Sunday, September 13, 2009

सीढ़ियों पर मौत

इज्जत बचाने की खातिर
राजकिशोर



‘बलात्कारी जब ऐन सामने हो और तुम उसे रोकने में असमर्थ हो, तो उसका विरोध मत करो, नहीं तो वह और खूँखार हो जाएगा। वह तुम्हारी जान भी ले सकता है।’ – आजकल लड़कियों को यही सलाह दी जा रही है। मेरी राय अलग है। इस मामले में मैं परंपरावादी मत से इत्तेफाक रखता हूँ कि चाहे जान चली जाए, पर जब तक होश है, बलात्कारी की मंशा पूरी न होने दो। जब पुरुषों को यह पता चल जाएगा कि वे किसी जीवित स्त्री से नहीं, उसके शव से ही बलात्संग कर सकते हैं, तो बलात्कार की संख्या निश्चित रूप से कम होने लगेगी। यही राय महात्मा गांधी की थी और उनके सोच के आधार पर ही मैंने अपना मत बनाया है।

ग्यारह सितंबर को जमुना पार दिल्ली के खजूरी खास के राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की भगदड़ में पाँच लड़कियों की मौत के हादसे के बाद मेरा यह मत और पुख्ता हुआ है। इन भगदड़ और इन मौतों की पृष्ठभूमि में और भी बहुत-से कारण होंगे ही। जिस बात को मैं यहाँ रेखांकित करना चाहता हूँ वह यह है कि लड़कियों को अपनी इज्जत बचाने के जो नुस्खे बताए जाते रहे हैं, वे बुरी तरह फेल हो चुके हैं और अब हमें लड़की की इज्जत को नए तरीके से परिभाषित करना चाहिए तथा इज्जत बचाने के नए तरीके भी खोजने चाहिए। ऐसा न होने के कारण ही उन पाँच लड़कियों की मौत हुई। वे तथा उनके साथ पढ़नेवाली लड़कियाँ दुराचारी लड़कों के खौफ से इतनी विक्षिप्त थीं कि उन्होंने जान पर खेल कर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश की। काश, उन्हें जान देने का दूसरा तरीका भी बताया गया होता।

वे लड़के, जो मौका पाते ही लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगे थे, निश्चय ही हिंसक होंगे। उनमें से कुछ के पास चाकू भी था। लेकिन लड़कियों के डर जाने के लिए शायद इतना ही काफी था कि वे लड़के हैं और उनके इरादे ठीक नहीं हैं। इस तरह की मुठभेड़ अकेले में हो, तब भी लड़की के लिए यह जाना हुआ होना चाहिए कि पाशविक बल के सामने उसे किस तरह पेश आना है। हैरत और तकलीफ की बात यह है कि स्कूल में उस समय लड़कियों की संख्या कम नहीं थी, लेकिन इस सामूहिकता के बावजूद छेड़ी जा रही लड़कियों में यह हिम्मत क्यों नहीं पैदा हुई कि वे बदमाशों को उचित जवाब दे सकें? अन्याय को सहन न करने का साहस दिखाने पर गुत्थमगुत्शी भी हो जाती, तो कोई हर्ज नहीं था। लेकिन लड़कियों को शरीर-कातर होने की सीख इस कदर घुट्टी में पिला दी गई है कि उन्हें लगा होगा कि प्रतिकार के परिणामस्वरूप पुरुष शरीर के स्पर्श का पाप उन्हें ढोना पड़ सकता है। घर लौटने पर उन्हें यही उलाहना सुनना पड़ेगा कि तुम उन बदमाशों से उलझने क्यों चली थीं – तुम्हें अपना दामन बचा कर वहाँ से चुपचाप खिसक लेना चाहिए था। लड़कियों के सिर पर हमेशा लटकनेवाली इसी अविवेकी डर की तलवार ने उन्हें कमजोर और कायर बना दिया होगा, जिसका मनहूस नतीजा एक पागल भगदड़ और पांच लड़कियों की मौत में निकला। जो डर कायर बना दे, उसे निकट के डस्टबिन में फेंक आना चाहिए। इज्जत की जो परिभाषा लड़कियों को अपने पर शर्मिंदा होना सिखाए, उस परिभाषा की शहर के सबसे बड़े मैदान में सामूहिक अंत्येष्टि कर देनी चाहिए।

पुरुष से सभ्य होने की माँग लाजिमी और अनिवार्य है। पुरुष की असभ्यता की भर्त्सना तब तक निरंतर होनी चाहिए जब तक उसका पासंग भी बचा रहता है। लेकिन दुनिया भर की स्त्रियाँ क्या तभी चैन की साँस ले सकेंगी जब दुनिया के सारे पुरुष यकीनन सभ्य हो जाएँगे? क्षमा करें, वह खूबसूरत सुबह कभी नहीं आएगी। शायद यह आदमी की फितरत में ही नहीं है। इसलिए स्त्रियों के लिए इज्जत से जीने के संघर्ष के उस दूसरे सिरे की भी इतनी ही फिक्र करना लाजिमी और अनिवार्य है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी रक्षा के लिए खुद भी जिम्मेदार होता है। व्यक्ति की इसी जिम्मेदारी को मान्यता देने के लिए हम सभी को आत्मरक्षा का अधिकार मिला हुआ है। कानून यह है कि अपनी रक्षा करने के लिए मुझे जितने भी लोगों की जान लेनी पड़े, मैं ले सकता हूँ। यह मेरे जीवन धारण करने के अधिकार के तहत आता है और इसके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता।

जो बात जीवन के बारे में सही है, वही उन चीजों के बारे में भी जिन्हें मिला कर जीवन बनता है। अगर मुझे डरा-धमका कर किसी ने मेरा सामान छीन लिया, मुझे अपने घर से बेदखल कर दिया, मेरे साथ शारीरिक अतिक्रमण किया, तो मैं सिर्फ जिंदा रह कर क्या करूँगा? ऐसे जीने को धिक्कार है जिसमें स्वाभिमान न हो। स्त्रियों के लिए यह और भी ज्यादा सच है, क्योंकि उनके साथ शारीरिक अतिक्रमण का खतरा अकसर मौजूद होता है। ऐसी कठिन घड़ियों में आत्मरक्षा के अपने जैविक अधिकार की याद आनी ही चाहिए। इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अगर जान भी चली जाए, तो खुशी-खुशी दे देनी चाहिए।

