Monday, August 31, 2009

"सती प्रथा हमारी परंपरा"

सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी से रविवार डॉट कॉम के लिए आलोक प्रकाश पुतुल ने उनके पसंदीदा विषय क्रिकेट से लेकर जातिप्रथा और भारतीय सभ्यता तक कई विषयों पर बातचीत की। स्वाभाविक है, इसमें राजस्थान में घटित देवराला सती की घटना पर जनसत्ता अखबार में छपे उनके चर्चित संपादकीय पर भी बात हुई। आज से कोई 22 साल पहले 1987 में हुए देवराला सती कांड के समर्थन में छपा यह संपादकीय लंबे समय तक चर्चा में रहा। तब प्रभाष जोशी जनसत्ता के संपादक थे।

संपादकीय का एक अंश है-

‘जो लोग इस जन्म को ही आदि और अंत मानते हैं और अपने व्यक्तिगत भोग में ही सबसे बड़ा सुख देखते हैं उन्हें सती प्रथा कभी समझ में नहीं आएगी। यह उस समाज से निकली है जो मृत्यु को जीवन का सर्वथा अंत नहीं मानता, बल्कि उसे एक जीवन से दूसरे जीवन की और बढ़ने का माध्यम समझता है। ऐसा समाज ही सती प्रथा के उचित होने पर कोई सार्थक बहस कर सकता है। उसी हिसाब से अब सती प्रथा पर विचार होना चाहिए। मगर यह अधिकार उन लोगों को नहीं है जो भारत के आम लोगों की आस्था और मान्यताओं को समझते नहीं हैं। ऐसे लोग कोई फैसला देंगे तो उसका वैसे ही धज्जियां उड़ेंगी जैसे राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की दिवराला में उड़ी (दिवराला की सती- संपादकीय जनसत्ता)।’

रविवार डॉट कॉम में छपी इस ताजा बातचीत को पढ़ कर ताज्जुब होता है कि इन दो दशकों में, भारतीय समाज अपनी संरचना और सोच में इतना बदला है, पर प्रभाष जोशी की सोच वहीं ठहरी हुई लगती है। सती पर पछा गया सवाल और उस पर जवाब आप भी पढ़िए और गुनिए।

प्रश्न- मुझको आपका एक बहुचर्चित लेख याद आता है सती प्रथा वाला...

प्रभाष जोशी- मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है। अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया। सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां? सीता। सीता आदमी के लिए मरी नहीं। दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां ? पार्वती। वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए। उसके लिए। सावित्री। सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है। सावित्री वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया।

सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है. मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं। अब वो अगर पतित होकर... बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई। इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में। इसलिए वह घर में रहे। जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते। अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं।

आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है। मेरा मूल झगड़ा ये है।

11 comments:

स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...

आज के दौर मे "सती होना/करना" एक अपवाद है, और हिंदू धर्म को इससे मुक्ती मिल चुकी है, जहा कही राजस्थान वैगैरा मे है भी, वों अपने विशुद्द आर्थिक लाभ के चलते ये घटना होती है।
जो सर्वव्यापी है वों है सती का कांसेप्ट, वों ये की स्त्री अपने पति के जीवित रहते एकनिष्ट रहे। दूसरा सती की परम्परा से जुड़ा कांसेप्ट है, कौमार्य का।

विधवा-विवाह, तलाक, और दूसरा विवाह, ये आज के मध्य-वर्ग मे आसानी से पैठ बना चुके है। और स्त्रीयों का एक बहुत बड़ा तबका, प्रत्यक्ष- परोक्ष रूप से संपत्ति का हक़दार है। और आज के समाज मे स्त्री के लिए शिक्षा, ख़ुद कमाने के अवसर, किसी भी दूसरे काल से ज्यादा है।

Therefore, the "widow burning" is not the primary challenge for our generation. The primary challenge for women of my era are to widen their presence in social/technical/political spheres, combating all forms of mental, physical and political violence, democratization of families, and participation in the policy making and politics.

