Friday, August 28, 2009

नो वर्क नो सैलरी - नो सेक्स नो फूड !क्यों ?

स्त्री को उसकी सही औकात{उनके हिसाब से 'पाँव की जूती' जो कॉलेज के दिनों मे अपने सहपाठी को कहते सुना था} बताने मे कट्टर पितृसत्तावादी ,मर्दवादी समाज कभी पीछे नही हटे इसका गवाह है हमारा इतिहास।कभी उसे डायन बता कर खौलते तेल मे डाल दिया जाता है ,कभी ज़लील किया जाताहै,बलत्क्रत किया जाता है।विडम्बना है कि यह उन एशियाई समाजों मे अधिक होता है जो खुद को नैतिकतावादी मानते हैं , संस्कृति की रक्षा के लिए जान लड़ा देते हैं।{पर क्या सच मे नैतिक हैं ? संस्कारवान हैं?}शोध साफ दिखाते हैं कि दुनिया के बाकी सभी हिस्सों से कहीं अधिक वेश्यावृत्ति एशिआई देशों मे है।दिक्कत यह है कि अफगानिस्तान , पाकिस्तान जैसे देशों के बारे मे क्या कहा जाए जो धर्म के नाम पर स्त्री की गर्दन पर तलवार की नोक का पहरा बिठाए रखते हैं।विरोध तो दर्ज करना ही होगा।




घर , घरवालियां और सेक्स


नीलिमा


पिछले दिनों अफगानिस्तान में घोषित नए कानून के द्वारा मानवीयता की सारी हदें पार कर दी गईं ! इसके मुताबिक अपनी पत्नी द्वारा सेक्स से वंचित पति उसे खाना देने से इंकार कर सकता है ! इसके अनुसार पत्नी को चार दिन में कमसे कम एक बार अपने पति की शारीरिक इच्छा की पूर्ति करनी होगी ! इससे विवाह की परिधि में पत्नी से बलात्कार को कानूनी मान्यता दी गई ! इसे घोषित करने वाले अफगान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई का समर्थन अफगान के रुढिवादी संगठनों ने किया जिनके बल पर चुनावी राजनीति का निकृष्टतम दांव खेला गया ! इस कानून का पश्चिमी नेताओं और अफगानी स्त्री संगठनों नेविरोध और निंदा की !

नो वर्क नो सैलरी - नो सेक्स नो फूड ! अफगानी समाज में स्त्री की पारिवार में स्थिति कामगार की तरह है ! जिसका काम पति की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना और उसके बच्चों को पालना मात्र है ! उसके एवज में पति उसे खाना और रहने की जगह देकर इस घरेलू कामगार के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री करता है !

अफगान समाज तो बहुत सभ्य निकला ! उसने विवाह ,परिवार, स्त्री की बराबरी से जुडी कई वैश्विक समस्याओं को इतने सहज तरीके से सुलटा दिया ! इसने विश्व को समझा दिया कि कि सभ्य समाज में स्त्री और पुरुष के संबंध तो कबीलाई ही रहेंगे ! कितनी भी कवायदें आप कर लें कितना भी आप विमर्श कर लें ! स्त्री का जन्म एक घरेलू मजदूर के रूप में हुआ है इस सच से मुंह नहीं मोड सकते !

दिहाडी मजदूरी को हम आज तक नहीं खत्म कर सके ! मजदूर संगठन बनते टूटते रहते हैं पर मजदूरों की बेबसी बनी रहती है ! स्त्री के साथ भी यही स्थिति है ! अफगान हमसे ज़्यादा दो टूक है ! उसने बराबरी , हकों और सम्मान के सारे भ्रमों को तोडते हुए जो बात साफ साफ कही विश्व के बडे - बडे स्ट्रेट फार्वर्ड समाज नहीं कह पाए !

