Sunday, August 30, 2009

प्रेम की विडंबनाएँ

एकनिष्ठता का सवाल
राजकिशोर


जैसे उत्तर भारत के समाज को समझने के लिए प्रेमचंद को बार-बार पढ़ने की जरूरत है, वैसे ही स्त्री-पुरुष संबंध के यथार्थ पर विचार करने के लिए शरत चंद्र को बार-बार पढ़ना चाहिए। हाल ही में शरत बाबू का अंतिम उपन्यास शेष प्रश्न पढ़ने का अवसर मिला, तो मेरे दिमाग में तूफान-सा आ गया। स्त्री-पुरुष संबंध का शायद ही कोई आयाम हो जिस पर इस विचार-प्रधान, पर अत्यंत पठनीय उपन्यास में कुछ न कुछ नहीं कहा गया हो। और, जो भी कहा गया है, वह इतना ठोस है कि आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना 1931 में, जब यह पहली बार प्रकाशित हुआ था। हैरत होती है कि हिन्दी की स्त्रीवादी लेखिकाएँ शरत चंद्र को उद्धृत क्यों नहीं करतीं। क्या इसलिए कि वे स्त्री नहीं, पुरुष थे ?

जिस एक बिन्दु पर शरत चंद्र की स्थापना सबसे ज्यादा उत्तेजक है, वह है एकनिष्ठता का मुद्दा। लगभग सारी संस्कृतियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों में एकनिष्ठता की कायल रही हैं। ईसाई समाजों ने तो इसे कानून की शक्ल भी दे दी, जिसका अनुकरण दूसरे समाज कर रहे हैं। बहरहाल, एकविवाह प्रणाली और एकनिष्ठता में फर्क है। एकविवाह प्रणाली एक समय में एक ही संबंध की पक्षधर है। लेकिन इसमें एक संबंध के टूट जाने पर नया संबंध करने पर रोक नहीं है। इस तरह, कोई स्त्री या पुरुष, हर विवाह में वफादारी निभाते हुए भी, एक के बाद एक असंख्य विवाह कर सकता है। इसीलिए इसे क्रमिक बहुविवाह कहा जाता है। एकनिष्ठता कुछ अलग ही चीज है। इसका सहोदर शब्द है, अनन्यता। कोई स्त्री या पुरुष जब अपने प्रेम पात्र के साथ इतनी शिद्दत से बँध जाए कि न केवल उसके जीवन काल में, बल्कि उसके गुजर जाने के बाद भी कोई अन्य पुरुष या स्त्री उसे आकर्षित न कर सके, तो इस भाव स्थिति को अनन्यता कहा जाएगा। यही एकनिष्ठता है। आज भी इसे एक महान गुण माना जाता है और ऐसे व्यक्तियों की पूजा होती है।

हैरत की बात यह है कि शेष प्रश्न की नायिका कमल, जो लेखक की बौद्धिक प्रतिनिधि है, एकनिष्ठता के मूल्य को चुनौती देती है। उसकी नजर में, यह एक तथ्यहीन, विचारहीन, मूर्खतापूर्ण, जड़ परंपरा का अवशेष है जिसे प्लेग के चूहे की तरह तुरंत घर से बाहर फेंक देना चाहिए। यह प्रसंग उठता है शेष प्रश्न के एक प्रमुख पात्र आशुतोष गुप्त की अपनी मृत पत्नी के प्रति एकनिष्ठता की तीव्र भावना से। जब कमल यह घोषित करती है कि नर-नारी के प्रेम व्यापार में अनन्यता को मैं न आदर्श मानती हूं और न ही इसे अतिरिक्त महत्व देती हूँ, तो वयोवृद्ध आशु बाबू विचलित हो जाते हैं। वे कमल से कहते हैं, ‘कमल, तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो। मैं पाप-पुण्य की बात नहीं करता, फिर भी सत्य यह है कि मेरे लिए मणि की माँ के स्थान पर किसी दूसरी स्त्री को अपनाने की सोचना तक संभव नहीं।’ कमल का उत्तर चौंकानेवाला है। वह कहती है, इसका कारण यह है कि आप बूढ़े हो गए हैं।

