Friday, September 11, 2009

कहानी नहीं सच

सुनने में यह कहानी लग सकती है लेकिन है यह सौ फीसदी सच। नाम-वाम भी पहचान छुपाने के लिए बदले नहीं गये हैं।
उसका नाम अर्चना है। उम्र 26 साल। शादी को आठ साल होने को हैं। एक सात साल की बेटी है। पति का नाम अमित कुशवाहा।
अर्चना अपनी मासूम सी खूबसूरत सी बच्ची के साथ जब अखबार के दफ्तर में दाखिल हुई तो उत्सुकता बस बच्ची को प्यार करने की हुई। लेकिन ज्यों-ज्यों अर्चना की जिंदगी के पन्ने खुलने शुरू हुए मेरी निगाहें सिर्फ उस नन्ही बच्ची मल्लिका पर टिकी थीं कि कैसे वह मां का आंचल थामे सब कुछ सुन, देख समझ रही है। अर्चना की शादी आठ साल पहले हुई। वह गांव की गरीब लड़की है। पांच बहनें। पिता किसान। कानपुर के अमित का रिश्ता पहुंचा। अमित उस वक्त होटल ताज (लखनऊ) में काम करता था. पिता ने कुछ बीघा खेत बेचा और बेटी की शादी अच्छे घर में कर दी. साल भर के अंदर ही अच्छे घर की हकीकत अर्चना को दिखने लगी. पति की पहले ही दो शादियां हो चुकी थीं. दोनों बार तलाक लिया जा चुका था. पहले तलाक के मामले में महाशय पति तिहाड़ जेल की हवा भी खा चुके थे. लेकिन उन्हें बार-बार शादी करने की आदत है. गांव की लड़की चुपचाप पड़ी रहेगी और उसकी बाकी कारगुजारियों पर बोलेगी नहीं यही सोचकर उसे लाया गया था. अर्चना एक बच्ची की मां बनने वाली थी तब उसने कुछ बातों का विरोध किया. इन गलत बातों में मारपीट, आधी रात को घर से बाहर निकाल देना, सर फोड़ देना, प्रेगनेंसी के दौरान पेट पर मारना, भूखा रखना, कमरे में बंद करके रखना आदि शामिल था. दरअसल, पति मूलत: चरित्रहीन है.
जैसे-तैसे अर्चना कानपुर का घर छोड़कर लखनऊ आ जाती है। यहां भी अमित का घर है. वह वहीं रहकर बेटी को पढ़ाती है. अर्चना खुद सिर्फ इंटर पास है. दो बार तलाक के मामलों में घिर चुका अमित अब शातिर हो चुका है. उसने पत्नी से कहा, सात साल बीतने दो तब बताऊंगा. उसे डाउरी एक्ट का इल्म है. कानूनी दांवपेंच वह जानता है. एक साल से पत्नी के साथ नहीं रह रहा है. बेटी की फीस सीधे स्कूल में जमा करवाता रहा है जो अब बंद है. एरिया की पुलिस उसके शिकंजे में है. नौकरी उसने छोड़ दी है ताकि कम से कम मुआवजा देना पड़े.
वैसे महाशय की तैयारी एक्सपार्टी डिवोर्स की थी. खबर मीडिया में आने से केस बदल तो गया है लेकिन उसका असली रूप सामने आ चुका है. वह चौथी शादी की तैयारी में है. अमित का कहना है कि अगर अर्चनाचुपचाप मुंह बंद करके रहे, उसकी और उसकी मां की सारी बातें मानें, घर से बाहर बिना पूछे कदम भी न रखे, घर में हमेशा घूंघट में रहे, पति से कोई पूछताछ न करे, उसकी हर बात माने, सारे रीति-रिवाजों का पालन करे तो वो अर्चना को साथ रखने के बारे में सोच सकता है। ऐसा कहते वक्त अमित की आंखों का दंभ और उसकी बेटी मल्लिका की मासूमियत दोनों मेरे सामने थे।
यह इक्कीसवीं सदी का सच है। किस कानून से बदलेंगी मानसिकताएं?
- प्रतिभा कटियार

17 comments:

चण्डीदत्त शुक्ल-8824696345 said...

अद्भुत कथा है...रोंगटे खड़े करने वाली...एक बार जिसका हाथ थामा, उसका साथ देने का हौसला नहीं...बल्कि नीयत ही नहीं...। भगवान ही ठीक करेगा ऐसे लोगों की बुद्धि। मेरी दुआ...पीड़ित को इंसाफ़ मिले।

संजय तिवारी said...

लेखनी प्रभावित करती है.

Dipti said...

ऐसे कई केस हमारे आसपास बिखरे पड़े है। मेरी एक कज़िन को तो इससे मुक्ति मौत के साथ मिली है। सात साल तक उसके ससुरालवालों ने इंतज़ार किया और फिर उसे जलाकर मार दिया। बहन की सास मेरे भांजे को लेकर फरार है और चाहती है कि केस दबा दिया जाएं तब ही उस बच्चे को हमें सौंपेगी।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

पूरा समाज ही दोषी है , हम लोग इन बातो पर खूब चर्चा तो कर लेते है लेकिन जब अपनी बारी आती है तो सब भूल जाते है !