इस तरह, मामला सिर्फ बलात्कार या बेइज्जती से बचने-न बचने का नहीं रह जाता। यह अस्तित्व की स्वतंत्रता और स्वाभिमान का मामला हो जाता है। अतिक्रमण का सामना करने के मामले में हमें चूहा नहीं, शेर बनना सीखना पड़ेगा, नहीं तो हमारा अपमानित होते रहना निश्चित है। जरूरी है कि हर माँ-बाप अपने बेटे-बेटी को, बेटियों को तो जरूर ही, शुरू से यह प्रशिक्षण देते रहें कि अन्याय के सामने झुकना नहीं है, उसका विरोध और प्रतिकार करना है। अपनी ओर से न हिंसा करनी है न हिंसा को प्रोत्साहन देना है, पर जायज उद्देश्य के लिए हिंसा करने से डरना नहीं है। ऐसा अनुशासन और प्रशिक्षण ही सभ्यता को सचमुच सभ्य बना सकेगा। मेरी अपनी बेटी कभी ऐसे किसी हादसे का शिकार हो कर आँसू बहाते हुए घर लौटी, तो मैं उससे यही कहूँगा कि इससे अच्छा था कि बलात्कारी का प्रतिकार करते हुए तू अपनी जान दे देती। 000

23 comments:

ab inconvenienti said...

ये लड़के स्लम एरिया के थर्ड ग्रेड परिवारों से थे, स्लमडॉग्स से उम्मीद भी क्या की जा सकती है. जहाँ मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के बच्चे पढने जाते हैं वहां छेड़छाड़ नहीं होती. ये लोग ही samaaj ka नासूर हैं.

आर. अनुराधा said...

स्लमडॉग, समाज का नासूर!?? शर्मनाक है ऐसी सोच जो गरीबों के लिए ऐसा नजरिया रखती है। क्वैया नोएडा के पंधेर तथाकथित स्लमडॉग थे, गरीब थे जिन्होंने अपनी शारीरक हवस के लिए मासूम लड़कयों की जानें तक ले लीं और अब व्यवस्था मे भी अपने बचने की राहें निकाल रहे हैं जबकि उनका साथ देने वाला नौकर ठगा सा महसूस कर रहा है कि उसकी उम्रकैद माफ नहीं हो पाई और उसके मालिक-साथी ने भी कोई मदद नहीं की।

गरीब होना कोई अपने लिए चुनता नहीं है, बल्कि यह एक तुलनात्मक स्थिति है। आज के जमाने की विश्वव्यवस्था पूरी तरह से आर्थिक मानकों, कारकों पर निर्भर है। ऐसे में ab inconvenienti ऐसी सोच रखते हैं तो इसमें उनकी कुपढ़ता के अलावा माहौल का भी दोष है।

जहां तक लेख का सवाल है, मैं सहमत हूं और राजकिशोर जी के जज़्बे की कद्र करती हूं कि वे अपनी बेटी से भी ऐसी अपेक्षा रखते कि वह अपनी रक्षा के लिए जान की परवाह न करे।

लेकिन मूल सवाल यह है कि वे लड़के शारीरिक चोट नहीं बल्कि 'शारीरक शोषण' करना चाहते थे। और इसे वे अपना सहज अधिकार समझ रहे थे। क्या ऐसा कोई समय आएगा जब लड़कियां या महिलाएँ अपने शरीर को इतना महत्व देना ही छोड़ देंगी कि लड़कों को इस तरह की छेड़-छाड़ मुर्दे से छेड़-छाड़ जैसी लगने लगे और वे इससे उकता जाएं।

वे छेड़ते हैं तो लड़कियां छिड़ती क्यों हैं? हालांकि यह सदियों की ट्रेनिंग है इस फ्रेम के बाहर सोच पाना बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी सोच कर देखें कि महिलाओं का शरीर ही इतना वल्नरेबल क्यों होता है, पुरुषों का क्यों नहीं।

और यकीनन यह शाररिक ताकत की बात नहीं है।

स्वप्नदर्शी said...

"क्या ऐसा कोई समय आएगा जब लड़कियां या महिलाएँ अपने शरीर को इतना महत्व देना ही छोड़ देंगी कि लड़कों को इस तरह की छेड़-छाड़ मुर्दे से छेड़-छाड़ जैसी लगने लगे और वे इससे उकता जाएं।"

@anuradha
This is only possible for a dead body and not for living soul. The sexual violence is the worst form of violence, it can hurt simultaneously, at multiple level, physical, mental, emotional, and at worst hits your soul in long term. Resistance against any violence is must whatever it takes, in this respect my opinion is close to Mr. Rajshekhar. Surrender is not the option here.

Women should carefully look after their health in general, should wear cloths and shoes that are comfortable (enough to run), should be prepare to combat if needed, and every women should have some training in marshal art, if nothing else it will boost confidence. And above all these trainings can equip them to make quick decisions and assessments.

And collectively we have to continuously pressurize our political and legal system to identify these problems and punish the guilty. It is not the difference in physical strength that makes women venerable, it is the failure of our social and legal system to take such offenses lightly, and men feels that they have a license to commit these acts.

आर. अनुराधा said...

मेरा इस बात से इनकार नहीं कि अपनी रक्षा करने के स्थान पर सरेंडर करना गलत है। लेकिन यह विचार मैंने रखा है कि क्यों ऐसा हो कि महिलाओं को अपने शरीर इस तरह पुरुष की 'नजर से भी' बचा कर रखने की सीख दी जाती है। और निस्चित रूप से कोई, किसी पुरुष को पीटता है तो जो चोट लगती है, वह बलात्कार या उसके इरादे यया छेड़-छाड़ भर से भी कहीं कम दर्दनाक और जल्द भुला दिए जाने के काबिल होता है। पर ऐसा क्यों है, कि पुरुष सिर्फ शारीरिक घाव पाता है, जो कि भर भी जाता है। लेकिन ऐसी किसी घटना में स्त्री का मन और पूरा जीवन ही छिल जाता है, जिसकी हीलिंग शायद ही कभी हो पाती है।

क्या प्रकृति ने औरत को ऐसा बनाया या समाज ने सिखाया कि औरत का शरीर ऐसा है, उसका एक पक्ष दुरुपयोग करे और दूसरा पक्ष उसे संभालने, छुपाने, बचाने के तरीते घुट्टी में लगातार देता रहे?