आशु बाबू बूढ़े हो चुके हैं ? हाँ, वे आज बूढ़े जरूर हैं, पर उस समय तो वे बूढ़े नहीं थे, जब उनकी हृदयेश्वरी चल बसी थी। कमल का कहना है कि दरअसल, वे उस समय भी तन से भले ही बूढ़े न रहे हों, मन से पक्के बूढ़े थे। कमल की नजर में बुढ़ापे की परिभाषा यह है : ‘मेरी दृष्टि में ‘सामने की ओर न देख पाना ही मन का बुढ़ापा है। हारे-थके मन द्वारा भविष्य के सुखों, आशाओं, और आकांक्षाओं की उपेक्षा करके अतीत में रमने को, कुछ पाने की इच्छा न रखने को, वर्तमान को एकदम नकारने को और भविष्य को निरर्थक समझने को मैं मन का बुढ़ापा मानती हूँ। अतीत को सब कुछ समझना, भोगे हुए सुख-दुखों की स्मृति को ही अमूल्य पूँजी मान कर उसके सहारे शेष जीवन जीना ही मन का बुढ़ापा है। ’ उपन्यास के आखिरी पन्ने तक आशु बाबू अपने बारे में इस विश्लेषण से सहमत नहीं हो पाते। कमल से उनके अंतिम शब्द ये हैं : ‘कमल, तुम मणि की माँ के प्रति मेरे आज तक चल रहे अविच्छिन्न बंधन को मोह का नाम दोगी, इसे मेरी दुर्बलता का नाम दे कर मेरा उपहास करोगी, किन्तु जिस दिन यह मोह जाता रहेगा, उस दिन मनुष्य का और भी बहुत कुछ नष्ट हो जाएगा। इस मोह को भी तपस्या का फल समझना, बेटी। ’

ऐसा लगता है कि खुद शरत चंद्र एकनिष्ठता की पहली को सुलझा नहीं सके थे। यह आदर्श उन्हें उलझन में डालता था तो कहीं से मोहित भी करता था। शेष प्रश्न में दो अनन्य प्रेमी युगल अपना पार्टनर बदल लेते हैं। लेकिन आशु बाबू के अदम्य प्रेम का दीपक पूरी पुस्तक में जलता रहता है। कमल के लिए यह कितना ही अस्वाभाविक हो, आशु बाबू के लिए यही स्वाभाविक है। जब उसका पुराना साथी शिवनाथ उसे छोड़ देता है और दूसरी स्त्री को अपना लेता है, तो वह दुखी होती है, पर सती होना उसे कबूल नहीं है। वह अपने हृदय की खाली जगह एक अन्य पुरुष से भर लेती है।

इस मंथन से निष्कर्ष यह निकलता दिखाई देता है कि किसी से एकनिष्ठता की माँग करना नैतिक नहीं है। प्रेम पैदा होता है, तो मर भी सकता है। लेकिन अगर किसी ने एकनिष्ठता का जीवन चुना है, तो उसे बौड़म या ठहरा हुआ क्यों मान लिया जाए? सबको अपना जीवन अपने तरीके से जीने का अधिकार है। एक तरीका किसी को ठीक लगता है, तो इससे दूसरा तरीका अपने आप बुरा नहीं हो जाता। 000

16 comments:

मसिजीवी said...

शेष प्रश्‍न कोई डेढ दशक पहले पढ़ा था, अधिकांश कथा विस्‍मृत हो चुकी है केवल कमल का पात्र ही बचा रह पाया है शायद अपने सवालों की वजह से।

कक्षा में जब भी शुचिता-एकनिष्‍ठता के सवाल को उठाने की कोशिश करता हूँ पाता हूँ कि द्वंद्व से ,ाुद ही मुक्‍त नहीं हैं सिखाएं कैसे...

फिर से पढ़ा जाए- शेष प्रश्‍न

स्वप्नदर्शी said...

I have been old fan of sharat babu, and shesh prshn has some interesting questions. They have a feminist appeal, but after two decades I am over him. The problem with sharat babu is that he opens a question on scholarly plane, and the quest for answers leads to shunning of logic, and it ends up in Utopian plane. More with the chareetrheen, and less in the Shesh Prashn there is undertone of male teaching and consistently defining morality to the disoriented females who have lost faith and ways of traditional life.

We are now in a new century, and today's enlightened, educated women have crossed that illogical trap of psychological trauma, what Sharat's heroins go through. Lets say our life is not revolving around one upendra babu, or Ashu babu or any such patriarch. We are not looking at their mercy.

