Wednesday, September 16, 2009

हम सब अचिन्हित शिकार है योनिक हिंसा के .

"बलात्कार का हर्जाना " और "सीढीयों पर मौत " को दो किश्तों की तरह देख रही हूँ और कहना चाहती हूँ, दोनों पोस्ट कुल मिलाकर एक एकहरी सोच जो हमारे इस अमानवीय समाज मे व्याप्त है उसी का विस्तार है, और उसी को नए तरह से शब्दजाल मे पिरोकर परोसने की कोशिश है, जिसे देखकर तनिक आश्चर्य होता है, बहुत नही!!! दोनों ,का मिलाकर लब्बोलुबाब ये है, " पीड़ीत अगर अपना बचाव न कर सका, और जिंदा बच गया तो ये उसका नैतिक पतन है, अगर उसने हर्जाना स्वीकार किया तो भी नैतिक पतन है। और सुझाव ये कि लड़कर मर जाओ। अगर इस तरह की दुर्घटना के बाद खुदा न खास्ता घर लौटना हुया तो वहाँ कोई सहानुभूती या फ़िर लड़ाई मे सहयोग की अपेक्षा न रखो। यही सब तो होता आया है, इसमे नया और मानवीय क्या है?

जो बात प्रतीश और संजय ने उठाई है, वों इस एकहरी सोच की सही काट है। बलात्कार की घटनाओं मे कमी स्त्रीयों के किसी भी तरह के आचरण करने से काबू मे नही आ सकती (चाहे वों बुर्का पहने, रात-बेरात घर से बहार न निकले, या फ़िर हथियारों से लैस होकर सड़क पर निकले)। ये एक सामाजिक समस्या है, और इसकी जड़े भी इसी व्यवस्था मे है।, चाहे अनचाहे स्वीकृति भी। और सबसे आसन तरीका ये है की दोष पीड़ीत पर मढ़ दिया जाय। और अपनी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से आसानी से मुह मोड़ लिया जाय।

बलात्कार के तमाम पहलू है जिन पर बहुत कुछ बोला-लिखा जाता है, जिसमे नर होरमोंस पर दोशोरोपन से लेकर, स्त्रियों का व्यवहार, वेश भूषा चपेट मे आती है। पर इसका एक महत्तवपूर्ण पक्ष ये है, कि हमारे समाज मे माता-पिता, नाते रिश्तेदार, और दोस्त, तीनो जिन्हें पीड़ीत का संबल बनाना चाहिए, वों उसका साथ छोड़ देते है। कम से कम इस अर्थ मे कि कानूनी लड़ाई लड़ना नही चाहते और समाज मे अपनी रुसवाई से डरते है। इसीलिये बलात्कार के आघात से कम और अपनो की कायरता और उपेक्षा से उपजी असहायता अक्सर पीड़ीत को आत्महत्या की तरफ़ धकेलती है। समाज, पास पड़ोस, और स्त्री के प्रति एक गहरा अमानवीय नजरिया कि बलात्कार की पीडीता, विधवा और तलाकशुदा स्त्री एक झूठी थाली है, न कि एक मनुष्य। योंशुचिता और उसके आधार पर स्त्री को हाशिये पर फेंक देने के लिए समाज जिम्मेदार है। जब तक ये स्थिती रहेगी, पीडीत कैसे सिर्फ़ अपने बूते और अपनी सोच के बूते इस समस्या का हल ढूँढ सकता है? इससे पहले कि बलात्कार की पीड़ीता ये मानने लगे कि ये एक मात्र दुर्घटना थी, उसके परिवार को, और वृहतर समाज को इस मूल्य को अपनाना पडेगा। बलात्कार स्त्री और उसके परिवार के लिए सामाजिक कलंक है, और जब तक सामाजिक सोच नही बदलेगी, खाली पीड़ीत की सोच बदलने की बात से क्या होगा?

धीरे-धीरे ही सही पर हमारे समाज मे बदलाव आए है, और प्रिदर्शनी मट्टू के पिता के जैसे पिता भी हमारे देश मे है, जिन्होंने बेटी की मौत के बाद भी न्याय के लिए संघर्ष किया, और अपराधी को सजा हुयी। भावरी देवी के पति भी है, जिन्होंने अपनी पत्नी का साथ दिया। मेरी नज़र मे यही एक अभूतपूर्ण पहल हमारे जनतंत्र मे हुयी है, जिसमे एक आम, बूढा पिता, और परिवारजन , एक गरीब ग्रामीण, अहिंसक तरीके से और जनतंत्र का इस्तेमाल करके न्याय पाने मे सक्षम रहे है। पर इन सफलताओं का सहरा सामाजिक भागीदारी को जाता है, केवल एक अकेले व्यक्ति और परिवार के लिए ये सब अपने बूते करना मुमकिन नही है।

क्या किसी को ये भ्रम है कि पीड़ीत व्यक्ति बलात्कार के लिए ख़ुद को दोषी मान सकता है?
जिस पर राजकिशोरजी और अनुराधा की बहस है कि स्त्री अपना शरीर पुरूष से छिपाती है, और शरीर पर परपुरुष के छू जाने मात्र से विचलित होती है, और इसी मे अपना शील गया समझती है। और अगर इस पर काबू पा ले तो बलात्कार की पीडा कम हो जायेगी। अगर ऐसा होता तो पश्चिमी देशो मे जहा काफी हद तक यौन शुचिता का भ्रम टूटा है, वहा बलात्कार की पीडीत स्त्रीयों और योन हिंसा को झेलने वाले बच्चों का दर्द कुछ कम होता। कम से कम इन देशो ने इतने गहरे जाकर, न सिर्फ़ बलात्कार, बल्कि सेक्सुअल हरासमेंट के क़ानून कई परतों मे बने है, जिनमे हाव-भाव, बॉडी लंग्वैज़, भाषिक हिंसा, तक तमाम आयामों को परिभाषित किया गया है।
योंशुचिता से छुटकारे के बावजूद मानसिक पीडा बहुत गहरे वहां भी है। और ये पीडा इसीलिये है की इंसान का अस्तित्व कुचला जाता है, एक असहायता के बोझ, और मनुष्य का सिर्फ़ एक वस्तु बन जाने का अहसास इससे गहरे जुडा है. दूसरा उदाहरण, पुरुषो के लिए समाज मे योन शुचिता के मानदंड स्त्री के जैसे नही है, पर फ़िर भी अगर "सोडोमी" का शिकार हुए बच्चे जो लिंग से पुरूष है, इसे सिर्फ़ शारिरीक दुर्घटना की तरह भूल जाते है? बलात्कार की रोशनी मे नही, बल्कि मनुष्यता की सम्पूर्णता की रौशनी मे इस तथ्य को खुलकर स्वीकार करने की ज़रूरत है की योनिकता और सेक्सुअल व्यवहार, और उससे जुड़े मानव अनुभव, हमारे मन, शरीर और समस्त व्यक्तित्व पर बहुत गहरा, और चौतरफा असर डालते हैऔर किसी भी तरह का अन्याय, जबरदस्ती, और निजता का उलंघन जो मनुष्य के बेहद निजी योनिक व्यवहार से जुड़े है, उनकी शिनाख्त इसी के तहत होनी चाहिएभले ही सामाजिक रूप से ये कितना ही, अवांछनीय विषय हो! और अगर ऐसी घटना से पीड़ीत को अपने काम मे हर्जा होता है, स्वास्थ्य मे समस्याए आती है, तो हर्जाना उस नुक्सान का ज़रूर मिलना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा, और हरजाने के साथ साथ कडा कानूनी दंड मिलना चाहिए। या खुदा न खास्ता गर्भ और अनचाहे बच्चे पैदा हो जाए, तो उनके पालन की जिम्मेदारी भी पुरूष पर होनी चाहिए।

ये सिर्फ़ पुरुषो के दिमाग का फितूर है, कि स्त्री पुरूष स्पर्श से असहज हो जाती है, और ख़ुद को योनिकता के अर्थ मे अपवित्र मानती है। मैं फिलहाल किसी ऐसी स्त्री को नही जानती जिसका शरीर जाने अनजाने और मजबूरी मे हजारो पुरुषो के शरीर से टकराया हो। पर-पुरूष के रोज़-ब-रोज़ के स्पर्श की आज की स्त्री अभ्यस्त हो गयी है, और पहले भी हमारी दादी नानिया अभस्य्त रही है। कोई नई बात नही है। रोज़-रोज़ की बसों मे, हवाई जहाज़ की तंग सीटो मे भी, भीडभाड से भरे बाज़ारों मे, घरों मे सब जगह, नाते रिश्तेदारो और दोस्तों को गले लगाने मे भी। स्पर्श किसी एक तरह का नही होता, स्पर्श और स्पर्श मे फर्क है। आत्मीयता का, दोस्ती का स्पर्श, प्रेम का वांछनीय है, और भीड़ का तो आपकी इच्छा हो न हो , आपको भुगतना ही है, अगर आप "असुर्यस्पर्श्या" नही है तो। इन स्पर्शो की तुलना बलात्कार के या फ़िर योनिक हिंसा से उत्प्रेरित स्पर्शो से नही की जा सकती है। और अन्तर इन स्पर्शो मे सिर्फ़ इंटेंशन का है, शारीरिक एक्ट का नही!! शारीरिक से बहुत ज्यादा बलात्कार पहले एक अस्वस्थ, रोगी, और अपराधी मानस मे जन्म लेता है, और ऐसी परिस्थिति जब उसे कम से कम अवरोधों का सामना करना पड़े, शारिरीक रूप लेता है। इसीलिये, बलात्कार की घटनाओं से भी ज्यादा सर्वव्यापी वों अपराधी मानस है, जिसकी शिनाख्त बिना इस व्यवस्था और पारंपरिक सोच को समझे बिना नही की जा सकती है। और इसकी रोकथाम भी, सामाजिक सोच और स्त्री के प्रति समाज का नज़रिया बदलने के ज़रिये हो सकती है, और तत्कालीन उपाय क़ानून व्यवस्था को सक्षम बना कर और तमाम छोटे-बड़े हर तरह के बुनियादी स्पोर्ट सिस्टम को बना कर किए जा सकते है जो बलात्कार की राह मे लगातार रोड़ा खडा करते रहे।