यह मेरा विचार नहीं बल्कि सवाल है और इसका जवाब पाने को उत्सुक हूं, पूरा न सही, अधूरा ही सही।

राजकिशोर said...

लड़कियो, औरतो, माताओ, बहनो, बेटियो, बलात्कार को तुम तभी सही परिप्रेक्ष्य में ले सकोगी, जब इसे शारीरिक हिंसा का एक प्रकार समझो। बलात्कारी पुरुष के लिए इसके एक से अधिक आयाम होंगे। पर तुम्हारे लिए यह शारीरिक चोट से ज्यादा कुछ भी नहीं होना चाहिए। इस चोट के निशान तुम्हारी आत्मा तक चले जाएँ, यह तुम्हारी कमजोरी है और सामाजिक मान्यताओं की रुग्णता जिसके कारण तुम्हारे मन में स्थायी क्षति की बात बैठ जाती है। अगर मेरे साथ कभी ऐसा हुआ, तो मुझे अपने तईं अफसोस यह होगा कि मैं जबरदस्ती करनेवाले का पर्याप्त प्रतिरोध क्यों नहीं कर सका। लेकिन कोई पाशविक बल के आधार पर मेरे साथ जबरदस्ती कर बैठता है, तो इसमें मेरे लिए लज्जित होने की बात कहाँ है 9 चीता या भेड़िया हमेशा मुझसे अधिक मजबूत रहेगा।

इसलिए स्वप्नदर्शी के इस सुझाव से मैं सोलह आना राजी हूँ कि हममें से प्रत्येक को आत्मरक्षा की कलाएँ सीखनी चाहिए (यह शिक्षा बचपन में ही मिलनी चाहिए), क्योंकि हमें अभी हजारों साल तक मानव रूपी पशुओं के बीच ही रहना है। ये कलाएँ पुरुषों को भी सीखनी चाहिएँ ताकि वे गुंडों और आकस्मिक हिंसा से अपना बचाव कर सकें। इसके साथ ही, मन से निडर होना और अहिंसक प्रतिरोध की तैयारी करना भी आवश्यक है। आखिर लश्क्ष्य तो हिंसा की संस्कृति को समाप्त करना ही है, नहीं क्या 9

बलात्कार को हौआ बनाए रखने से स्त्री हमेशा घाटे में रहेगी। वह हमेशा यही समझेगी कि किसी ने मुझे छू लिया या मेरी छाती पर या मेरी कमर पर हाथ रख दिया, तो मेरी इज्जत चली गई और बलात्कार कर दिया तो मेरी इज्जत लुट गई।

हर आदमी की इज्जत उसके अपने कर्मों से तय होती है, तय होनी चाहिए -- उसके साथ दूसरे क्या करते हैं या कर बैठे हैं, इससे नहीं। अभी इज्जत का जो पैमाना है, उसके अनुसार अगर बलात्कृत महिला की इज्जत लुट गई तब तो बलात्कारी की इज्जत बढ़ गई होगी। ऐसा कैसे हो सकता है 9 औरत का ही नहीं, हरएक का शरीर मूल्यवान है और समान रूप से मूल्यवान है। यह उसकी निजता है। जैसे कोई मुझसे पूछे बिना मेरे कमरे में नहीं घुस सकता, वैसे ही किसी को भी -- पुलिस और सेना को भी नहीं -- मेरा शारीरिक अतिक्रमण करने का अधिकार नहीं है। बलात्कार की परिभाषा इसी आधार पर तय की जाए तो अच्छा रहेगा। बलात्कृत के लिए इसका कोई यौन संदर्भ नहीं होना चाहिए। नहीं तो फालतू के सदमे लगते रहेंगे और समस्या का समाधान निकल नहीं पाएगा। औरत का शरीर ज्यादा वलरनेबल है, क्योंकि वह कामना का विषय है। लेकिन यह औरत को अपने व्यवहार से बताना है कि बेटा, कामना है तो नजदीकी पाने की कोशिश प्रेम के बल पर करो, हिंसा के बल पर नहीं। हिंसा करने की कोशिश करोगे, तो तुम्हारे लिए मेरे पास जूतों के अलावा कुछ और नहीं हो सकता। यह मत समझना कि तुम पुरुष हो, इसलिए मैं तुमसे डर जाऊँगी और हाय दैया या ओ गॉड कह कर नरवस हो जाऊँगी और तुम जो चाहोगे, कर गुजरोगे। और यह भी मत समझना कि संघर्ष के दौरान तुम मेरे किसी अंग पर हाथ रखने या उसे मसलने-कुचलने में कामयाब हो गए, तो मेरी कुछ तो इज्जत चली ही जाएगी। मेरी जूती ! मेरी इज्जत मेरे समूचे व्यक्तित्व के साथ जुड़ी हुई है, मेरे किसी एक या सभी अंगों के साथ नहीं। तुम अपनी इज्जत की फिक्र करो। मेरी इज्जत मेरे हाथ में है, उसे नष्ट करना तुम तो क्या, तुम्हारे बाप के लिए भी संभव नहीं है।

जिस दिन स्त्री व्यक्तित्व में यह तेज आएगा -- और मुझे यकीन है कि वह दिन बहुत दूर नहीं है -- उस दिन बलात्कार की इच्छा करने के पहले कोई भी पुरुष हजार-पाँच हजार बार सोचेगा।

आर. अनुराधा said...

"और यह भी मत समझना कि संघर्ष के दौरान तुम मेरे किसी अंग पर हाथ रखने या उसे मसलने-कुचलने में कामयाब हो गए, तो मेरी कुछ तो इज्जत चली ही जाएगी। मेरी जूती ! मेरी इज्जत मेरे समूचे व्यक्तित्व के साथ जुड़ी हुई है, मेरे किसी एक या सभी अंगों के साथ नहीं। तुम अपनी इज्जत की फिक्र करो। मेरी इज्जत मेरे हाथ में है, उसे नष्ट करना तुम तो क्या, तुम्हारे बाप के लिए भी संभव नहीं है। "

वाह राजकिशोर जी, धन्यवाद। जो कुछ मैं सोच रही थी लेकिन शब्दों में नहीं ला पा रही थी, आपने वह मेरे लिए कह दिया। इस टिप्पणी में मैं आपका समर्थन करती हूं और मानती हूं कि मेरी अस्पष्ट सी अभिव्यक्ति का आपने भी इस तरह खुलासा करके समर्थन किया है।

आर. अनुराधा said...