दरअसल स्त्री की देह तो एक कॉलोनी मात्र है ! जिसका इसपर कब्ज़ा है वही उसका मालिक है ! अपने श्रम से औपनिवेशिक ताकतों की इच्छाओं की पूर्ति करते जाना और बदले में भोजन ताकि जीवित रहा जा सके और अगले दिन की बेगारी के लिए तैयार रहा जा सके !

अगर ज़्यादा कडवा सच पचा पाएं तो - स्त्री की योनि एक कॉलोनी मात्र है ! जिसके शोषण की एवज में स्त्री जीवित रहने की हकदार होती है ! प्रतिबंधित समाज इस सच को कहने में नहीं झिझकते ! खुले समाजों में शब्दों की चाशनी , विचारों और विमर्शों की तहों में यह धारणा लिपटी रह जाती है !

स्त्री का अस्तित्व राजनीति के लिए बहुत बढिया पैंतरा है ! सभ्य कहे जाने वाले समाजों में स्त्री की मुक्ति और बंद समाजों में उसकी दासता के एलान के बल पर राजनीतिक ताकतें सत्ता का खेल खेलतीं हैं ! स्त्री की गुलामी और आज़ादी दोनों का राजनीतिक इस्तेमाल सबसे भारी दांव होता है ! स्त्री विमर्श की बडी लेखिका मृणाल पांडे मानतीं हैं कि स्त्री- आंदोलनों को राजनीतिक पार्टियां अपने फायदें में ऎप्रोप्रिएट कर लेतीं हैं ! ऎसे में स्त्री के पारिवारिक - सामाजिक अधिकार और बराबरी एक ऎसा समीकरण होता है जिसका जितना उलझाव होगा उतना ही फायदा पुरुष समाज का होगा !

घर की चौखट में सुरक्षित दिखने वाली स्त्री उसके भीतर कितने शोषण और समझौतों के बावजूद ही रह पा रही है इसका अंदाज़ा शायद उन विवाहिताओं बनाम पीडिताओं को भी नहीं होता ! स्नेह , कर्तव्य ,आदर्श ,नैतिकता, प्रेम ..जैसे कई छलावों में लिपटा सच यही है कि विवाह स्त्री के लिए एक समझौता और करार है ! क्या विवाह एक यौन पशु के लिए चारे और सुविधा का इंतज़ाम है जिसके जरिए वह सत्ताधीश कहलाता है और उसका वंश भी आगे बढता रहता है ?

मार्ग्रेट श्राइनर का उपन्यास - घर , घरवालियां और सेक्स पढकर समाज की मुख्य बुनियाद विवाह और परिवार पर ही अनेक शक पैदा होते है ! स्त्री और पुरुष के संबध विवाह के बाहर और भीतर दोनों ही जगह शोषक - शोषित और मालिक - मजदूर के हैं ! सामाजिक विकास के चरणों में कबीलाई समाज की मूल प्रवृत्तियां बदल नहीं पाईं

21 comments:

निर्मला कपिला said...

बहुत ही सार्थक और जानदार लेख है और इस अभिव्यक्ति मे तो पूरे औरत समाज का सच है चाहे कोई इसे माने या न माने---
घर की चौखट में सुरक्षित दिखने वाली स्त्री उसके भीतर कितने शोषण और समझौतों के बावजूद ही रह पा रही है इसका अंदाज़ा शायद उन विवाहिताओं बनाम पीडिताओं को भी नहीं होता ! स्नेह , कर्तव्य ,आदर्श ,नैतिकता, प्रेम ..जैसे कई छलावों में लिपटा सच यही है कि विवाह स्त्री के लिए एक समझौता और करार है ! क्या विवाह एक यौन पशु के लिए चारे और सुविधा का इंतज़ाम है जिसके जरिए वह सत्ताधीश कहलाता है और उसका वंश भी आगे बढता रहता है ?
बहुत बडिया लिखा है ।अज भी चाहे औरत कितनी ही आधुनिक दिखे मगर ये सच उसके लिये भी यथार्थ है हर औरत को इस से कभी न कभी रुबरू होना ही पडता है आभार्

Arvind Mishra said...