सुजाता said...

हैरत होती है कि हिन्दी की स्त्रीवादी लेखिकाएँ शरत चंद्र को उद्धृत क्यों नहीं करतीं। क्या इसलिए कि वे स्त्री नहीं, पुरुष थे ?
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स्वप्नदर्शी जी की बात से सहमत हूँ।
अब शेष प्रश्न पढने की इच्छा है आपकी पोस्ट पढकर।
और पढकर अपनी ओर से इस प्रश्न का उत्तर खोजूंगी।

Pratibha Katiyar said...

कल इस पोस्ट पर कमेंट करते-करते जाने क्यों ठहर गई थी. शायद सिरा ही नहीं ढूंढ पाई थी. स्वप्नदर्शी जी ने सिरा भी दिया और बात भी कह दी पूरी तरतीब से. वक्त बहुत बदल चुका है. नये न$जरिये से चीजों को समझने की $जरूरत है. शरत बाबू भी आज अगर लिखते तो शायद कुछ और ही होता.

राजकिशोर said...

मेरी समझ में नहीं आता कि शरत बाबू आज लिखते तो वह किस आधार पर भिन्न हो सकता था। मैं यही तो कहना चाहता हूं कि शरत बाबू ने एकनिष्ठता के मुद्दे पर जो कुछ कहा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। अपनी ओर से निवेदन मैंने यही किया है कि एकनिष्ठता आज भी किसी का प्रिय मूल्य हो सकता है, जैसे कमल के समय में आशु बाबू का था। अर्थात एकनिष्ठता और इससे भिन्न दृष्टिकोण समान रूप से ग्राह्य हो सकते हैं और होने भी चाहिए। क्या मैं भी अपने समय से इतना पिछड़ गया हूं कि मेरी बात आउटडेटेड लग रही है 9

स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...

What has changed in last 100 years, and from the plot design of sharat babu is that we are not educated women of Bengali elite society of colonial era, who had secured source of income and activity limited to reading (sometimes writing). Their scholarship, intellectual activity had no social or economical value. Even all scholarly activities in Sharat/Ravi saahitya seems to be as a additional tool to attract male attention. The women have only one choice there; projecting their self in the mirror of a "male" desire. Shesh-prashn deals with this a little bit, about the economic dependency and her right to alimony on Utopian plane.

Today, we are more self-reliant, and aspire to full-fill our own ambitions and have opportunity to get social recognition and economic return of our mental/physical labor. Male/female partnership within the marriage or free of marriage is based on sharing a life together and therefore, demand more democratic families, equal and just treatment as a human being. We are the mirror of our own ambitions.

As far "eknisThtaa", this is a basic honesty in the contract of marriage and should be applicable for both men and women.

Its not a value, specially for widows/bachelors, or divorcees. Now, you can also see it as a matter of choice extending to this group, because sharing your life and heart is not a easy matter, and requires a lot of investment of time, efforts, and all other things. Its waste of time and energy to involve yourself in unnecessary relations.

varsha said...

एकनिष्ठता किसी काल खंड की नहीं बल्कि प्रवृत्ति की पैदाइश है . उस अनुराग की जो किसी को किसी से रहा है . मेरी भी समझ में नहीं आता कि शरत बाबू आज लिखते तो वह किस आधार पर भिन्न हो सकता था ? यह ज़रूर है की यह भावः स्त्री -पुरुष में कुछ ज्यादा कम हो सकता है.

अपूर्व said...

आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ..शरत जी मानवीय संबंधों और उनके मनोविग्यान के अद्भुत चितेरे थे..अनन्यता का भाव भक्ति और सूफ़ी साहित्य मे भी बड़ी शिद्दत से प्रतिध्वनित होता है..

राजकिशोर said...

सुजाता जी से मैं यह जानना चाहता हूं कि वे स्वप्नदर्शी जी की किस बात से सहमत हैं।
वैसे, जानना तो यह भी चाहूंगा कि स्वप्नदर्शी जी ने अपनी दूसरी टिप्पणी में क्या कोई ऐसी बात लिखी है जिसका मेरी मूल टिप्पणी से संबंध हो 9

Pratibha Katiyar said...