"और यह भी मत समझना कि संघर्ष के दौरान तुम मेरे किसी अंग पर हाथ रखने या उसे मसलने-कुचलने में कामयाब हो गए, तो मेरी कुछ तो इज्जत चली ही जाएगी। मेरी जूती ! मेरी इज्जत मेरे समूचे व्यक्तित्व के साथ जुड़ी हुई है, मेरे किसी एक या सभी अंगों के साथ नहीं। तुम अपनी इज्जत की फिक्र करो। मेरी इज्जत मेरे हाथ में है, उसे नष्ट करना तुम तो क्या, तुम्हारे बाप के लिए भी संभव नहीं है। "

वाह राजकिशोर जी, धन्यवाद। जो कुछ मैं सोच रही थी लेकिन शब्दों में नहीं ला पा रही थी, आपने वह मेरे लिए कह दिया। इस टिप्पणी में मैं आपका समर्थन करती हूं और मानती हूं कि मेरी अस्पष्ट सी अभिव्यक्ति का आपने भी इस तरह खुलासा करके समर्थन किया है।

Pratibha Katiyar said...

यकीनन स्त्री व्यक्तित्व में यह तेज आयेगा...बल्कि आने ही लगा है. बहुत सार्थक बात कही है राजकिशोर जी ने.

shama said...

Meree ray hai,ki, balatkaree ko maar bhee dalen to qanoonana saza nahee miltee...filmon me dikhaya jata hai wo galat hai..lekin is baatse ittefaaq naheeki, jaan pe khelke aisa karen...kyon kewal streeka shaheer pakeezgee ka ekmaatr praman hai?
Samajne yehee dharna badal denee chahiye..jo kahte hain,ki, maut ke baad balatkaar nahee karte, yebhee galat hai..kya byah ke baad kayi baar uskee ichhake viruddh pati shahree sambandh kayi baar nahee rakhte? Aise me wo kahan fariyad le jay?

प्रीतीश बारहठ said...

इतने सारे विज्ञ जनों के बीच में मामूली सी राय अपनी भी रख रहा हूँ।

राजकिशोर जी,

क्या ज्यादा से ज्यादा हथियार इकट्ठा करके ज्यादा से ज्यादा लड़ाके तैयार करके विश्व-शांति कि स्थापना का लक्ष्य आसान हो जायेगा ? इसके लिये यह भी करें कि देश में होने वाले आतंकी हमलों को गम्भीरता से न लें !!! आपके लेख को पढ़कर ऐसा लगता है कि बलात्कार करने वाले कहीं बाहर से आते हैं और वे एक अलग वर्ग हैं ! वे हमारे बीच से ही आते हैं और हमारी जैसी बातें करने वाले भी होते हैं। आपने माना है कि बलात्कारी की भी इज़्ज़त नहीं बढ़ती है, तो जरूरत संस्कार देने की है। यह लेख और टिप्पणियां जिस माहौल को बनाने की बात कर रहीं हैं वही माहौल तो बलात्कारी चाहता है कि भई करने दो, हमारी हरकत को अपराध क्यों कहते हो। यदि मेरी बात पर यक़ीन न होतो किसी बलात्कारी से पूछ देखें वह आपकी योजना का शत-प्रतीशत समर्थन करेगा।
और आप जो लडकियों को सुझाव दे रहे हैं कि मर जाओ, तो यह सही है कि हम और हमारी व्यवस्था के पास कमजोर को देने के लिये दूसरा विकल्प है ही नहीं । आप क्यूं नहीं कहते कि साम-दाम-दण्ड-भेद से जैसे भी हो उस क्षण में अपने स्वत्व की रक्षा कर सको तो करो, नहीं तो जान की रक्षा तो करो और बाद में अपना समय आने पर उस पर घातक प्रहार करो। (लेकिन बाद में तो कानून उसका बाल बांका करने नहीं देगा)

Sanjay Grover said...

मैं अनुराधा जी के पहले कमेंट से, प्रीतिश बारहठ जी से और शमा जी की बात से सहमत हूं। मान लीजिए कि रात आपके घर में डकैती पड़ती है। तो क्या आप सुबह उठकर थाने में रपट कराने की सोचेंगे या डकैतों से लड़कर रात को ही मर जाने की !? पुराने समय में भी रानियां जौहर की आग में जल जाया करती थीं। लेकिन उससे बदनीयत लोगों का क्या बिगड़ता है ? यह तो उन्हें बढ़ावा देने वाली वही पुरानी सोच है। बलात्कार एक दुर्घटना है। अगर आप के देखते-देखते किसी स्त्री से बलात्कार हो जाए और आप कुछ न कर पाएं तो क्या आप आत्महत्या कर लेंगे !? कर भी लेंगे तो उससे बलात्कारी का और उस मानसकिता का क्या बिगड़ जाएगा !? अगर भंवरी देवी भी आत्महत्या कर लेती या लड़ते-लड़ते मर जाती तो !? इससे तो बतात्कारी मानसिकता का ही मकसद पूरा होता है। शादी से लेकर बाद तक स्त्री के साथ दहेज से लेकर जबरन संभोग तक क्या-क्या नहीं होता !? उसे क्यों नहीं मरने की शिक्षा देते हम !? क्यों कि वो सब समाज से छुपा रहता है इसलिए !? और यहां सब कुछ सामने आ जाता है या कानूनी कार्रवाई की खातिर सामने लाना होता है, इसलिए !? यानि कि सामाजिक बदनामी के डर से सिर्फ स्त्री को बलि चढ़ाने की कोशिश की पुरानी मानसिकता !? कई बार घरों में स्त्रिओं द्वारा अकेले या कमउम्र पुरुष से जबरदस्ती की बातें भी सुनने को मिलती हैं। वो क्यों नहीं लड़ते-लड़ते मर जाने की सोचता ? या उसे क्यों नहीं ऐसे सुझाव दिए जाते ? समाज की मानसिकता को न समझकर और न बदलकर सिर्फ लड़कियों को बलि चढ़ाने से इसलिए कुछ नहीं होने वाला क्योंकि इसमे कोई नयी बात ही नहीं है। जौहर, सती, बुर्के, पर्दे इसी मानसिकता की उपज हैं। लड़कियों के साथ चालाकीपूर्ण तरीकों से चिपका दिए गए इज्जत, मर्यादा, शील, पवित्रता जैसे शब्दों को उखाड़ फेंकने की भी ज़रुरत है। जिससे कि लड़कियों के साथ हुई ज़बरदस्ती को समाज सामान्य ढंग से ले, ना कि बलात्कारी।

सुजाता said...