बलात्कार से भी ज्यादा "योन शुचिता" और "बलात्कार का खौफ" हमारे समाज मे इतना व्याप्त है, की वों स्त्री और पुरूष दोनों से उनकी मनुष्यता छीन लेता हैऔर कुछ हद तक हम सब अप्रत्यक्ष रूप से उसका शिकार हो जाते हैस्त्री-पुरूष के सम्बन्ध विशुद्द रूप से यौनिक संबंधो के दायरे मे बंध जाते है, उनमे एक मनुष्य की तरह दोस्ती की, सहानुभूती की और कुछ हद तक एक स्वस्थ "कम्पीटीशन" की तमाम गुंजाईश ख़त्म हो जाती हैएक दूसरे से सीखने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, एक दूसरे के साथ खड़े होने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, और कही कही बहुत सी समस्याए जो सामूहिक भागीदारी से ही सुलझाई जा सकती है, उनका मार्ग अवरुद्ध हो जाता हैले देकर स्त्री और पुरूष अपना जीवन मनुष्य नाम के एक प्राणी का जीवन जीकर "अपने अपने लैंगिक कटघरों" मे बिताने को बाध्य है। स्त्रीयों का अच्छा स्वास्थ्य, और उनकी देह मे थोडा रफ-टफ पना, मार्शल आर्ट की ट्रेनिग आदि बलात्कार की समस्या का समाधान नही है, पर ये कुछ हद तक उनके भीतर एक मनुष्य होने का विश्वास पैदा कर सकता है, और अपनी परिस्थितियों के आंकलन को इम्प्रूव कर सकता है। और शायद कुछ हद तक, स्त्री पुरूष के बीच खड़ी लैंगिक कटघरों की दीवारों को ढहाने का काम कर सकती है।

40 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप के दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत हूँ। समाज विकास के क्रम में यह भेद उत्पन्न हुए हैं। लेकिन अब वह वक्त आ चुका है कि इस की समाप्ति होनी चाहिए। लेकिन यह भी तो समाज में से शोषण की अंतिम कड़ी के साथ ही समाप्त हो सकेगा। इस लिए स्त्री की मुक्ति का संघर्ष भी मनुष्य के शोषण से मुक्ति के अंतिम युद्ध का हिस्सा है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपने बहुत अच्छा और सच्चा विश्लेषण किया है। साधुवाद।

बलात्कार की भूमिका पहले किसी अपराधी मस्तिष्क के भीतर बनती है। इसके बाद यह चिन्गारी बाहरी परिस्थितियों और शिकार की भौतिक दशा का लाभ उठाकर आग की लपट बन जाती है। इसमें सर्वप्रथम स्वाहा होती है स्वयं उस बलात्कारी की मानवता और शर्मसार होता है यह मानव समाज। लेकिन त्रासद सजा भोगनी पड़ती है उस अकेली औरत को जिसकी क्षति अपूरणीय बना दी जाती है।

इस सम्पूर्ण मसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे दुर्भाग्य की शिकार महिला को सामाजिक रूप से त्याज्य बनाकर हम सभी एक सामाजिक अपराध कर रहे होते हैं। जिसे सहानुभूति और आत्मीयता की आवश्यकता है, मानसिक अवलम्बन की जरूरत है उसको उसकी नियति पर छोड़कर हम भी उस अपराध में भागीदार बन जाते हैं।

आखिर ऐसा क्यों है कि सड़क पर किसी गाड़ी की चपेट में आकर चोटग्रस्त पड़े व्यक्ति को भी आते-जाते राहगीर छोड़कर अपने काम को चले जाते हैं। लावारिस होकर पुलिस की प्रतीक्षा करते-करते मौत आ जाती है। इक्का-दुक्का अपवाद को छोड़ दें तो स्थिति कमोवेश यही है कि पुलिस केस में फँसने और अदालतों का चक्कर काटने के डर से लोग आँखों देखी घटनाओं की भी गवाही देने से कतराते हैं।

अपराधी से खुद को बचा लेने और निजी निरापद जीवन जी लेने को ही हम अपने लिए पर्याप्त मान लेते हैं। फिर हम यह कैसे मान लें कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है?

डॉ .अनुराग said...

सच कहा ...बलात्कार मन पे लगा एक नासूर है .जो रिसता रहता है ...ऐसे में इमोशनल सपोर्ट बहुत जरूरी है .सालो पहले इस सवेदनशील विषय पर एक हिंदी फिल्म बनी थी "घर "जिसमे इस विषय को उठाया गया था

सुजाता said...

प्रभावी ढंग से आपने बाते कही।काफी हद तक सहमत!

राजकिशोर said...

"स्त्रियों का अच्छा स्वास्थ्य, और उनकी देह मे थोड़ा रफ-टफपना, मार्शल आर्ट की ट्रेनिग आदि बलात्कार की समस्या का समाधान नही है, पर ये कुछ हद तक उनके भीतर एक मनुष्य होने का विश्वास पैदा कर सकता है, और अपनी परिस्थितियों के आकलन को इम्प्रूव कर सकता है। और शायद कुछ हद तक, स्त्री पुरूष के बीच खड़ी लैंगिक कटघरों की दीवारों को ढहाने का काम कर सकती है।" -- इतना ही, बस इतना ही कहना चाहा था मैंने -- इससे एक शब्द भी ज्यादा नहीं। कृतज्ञता के साथ धन्यवाद।

प्रीतीश बारहठ said...

राजकिशोर जी,
आपने यह कहा था...
"मेरी अपनी बेटी कभी ऐसे किसी हादसे का शिकार हो कर आँसू बहाते हुए घर लौटी, तो मैं उससे यही कहूँगा कि इससे अच्छा था कि बलात्कारी का प्रतिकार करते हुए तू अपनी जान दे देती।"

जिस पर टिप्पणी करते हुए मेरे हाथ कांप गये और मैं टिप्पणी से बच गया। जिस लड़की को यह शब्द सुनने पड़ेगें उसके साथ यह दूसरी घटना समझिये, ऐसा पिता उसे बलात्कारी से ज्यादा आततायी लगेगा। और उसी की छत के नीचे वह जीवित रहने के बजाय आत्महत्या ही करेगी। आपने यह लिखा होता कि मैं खुद उस बलात्कारी की जान लेकर छोडूँगा तो शायद आपके विचार से नहीं तो दुख से सहानुभूति अवश्य होती। समय कम है लेकिन इस लेख पर भी इतना कहता हूँ कि कोई भी एकांगी विचार समाधान की राह नहीं खोज सकता, यह लेख भी नहीं। दीवारें इस तरह नहीं ढहती हैं। भारत - पाकिस्तान दोनों के पास परमाणु बम होंगे तो युद्ध का खतरा नहीं रहेगा, यह चलताऊ विचार है। यह चल रहा है क्योंकि दोनों का एक-दूसरे पर कोई नियन्त्रण नहीं है। लेकिन यहाँ तो दोनों ही पक्ष समाज के नियन्त्रण में हैं। कोई बलात्कारी कैसे बनता है इस पर भी विचार करना होगा। समय मिला तो आगे फिर टिप्पणी करूंगा।

धन्यवाद।
कुछ अनुचित कह गया हूँ तो क्षमा करें...

Sanjay Grover said...

कोई बलात्कारी कैसे बनता है इस पर भी विचार करना होगा।
ji, Pritish ji, bilkul. mere man meN bhi yahi bat thi. yeh sawal bhi kuchh kam mahatvpurn nahiN hai.

आर. अनुराधा said...

जो बलात्कारी बनता है, वह मानसिक रूप से बीमार होता है। और यह मानसिक बीमारी उसके मानसिक और भावनात्मक विकास के साथ ही अपने आस-पास के माहौल से तय होती है- ये मेरा मानना है।

इस बीच अंग्रेजी पत्रिका न्यूज वीक ने अपने 29 जून के अंक में एक लेख छापा है-
"Why Do We Rape, Kill and Sleep Around?

The fault, dear Darwin, lies not in our ancestors, but in ourselves."

इसका लिंक ये रहा-

http://www.newsweek.com/id/202789/output/print

Sanjay Grover said...