एशिया ही नहीं ऐसा कमीनापन कमोबेश पूरी दुनिया में है -पर पूरी दुनिया में हर किसी को कोसते रहना ठीक नहीं है ! खुद सोचिये की क्या यह एक एकांगी दृष्टिकोण नहीं है ? यहाँ कुछ खराब है तो वह ही क्यों बार बार उद्धरनीय बनता है -क्या जो अच्छा है वह दिखता नहीं -यह दृष्य्भेद महज दृष्टि भेद के ही चलते है ! लगता है ब्लागजगत की आधी दुनिया के नुमायिंदे प्रशंसाबोध खो चुके हैं -इन्हें बस हर वक्त रोना कलपना ही आता है ! इससे क्या मिलेगा समाज को ? यह कैसी रचनात्मकता है ? इसी को शूकर वृत्ति कहा गया -कबीर को हर जगह बस मैला दिखता था -तुलसी इस शूकर वृत्ति से ऊपर उठे -आज वे कबीर से कहीं अधिक सम्माननीय हैं ! (कम से कम मेरी दृष्टि में ) -यह उदाहरण महज इसलिए की समाज में चोखेरबालियाँ वह भी तो देखें और बताये जो कुछ अच्छा और अनुकरणीय हो रहा है -बार बार एक ही रोना विकर्षित करता है !

Anonymous said...

लगता है ब्लागजगत की आधी दुनिया के नुमायिंदे प्रशंसाबोध खो चुके हैं

आधी दुनिया का का मतलब महिला समाज हैं तो बाकी आधी दुनिया मे पुरूष , समलैंगिक और लैंगिक विकलांग सब ही हुए । इस का अर्थ हुआ की वो आधी दुनिया जिस को आप फक्र से पुरूष की दुनिया कहते हैं वो केवल आप की नहीं हैं । जगह सिकुड़ रही हैं , पैरो के नीचे से कब जमीन
निकल जायेगी !!!! पता नहीं

Ashok Kumar pandey said...

सुजाता जी
जबसे यह ख़बर पढी थी बेहद व्यग्र था।
आपकी पोस्ट ने और बढा दी व्यग्रता। चाहता था कुछ और कमेन्टस आ जायें फिर लिखूं पर नहीं आये।
कहीं यह उस मूक सहमति की अभिव्यक्ति तो नहीं जो निश्चित रूप में पुरुषों के एक बडे वर्ग में है ही। मज़बूरी में चाहे कह ना पायें पर भीतर गहरे में बैठा सामंत औरत को बस वही समझता है।

यह वोट आधारित लोकतंत्र की सीमाओं को भी अभिव्यक्त नहीं करता क्या?

Ashok Kumar pandey said...

अरविन्द जी का दृष्टि दोष समझ में आता है। कबीर को शूकर दृष्टि का कहने वाला कोई भयावह मायोपिया का शिकार हो सकता है जो सडक पर कीचड मे लोटते हुए आसमान की ख़ूबसूरती देख कर खुश रहता है।

BS said...

कृपया ये बतायें कि अगर स्त्री पुरुष को सेक्स नहीं करने देगी, उसके घर के काम नहीं करेगी, बच्चे नहीं जनेगी तो घर कैसे चलेगा और पुरष क्यों शादी करेगा? क्या दिन भार काम करके थके मांदे पुरुष की इतनी सी बात गलत है केवल चार दिन में ही सही एस बार तो स्त्री सहवास करने दे?

आप जैसे नारीवादी महिलायें शादी को ही खत्म करना क्यों चाहती है? अगर पुरुष इतने ही बुरे हैं तो स्त्री क्यों बचपन से शादी के सपने देखती है? गुड्डे-गुड़िया की शादी के बहाने से लड़कियां शादी करने की बातें करती हैं। क्या ये प्राकृतिक नहीं है कि स्त्री परुश के साथ मिलकर रहना चाहती है और पुरुष स्त्री में सेक्स चाहता है?