लेकिन लड़कियों के डर जाने के लिए शायद इतना ही काफी था कि वे लड़के हैं और उनके इरादे ठीक नहीं हैं।
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मानसिकता को सही पकड़ा आपने।इसी को बदलने की आवश्यकता है।
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जरूरी है कि हर माँ-बाप अपने बेटे-बेटी को, बेटियों को तो जरूर ही, शुरू से यह प्रशिक्षण देते रहें कि अन्याय के सामने झुकना नहीं है, उसका विरोध और प्रतिकार करना है।
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यह भी एक दम ठीक !
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मेरी अपनी बेटी कभी ऐसे किसी हादसे का शिकार हो कर आँसू बहाते हुए घर लौटी, तो मैं उससे यही कहूँगा कि इससे अच्छा था कि बलात्कारी का प्रतिकार करते हुए तू अपनी जान दे देती।
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लेकिन यह सही नही है!
लड़कियों के लिए जान दे देने के सिवा समाज ने कोई आदर्श भी नही सिखाया है।जान लेने को उतारू है ही समाज उनकी। यह हल नही हो सकता।

यह किसी एक व्यक्ति की समस्या नही है। परम्परागत सोच मे सामाजिक समस्याओ के लिए सदा व्यक्तिगत हल प्रदान किए जाते हैं।व्यवस्था को पल्ला झाड़ने मे आसानी होती है इससे।मेरा मानना है कि बलात्कार की स्थिति मे कोई स्त्री कैसे प्रतिक्रिया करती है इसे पहले से ही जाना नही जा सकता।किसी भी संकट के समय आप क्या करने वाले हैं यह पहले से निश्चित नही होता। हाँ यह सही है कि आत्मरक्षा की शिक्षा सभी को दी जानी चाहिए। वक्त पड़ने पर उसका इस्तेमाल भी आना चाहिए।
जैसे, अपने अपने घर मे बॉडी गार्ड रख लेने से चोरी चकारी की सम्स्या से निजात मिल जाएगी यह सोचना मूर्खता है ही सामाजिक अन्याय भी है।क्योंकि हर कोई समर्थ नही होता।यदि व्यवस्था ऐसी है कि केवल समर्थ ही बच सकता है अपराध से तो उस व्यवस्था को बदल देने की सख्त ज़रूरत है।यह किए बिना लडना कुछ खास कामयाबी नही दिलाएगा क्योंकि सामान्यत: हर स्त्री बलात्कार का प्रतिकार करती ही होगी।

राजकिशोर said...

क्षमा करें, फिर एक छोटा-सा हस्तक्षेप।

एक, मेरा आशय यह कदापि नहीं है कि व्यक्तिगत प्रतिकार ही सामाजिक समस्याओं का एक मात्र निदान है। निदान तो सामाजिक स्तर पर ही होगा। इस अंतहीन प्रक्रिया के दौरान व्यक्तिगत स्तर पर भी हममें से हरएक को प्रतिरोध करना पड़ सकता है। मै इसी बारे में संवाद कर रहा था।

दो, मेरा इरादा आत्महत्या को प्रोत्साहित करने का बिलकुल नहीं है। इरादा ठीक उलटा है यानी जीवन को बहुमूल्य बनाना। और, मामला सिर्फ बलात्कार का प्रतिरोध करने का नहीं है। मामला व्यक्ति की अस्मिता में प्रत्येक हस्तक्षेप का प्रतिरोध करने का है। मेरे इन शब्दों को दुबारा पढ़ने की कृपा करें - 'जो बात जीवन के बारे में सही है, वही उन चीजों के बारे में भी जिन्हें मिला कर जीवन बनता है। अगर मुझे डरा-धमका कर किसी ने मेरा सामान छीन लिया, मुझे मेरे घर से बेदखल कर दिया, मेरे साथ शारीरिक अतिक्रमण किया, तो मैं सिर्फ जिंदा रह कर क्या करूँगा? ऐसे जीने को धिक्कार है जिसमें स्वाभिमान न हो। स्त्रियों के लिए यह और भी ज्यादा सच है, क्योंकि उनके साथ शारीरिक अतिक्रमण का खतरा अकसर मौजूद होता है। ऐसी कठिन घड़ियों में आत्मरक्षा के अपने जैविक अधिकार की याद आनी ही चाहिए। इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अगर जान भी चली जाए, तो खुशी-खुशी दे देनी चाहिए।'

तीन, बेइज्जत होने के बजाय जान दे देनी चाहिए, इस परंपरागत धारणा और अपने स्वत्व की रक्षा के संघर्ष में जान भी चली जाए तो कोई हर्ज नहीं है, इस धारणा में जमीन आसमान का फर्क है। यहाँ जोर जान देने पर नहीं, बल्कि संघर्ष पर है। कितना शारीरिक नुकसान सहने के बाद हम हमलावर के आगे समर्पण कर देंगे, यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सहनशक्ति पर निर्भर है। इस बारे में सभी के लिए कोई एक पैमाना तय नहीं किया जा सकता। हाँ, सभी के लिए एक जैसा आदर्श जरूर निरूपित किया जा सकता है।

चार, मैं अपनी इस मान्यता पर पुनर्विचार करने का कोई कारण नहीं देखता कि जो अपनी जान की बहुत ज्यादा परवाह नहीं करते, वे कोई बड़ा मूल्यगत संधर्ष नहीं कर सकते। जान बची तो लाखों पाए और जान है तो जहान है - इस सड़े-गले विचार के कारण ही भांरत के लोग लंबे समय से कीड़े-मकोड़ों जैसी जिंदगी बिताते रहे हैं। गांधी जी गांधी और भगत सिंह भगत सिंह इसीलिए बन पाए कि उन्होंने मौत से डर पर विजय प्राप्त कर लिया था।

सुजाता said...

