? इसके लिए होमो या लेस्बियन होना जरूरी क्यों है?’ सौदामिनी ने अपनी बात थोड़ी और स्पष्ट की, ‘अब आप शायद यह पूछना चाह रहे होंगे कि क्या श्वेता को या मुझे पुरुष की जरूरत महसूस नहीं होती? होती है, तमाम कटु अनुभवों के बावजूद होती है। हमें जो पुरुष मिले, वे एक ही ढर्रे के थे, इससे यह साबित नहीं होता कि सब पुरुष एक ही जैसे होते हैं। लेकिन हम अभी इंतजार करना चाहते हैं। कोई मन लायक आदमी मिला तो देखेंगे। हां, यह तय है कि उससे विवाह नहीं करेंगे। हमारा संबंध मित्रता तक सीमित रहेगा। पर इसका गलत अर्थ न लिया जाए। मित्रता अपने आपमें एक असीमित संबंध है। हो सकता है, आगे चल कर मैं मां बनना भी चाहूं। पर यह मैं अपने दम पर करूंगी। अपने बच्चे के जैविक पिता को किसी बंधन में नहीं डालूंगी। वह मेरा दोस्त ही रहेगा, मेरा पति नहीं हो जाएगा। क्यों, इसमें कुछ गलत तो नहीं है?’ मेरे मुंह से निकला -- ‘बिलकुल नहीं’। पर मैंने पाया कि मेरे हामी भरने में मेरी आत्मा का पूरा बल नहीं था। मैंने अपने आपसे सवाल किया, भीतर ही भीतर क्या मैं भी औरों जितना ही दकियानूस हूं? 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4 comments:

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

एक ईमानदार अभिव्यक्ति।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

निर्मला कपिला said...

बहुत बडिया आभार्

Atmaram Sharma said...

बहुत गंभीर प्रश्न खड़ा होता है आखिर में. खुद को टटोलकर उजागर करने में हिम्मत लगती है.

शोभना चौरे said...

sarthak chintan
abhar

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