मेरी गुजारिश है की रविवार पर जाकर पूरा साक्षात्कार पढा जाय। कुछ जगहों पर स्त्री समुदाय की खामोशी और प्रभास जोशी पर "जूतम-पैजार" मे शामिल न होने पर भी लोगो ने बैचैनी जतायी है। प्रभास जोशी हो या फ़िर कोई और, उनकी आलोचना ज़रूर होनी चाहिए, परन्तु इस आधार पर नही की एक भगवान् राक्षस हो गया की टोन पर। "जिस सम्पादकीय की आपने ज़िक किया है" वों श्री बनवारी का लिखा हुया है, प्रभास जोशी का नही।

एक बात का क्रेडिट प्रभास जोशी को देना पडेगा "
उन्होंने स्त्री को, विधवा को चिता पर जलाने को "सती और परम्परा "का हिस्सा नही मना है, और अपने ही उदाहरणों से, अपनी ही जमीन पर खड़े हो कर एक परिभाषित किया है। दूसरा उन्होंने, "सती-प्रथा" का कारण संपत्ति से विधवा की बेदखली का एक सुलभ रास्ता बताया है। तीसरा ये की ये पूरे हिन्दुस्तान मे सर्वव्यापी नही है, विधवा विवाह, कई ग्रामीण समाजो मे प्रचलित है, और कुछ इसी तरह से की घर की सम्पति घर पर रहे की तर्ज़ पर।

इन तीनो कारणों को सती-प्रथा का सीधा समर्थन नही माना जा सकता है।

मुझे लगता है की प्रभास जोशी नही, बल्की सती-प्रथा की ऐतिहासिक समीक्षा, फेमिनिस्ट द्रिस्टीकोण से होनी चाहिए, एक लगातार बदलते ऐतिहासिक परिपेक्ष्य मे।

आर. अनुराधा said...

भारत में मनोरंजन की दुनिया के बाहर आइकॉन्स की, रोल मॉडल्स की वैसे ही कमी रहती है।

पत्रकारिता में पढ़ाई के दौरान और आज भी अपने समकालीन वरिष्ठ जनों की तरफ हम पूरे विश्वास और ढेरों उम्मदों के साथ देखते रहे हैं। ऐसे में किसी जिम्मेदार और प्रभावी वरिष्ठ को जब समाज के सकारात्मक बदलाव की धारा के खिलाफ जाता देखते हैं तो दुख होता है कि उन्हीं का किया-धरा सकारात्मक तो नकारात्मक में बदला जा रहा है।

सचमुच उस इंटरव्य को पूरा पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने कई और जगहों पर समाज को सदियों पीछे धकेलने लायक बातें कही हैं। अगर पूरी चैतन्य अवस्था में वे यह सब कह रहे हैं तो मैं साफ कहती हूं कि इस व्यक्ति ने अपने जीवन में चाहे जितनी ऊंचाइयां छुई हों, पर उनका मूल विचार ही गलत और सदियों पुरानी समाज-व्यवस्था का समर्थन करता लगता है जिसकी हम चोखेर.. से लेकर हर जगह लगातार लानत-मलामत कर रहे हैं।

मैं प्रभाषजी या किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं लेकिन उस विचार के खिलाफ लिख रही हूं जो ऐसे व्यक्ति के नाम से जड़ु गया है जिसके कहने-लिखने का असर गहरा और दूर तक होता है।

सही कहा है कि सती पर चर्चा अब उतनी सामयिक और जरूरी नहीं रह गई है लेकिन सती को अगर कोई सोचने-समझने वाला व्यक्ति किसी भी देश के लिए सहज घटना समझे और उसमें सुधार के प्रयास को 'अंग्रेजों की नजर से किया गया काम' बताए तो क्या कहा जाए?

और, विधवा को परिवार की संपत्ति से बेदखल करने या उस संपत्ति पर पुरुषों का हक बना रहने (घर की घर में रहने) देने के इन तरीकों का क्या स्वप्नदर्शी समर्थन कर रही हैं?

Sanjay Grover said...

agar ye sampadkiye Banvari ne likha tha to Prabhash Joshi ke nam se kaise chala gaya? Iska ek matlab yeh bhi hota hai ki Prabhash Joshi ek laparwah sampadak the. Iska dusra matlab hota hai ki hindi akhbaroN me apne nam se dusroN ka likha chhap lene jaisi ghatiya parmparayeN chalti haiN jiska ek gandhiwadi sampadak ne na to kabhi virodh kiya na hi unhehn rokne-badalne ki koi koshish ki. Iska teesra matlab yeh bhi nikalta hai ki Banwari aur anya logoN ne kai aise bhi sampadkiye likhe honge jinka labh unheN milne ki bajaye Prbhash joshi ko mila hoga.
ab ye sach to Banwari hi bata sakte haiN ki unheN apne kiye ki saza mil rahi hai ya we bali ka bakra bane hain !!??

स्वप्नदर्शी said...