संघर्ष न किया जाए यह मेरा आशय नही।जब आप कह रहे हैं कि संकट के समय आत्मरक्षा की कोई भी तरकीब अपनाना बहुत ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया है तो इससे ज़ाहिर है कि बलात्कार के आगे भी कोई स्त्री एकदम से घुटने नही टेकती होगी।
लेकिन दिक्कत यह है कि बलात्कार की आप किसी आम चोरी -लूट से तुलना नही कर सकते।यह ऐसा अपराध है ही नही।

कब किस स्थिति मे यह आपके साथ हो जाए आप नही जानते।नही जानते कि संघर्ष करने लायक उस समय होगे भी कि नही।जैसे हर पुरुष माचो नही होता वैसे ही हर स्त्री भी जान लेने देने का संघर्ष करके चार पाँच गुंडों से खुद को नही बचा सकती।उसे आत्मरक्ष की तकनीकें सिखानी चाहिएँ विद्यालय जीवन से ही।इससे मेरी घोर सहमति है।लेकिन यह कहना कि इससे अच्छा अपनी जान दे देतीं मुझे स्वीकार्य नही।

क्या हम प्रकारांतर से यही नही कह रहे कि वर्जिनिटी की कीमत जान से बढ कर है। कोई बलपूर्वक सामान छीन ले और उस पर से चाकू-पिस्तौल भी दिखाए तो आप क्या करेंगे? संघर्ष करेंगे...करना ही चाहिए ..और किया भी जाता होगा...लेकिन नही कर पाए तो क्या ....क्या हर कोई दुनिया मे वीर ही पैदा होता है...भगत सिंह या महात्मा गाँधी ही होता है ? ..


पूरे लेख पर संक्षेप मे मै यही कहना चाहती हूँ कि आपकी मंशा की अच्छाई समझते हुए भी मुझ तक सन्देश यही पहुँच रहा है कि शील ही स्त्री की इज़्ज़त का पैमाना है ,और वह जान से भी बढ कर है जो कि मुझे उचित नही लग रहा।

स्वप्नदर्शी said...
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Sanjay Grover said...

सुजाताजी, आपको उचित न लगना उचित ही है। अगर हम यह तय नहीं कर सकते कि किसी की संघर्ष-क्षमता कितनी है तो यह कैसे तय कर सकते हैं कि किसी की स्वाभिमान बचा कर रखने की क्षमता क्या रही होगी !? कितने पैमाने तक समझौते कर लेने पर स्वाभिमान, स्वाभिमान रहता है और कितने पर वह स्वाभिमान नहीं रहता !? नाली से निकाल कर कितने बड़े तालाब में डाल देने पर कीड़ा, कीड़ा नहीं रहता !? साफ भाषा में मेरा मतलब यह है कि कितने पुरुष हैं जो दुकानदारी से लेकर नौकरियों में, चाहे वे पत्रकारिता से लेकर चिकित्सा तक कोई भी क्षेत्र हों, स्वाभिमान से समझौते करते रहने की कीमत पर मर जाना पसंद करते हैं या उन्हें ऐसी सलाहें दी जाती हैं!? आखिर कोई चीज़ तो ऐसी होती होगी जिसे पुरुष भी अपना शील या अपनी ‘सील’ मानता होगा। बलात्कार की तुलना चोरी वगैरह से करने के खतरे समझे जा सकते हैं पर बात को समझाने के लिए इस तरह के उदाहरण दिए जा सकते हैं कि अगर कोई लापरवाह अमीरजादा अपनी कार से सड़क पर मेरी टांग तोड़ देता है तो क्या मुझे वहीं सड़क पर उससे लड़ मरना चाहिए या मरहमपट्टी कराकर उससे अदालत में निपटना चाहिए !? बलात्कार को एक दुर्घटना मान लेने से किसी के स्वाभिमान में कमी कैसे और क्योंकर आ जाएगी भला !? स्त्री के पक्ष से देखें तो यह एक ऐक्सीडेंट ही तो होता है। जबकि पुरुष पत्नी-बच्चों-दुनियादारी आदि-आदि के नाम पर आए दिन सोचे-समझौते करता फिरता है फिर भी कहीं उसका ‘शील’ भंग नहीं होता !

नयी बोतल में पुरानी शराब नहीं बल्कि पुराना ज़हर !?

Pooja Prasad said...

जो डर कायर बना दे, उसे निकट के डस्टबिन में फेंक आना चाहिए- जी राजकिशोर जी। एकदम सही कहा आपने। यह लेख वाकई नई बहस और सामजिक नियम कानून व शब्दावली की जरुरत दर्शाता है।

sangeeta said...

this is my first visit to this blog n i am happy that i came here..

i agree with Rajkishore that rape is just a physical abuse...'shareerik aaghaat' and as Anuradha says , women should be able to aware of their body ( which is not a part of mind and soul)...our culture has fused the female body with her mind n soul ( n named it sateetva) and that has caused a huge problem.....

empowering women by all means is the solution as everybody knows and i wish more discussions like this come up and reach where it is needed the most.

and yes jaan de dena for izzat bachaana seems exaggerated but if you don't fear for anything to fight for your self respect, that i agree.

Anonymous said...

"मेरी अपनी बेटी कभी ऐसे किसी हादसे का शिकार हो कर आँसू बहाते हुए घर लौटी, तो मैं उससे यही कहूँगा कि इससे अच्छा था कि बलात्कारी का प्रतिकार करते हुए तू अपनी जान दे देती। "


राज किशोर जी ....आपको ऐसा नही लगता की यह दुर्घटना होती है ,कभी प्रायोजित कभी अप्रत्याशित तो दुर्घटना में समय नही रहता लड़कियों को --किया क्या जाये ,इससे पहले ही वे इतनी हडबडा जाती है न साहस काम आता है न अक्ल काम करती है ..अब आप ही देखिये ..पहले आप ही ने द्वार बंद कर दिया .. साहस कहाँ से आएगा .मुझे तकलीफ हुई आप की इन पंक्तियों से ...

प्रीतीश बारहठ said...