मैं आपकी बात से काफी हद तक सहमत हूं, अनुराधा जी। इस बीच भड़ास के माघ्यम से मटुकजूली द्वारा हिंदी ब्लाग शुरु किए जाने का पता चला है। लिंक है:-
www.matukjuli.blogspot.com

Sanjay Grover said...

@@@@@@@@@@@@@भावरी देवी के पति भी है, जिन्होंने अपनी पत्नी का साथ दिया। मेरी नज़र मे यही एक अभूतपूर्ण पहल हमारे जनतंत्र मे हुयी है, जिसमे एक आम, बूढा पिता, और परिवारजन , एक गरीब ग्रामीण, अहिंसक तरीके से और जनतंत्र का इस्तेमाल करके न्याय पाने मे सक्षम रहे है। पर इन सफलताओं का सहरा सामाजिक भागीदारी को जाता है, केवल एक अकेले व्यक्ति और परिवार के लिए ये सब अपने बूते करना मुमकिन नही है।@@@@@@@@@@@@@

ek vyvadhan, apni bat kahne ke liye.

mujhe nahiN lagta ki wo samajik bhagidari bhanvri devi aur uske pati ko naseeb huyi hogi jo प्रिदर्शनी मट्टू के पिता ko.

स्वप्नदर्शी said...

@Prateesh
"समय कम है लेकिन इस लेख पर भी इतना कहता हूँ कि कोई भी एकांगी विचार समाधान की राह नहीं खोज सकता, यह लेख भी नहीं। दीवारें इस तरह नहीं ढहती हैं।"

I agree 100% on this, and its a complicated matter, but we have to deconstruct these complexity one by one and together some day we will find solutions.

I do not claim that this article is solution. It is a mere step of deconstructing myths.

सुशीला पुरी said...

बलात्कार हर उस क्रिया को कह सकते हैं जहाँ हमारी बिना मर्जी के कुछ होता और हम लाचार से देखते या झेलते हैं , आप इस नाजुक विषय पर कलम चला रहे हैं यही स्त्री जागरूकता की शुरुआत है .....बधाई

प्रीतीश बारहठ said...

माफ़ करें। मैं लिंक पर नहीं गया हूँ।

अनुराधा जी, यदि बलात्कारी प्रवृत्ति बीमारी है तब तो उसे अपराध नहीं कहना चाहिये। किसी बीमार का अपने
पर क्या बस होता है। बलात्कारियों के अनेक वर्ग हैं और उन के द्वारा घटित घटनाओं की पृष्ठभूमि भी भाँति -भाँति रूप से पेचीदा होती है। इसलिये मेरा आग्रह सांगोपांग विचार पर ज्यादा है। मनुष्य जानवरों से अलग इसलिये है कि उसने अपनी नैसर्गिक प्रवृत्तियों का परिष्कार किया, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनुशासित किया, अपने पर नियन्त्रण स्थापित किया और उनमें निरन्तरता लाने के लिये सदैव सजग रहकर वातावरण बनाता रहा और उसकी चौकीदारी करता रहा। सैक्स स्त्री और पुरुष दोनों की ही नैसर्गिक आवश्यकता है। एक सुंदर स्त्री को देखकर पुरुष के मन में वासना का भाव जागना स्वाभाविक नैसर्गिक प्रवृत्ति है, ठीक इसी प्रकार अपनी प्रवृत्ति के अनुसार सुंदर और सुघड़ पुरुष को देखकर स्त्री के मन में भी यही भाव आता है यह बलात्कार नहीं हैं। लेकिन एक सामाजिक सांस्कृतिक पुरुष/ स्त्री अपनी इस जैविक प्रवृत्ति पर कुशलता से विजय प्राप्त कर उसे सुंदरतम रूप में परिणित करता है। वह सामाजिक संबंध के रूप में , मानवीयता और परस्पर सम्मान, संरक्षण और स्नेह के रूप में समाज में अभिव्यक्ति होता है। महाभारत में युधिष्ठर से उसकी सौतेली माता के बाबत एक सवाल किया जाता है और उसका जवाब इसे इसी तरह स्पष्ठ करता है। एक संयमित और सुशील व्यक्ति भी नशे में आपा खो देता है क्यों? क्योंकि जो शक्ति उसकी समस्त गैर सामाजिक गैर मानवीय वृत्तियों पर नियन्त्रण रखती वह शिथिल हो जाती है। यह जो हम बहुत वीरता की भावना के साथ (पिछले लेख में) जीवन में किसी भी प्रकार के समझौते को जीवन लीलने वाला बता रहें हैं, मेरे आकाओ जीवन जैसे आक्सिजन के बिना संभव नहीं है उसी प्रकार समझौतों के बिना भी संभव नहीं प्रकृत्ति में प्राणिमात्र की औकात बहुत ही श्रुद्र है। सवाल यही है कि किस हद तक समझौता सम्मानजनक है और किस हद से गुजर जाने के बाद वह लज्जास्पद है। इसलिये एक जीवंत समाज को हमेशा वह वातारवण निर्मित रखना चाहिये जिसमें समस्त गैर मानवीय और गैर सामाजिक वृत्तियां सुप्त रहें,(इन्हें मारा नहीं जा सकता है)।

प्रीतीश बारहठ said...

स्वप्नदर्शी जी,

मैने इस लेख के विषय में जो लिखा वह इसलिये कि मनुष्य का रोजमर्रा का आचरण उसकी बुद्धि से नही उसके संस्कार से नियन्त्रित होता है, जिसका निरन्तर अभ्यास करना होता है। मुझमें यह बुद्धि है कि प्रातःकालीन भ्रमण और एक्सरसाइज से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। लेकिन फिर भी मैं यह नहीं करता हूँ। दूसरी और मुझे इस बात की 10 प्रतिशत भी जानकारी नहीं है कि दांतों में कितनी प्रकार के रोग होते हैं जिनसे मंजन उनकी सुरक्षा करता है और किस तरह करता है। फिर भी मैं रोज दांत साफ करता हूँ कभी नहीं भूलता। आपके लेख में भी दोषारोपण ही अधिक है, यह घड़े बनाता है, सोच बदलने का उपदेश देता है लेकिन उस सोच को उकसाने वाले वातावरण पर कुछ नहीं कहता। दुनिया से बलात्कार की समस्या का जड़ से समाधान हो सकता है मुझे विश्वास नहीं होता लेकिन हाँ जो समाज सजग होगा, अपनी संस्कारशीलता को बनाये रखेगा वहाँ यह न्यूनतम स्तरतक जा सकता है लेकिन उसके लिये सजगता में निरन्तरता बनाये रखनी होगी। दुनिया में चोरों का खात्मा कर देने के बाद भी अपने सामान की सुरक्षा और निगरानी की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती है। कब कौन चोर हा जाये.... कुछ पता नहीं..

Sanjay Grover said...

समझौते के बिना दुनिया नहीं चलती और भ्रष्टाचार और पाखण्ड के बिना हिंदुस्तान नहीं चलता और इसे अधिकांश लोगों ने स्वीकार भी कर लिया है। सार्वजनिक रुप से क्या कहा जाता है, अलग बात है। मगर हमने जब बेईमानी को अपना मान लिया हो तो फिर हमें क्या ये शिकायतें करने का हक रह जाता है कि हमारे नलों में ज़हरीला पानी क्यों आता है ? मेट्रो पुल क्यों गिर जाते हैं ? आतंकवादी कैसे अपना काम कर जाते हैं ? बलात्कार के मामलों में पूलिस इतनी पूर्वाग्रही क्यों है ? ( आखिर पुलिस वालों को भी अपने घर-परिवार, समाज-परिवेश से कुछ संस्कार मिले होते हैं।)

संस्कार के अपने ख़तरे हैं। समझौते की हदें और संस्कार का स्वरुप कैसे तय होगा ? अभी तो ऐसा है कि एक बेटा है, सुबह मां-बाप के पैर छूता है तो उसे भी लगता है, मां-बाप को भी लगता है, रिश्तेदारों को भी लगता है, पड़ोसियों को भी लगता है, समाज को भी लगता है कि पृथ्वी पर कोई पवित्र घटना घट रही है। दोपहर वो एक जोड़ी जूते लाता है और उनके पैसे मां से अलग से ले लेता है, बाप से अलग और भाभी मां से अलग और उसके लिए कोई झूठी गवाही की ज़रुरत पड़े तो दोस्तों को आगे कर देता है। अब यह सोफेस्टीकेटेड ठग बाबा लोगों की नज़र में बड़ा संस्कारी कहलाएगा । इस ‘प्रेरणा’ और ‘संस्कार’ के चलते वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में तरक्की कर जाएगा, इसमें कोई शक नही है। इस आदमी को बलात्कार की भी ज़रुरत नहीं पड़ेगी। वह मां कहकर भाभी के साथ बिना किसी अपराध-बोध के कुछ भी कर लेगा पर कमरे से बाहर आकर किसी से कहेगा नहीं। कहेगा तो वहां कहेगा जहां इस तरह की वीरताओं के प्रसारण से कोई फायदा या प्रशंसा मिलती होगी। बात कमरे से बाहर न निकले तो भाभी मां को भी कोई एतराज़ न होगा। इसी तरह वह अन्य लड़कियों से फायदे उठाएगा। जहां नकली ‘भाई’ बनकर संभव होंगे वहां नकली भाई बनकर, जहां प्रगतिशील दोस्त बनकर आसानी होगी वहां वैसा बनकर। और इसमें कोई बुरा मानने की बात नहीं, देखी-दिखाई आम सच्चाई है कि इन सब महानताओं के चलते आज तक तो उसे घर-बाहर की महिलाओं की प्रशंसा और सहयोग ही मिलते आए होते हैं। अब वे जानते-बूझते दिए गए हों चाहे अनजाने में या मानसिक कंडीशनिंग के चलते।