पूरे मुद्दे पर बात कीजिये। अलग - अलग बातों से पूरा मामला दिखता नहीं है।

Ashok Kumar pandey said...

चलिये ये खुलकर आये।
''स्त्री परुश के साथ मिलकर रहना चाहती है और पुरुष स्त्री में सेक्स चाहता है?''
तो इसका अर्थ यह हुआ कि इन जनाब के हिसाब से सेक्स पुरुष की चाहना है और औरत बस उसे देने वाली वह भी उसके द्वारा किये गये शादी के एहसान के एवज़ में। स्त्री शरीर की न तो अपने आप में कोई आकांक्षा है ना ही कोई शिकायत बस उसे तीसरे चौथे पतिदेव के आदेश पर प्रस्तुत हो जाना है। पुरुष दिन भर 'काम' करके थका होता है और औरत चाहे घर पए सुबह 4 बजे से रात 11 बजे तक खटे उसे थकान नहीं होती क्योंकि वह जो करती है वह तो 'काम' है ही नहीं। भले इसमे 10 से छ्ह की नौकरी भी शामिल हो। स्त्री कोई पत्थर का पुतला नहीं,सेक्स की भी वह पार्टनर होती है केवल रिसीवर नहीं। तो उसमें उसे अपनी इच्छा व्यक्त करने का अधिकार क्यूं नहीं। घर का काम पुरुष करेगा तो क्या घर नहीं चलेगा?

यही वह सामंती सोच का स्टीरियोटाईप है जिसमें शादी के लिये मरी जा रही लडकी का चित्र उकेरा जाता है मानों मर्द शादी करना ही नहीं चाहते बस उन पर थोप दी जाती है। यह एक साफ़ झूठ है। हां इस सामाजिक व्यवस्था मे चूंकि स्त्री को लगातार असुरक्षा का बोध कराया जाता है और उसको आर्थिक अधिकार नहीं दिये जाते तो शादी उसके लिये सुरक्षा बोध से जुड जाती है।

मुद्दा यही है कि स्त्री की अपनी अलग अस्मिता है। वह घर के काम करने वाली, बच्चे जनने वाली और पुरुष के लिये एक शरीर उपलब्ध कराने वाली मात्र नहीं है। घर केवल पुरुष का नहीं होता उस पर उस स्त्री का हक़ होता है। अगर शादी का मतलब वही है जो इन महोदय ने बताया है तो मै भी कहुंगा शादी मुर्दाबाद।

मेरे लिये तो मर्द औरत के बीच का हर रिश्ता बराबरी का और लोकतांत्रिक ही होना चाहिये।

विवेक सिंह said...

सार सार को गहि रहो थोथा देउ उड़ाय !

BS said...

श्रीमान अशोक जी (स्त्री कारणों के चैम्पियन),

"स्त्री की अपनी अलग अस्मिता है। वह घर के काम करने वाली, बच्चे जनने वाली और पुरुष के लिये एक शरीर उपलब्ध कराने वाली मात्र नहीं है। घर केवल पुरुष का नहीं होता उस पर उस स्त्री का हक़ होता है। अगर शादी का मतलब वही है जो इन महोदय ने बताया है तो मै भी कहुंगा शादी मुर्दाबाद।
"

तो महिलाओं को किसने कह हे कि बिना शादी के मत रहो? आप अपने आस-पड़ोस-घर कहीं भा पता कर लीजिये कोई बिना शादी के रहना चाहती हो।

रोमानी दुनिया मे रहना छोड़ो, वास्तविकता ये है कि औरते दुनिया के इसी हिस्से में सबसे ज्याद सुखी हैं जहं पर उन पर अत्याचार दिखाया जाता है।

घर पर स्त्री का हक है, देह पर स्त्री का हक है, बच्चों पर स्त्री का नैसर्गिक हक है, तो फिर मर्दों का क्या है? सिर्फ स्त्र्यों के मैज करने के लिये कामा कर लाना।

आर. अनुराधा said...