राजकिशोर जी !
वैसे मेरी टिप्पणी केवल टिप्पणी ही थी
लेकिन क्षमा करते हुए एक और छोटा-सा हस्तक्षेप मेरा भी बर्दास्त करे !!
एक पीड़ित लड़की द्वारा बलात्कार का प्रतिरोध कोई सतत् संघर्ष नहीं है न ही वह पूर्व नियोजित हो सकता है। यह एक अवधि विशेष में एक ऐसे मौके पर घटित होने वाली घटना है जब सारी परिस्थितियाँ बलात्कारी के पक्ष में और पीड़िता के विरुद्ध होती हैं। वह अनुमान भी नहीं कर सकती कि सामने जो व्यक्ति है वह उसका बलात्कारी होने वाला है न ही घटना घट जाने के बाद उसके पास संघर्ष का अवसर उपलब्ध रहता है। आप कह तो सकते हैं कि उसे लड़ते हुए मर जाने की हद तक चला जाना चाहिये, लेकिन घटना हमेशा इस सुअवसर के साथ भी नहीं घटती। बलात्कारी मारता नहीं है काबू में करता है और हमेशा बल से नहीं ज्यादातर छल से ऐसा करता है। काबू में हुआ व्यक्ति वह संघर्ष नहीं कर सकता जिसमें जान चली जाये। वावजूद संघर्ष के न तो जान जाती है न बच पाती है। फिर आपके अनुसार ऐसी वीर लड़कियों के समाचारों की अखबारों की असंख्य कटिंग मैं उपलब्ध करवा सकता हूँ जहाँ लड़ते हुए लड़की ने अपनी जान दे दी। घटना के बाद आत्महत्या करली। और बालात्कार के बाद उसका कत्ल कर दिया गया। उनसे क्या हासिल हुआ। जहाँ तक प्रतिकार में अपनी जीत की संभावना हो, आशा हो, शक्ति हो वहाँ ही संघर्ष का मतलब समझ में आता है, ए.के 47 वाले से निहत्था गुत्थमगुत्था हो कर जान देना निश्चित ही मूर्खतापूर्ण कार्य है। अपनी शक्ति का वास्तविक और विवेकपूर्ण अनुमान लगाये बिना दुश्मन की सुविधा के मैदान में जीवित रहने का या कम हानि उठाने का विकल्प मोजूद होते हुए भी जान देना वीरता नहीं मूर्खता है। आप शरीर को इज्ज़त से जोडे जाने का तो विरोध कर रहे हैं लेकिन उसी को स्वाभिमान के स्वांग से जान देने लायक भी बता रहे हैं। आपके पास उस लड़की को न्याय देने का कोई विकल्प नहीं जो बलात्कार के बाद ज़िदा लौट आयी है। न ही जीवित बलात्कारी के लिये कोई सज़ा है।
आपका एकः व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रतिकार होना चाहिये सहमत हूँ लेकिन आपका लेख इससे अधिक यह कह रहा है कि प्रत्येक प्रतिकूल क्षण में संघर्ष होना चाहिये तब भी जबकि वह आत्मघाती भी हो। उस खास प्रतिकूल क्षण के बाद क्या व्यक्तिगत स्तर पर संघर्ष के अवसर ख़त्म हो जाते हैं ?
आपका दोः जीवन की बहुमूल्यता है बेशक, इसीलिये उसे बचाये रखेने के लिये विवेकपूर्ण संघर्ष करना चाहिए। मैं पचास हथियारबंद गुण्डों के बीच अकेला हूँ, उन्होंने मेरे एक तमाचा जड़ दिया और गाली दी। अब मुझे वहाँ से भागकर समाज से सुरक्षा की गुहार करनी चाहिए, अपनी ताकत इकट्ठी करनी चाहिये या उनके हाथ तोड़ देने और जबान निकालेने के लिये संघर्ष कर अपनी मौत को सुनिश्चित कर लेना चाहिए ?? बहुत से भावुक लोग ऐसी स्थिति में घर आकर ज़हर खा लेते हैं उनकी वीरता के लिये कौनसा प्रशस्ति पत्र दिया जाये ! अगर जान चली जाये और निश्चित जान चली जाये में बहुत फर्क है। और काबू में हुये वक्ति की तो जान भी नहीं जायेगी उसे तो फिर आपकी सीख के अनुसार अपने को वीर बताने के लिये घटना के बाद आत्महत्या ही करनी पड़ेगी वरना आप कहेंगे कि बलात्कार के बाद भी जिंदा कैसे रही कायर !
आपका तीनः “बेइज्जत होने के बजाय जान दे देनी चाहिए, इस परंपरागत धारणा और अपने स्वत्व की रक्षा के संघर्ष में जान भी चली जाए तो कोई हर्ज नहीं है, इस धारणा में जमीन आसमान का फर्क है” आपके अनुसार तो इसमें कोई फर्क नहीं है, आप यही कह रहे हैं कि हाथों हाथ जान दे दो लेने वाला ले या न ले आपतो देदो।
आपका चारः “गांधी जी गांधी और भगत सिंह भगत सिंह इसीलिए बन पाए कि उन्होंने मौत से डर पर विजय प्राप्त कर लिया था” ये दोनों ही बहुत प्रज्ञावान विभूतियाँ थी, मेरी विनती है कि इनके बहाने से कोई बात रखें तो बहुत सावधानी बरतें मेरी भावनायें आहत होती हैं। कृपया किसी भी उथले विचार के साथ इन्हें न जोड़ें(शब्द के लिये क्षमा करें) गाँधी जब अंग्रेजों के पास आजादी की माँग लेकर जाते थे वहाँ अपनी जान ही देकर नहीं आते थे। भगतसिंह भी नहीं देकर आये उनके संघर्ष के पीछे एक सोच थी, अविवेकपूर्ण भावुकता और क्रोध नहीं। गाँधी जी ने एक गाल के बाद दूसरा गाल प्रस्तुत कर दिया था चांटा खाने को इससे लड़कियाँ क्या सीख लें ? मृत्यु का ड़र नहीं होना और मृत्य के मुख में जाने में अन्तर होता है। गाँधी जी और भगतसिंह की लड़ाई राजनीतिक थी उसका एक हासिल किया जा सकने लायक एक लक्ष्य था, नियति थी। दुश्मन निर्धारित था। गाँधीजी मृत्यु का ड़र विजयी कर भूखे शेरों के बाड़ों में नहीं घुसते। बालात्कारी एक पशु ही होता है उससे जान बचाकर भागना ही संघर्ष है उसके जबड़े में घुस-जाना नहीं।

एक बात और, वे लडकियाँ कब जान दें जिन्हें घटना के दो वर्ष बाद पता चलता हो कि अरे उसने तो हमारे साथ बलात्कार किया था।

राजकिशोर said...