मुश्किल यह है कि संस्कार कितने भी बढ़िया,(वैसे भिन्न-भिन्न संस्कारों का घटिया-बढ़ियापन भी बहस का विषय है) , कितने भी नेक इरादों से डाले गए हों अंततः जड़, विवेकहीन कर्मकांडों जैसी दुर्गति को प्राप्त हो जाते हैं।

अब एक दूसरा लड़का है जिसे सीधी-सपाट बात करनी आती है, चालाकियां नहीं आतीं, व्यक्त्वि आकर्षक नहीं है या आकर्षक बनाकर पेश करने की कला नहीं जानता या ऐसा करना ही नहीं चाहता तो ज़्यादा संभावना इसी बात की है कि यही भाभियां, बहिनें, सहेलियां, लड़कियां उसके साथ उपेक्षा, उपहास या घृणा के साथ पेश आएं। (इन्हीं सब बातों को कहने की वजह से मैं उस दिन चोखेरबाली पर कमेंट करने से बचा था जिसकी शिकायत सुशीला पुरीजी ने मेरे ब्लाग पर आकर की थी ) अब अगर इस लड़के को बचपन से यही सब व्यवहार मिलता आया है तो संभावना है कि किसी दिन उसकी मानसिकता रुग्ण्ता में बदल जाए। फिर जो वो गुस्ताख हुआ तो बलात्कार पर उतर सकता है और जो उसका व्यक्त्वि ज्यादा ही दबा दिया गया है तो मुमकिन है वो कुछ अन्य ढंके-छिपे तरीकों से अपनी कुंठा निकाले। क्योंकि सभी लोग तो इतने समझदार, संवेदनशील, त्यागी और प्रबुद्व होते नहीं कि भैया हमें कुछ मिला या नहीं मिला पर आगे से कोशिश करेंगे कि हमारे जैसों की ऐसी दुर्गति न हो। हम एक समाजसेवी संस्था चलाएंगे, ये करेंगे या वो करेंगे....
ऐसे कई कारण हो सकते हैं, मैंने सिर्फ एक उदाहरण रखा है......

Sanjay Grover said...

पोस्ट थी ‘सरनेम की महिमा’ और मेरी टिप्पणी थी:-
""मेरे माता-पिता ने कहीं भी टीका-टिप्पणी करने को मना किया है।""

(http://blog.chokherbali.in/2009/08/blog-post_18.html)

आशय यही था कि या तो हम माता-पिता और संस्कार की अंघ-भक्ति में डूबे रहें या फिर औरतों के मसअले हल करलें। संस्कार और माता-पिता पर इतना और ऐसा ज़ोर रहने पर ये दोनों काम साथ-साथ तो होने वाले लगते नहीं।
विस्तार से बात रखना चाहता था, आलस कर गया।

Sanjay Grover said...

वो बात सारे फसाने में जिसका ज़िक्र न था/
वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है //

इस पोस्ट के किसी कमेंट में उन बातों का कहीं अता-पता नहीं है जिनपर भूतनाथ (बनावटी) क्रोध-विरोध-प्रतिरोध दिखा रहे हैं। भैया मेरे चोखेरबाली की पुरानी पोस्टों में चले जाओ, हमारे नाम से इसी विषय पर बहुत बढ़िया-बढ़िया तकरीरें मिलेंगीं। चाहो तो कापी कल्लेना।

Lal salaam said...

अन्तर इन स्पर्शो मे सिर्फ़ इंटेंशन का है, शारीरिक एक्ट का नही!! शारीरिक से बहुत ज्यादा बलात्कार पहले एक अस्वस्थ, रोगी, और अपराधी मानस मे जन्म लेता है, और ऐसी परिस्थिति जब उसे कम से कम अवरोधों का सामना करना पड़े, शारिरीक रूप लेता है। इसीलिये, बलात्कार की घटनाओं से भी ज्यादा सर्वव्यापी वों अपराधी मानस है, जिसकी शिनाख्त बिना इस व्यवस्था और पारंपरिक सोच को समझे बिना नही की जा सकती है। और इसकी रोकथाम भी, सामाजिक सोच और स्त्री के प्रति समाज का नज़रिया बदलने के ज़रिये हो सकती है, और तत्कालीन उपाय क़ानून व्यवस्था को सक्षम बना कर और तमाम छोटे-बड़े हर तरह के बुनियादी स्पोर्ट सिस्टम को बना कर किए जा सकते है जो बलात्कार की राह मे लगातार रोड़ा खडा करते रहे।thik hay

Sanjay Grover said...

मोहल्लालाइव.काम पर एक पोस्ट आयी है:-

"""ज़हरीली हंसी और एसएमएस में स्‍त्री की छवियां"""

http://mohallalive.com/2009/09/20/mrinal-vallari-on-vulgar-sms/

भूतनाथ अपना यह कमेंट वहां रखें तो प्रासंगिक होगा।

राजकिशोर said...

मेरा खयाल है, बलात्कार की समस्या पर यहाँ पर्याप्त बहस हो चुकी है। अब हमें थोड़ा आगे बढ़ना चाहिए। मैं प्रस्ताव करता हूँ कि चोखेर बाली की समन्वयक की ओर से इस सामुदायिक ब्लॉग के सदस्यों के बीच से तीन व्यक्तियों (इनमें एक पुरुष हो) की एक समिति बना दी जाए। समिति का काम होगा, बलात्कार की सम्स्या के समाधान के लिए विभिन्न स्तरों (समाज, सरकार, न्यायालय, पुलिस, परिवार, संगठन, व्यक्ति, नागरिक आदि) पर कार्यान्वयित किए जाने योग्य कदमों का निर्धारण करना। यह रिपोर्ट दो हजार शब्दों से अधिक की न हो। रिपोर्ट को चोखेर बाली पर प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए तथा लोगों की राय आमंत्रित की जाए। जो अपनी राय नहीं लिखना चाहते, उनसे सिर्फ सहमत/असहमत के रूप में अपना मंतव्य देने के लिए कहा जाए।

प्रीतीश बारहठ said...

मेरे आने तक लगता है मेला बिखर गया
बहस समाप्ति की घोषणा हो जाने पर कुछ कहना अनुचित है लेकिन क्षमा चाहता हूँ।
बिना समझौतों के दुनिया तो चल सकती है जीवन नहीं चल सकता..जीवन...जीवन..
बिना समझौते के ही नहीं, समझौते करने वाले दुनिया के सभी स्त्री-पुरुष मिट जायें तब भी दुनिया तो चलती रहेगी। समझौते की हद उसी तरह तय की जा सकती है जैसे अन्य चीजों की, बिल्कुल आसान है, कोई कठिनाई नहीं है। मैं अपनी योग्यता और देश-काल के परिवेश की पृष्ठभूमि अपने स्वत्व को बचाकर किसी निर्धारित वेतन के बदले किसी की नौकरी करने का समझौता करता हूँ तो यह सम्मानजनक समझौता है और यदि दो रोटी के बदले किसी का बंधुआ मजदूर हो जाता हूँ तो अपमानजनक और यदि किसी पर अनुचित दबाव ड़ालकर अपनी योग्यता के अनुपात में अधिक वेतन का समझौता करने को बाध्य करता हूँ तो वह भी अनुचित है। हद पार के कुछ समझौते जो कमजोर मनुष्यों ने कर लिये हैं उनके उदाहरण संजय जी ने दे दिये हैं, जिनसे वे खुद समझौता नहीं करते हैं यही हद है। हाँ मैं किसी को कहता हूँ, आज तो बड़े हीरो लग रहे हो तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं उसे हीरो मान रहा हूँ, यह मेरी उसके बनाव-श्रंगार पर टिप्पणी है। उसी तरह इन तमाम में भी टिप्पणियां मौजूद हैं, और औकात सीमित होने के कारण अनुचित समझौते हैं, या अपराध हैं। हालांकि मेरी टिप्पणी में आचरण और विचार की हैबिट को संस्कार कहा गया था लेकिन फिर भी संजय जी के पहले लड़के को मैं संस्कारशील नहीं मानता। और उनके दूसरे लड़के को भी.. हाँ .. दूसरे को भी.. (कारण जानना जरूरी हो तो आदेश करें)। मैं संस्कार के साथ जड़ता नहीं निरन्तरता की बात करता हूँ।
जब मनुष्यों को को भूत –जिन्द सलाह देने लगे हों तो मुझे चुप हो जाना चाहिये।

Sanjay Grover said...

मैं तो प्रीतीशजी से यही कहूंगा कि बात पूरी करें। हांलांकि (मेरे !) दूसरे लड़के को संस्कारशील मैंने भी नहीं कहा, फिर भी मुझे लगता है कि प्रीतिशजी का पक्ष जानना लाभदायक रहेगा। बाकी ‘चोखेर बाली’ के माडरेटर्स के हाथ में है।

प्रीतीश बारहठ said...