सवाल एकनिष्ठता के मुद्दे पर सहमत होने या नहीं होने का है ही नहीं. स्वप्नदर्शी जी की जिस बात से सहमत हूं उसी में जवाब भी है-We are now in a new century, and today's enlightened, educated women have crossed that illogical trap of psychological trauma, what Sharat's heroins go through.

Pratibha Katiyar said...
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स्वप्नदर्शी said...
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राजकिशोर said...

यही तो सवाल है कि हम इक्कीसवीं शताब्दी में हैं, तो 9 शरत बाबू की स्त्रियाँ कैसी थीं, उनके बंधन क्या थे आदि ऐतिहासिक प्रासंगिकता का मामला ठहरा। अपनी जानकारी बढ़ाने के लिेए ही मैं जानना चाहू हूँ कि उनकी कौन-कौन सी मान्यताएँ आज बेकार हैं और वे नई मान्यताएँ कौन सी है जिनका शरद बाबू से तारतम्य नहीं है। मु्द्दों को साफ नहीं किया जाएगा, तो हमें ईमानदारी से और अर्थपूर्ण ढंग से जीने में मदद कैसे मिलेगी 9 अस्पष्ट आरोप, अस्पष्ट तुलनाएँ, अस्पष्ट स्थापनाएँ तथा अस्पष्ट प्रतिपादन -- इनसे किसी को मदद मिल रही हो, तो वह खुशकिस्मत है।
मैंने यह नहीं कहा है कि एकनिष्ठता बहुत बड़ा मूल्य है। पर यह जरूर मानता हूं कि यदि कोई एकनिष्ठ है तो उसे लल्लू या बौड़म न माना जाए। इसी तरह यदि कोई एकनिष्ठ नहीं है तो उसे बदमाश या व्यभिचारी न बताया जाए। इसके पीछे उसके बेहतर तर्क हो सकते हैं।
जहाँ तक यूटोपिया होने का सवाल है, क्या हर श्रेष्ठ चीज अपने उच्चतम रूप में यूटोपिया ही नहीं है -- प्रेम ही नहीं, स्वतंत्रता, समानता, समाज, देश, धर्म, नैतिकता आदि भी 9 हम इक्कीसवीं शती में जी रहे हैं, इसलिए हम घमंड में अपने उन पूर्वजों को कूड़े पर फेंक नहीं सकते जिनके संघर्ष ने हमें इस शताब्दी तक पहुंचाया है -- अगर इक्कीसवीं का मतलब सिर्फ कैलेंडर से नहीं है।
मैं शरद चंद्र का दलाल नहीं हूँ, न मानसिक रूप से उनके युग में रहता हूं। सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि अगर शरद बाबू की कमल के तर्क अप्रासंगिक हो गए हैं, तो आज की कमल क्या कहती है 9 या, वह सिर्फ कपड़े बदल कर उन्हीं की बातें दुहरा रही है 9

सुजाता said...

इस परिदृश्य और बहस से कुछ दिन का अवकाश ले लेने के लिए क्षमा करें!
मै केवल इस बात से सहमत हूँ कि यह सम्भव है कि आज की स्त्री की उलझनें और समस्याएँ शरत की स्त्री से काफी कुछ अलग हैं और उनके लिए वह खुद अपनी वाणी अपनी भाषा मे कहना लिखना ज़्यादा बेहतर समझती है बजाए किसी को उद्धृत करने के, शायद इसलिए आज की लेखिकाएँ उन्हे उद्धृत नही करतीं।यह स्वप्नदर्शी जी की सोच है जो मुझे ठीक ही लगती है।
हर किसी का शरत को न पढना भी एक कारण हो सकता है :)नारीवादियों की पैरवी नही है आपके पूछने पर केवल यह सोचा कि क्या कारण हो सकता है?
यूँ रवीन्द्रनाथ के उपन्यास 'चोखेरबाली' के बोल्ड विषय पर तो मै गद गद हूँ ही,कोट भी करती हूँ उन्हें यह और बात है कि उसका अंत वे उस तरह बोल्ड नही कर सके।


कोई पूर्वाग्रह नही है बात केवल इतनी है कि अब स्त्री खुद कह सकने मे समर्थ है (कम से कम नारीवादी या पढने लिखने वालीं )इसलिए वे किसी को कोट करने की बजाए खुद विश्लेषण करती है,विचार करती है।
शरत को भी पढकर अवश्य अपनी प्रतिक्रिया बताऊंगी!

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