और, विधवा को परिवार की संपत्ति से बेदखल करने या उस संपत्ति पर पुरुषों का हक बना रहने (घर की घर में रहने) देने के इन तरीकों का क्या स्वप्नदर्शी समर्थन कर रही हैं?

Bilkul nahee,

The argument here is that "widow burning" is not prevalent and it is not the central dogma of Indian culture

आर. अनुराधा said...

संपादकीय किसी के नाम से नहीं जाता है। उसे संपादक के अलावा कोई अन्य भी लिख सकता है जिसे संपादक नियुक्त करता है और जिसकी दिशा बाकायदा बैठक में संपादक ही तय करते हैं। यानी पर्दे के पीछे चाहे जिसने लिखा हो, किसी पत्र-पत्रिका के संपादकीय का क्रेडिट उसके संपादक को ही जाता है। और वही उसके हर शब्द-वाक्य के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होता है।

सती की घटनाएं- widow burning, अब नहीं होती हैं, वैसे ही जैसे छुआ-छूत अब महानगरों में खुले-आम नहीं होता। या मिसाल के तौर पर पोलियो दुनिया के कई देशों से गायब है। क्या इसका मतलब यह है कि अब उसे बुरा नहीं माना जाना चाहिए? या उसे अपनी संस्कृति का हिस्सा मानना...?! क्या कोई विद्वान इसकी चर्चा एकदम निरपेक्ष होकर असंपृक्त होकर कर सकता है?!

"सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है।" और यह मानना कि अपने देश की इन परंपराओं को अंग्रेजों की नजर से देखना...! क्या पोलियो, कोढ़,टीबी को हम "विदेशियों की नजर" से नहीं देखते? तब हम यह कहें कि कोढ़ियों को गांव-बस्ती से बाहर करके उनको अपने से दूर करके अलग उनके हाल पर छोड़ देना हमारी परंपरा है उसे विदेशी नजर से नहीं देखना चाहिए!

वैसे सती के खिलाफ सबसे ज्यादा सक्रिय रहे राजा राम मोहन राय विदेश में पढ़े ही सही, पर भारतीय थे और यहां की संस्कृति से अच्छी तरह वाकिफ भी।

और सबसे बड़ी सती सीता को इसलिए नहीं कहा गया कि आखिर आजिज आकर उन्होंने खुद ही पति परमेश्वर को तज दिया और 'आत्महत्या' कर ली। (इस बात से किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंची, तो माफ करें, ऐसा कोई इरादा नहीं है)। वे सती इसलिए कि पति के साथ दर-दर की ठोकरें खाईं, रावण के घर रह कर उसे देखा तक नहीं और अपनी पवित्रता साबित करने के लिए आग से भी गुजर गईं। और जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम पति ने गर्भवती होने की हालत में धोखे से अकेली, जंगल में छोड़ दिया। और दूसरी बड़ी सती पार्वती जो पति के गौरव सम्मान के लिए खुद जल गई। यह सब तो प्रभाषजी ने खुद कहा है।

Asha Joglekar said...

kisi bhee jiwit wyakti ka jinda jalane ya jalane dene ka samarthan mai to kabhee nahee krungee chahe prabhas joshee kahen ya koee aur. parmpara bhee agar buree ho to badalana hee chhiye.

Sanjay Grover said...

ji bilkul anuradhaji, main bhi yahi kah raha hun ki sampadkiye men kisi ka nam nahin jata. par jab kisi aur ke achchhe likhe ka credit aap lenge to bure ka dusre par kyon dalenge!!?? aur agar aapne wo sampadkiye likha hi nahin tha to bees sal bad 'mera mul jhagda' kahte huye 'safai' kyoN !!??? aur 'safai' bhi aisi ki jisme aapke asli vichar chhalak-chhalak ja rahe hain.

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Ek ziddi dhun said...

मैंने प्रभाष जोशी का यह जहरीला साक्षात्कार जब ब्लॉग पर डाला तो उनके चेले, संघी और ब्राह्मनादी लोग कोई तर्क न पाकर गाली-गलौज और हास्यास्पद बातें करने लगे थे. इस काम के लिए बड़े अनाम से ब्लोगों का भी सहारा लिया गया. लेकिन मुझे सबसे बड़ी हैरान यह थी कि स्त्री ब्लोगरों को कम से कम सती वाले मसले पर (वैसे तो पोर ही ब्राह्मणवाद पर) तो चुप नहीं रहना चाहिए था. अनुराधा को सलाम.

Unknown said...

ANURADHA MAM U ARE GREAT

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