संजय जी,
मैंने लापरवाही की या मेरे शिक्षकों ने मुझे उचित प्रकार से और पर्याप्त नहीं पढ़ाया, या मेरे अभिभावकों ने मेरी शिक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं की, सभी परिस्थितियों मेरा रिजल्ट अनुत्तीर्ण ही रहेगा, जिम्मेदारी तय करना शेष रहेगा, प्राथमिक रूप से मैं ही अनुत्तीर्ण कहलाऊँगा। बात यदि जिम्मेदारी की है तो मेरे केस पर विचार करने के लिये इन सभी पहलूओं पर विचार करना होगा तभी राह निकलेगी। इसीलिये मैंने टिप्पणी की थी कि बलात्कार के केस की पेचीदा पृष्ठभूमि पर समग्रता से विचार करना होगा। मैं ये भी नहीं मानता कि जो व्यक्ति अपने शेष कार्य सामान्य ढ़ंग से करता है उसकी बलात्कारी प्रवृत्ति कोई मानसिक बीमारी या रुग्णता है। वह स्पष्ट रूप से अपराध है। आपके दूसरे लड़के के (टिप्पणी के दूसरे लड़के, इसे इस रूप में लें) बारे में आपने कहा है कि वह वह सीधा-सपाट है तो ठीक है, इससे तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता यदि वह सुसंस्कृत है। लेकिन यदि आपके सीधे-सपाट से आशय यह है कि उसे शिष्टाचार नहीं आता है तो यह किस कारण से? क्या उसका माहौल ही ऐसा है ? उसे रास्ता चाहिये तो वह कहेगा कि मुझे उधर जाना है कृपया रास्ता दें या वह कहेगा कि अरे हट परे बीच में खड़ा है खम्बे की तरह ! आखिर वह है कैसा? जिसेके साथ "यही भाभियां, बहिनें, सहेलियां, लड़कियां उसके साथ उपेक्षा, उपहास या घृणा के साथ पेश आएं।" आपकी यह पंक्ति भाभियों, बहनों, सहेलियों, लड़कियों के किस दायित्व का निर्धारण कर रही हैं क्या उस लड़के की वासना को बाझ इन पर धरा जाना है? उस पर बेहद खतरनाक़ धमकी है यह कि यदि उसकी यौन इच्छाओं की पूर्ति नहीं की तो वह बलात्कार करेगा !!! अच्छा आप बतायें यह लड़का बलात्कार के सिवा और क्या-क्या करेगा ? अपनी यौन इच्छाओं के सिवा दूसरी इच्छायें पूरी करने के लिये क्या-क्या करेगा ? आपने पहले लड़के के सम्बन्ध में जो तथ्य सार्वजनिक किये है उन्हें जानकर कोई मूर्ख ही उसे सुशील कहेगा। आपने उसके चारों और जो वातावरण खड़ा किया है उसके प्रति भी शायद ही कोई सहानुभुति रखे, शायद कोई नहीं। फिर भी उस कहानी में एक बात है कि वह बलात्कार नहीं कर रहा है जो इस पोस्ट का विषय है। अतः उस पर बात कर क्यूँ बाकी लोंगों का समय बर्बाद करें ! क्षमा चाहता हूँ मैंने समझौतों की बात इसमें घुसेड़ दी, जो विषय नहीं था। मेरी मूल बात यह थी कि अपनी नैसर्गिक वृत्ति का सामाजिकीकरण किस प्रकार किया जाता है ! जब हमने भूख लगने पर खाना देखते ही खाने पर जानवरों की तरह नहीं टूट पड़ते। हमने मनुष्य होने के नाते भोजन की एक नैतकी विकसित की है, उसका पालन करते हैं तो अन्य वृत्तियों पर जैसे कि सैक्स..... का नियमन करते हैं।जो नहीं करता वह बलात्कार की ओर बढ़ता है...

यदि वार्ता शिष्ट भाषा ओर भाव में हो तो मुझे भूतों का भी डर नहीं लगता है।

Sanjay Grover said...

देखिए, अब आप खामख्वाह कुछ चीजे़ं मुझपर लादने की कोशिश कर रहे हैं और मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि इन्हीं कारणों से बहसों का माहौल खराब हो जाता है और संदेह उठते हैं कि बहस हम कुछ अच्छा करने की नीयत से कर रहे हैं या सिर्फ हार-जीत और ख़ुदको ऊंचा दिखाने की नीयत से कर रहे हैं। सीधा-सपाट से जो आशय आपने निकाला है वो तो आप किसी भी सच बोलने वाले के बारे में निकाल सकते हैं। और किसी के भी अशिष्ट और बलात्कारी बनने के पीछे उसकी परवरिश और माहीैल न होता हो, ऐसा मुझे तो नहीं लगता। हां, कोई तात्कालिक घटना के चलते भी अशिष्ट हो सकता है। मसलन एक औरत के साथ किसी सार्वजनिक स्थल पर बलात्कार हो जाता है और कोई कुछ नहीं बोलता। कोई बोलता भी है तो यह कि ‘इसके कपड़े ही ऐसे थे’ या ‘ये तो है ही ऐसी’ या ‘इनकी जात बहुत सर पे चढ़ गयी थी, इन्हें रास्ता दिखाना बहुत ज़रुरी था’ (ये सब बातें ये लोग अत्यंत ‘शिष्ट’ भाषा में भी कह सकते हैं क्योकि व्यवस्था ने इन्हें वो स्थितियां-परिस्थितियां बख्षीं हैं कि ये घटिया से घटिया काम भी बहुत धैर्य के साथ निभा सकते हैं) तो ऐसे में वह महिला कभी यह कह भी दे कि ’’एक ’मादर....’ ने मेरे साथ यह किया और सारे ‘मादर....’ देखते रहे ’’ तो ऐसे में आप उस महिला की तकलीफ को समझेंगे या उसकी अशिष्टताएं गिनने बैठ जाएंगे। अब कृपा कर के इसे भूतनाथजी की भाषा का समर्थन न मान लें।
आपने पूछा कि वह लड़का और क्या-क्या कर सकता है ! कुण्ठावश वह उन लड़कियों के बारे में, जिन्हें वह चाहता था और उसे नहीं मिल पायीं, अफवाहें फैला सकता है। उनके पुरुष मित्रों के बारे में भी अफवाहें फैला सकता है। वह किसी कथित धार्मिक दल में शामिल हो सकता है जो कथित सभ्यता-संस्कृति के कथित बचाव के लिए सड़क पर ही लड़कियों को ‘सबक’ सिखा देते हैं। आदेश करें तो और बताऊं।
आप कहते हैं कि बेहद खतरनाक धमकी है कि ‘‘‘उसकी यौन-इच्छाओं की पूर्ति....उसकी वासनाओं का बोझ......’’’। प्रीतिशजी, अपने निकाले हुए अर्थ मेरे ऊपर मत डालिए। मैं यह समझने-समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि ‘ऐसा क्यों होता होगा’ मैंने यह कब कहा कि ‘ऐसा होना चाहिए’!!!!???? मैं फिर कह रहा हूं या तो सही अर्थों को समझिए या फिर 'समग्रता से चिंतन' का दिखावा छोड़िए। मैंने कहा कि """उसे घर.बाहर की महिलाओं की प्रशंसा और सहयोग ही मिलते आए होते हैं। अब वे जानते.बूझते दिए गए हों चाहे अनजाने में या मानसिक कंडीशनिंग के चलते।"""
जो महिलाएं समग्रता से चिंतन करती हैं आज वे भी इन कारकों से इंकार नहीं करती। क्या आप ये मानते हैं कि कि महिलाएं नहीं सिर्फ पुरुष मानसिक कंडीशनिंग के वशीभूत होते हैं !!?? सही नतीजों पर पहुंचना है तो हम सबको ईमानदारी से अपने-अपने भीतर झांकना पड़ेगा। सारी गलतियां दूसरों में नहीं होतीं, ।
आपको लगता है उस सुशील लड़के की बात करना वक्त खराब करना है क्सोकि वह सीधे-सीधे बलात्कार नहीं कर रहा है ! फिर आप ही ‘समग्रता से चिंतन’ की बात भी कर रहे हैं ! प्रीतिशजी, ऐसे ‘सुशील’ लड़के ही समाज में पाखण्डपूर्ण माहौल बनाए रखना चाहते हैं क्योकि पाखण्ड उनके लिए हमारे जैसे समाजों में एक सुविधाजनक रुटीन है। उपका यह सुविधाजनक रुटीन दूसरों में कुण्ठा और रुग्णता का कारण बनता है। आपने कहा कि कोई मूर्ख ही उसे सुशील कहेगा। आप बताएं कि कितने मूर्ख ऐसे होते हैं जो खुदको मूर्ख मानते हैं !? दूसरे, जब तक उस लड़के की बातें कमरे के अंदर हैं तब तक तो वो सुशील ही रहेगा न।

Sanjay Grover said...

जब हम यह जानने की कोशिश कर रहे होते हैं कि बीमारी क्यों हुई तब क्या हमारा आशय यह होता है कि लोगों को बीमार रहना चाहिए !? जान-बूझकर ऐसे आशय निकालने को दूसरे लफज़ों में शरारतपूर्ण कार्रवाई भी कहते हैं।

प्रीतीश बारहठ said...