"इसी को शूकर वृत्ति कहा गया -कबीर को हर जगह बस मैला दिखता था -तुलसी इस शूकर वृत्ति से ऊपर उठे -आज वे कबीर से कहीं अधिक सम्माननीय हैं ! (कम से कम मेरी दृष्टि में )"
@ अरविंद मिश्र-
आपकी दृष्टि में कौन-कौन सम्माननीय होना चाहते हैं, इस पर एक जनमत-संग्रह करा लिया जाए!!!??? इस बारे में पैमाने आप तय करें और सबके गुण-दोषों को मापें??!! समय अच्छा गुज़रेगा।

Science Bloggers Association said...

Mool pravattiyon ko badalne men samay lagta hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Arvind Mishra said...

@लगता है ब्लागजगत की आधी दुनिया के नुमायिंदे प्रशंसाबोध खो चुके हैं -इन्हें बस हर वक्त रोना कलपना ही आता है ! इससे क्या मिलेगा समाज को ? यह कैसी रचनात्मकता है ?
अन्यत्र एक ब्लॉग पर जान बूझ कर नुमायिदें शब्द की जगह संकुचित भावना से प्रजाति शब्द जोड़कर भ्रम फैलाया जा रहा है -नफरत फैला कर पूरे ब्लाग जगत को संदूषित करने वालों का हश्र क्या होना चाहिए -कभी कभी तो ऐसे लोगों के कारन ही हिटलर तानाशाह बना होगा !

अर्कजेश said...

’नो सेक्स नो फ़ूड’ से शुरु होकर, चर्चा कहां-कहां से घूम कर कहां पहुंच गई ।

नारी और पुरुष के सन्दर्भ में प्रश्न यह नहीं है कि पुरुष या नारी में से किसको क्या करना चाहिये ।

मुद्दे की बात यह है कि निर्धारक कौन है ?

और पुरुष को क्यों निर्धारित करना चाहिये की नारी क्या करे और क्या न करे?

महिलायें एकजुट नहीं हैं । इसीलिये नारी सशक्तीकरण की मुहिम उतनी जोर नहीं पकड रही है ।

जब तक महिलओं की धर्म भीरुता समाप्त नहीं होगी, तब तक महिलाओं की वास्तविक मुक्ति सम्भव नहीं है । आखिर क्या वजह है, उन सिद्धान्तों को मानने कि जिसमे उसकी उपस्थिति अपमानजनक बताई गई है ।

हर धार्मिक सन्स्थान में या तो उन्हे बराबर की हिस्सेदारी मांगनी चाहिये या फ़िर उसका बहिष्कार करना चाहिये ।

लीपापोती करके कुरान या रामायन की स्त्रीवादी व्यखा करने से कुछ होने वाला नहीं ।

एक आधुनिक समाज में रिश्तों की बुनियाद सिर्फ़ आपसी सहमति होनी चाहिये न कि बाहर से लादा गय कोइ सामाजिक या कानूनी नियम से । तभी स्त्री और पुरुष दोनों की वास्तविक मुक्ति सम्भव है ।

कि अब चार दिन-पांच दिन का नियम बनाइये । यद्यपि यह उस समाज की दमित कामुकता से उपजा नियम है । पहले आप बुरका ओढाइये, सात पर्तों में रखिये । जिसकी निष्पत्ति इस तरह के कबीलाई नियमों में होगी ।

Anonymous said...
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Arvind Mishra said...