The value of a sentiment is the amount of sacrifice you are prepared to make for it.
- John Galsworthy (Windows, Act II)

प्रज्ञा पांडेय said...

राजकिशोर जी
बलात्कार स्त्री के शरीर पर एक ऐसा आक्रमण है जो उसकी आत्मा तक को छिन्न भिन्न कर देता है . यातना की इस आखिरी इस हद जैसी और भी यातनाएं हैं ऐसा नहीं की बलात्कार अपने ढंग की एक अकेली यातना है .औरत के साथ उसके शरीर की शुचिता का अगर इतना संकीर्ण और ढकोसला पूर्ण पक्ष न जुडा होता तो शायद बलात्कार की भयावहता औरत को समाज से निष्कासित होने जैसी पीडा और यातना न दे जाता और उसको अपना जीवित होना भी इतना दुष्कर न लगता जितना उसको लगता है ... औरत का शरीर जिस पर इतने विचार और विमर्श होते हैं वह अबतक अपनी ही गुलामी में जकड़ी बिना मारे मर रही है ... औरत को सिखाने से बेहतर है कि पुरुष सीखें और पुरुष होने के दंभ से बाहर आयें औरत को मादा न समझें .बहुत दुःख कि बात है कि सारा विमर्श स्त्री को लेकर ही होता है .. पुरुषों को लेकर विमर्श क्यों नहीं होते हैं ?शायद इसकी भी एक बड़ी वजह है . ये पुरुष प्रधान समाज है . पुरुष को विवादित नहीं किया जायेगा ... सारे दोष औरत में ही हैं उसी कि बात हों .. कल्पना करिए कि यदि ये समाज स्त्री प्रधान होता तो क्या होता ...इसने ढक रखा है इसलिए इसको उघाडो..यही मानसिकता काम करती है ...क्यों नहीं हम घरों में अपने लड़कों को यह सिक्षा देते हैं कि स्त्री कि इज्जत करना . हम लड़की को यह सिखाते हैं कि तुम अपना शरीर बचाना .जब औरत गोश्त से ज्यादा नहीं समझी जा रही है तो चौतरफा आक्रमण के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है. औरत के पास ताकत है पर वह कई तरह के षड्यंत्रों का शिकार है .. गुलाम बनाने में भी बरसों लगते हैं और गुलामी से मुक्ति पाने में भी एक लम्बी लडाई लड़नी पड़ती है ..लड़ाई जारी है .... आभार इस बात का है कि प्रबुद्ध लोग औरत कि लडाई में उसके मददगार हैं .

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

यह जो विषय है....यह दरअसल स्त्री-पुरुष विषयक है ही नहीं....इसे सिर्फ इंसानी दृष्टि से देखा जाना चाहिए....इस धरती पर परुष और स्त्री दो अलग-अलग प्राणी नहीं हैं...बल्कि सिर्फ-व्-सिर्फ इंसान हैं प्रकृति की एक अद्भुत नेमत.. !!...इन्हें अलग देखने से एक दुसरे पर दोषारोपण की भावना जगती है....जबकि एक समझदार मनुष्य इस बात से वाकिफ है की इस दुनिया में सम्पूर्ण बोल कर कुछ भी नहीं है.....अगर पुरुष नाम का कोई जीव इस धरती पर अपने पुरुष होने के दंभ में अपना "....." लटकाए खुले सांड की तरह घूमता है...और स्त्रियों के साथ "....." करना अपनी बपौती भी समझता है....तो उसे उसकी औकात बतानी ही होगी....उसे इस बात के लिए बाध्य करना ही होगा की वह अपने पजामे के भीतर ही रहे....और उसका नाडा भी कस कर बंद रखे ....अगर वह इतना ही यौनिक है...कि उसे स्त्रियों के पहनावे से उत्तेजना हो जाती है...और वह अपने "आपे" से बाहर भी हो जाता हो...तो उसे इस "शुभ कार्य" की शुरुआत...अपने ही घर से क्यों ना शुरू करनी चाहिए....लेकिन यदि ऐसा संभव भी हो तो भी बात तो वही है.... कि उसके "लिंग-रूपी" रूपी तलवार की नोक पर तो स्त्री ही है... इसीलिए हर हाल में पुरुष को अपने इस "लिंगराज"को संभाल कर ही धरना होगा...वरना किसी रोज ऐसा हर एक पुरुष स्त्रियों की मार ही खायेगा...जो अपने "लिंगराज"को संभाल कर नहीं धर सकता...या फिर उसका "प्रदर्शन" नानाविध जगहों पर...नानाविध प्रकारों से करना चाहता हो.....!!मैं देखता हूँ....कि प्रतिक्रिया में आने वाली कई टिप्पणियाँ...अक्सर पुरुषों की इस मानसिकता का बचाव ही करती हुई आती हैं....तुर्रा यह कि महिला ही "ऐसे पारदर्शी और लाज-दिखाऊ-और उत्तेजना भड़काऊ परिधान पहनती है....बेशक कई जगहों पर यह सच भी हो सकता है....मगर दो-तीन-चार साल की बच्चियों के साथ रेप कर उन्हें मार डालने वाले या अधमरा कर देने वाले पुरुषों की बाबत ऐसे महोदयों का क्या ख्याल है भाई....!!
जब किसी बात का ख़याल भर रख कर उसे आत्मसात करना हो....और अपनी गलतियों का सुधार भर करना हो.. तो उस पर भी किसी बहस को जन्म देना किसी की भी ओछी मानसिकता का ही परिचायक है...अगर ऐसा करना पुरुष का उद्देश्य नहीं है तो ऐसी बात पर बहस का कोई औचित्य....?? अगर इस धरती पर स्त्री जाति आपसे भयभीत है तो उसके भय को समझिये....ना कि तलवार ही भांजना शुरू कर दीजिये....!!दुनिया के तमाम पुरुषों से इसी समझदारी की उम्मीद में......यह भूतनाथ....जो अब धरती पर बेशक नहीं रहा....!!

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...