क्या "चोखेर बाली" के माडरेटर को भी लगता है कि मेरी टिप्पणी माहौल खराब कर रही है,और मेरी नीयत अपने को ऊँचा दिखाने या हार-जीत की है ? यदि हाँ तो मेरी और से अलविदा !!! मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वहाँ किसी-भी सीधे-सपाट लागों को ढेरों प्यार मिलता है, लोग उनको सर-आँखो पे बिठाते हैं। किसी सभा में घण्टों पाखण्डपूर्ण भाषण करने वाले के बजाय 2 लाइन में सच्ची बात कहने वाले पर सभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज जाती है। यहाँ तक कि सच्चे लोगों की थोड़ी-बहुत अशिष्टता भी लोग खुशी-खुशी बर्दाश्त कर जाते हैं उसके लिये कहा जाता है कि भले ही जबान का खारा हो आदमी दिल का सच्चा है, जबकि पाखण्डी के रास्ते में पड़ने से भी लोग कतराने लगते हैं (स्वार्थियों को छोड़कर)। इसलिये मैने संजयजी से जानना चाहा था कि दूसरे लड़के को प्यार न मिल पाने का वास्तविक कारण क्या है ? सिर्फ सीधे-सच्चे होने के कारण उपेक्षा की बात मेरी सीमित बुद्धि को नहीं पचती। फिर उस लड़के को इतना तो पता होता ही होगा कि बलात्कार अपराध है। सभी अपराधों के पीछे पर्याप्त सामाजिक कारण होते हैं मैं भी मानता हूँ। लेकिन क्या कोई मुझे इजाजत देगा कि मेरी ढंग से पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हुई तो मैं चोरी करने लग जाऊँ। बलात्कार से प्रेम और सम्मान की भूख मिट जाती है क्या ? संजय जी, आपने समझौते के नये अर्थ खोले तो मैंने आपकी भावना पर कोई आरोप नहीं लगाया, अपना स्पष्टीकरण दिया था। आप जितना तो नहीं लेकिन थोड़ा सीधा-सपाट मैं भी हूँ इसलिये अपने विश्लेषाणत्मक बुद्धि पर केवल इसलिये लगाम नहीं लगा सकता कि उसमें किसी को शरारत नज़र आयेगी।
हाँ मैं इस ब्लाग पर सार्वजनिकरूप से घोषणा करता हूँ कि मैं संजय जी से श्रेष्ठ नहीं हूँ, न होना चाहता हूँ। यदि जाने-अनजाने कोई ऐसी बात मेरी टिप्पणी मे आ गई हो जो संजय जी की टिप्पणी से श्रेष्ठ हो तो मैं संजय जी और सभी पढ़ने वालों का क्षमाप्रार्थी हूँ।
इससे पहले कि छद्म नामों से टिप्पणी आने लगें, मैं यह भी स्वीकार करता हूँ मेरे पास वह दिव्य-दृष्टि नहीं है, वह चश्मा नहीं जिससे मैं यह देख सकूँ कि कौन दिखावा कर रहा है, किसकी नीयत क्या है !
ब्लागर की टिप्पणी नहीं आने तक मेरी टिप्पणी पुनः नहीं आयेगी मैं इस सुंदर ब्लाग का माहौल खराब नहीं करना चाहता, अबतक किया उसके लिये क्षमा चाहता हूँ।

Sanjay Grover said...

""""""""लेकिन क्या कोई मुझे इजाजत देगा कि मेरी ढंग से पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हुई तो मैं चोरी करने लग जाऊँ। बलात्कार से प्रेम और सम्मान की भूख मिट जाती है क्या ?""""""
aap dobara wahi kar rahe haiN. apni baat ko dusre par zabardasti ladne wali tippniaN aap BHUTNATH jaise nam se kareN, wahi behtar hoga. SamjhautoN ki baat jisne bhi uthayi ho use itni samajh honi chahiye ki SamjhotoN ke nam par bade se bade apradh ko justify kiya ja sakta.isliye zaruri hai ki hadeN puchhi jayeN. Na ki tark chhorhkar bhavnayeN bhunane par utar aaya jaye. jo sher maine BHUTNATH ji se kaha tha wahi aapse kahkar (aapse) aagya chahuNga :-
वो बात सारे फसाने में जिसका ज़िक्र न था/
वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है //

NAMASTE

सुजाता said...

बहस व्यक्तिगत न होकर जब तक मुद्दे पर है तब तक वह माहौल खराब नही कर रही।मुझे कोई कारण नही दिखता कि प्रीतीश जी अपनी टिप्पणियों को हटा लें।सिर्फ हाँ धर्मी टिप्पणियों की आदत चोखेरबाली को नही होनी चाहिए।लेकिन जिस तरह की असंयमित भाषा भूतनाथ लिख रहे हैं वह ऐसी गम्भीर बहस मे किसी तरह भी स्वागत योग्य नही है।

स्वप्नदर्शी said...

@ prateesh and Sanjay
mujhe samajh nahee aa rahaa hai ki ye bahas khaa jaa rahee hai?
is "climex" ke liye to ye kavaayad mene nahee kee thee!!!

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
यह जो विषय है....यह दरअसल स्त्री-पुरुष विषयक है ही नहीं....इसे सिर्फ इंसानी दृष्टि से देखा जाना चाहिए....इस धरती पर परुष और स्त्री दो अलग-अलग प्राणी नहीं हैं...बल्कि सिर्फ-व्-सिर्फ इंसान हैं प्रकृति की एक अद्भुत नेमत.. !!...इन्हें अलग-अलग करके देखने से एक दुसरे पर दोषारोपण की भावना जगती है....जबकि एक समझदार मनुष्य इस बात से वाकिफ है की इस दुनिया में सम्पूर्ण बोल कर कुछ भी नहीं है.....अगर पुरुष नाम का कोई जीव इस धरती पर अपने पुरुष होने के दंभ में अपना "....." लटकाए खुले सांड की तरह घूमता है...और स्त्रियों के साथ "....." करना अपनी बपौती भी समझता है....तो उसे उसकी औकात बतानी ही होगी....उसे इस बात के लिए बाध्य करना ही होगा की वह अपने पजामे के भीतर ही रहे....और उसका नाडा भी कस कर बंद रखे ....अगर वह इतना ही "यौनिक" है...कि उसे स्त्रियों के पहनावे से उत्तेजना हो जाती है...और वह अपने "आपे" से बाहर भी हो जाता हो...तो उसे इस "शुभ कार्य" की शुरुआत...अपने ही घर से क्यों ना शुरू करनी चाहिए....लेकिन यदि ऐसा संभव भी हो तो भी बात तो वही है.... कि उसके "लिंग-रूपी" रूपी तलवार की नोक पर तो स्त्री ही है... इसीलिए हर हाल में पुरुष को अपने इस "लिंगराज" को संभाल कर ही धरना होगा...वरना किसी रोज ऐसा हर एक पुरुष स्त्रियों की मार ही खायेगा...जो अपने "लिंगराज" को संभाल कर नहीं धर सकता...या फिर उसका "प्रदर्शन" नानाविध जगहों पर...नानाविध प्रकारों से करना चाहता हो.....!!
मैं देखता हूँ....कि स्त्रियों द्वारा लिखे जाने वाले इस प्रकार के विषयों पर प्रतिक्रिया में आने वाली कई टिप्पणियाँ [जाहिर है,पुरुषों के द्वारा ही की गयीं...]...अक्सर पुरुषों की इस मानसिकता का बचाव ही करती हुई आती हैं....तुर्रा यह कि महिला ही "ऐसे पारदर्शी और लाज-दिखाऊ-और उत्तेजना भड़काऊ परिधान पहनती है....बेशक कई जगहों पर यह सच भी हो सकता है....मगर दो-तीन-चार साल की बच्चियों के साथ रेप कर उन्हें मार डालने वाले या अधमरा कर देने वाले पुरुषों की बाबत ऐसे महोदयों का क्या ख्याल है भाई....!!
जब किसी बात का ख़याल भर रख कर उसे आत्मसात करना हो....और अपनी गलतियों का सुधार भर करना हो.. तो उस पर भी किसी बहस को जन्म देना किसी की भी ओछी मानसिकता का ही परिचायक है...अगर पुरुष इस दिशा में सही मायनों में स्त्री की पीडा को समझते हैं तो किसी भी भी स्त्री के प्रति किसी भी प्रकार का ऐसा वीभत्स कार्य करना जिससे मर्द की मर्दानगी के प्रति उसमें खौफ पैदा हो जाए....ऐसे तमाम किस्म के "महा-पुरुषों" का उन्हेब विरोध करना ही होगा....और ना सिर्फ विरोध बल्कि उन्हें सीधे-सीधे सज़ा भी देनी होगी...बेशक अपराधी किसी न किसी के रिश्तेदार ही होंगे मगर यह ध्यान रहे धरती पर हो रहे किसी भी अपराध के लिए अपने अपराधी रिश्तेदार को छोड़ना किसी दुसरे के अपराधी रिश्तेदार को अपने घर की स्त्रियों के प्रति अपराध करने के लिए खुला छोड़ना होता है...अगर आप अपना घर बचाना चाहते हो तो पडोसी ही नहीं किसी गैर के घर की रक्षा करनी होगी...अगर इतनी छोटी सी बात भी इस समझदार इंसान को समझ नहीं आती...तो अपना घर भी कभी ना कभी "बर्बाद"होगा....बर्बाद होकर ही रहेगा....किसी का भी खून करो....उसके छींटे अपने दामन पर गिरे बगैर नहीं रहते....!!
अगर ऐसा कुछ भी करना पुरुष का उद्देश्य नहीं है तो ऐसी बात पर बहस का कोई औचित्य....?? अगर इस धरती पर स्त्री जाति आपसे भयभीत है तो उसके भय को समझिये....ना कि तलवार ही भांजना शुरू कर दीजिये....!!
आप ही अपराध करना और आप ही तलवार भांजना शायद पुरूष नाम के जीव की आदिम फितरत है.....किंतु अपनी ही जात की एक अन्य जीव ,जिसका नाम स्त्री है....के साथ रहने के लिए कुछ मामूली सी सभ्यताएं तो सीखनी ही होती है....अगर आप स्त्री-विषयक शर्मो-हया स्त्री जाति से चाहते हो तो उसके प्रति मरदाना शर्मो-हया का दायित्व भी आपका है कि नहीं....कि आपके नंगे-पन को ढकने का काम भी स्त्री का ही है....??ताकत के भरोसे दुनिया जीती जा सकती है.....सत्ता भी कायम की जा सकती है मगर ताकत से किसी का भी भरोसा ना जीता जा सका है....ना जीता जा सकेगा.......!!ताकत के बल पर किसी पर भी किसी भी किस्म का "राज"कायम करने वाला मनुष्य विवेकशील नहीं मन जा जा सकता....बेशक वो मनुष्यता के दंभ में डूबा अपने अंहकार के सागर में गोते खाता रहे......!!दुनिया के तमाम पुरुषों से इसी समझदारी की उम्मीद में......यह भूतनाथ....जो अब धरती पर बेशक नहीं रहा....!!