उचित होगा उस पोस्ट की लिंक दे दी जाय जिससे स्थिति स्पष्ट हो जाय -मेरी गूगलिंग परिणाम नहीं दे सकी ! मुझे राहत है की मुझे इस अपयश से मुक्ति मिली -बाकी विद्वान् लोग प्रजाति की शब्द -मीमान्सा करते ही रहेगें ! वैसे यह स्पीशीज शब्द का हिन्दीकरण है ! मनुष्य एक प्रजाति है -नर और मादा उसी के अधीन हैं ! जातियाँ हैं -नीग्रो ,काकेशियन ,मगोलिआयी आदि आदि .
हलके फुल्के ढंग से मनुष्य योनि/प्रजाति शब्द कह दिए जाते हैं -हाँ यह संदर्भ देखना होगा की किस अर्थ में यह कहा गया है ! अन्यथा बिलावजह वितंडा खडा करना उचित नई लगता ! वैसे भी इस पोस्ट पर यह अप्रासगिक है -इसलिए चोखेरबालियों से सारी !पर जब बात शुरू हो गयी तो यहाँ यह कहना मेरे लिए जरूरी था -अन्यथा नाहक ही बलि का बकरा बनना पड़ता -मुझे भी एक गृहमंत्रालय में काम करना है -

Ashok Kumar pandey said...

ये महामर्द बीएएस बुर्के में क्यूं आते हैं? कहीं ये चूहों के प्रवक्ता तो नहीं?

आप ज़रा अपने दोस्तों से पूछियेगा कि क्या शादी के लिये उनके मन में इच्छा नहीं जगती। अपनी सहज कुत्ता प्रवृति के चलते यहां वहां मुह मारने के बावज़ूद भी?

जरा चार दिन घर का काम करके देखिये मालूम पड जायेगा मौज कौन करता है। और जब औरत कमाती है तो मर्द घर का काम करके यह मौज़ क्यों नहीं उडाते? सवाल किसी की तरफ़दारी का नहीं एक लोकतांत्रिक व्यव्स्था का निर्माण है।

औरतों के सुख के बारे में आप कौन होते हैं सर्टिफ़िकेट देने वाले? उन्हें ही तय करने दीजिये…

स्वप्नदर्शी said...

The law in Afghanistan reflects also the complete isolation of women from their role as an social being. I had a student from Afghanistan in winter, and had a chance to talk to him about his mother and other issues as well. The situation is that, women in that country have no role in any decision making, not even within the family.

The institution of family/marriage is no doubt is heavily tilted in the favor of men and needs democratization. It will only happen when women have equal opportunities in every sphere of society, including economic opportunity, education, politics and in policy making.

The limits of marriage as an institution are tightly controlled by the social and political situation of a given geography. It means different things in India, Afghanistan and in America.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

इस तरह के अमानवीय व्यवहार सिर्फ़ एशिया या यूरोप नहीं,पूरी मनुष्यता के लिए कलंक हैं. यह मनुष्य को नए सिरे से इतिहास के चक्र को पीछे घुमाने जैसी बात लगती है.

Fauziya Reyaz said...

stri ki halat sirf afghanistan ya pakistan hi nahi har mulk aur har samaj mein stri ke saath naainsaafi hui hai aur ho rahi hai...kabhi dharm ke naam par, kabhi sanskriti ke naam par to kabhi so called 'high society' ke naam par....iske liye mard aur aurat dono hi doshi hain...

Rashmi Swaroop said...

बाप रे ! यहाँ धांसू वाली बहस हो रखी है ! पर वाकई तारीफ के काबिल, मजेदार (जाने क्यूँ कुछ कमेंट्स पर बड़ी हंसी आई..!) और इस सबसे ऊपर "सार्थक" बहस रही. बेहतरीन post !
मुझे तो कोई कारण ही नज़र नहीं आता कि अशोक कुमार पाण्डेय जी से सहमत न हुआ जाए... धन्य हो सर जी ! आपके विचारो कि फैन हो गयी हूँ मै, और BS महाशय के कमेन्ट पढ़ के तो बस लगा कि कुछ नहीं हो सकता इन लोगों का! गुस्से से अधिक तरस के योग्य हैं.
जाकिर अली जी सही कहते हैं.. मूल प्रवर्तियो को बदलने में समय लगता है...
...और ये बदलाव हमे लाना होगा और परिवर्तन हम (इस हम में हम सब शामिल हैं !)लाकर ही रहेंगे !
धन्यवाद. :)
रश्मि.

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