दिनेशराय द्विवेदी said...

दुनिया पुरुषों की है क्यों कि औरतें भ्रम में हैं कि वे कमजोर हैं।

Pratibha Katiyar said...

दिनेश जी,
औरतें अपनी ताकत पहचान रही हैं तो भी मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं. उस लड़की ने हिम्मत से विरोध किया. कम पढ़ी-लिखी, गरीब होने के बावजूद अन्याय के खिलाफ खड़ी हुई है. अपनी नन्ही बच्ची के साथ. फिर भी उसके हिस्से क्या आ रहा है. अभी-अभी तुरंत खबर मिली है कि उसे सड़क पर घसीटकर मारा गया है. वह रिपोर्ट लिखवाने के लिए भटक रही है....

Unknown said...

इस कहानी में ऐसा नया कुछ भी नहीं हां यह बात जरूर है कि घटना सामने आ गयी इसलिए मलाल जरूर होता है । लेकिन मेरा मानना है कि ऐसी घटना में महिलाओं की भागीदारी कुछ कम नहीं होती है । जिसके बारे हम सब कुछ जानते हुए भी शादी कर देते हैं फिर बाद में ऐसी स्थिति होने पर रोना रोते हैं । मामला कुछ दिन गरमाया जरूर रहेगा पर बदलाव की कोई किरण शायद ही हो ।

स्वप्न मञ्जूषा said...

'इसमें नया कुछ भी नहीं है' यह एक वाक्य नहीं हंटर है...
अफ़सोस कि इस हंटर का असर नहीं है. हम तो त्याग की ऐसी मूर्ती बन चुके हैं कि सिर्फ त्याग ही बाकी रह गया है मूर्ती तक गायब है..
पत्नी का स्वाभिमान, उसकी इच्छाएं किसे कहते हैं ? आज भी ये शब्द अ-परिभाषित हैं,....

Fauziya Reyaz said...

ye sirf archana ki kahani nahi hai....na jane kitni archana apni zindagi isi tarah guzaar rahi hain aur yahi ummeed aane wali peedhi se bhi ki jaati hai ki khaamosh raho sehte raho...padh kar behad dukh hua

Chandan Kumar Jha said...

बहुत ही मार्मिक घटना ।

स्वप्नदर्शी said...

This is very unfortunate, not only in terms of what has happened, but also
because after all these events Archana wishes to live with this men, and divorce which could have been ideally a mean for her to get rid of this family, has turned into a threat of her very existence.

Is there a way out for her? I wonder, is living within this marriage is only options she has?

What could be the role of Rastreey Mahila Aayog in this scenario?

Pratibha Katiyar said...

स्वप्नदर्शी जी,
अर्चना अमित के साथ नहीं रहना चाहती है. वो तलाक चाहती है लेकिन आर्थिक सुरक्षा के साथ. पति ऐसा चक्रव्यूह रच रहा है कि उसे कुछ न देना पड़े. नौकरी भी इसीलिए छोड़े बैठा है.अर्चना के सामने अपने बेटी का भविष्य है. इसी वजह से इस लड़ाई को आर्थिक लड़ाई का रूप भी दिया जा रहा है. राष्ट्रीय महिला आयोग की सक्रियता का हमें भी इंत$जार है. वैसे कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से कल उसकी एफआईआर दर्ज हो गयी है.

शोभना चौरे said...

kitna asan hai yh kh dena ki ye nya nhi hai.pata nhi log kitni asani se ak mhila ki tklif ke bare me kh dete hai ye jumla .vo isse bhi jyda kduva sach dekhne aur sunne ki aas lgaye baithe hai .
sach to yh hai ki jitna samaj tthakthit aadhunikta ki or badh rha hai aisi ghtnaye aur bdhti hi ja rhi hai .iska taja udaharn hai kirn bediji ka t.v. dharavahik apki kachhri jise dekhkar rongte khde ho jate hai .
archnaji ne himmt dikhai hai anyay ke khilaf shayd ham prtyksh rup se unhe madad chah kar bhi nhi de ske .
kintu shbdo se to unki himmt na tode .

आर. अनुराधा said...

ऐसे मामलं में संस्थाओं को आगे आना चाहिए। अगर हममें से ही कोई ऐसी संगठन को जानता हो जो ऐसी महिलाओं की मदद कर सके, तो उसे सामने लाए। सिर्फ आर्थिक या रोजगार की नहीं, कानूनी मदद की भी जरूरत होगी अर्चना को।

इसके सामाजिक पहलुओं पर भी जमीनी विचार-विमर्श की जरूरत है।

Pratibha Katiyar said...

Yes, that can be a real help for the lady...looking forward for...

स्वप्नदर्शी said...

thanks Pratibha for your reply and best of luck for Archna.

I agree with Anuradha, and what could be possibilities?

sangeeta said...

kis kaanun se badlegi mansikta...
ek aur news hai ki gurgaon ke ek vyakti ne apni patni aur teen maheene ke bachhe ko asault kiya aur abandon kar diya kyuki bachha ek congenital condition se peedit hai....bachhe ki parvarish aur ilaaj itan bhaari kyon laga raha hai ....yeh maansikta ki baat hai....vyakti ki bhi aur samaj ki bhi..

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