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

.....और अब कहूँ कि आपके द्वारा दी गयी एक अच्छी राय को सर माथे पर लेता हूँ....लेकिन अडतीस वर्ष का यह व्यक्ति उर्फ़ भूतनाथ से यह दुनिया देखी ही नहीं जाती....पागल सा बना रहता है यह भूत....!!.........जिसके साथ बाबा आदम जमाने से रहता आया मर्द नाम का यह "विवेकशील"जीव........जिसके संग मर्द नाम के इस "समझदार,विद्वान......" जीव को क़यामत तक रहना है,उस स्त्री के प्रति इस जीव की घटिया और घृणित सोच से व्यथित रहता है यह भूतनाथ....जो जिन्दगी को पूरा करती है.....जो जिन्दगी में तमाम रंग भरती है.....उस स्त्री को इस "कुत्ते"जीव ने अपनी जायदाद....अपने हरम की कोई वस्तु बनाकर धर रखा है....हर वक्त अपने "........."रुपी जीभ को लपलपाता यह जीव एक बीहड़ सी भूख और प्यास से व्याकुल रहता है.....इसकी भूख ना जाने कितनी असीम और अनंत है,मुझे यह भी समझ नहीं आता....इसकी हरकतों पर जैसे मैं खुद अपने बाल नोचता रहता हूँ.....इसकी तरफ से ना जाने किससे-किससे माफ़ी माँगता रहता हूँ.....इसकी भूख और प्यास का क्या करूँ मैं.....और इसके लिए दुनिया का गन्दा से गंदा भी शब्द तुच्छ है.....छोटा है.....इसके लिए कौन से शब्द मैं व्यक्त करूँ....जो सच में इसके "तुल्य" हों.....इसके लिए तो मैं शब्दकोष में से भी कोई शब्द नहीं ढूँढ पाता.....मैं क्या करूँ.....आपने एकाध शब्दों के संतुलन की और इशारा किया है....मगर पुरुष जाति के लिए मैं खुद पुरुष होकर खुद ही असंतुलित हूँ.....मैं क्या करूँ.....मैं क्या करूँ.....मैं क्या करूँ......?????

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

यह दुनिया बहुत ही अजीब है.....अपने सम्मुख होते हर किस्म के अपराध को,अपने खिलाफ अत्याचार को,अपने शोषण को और ना जाने कितनी ही स्त्रियों के संग रोज-रोज होते बलात्कार को कोई नहीं रोक पाता....ना जाने कितनी ही स्त्रिया अपने पुरुषों के पापकर्म में भागी बनती है....ना जाने कितनी ही स्त्रियाँ तमाम वेश्यालयों की मालकिनें हैं...कितने ही चकलाघर स्त्रियों की देख-रेख में ही चलते हैं....रोज लाखों-करोडों लोग मादर.....बहिन.....भैन.....और ना जाने कितनी ही प्रकार की गालियों का सदुपयोग अपनी ही माँ-बहिन...दादा-दादी...चाचा-चाची..
ताऊ-ताई...या फिर तमाम किस्म के रिश्तेदारों के सम्मुख "सदुपयोग" करते हैं....मगर शायद इन बहिनों...माँओं...और इसी तरह की स्त्रियों को यह सब नागवार नहीं गुजरता...बल्कि शायद स्वाभाविक लगता है....कोई किसी किस्म के धत्त करम को नहीं रोक पाता....मगर दूर बैठे इस भूतनाथ की भाषा को अस्मित कहा जाता...
कौन जानता है इस भूतनाथ को...और कितना ??....क्या अपशब्द कह डालें हैं इस बनावटी भूत ने...??....अपनी व्यवहारिक जिन्दगी में घटने वाले असंयम और अश्लीलता से ज्यादा असंयमित है इसकी भाषा...इस भाषा में छिपे दर्द का कोई मोल है क्या....??सच बताऊँ... यह भूत शायद स्त्री के प्रति एक स्त्री से ज्यादा सम्मान रखता है....और एक अपूर्व प्रेम भी.. और स्त्री जाती ही क्या मानव-मात्र...के प्रति होने वाले तमाम किस्म के "रेप" पर उस व्यक्ति या स्त्री से ज्यादा तड़पता है....जिसके साथ यब घटा है....भूतनाथ की दुनिया कैसी है...यह भूतनाथ होकर ही जाना जा सकता है....खैर मेरे उदगारों से अगर बहुत से लोगों को तकलीफ हुई है...तो उसके लिए बेशक मैं क्षमा मांग लूंगा....मगर....मैं बार-बार इसी भाषा का उपयोग करूंगा....क्योकि मेरी तड़प और पीडा को व्यक्त करने में दरअसल ये शब्द भी सक्षम नहीं हैं....मगर कम-से-कम असंयमित शब्दों को इस्तेमाल करते हुए ही मैंने यह सब लिखा है...भाषा पर अपनी पकड़ और उसके इस्तेमाल का परिणाम मैं बेशक जानता हूँ....अगर कोई सच में ही गहराई में जाए तो उसे कतई यह असंयमित नहीं प्रतीत होगा...बाकि फिर भी सबसे क्षमा के संग....विदा...आप सब ब्लोगरों ही नहीं अपितु मानव-मात्र का हितैषी यह अप्रिय जीव....भूतनाथ.....!!

सुजाता said...

आखिर कुछ टिप्पणीकार अपनी मानसिकता का परिचय ही दे रहे हैं , हटाने के बाद भी टिप्पणी दोबारा कर गए हैं ; चलिए अच्छा है कि सभी के भीतर की गन्दगी समाज मे बिखरने की बजाए यहीं निकल जाए।
अनर्गल टिप्पणियों का जवाब न देना ही बुद्धिमानी है संजय जी, प्रीतीश जी !

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

सिर्फ खुद को ऊँचा दिखाने की गरज से ही अगर लेखक-ब्लोगर लिखते पढ़ते और खुद को व्यक्त करते हैं...तब तो उसका मुझे नहीं पता...मगर अगर सच ही में कोई सच्चाई कहने के लिए खुद को व्यक्त करता है...तब कुछ और ही बात घटित होती है.. आपकी माँ-बहनों के साथ कुछ भी घटता है.... आप रहे ना संयमित....!!!आप बीच बाज़ार में गन्दी अश्लील गालियाँ सुनते सुनाते हो...आप रहो ना संयमित....मेरी माँ-बहन ही क्या किसी भी स्त्री के संग "रेप" तो दूर की बात कोई अश्लील शब्दों का उपयोग तो कर दे....मैं कतई संयमित नहीं रह सकता...सार्वजनिक रूप से होते हुए किसी स्त्री के संग अपमान को रोकने के लिए मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ....अगर संयम का अर्थ आपलोगों वाला अपना लिया जाए तो "आक्रोश" नाम के इस शब्द का क्या अर्थ रह जाएगा.. जिसके कारण ही कोई इंसान किसी भी गलत कृत्य को रोकने के लिए उद्द्यत होता है...या फिर अपनी जान की बाजी तक लगा सकता है मेरे लेखक ब्लोगर बंधुओं संयम को अपनी कायरता और असमर्थतता का हथियार ना बना डालें...कहीं-कहीं असंयम का ही अर्थ है...और वहां सयंम सबसे बड़ी मुर्खता....मैं जो कहना चाह रहा हूँ....वो अगर किसी को समझ आये तब तो कोई बात है....अगर नहीं तो एक बार फिर सबसे क्षमा....!!मगर क्या करूँ... मुझसे "उथलेपन" को देख कर भी तो नहीं रहा जाता.....!!

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

सुजाता said...

आखिर कुछ टिप्पणीकार अपनी मानसिकता का परिचय ही दे रहे हैं , हटाने के बाद भी टिप्पणी दोबारा कर गए हैं ; चलिए अच्छा है कि सभी के भीतर की गन्दगी समाज मे बिखरने की बजाए यहीं निकल जाए।
अनर्गल टिप्पणियों का जवाब न देना ही बुद्धिमानी है संजय जी, प्रीतीश जी !
सच तो यह है कि तकनीक की बाबत मैं ज़रा कमजोर हूँ मुझे लगा था कि शायद मेरी उस दिन की टिपण्णी सर्वर डाउन होने के कारण यहाँ पर नहीं आ पायी....और शायद मेरे ब्लॉग पर जाकर लोगों ने मेरे आलेख को देखा है...बस इसी गरज से मैंने वो टिपण्णी नुमा आलेख वापस यहाँ चंस्पा कर दिया था...मगर सुजाता जी की इस टिपण्णी से मुझे असल बात चला चली....मैं बेशक एक बेहद खराब और गंदा या अश्लील इंसान हो सकता हूँ....मगर जितना कि सुजाता जी सोचती हैं...शायद इतना भी नहीं....खैर किसी एक के किसी को गलत समझ लेने से कोई सबके लिए गलत थोडा ही ना हो जाता है....खैर इस बात के लिए मैं एक बार फिर शर्मिन्दा हूँ....और आगे से इस ब्लॉग पर ना आने का वादा करके आप सब लोगों से भी क्षमा माँगता हूँ....अगर इससे आप सबका आहंकार खुश हो जाए...खासकर सुजाता जी का...लेकिन एक बात अवश्य कहूंगा...कि समंदर मथने से सिर्फ अमृत ही तो नहीं निकलता .....थोडा बहुत ज़हर भी निकलता है...है ना ???

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

भूत नाम धरने का यह अर्थ कतई नहीं होता कि कोई अपना परिचय ही नहीं देना चाहता...परिचय की खातिर उसी ब्लॉग और अन्य साधन भी उपस्थित होते हैं....जैसे फेस बुक....ऑरकुट... आदि-आदि....समस्त जानकारियाँ वहां मौजूद हैं इस बनावटी भूत के बारे में....बाकी आदमी को अगर जानना हो तो बात पुरानी है नाम का ब्लॉग भी काफी है....कोई किसी के भीतर क्या ढूँढ पाटा है....यह ढूढने वाले की की मानसिकता का भी परिचायक होता है....समंदर में उतरते तो सभी है....मगर कोई मछली तक सीमित रह जाता है...मगर कोई मोती भी ढूँढ लाता है....बेशक मोती ढूँढने वाले बहुत कम होते हैं....है ना ??

Sanjay Grover said...

‘अनर्गल के सामने चुप रह जाने’ की आपकी सलाह को मैं एक हद तक ठीक मानता हूं। पर फिलहाल इसके दो खतरे मुझे दिखाई पड़ते हैं। पहला, वे लोग इसका इस्तेमाल रणनीति की तरह करेंगे (और करते भी हैं) जो खुद अनर्गल या अतार्किक कहकर विवाद में फंस जाते हैं। दूसरे, समाज में इससे अनर्गल के ‘सही’ या ‘सच्चा’ होने का भ्रम फैल सकता है। और हमारा समाज किस कदर षडयंत्रों का शिकार और भागीदार है, यह मैं आपको बताऊं तो अजीब ही लगेगा। लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के लिए आवश्यक समझे ंतो इस टिप्पणी को रखें अन्यथा हटा दें। विदा।

प्रीतीश बारहठ said...

सुजाता जी!

आपका संतुलित रुख अपनाना उचित है, खांमखां ओछी चीजों के मुंह लगाना भी नहीं चाहिये। मुझसे पहलीबार यह गलती अनजाने में हो गई थी और दूसरी बार इस उम्मीद में कि पहला अनुभव शायद तात्कालिक आवेश के कारण था, जो गलत अनुमान निकला। अनर्गल से बचने के लिये आपको अपने ब्लॉग पर माडरेटर आन रखना चाहिये। दरअसल कुछ लोग इतनी कुत्सित मानसिकता के होते हैं कि वे महिलाओं को अपने अश्लील शब्द सुना-पढ़ाकर भी यौनिक सुख की अनुभूति करते हैं, ये महिलाओं कि उपस्थिति मात्र से उत्तेजित हो जाते हैं, ये कितने भी सच्चे और भले होने का दावा करें किसी भी कीमत पर अश्लीलता का दामन नहीं छोड़ सकते। बलात्कार की मानसिकता पर विचार करते हुए इस मानसिकता की जांच - परख भी आवश्यक है। अनर्गल मूर्खता के सामने भी सिर्फ दो हथियार बचते हैं, एक तर्क के सामने निरुत्तर होकर या तो ये अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर शीघ्र ही लौटने और माकूल जवाब देने की दूर-दूर से धमकियाँ देते रहते हैं, अपने चेलों को आगे करते हैं, अपने ही ब्लाग पर ऐनान नाम से प्रगट होकर सामने वाले का डिमोरलाईज करते हैं। दूसरे जिन ब्लाग पर यह संभव नहीं हो वहां बात का सीधा जवाब देने के बजाय ये भले बनकर व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं और खुद ही रोने लगते हैं देखो मेरे साथ ऐसा हो रहा है। चतुर चोर वाली मानसिकता से ये रात को चोरी करते हैं और सुबह पुलिस के साथ घटनास्थल पर बने रहते हैं और चोरियों की शिकायत करते हैं ताकि इनपर कोई शक न करे। इसलिये चोखेर बाली को संतुलित रहने के साथ-साथ माडरेटर भी ऑन रखना चाहिये।

बलात्कार की समस्या पर विचार-विमर्श करते हुये इसके प्रकार और पृष्ठभूमियों पर चर्चा की जानी चाहिये। मैं कुछ जो इसके प्रकार देखता हुँ वे इस प्रकार हैं-
1. एक तरफा प्रेम में आक्रामता
2. प्यार में धोखा खाने पर आक्रामकता
3. मनचले रईशजादों द्वारा जो पसंद आ गया वह चाहिये ही चाहिये की जिद में
4. बदला चुकाने के लिये (इसकी पृष्ठभूमि में लैंकिग मानसिकता है)
5. अपमानित करने के लिये (इसकी पृष्ठभूमि में लैंकिग मानसिकता है)
6.अत्यन्त भोगवादी अपराधी प्रवृत्ति के लोगों द्वारा कुछ नवीन करने की वासना से
7. रिश्वत में अस्मत के रूप में
8. भावात्मक शोषण के द्वारा
9. किसी महत्वाकांक्षी लड़की/औरत के साथ लोभ प्रदान करके
10. मानसिक अनुकूलन करके
11. कम उम्र के बच्चों के साथ उजागर नहीं होने एवं लम्बे समय तक उपभोग की उम्मीद के साथ
12. मनचलों द्वारा कीर्तिमान स्थापित करने लिये (लैंगिक मानसिकता, औरत को भोग की वस्तु मानने की मानसिकता)
13. एकान्त का लाभ उठाकर
14. प्रभावशाली लोगों द्वारा अधिकार के रूप में (जबान खोलने पर मार देने की धमकी तक)
15. अत्यन्त कामुकता में विवेकहीन होकर (जैसे पिता द्वारा पुत्री के साथ)
16. अपराधी प्रवृत्ति के लोगों द्वारा अवस्कों को उकसाकर अपना मनोरंजन करने के लिये
17. स्त्री द्वारा जानबूझकर यौनसुख प्रदान करने का भरोसा देने लायक वातावरण बनाना और अपनी हरकतों से आश्वस्त करते रहकर भावात्मक शोषण करते रहना एवं बाद में अपना रुख एकाएक पलट लेना, इससे आक्रामक होकर बलात्कार

जहाँ तक बात लैंगिक भेद की है तो यह बलात्कार की घटना में हमेशा तो नहीं होता लेकिन घटना के बाद जो स्त्री को परिवार और समाज में भोगना पड़ता है वह अवश्य ही और पूर्णतः लैंगिक मानसिकता के चलते होता है। छेड़छाड़ और ह्रासमैंट के मामले तो पूर्णतः लैंगिक मानसिकता की देन ही होते हैं।

जहाँ तक मेल कन्डीडेट के साथ बलात्कार की बात है तो यह नगण्य घटनायें होती हैं जो अवसर (एकांत) भुनाने की मानसिकता, यौनसुख की प्राप्ति और यौन अतृप्ति के कारणों से किया जाता है।

यदि इस समस्या पर गंभीरता से विचार करना है तो कुछ इस तरह खाना बनाकर करें।

धन्यवाद, ब्लाग से अलविदा

प्रीतीश

प्रीतीश बारहठ said...

Sorry

खाना नहीं "खाका"

Anonymous said...

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