Friday, October 16, 2009

लक्ष्मी जी को अब विश्राम करने दें
राजकिशोर


बहुत पहले नीरद सी. चौधरी की एक किताब – पैसेज टू इंग्लैंड - पढ़ी थी जिसमें उन्होंने इंग्लैंड की अपनी यात्रा के संस्मरण लिखे थे। उसका एक प्रसंग जब-तब मेरे जेहन को झकझोरता रहता है। चौधरी ने लिखा था कि वे जिस-जिस अंग्रेज के घर गए, उन्होंने यह खोजने की कोशिश की कि वे धन की किस देवी की पूजा करते हैं। लेकिन कहीं भी – कोने-अंतरे में भी – धन की किसी देवी की मूर्ति उन्हें दिखाई नहीं दी। नीरद बाबू आस्तिक थे या नास्तिक, यह मुझे नहीं मालूम। मुझे यकीन है कि अपनी इस खोज – या, खोज की विफलता – से वे भारतवासियों की लक्ष्मी पूजा की आलोचना करना जरूर चाह रहे थे। भारत को अध्यात्म – प्रधान देश माना जाता रहा है। आज भी बहुत-से लोग यह दावा करके प्रसन्न होते हैं। वास्तविकता यह है कि उत्तर भारत के हर घर में अन्य किसी देवी-देवता की मूर्ति रखी हो या नहीं, लक्ष्मी या लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति जरूर दिखाई पड़ जाती है। दीपावली तो लक्ष्मी पूजन का त्यौहार है ही।

उत्तर भारत के लोग बड़ी गंभीरता से लक्ष्मी पूजन करते हैं, पर अभी तक तो उत्तर भारतीयों को लक्ष्मी का प्रसाद मिला नहीं है। आर्थिक प्रगति की दौड़ में उत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से काफी पिछड़ गया है। इसके आसार दिखाई नहीं देते कि वह तेज रफ्तार से दौड़ कर वर्तमान गैप को पांच-दस साल में पूरा कर लेगा। उत्तर भारत के गरीब और विकल्पहीन लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं और समय-समय पर अपमानित होते रहते हैं। ये सभी पुश्तैनी लक्ष्मी पूजक हैं। पर लक्ष्मी जी आंख उठा कर भी अपने इन उपासकों के दीन-हीन चेहरों को नहीं देखतीं। वक्त आ गया है कि समृद्धि पाने के लिए हम किसी खास देवी पर आश्रित न रहें तथा अन्य दिशाओं में सोचें।

तो क्या धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी की प्रामाणिकता में शक करने का समय आ गया है 9 कहीं ऐसा तो नहीं है कि वे वह नहीं हैं जो हम उन्हें समझते हैं 9 या, हमें लक्ष्मी की पूजा करना ही नहीं आता 9 यहां मैं आस्तिकता बनाम नास्तिकता का प्रश्न उठाना नहीं चाहता। लेकिन यह तो कोई भी देख सकता है कि जब स्वयं ईश्वर ही संदेह और अविश्वास के घेरे में है, तो उसके मातहत छोटे-बड़े देवी-देवताओं की क्या बिसात। अगर ईश्वर में आपकी आस्था है, तब भी आपके लिए देवी-देवताओं में यकीन करना या उनकी मूर्तियों की पूजा करना आवश्यक नहीं है। दयानंद सरस्वती, जिनका निधन दीपावली की शाम को हुआ था, परम आस्तिक थे, पर मूर्ति पूजा की व्यर्थता पर जोर देनेवालों में अग्रणी थे। इसलिए देवी लक्ष्मी को विदा करने और यह कबूल न हो तो उन्हें विश्राम देने का प्रस्ताव आस्तिकता के लोकप्रिय दायरे में भी किया जा सकता है।

यह आपत्ति विचारणीय है कि हम अपनी मूल सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ समझौता कैसे कर सकते हैं 9 अपनी सांस्कृतिक विरासत को इतिहास की नदी में विसर्जित करने के बाद हम अपने को किस हक से भारतीय कह सकेंगे 9 पहली बात तो यह है कि देवी-देवताओं को मानना या न मानते हुए भी उनकी पूजा करना भारतीय संस्कृति का अनिवार्य अंग नहीं है। बहुत-से भारतीय, जैसे जैन और बौद्ध, देवी-देवताओं को माने बिना भी धर्म की साधना करते रहते हैं। मेरा खयाल है, आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन के समर्थकों को भी मूर्ति पूजक होने में असुविधा महसूस होती होगी। फिर दोहरी जिंदगी क्यों जिएं 9 दूसरी बात यह है कि दीपावली मुख्यतः उत्तर भारत का पर्व है। भारत के सभी अंचलों के लोग इस दिन त्यौहार नहीं मनाते, न ही लक्ष्मी पूजन करते हैं। इसलिए यह दावा करना ठीक नहीं कि लक्ष्मी पूजन का सिलसिला रुक गया, तो भारतीयता का क्या होगा 9

भारतीयता या हिन्दू धर्म की सच्ची चिंता उनके सभी प्रचलित रूपों को बनाए रखने की चिंता का पर्याय बना देने से यह संभावना ज्यादा है कि उनके जो रूप जड़ या अर्थहीन हो चुके हैं उन्हें भी ढोते रहा जाए और नए रूपों को विकसित न होने दिया जाए। संस्कृति हमारी चेतना का घर है। घर की तरह ही संस्कृति में भी नियमित रूप से झाड़ू-बुहारी होनी चाहिए। अगर जाति प्रथा या कन्या दान या दहेज या जनेऊ हिन्दू धर्म की अनिवार्य पहचान नहीं रहे, तो हम उसी तर्क से सत्यनारायण की कथा, लक्ष्मी पूजन आदि से भी मुक्त हो सकते हैं। इस समय लक्ष्मी के बजाय सरस्वती की पूजा का प्रचार-प्रसार करना आवश्यक है। सरस्वती की आराधना करने से सत्य ही नहीं, समृद्धि भी मिलेगी। हां, इन दिनों सरस्वती के नकली साधक ही समाज और बाजार पर हावी हैं। सरस्वती के असली साधकों का एक जरूरी कर्तव्य इन्हें अपदस्थ करना भी होगा। 000

8 comments:

अजय कुमार said...

lakshmi poojan , dhan ki mahatta ya dhan ke prati kritagyata ka soochak hai . shayad.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

लक्ष्मी जी को अब विश्राम करने दें:

जी सर, सही कहा आपने कि लक्ष्मी जी को अब विश्राम करने दें, मुझे तो सुबह-सुबह एक मित्र ने दुआ दी कि लक्ष्मी जी आपके घर आये और उन्हें गठिया हो जाए,. ताकि वो जा न सके !

आपको दीपावली मुबारक !

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आप सभी को दीपावली की शुभकामनायें !!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
और साथ में एक क्षणिकाएं -( दिवाली में साम्य )

सुशीला पुरी said...

सरस्वती के असली साधक कौन हैं ये कौन तय करेगा ? दीप -पर्व पर लक्ष्मी के पूजन के मूल में, भावना की प्रधानता होती है कि
हम समृधि को सच्चे तरीके से हासिल करे किन्तु त्रासदी यह है कि उसे भ्रष्ट तरीके से पाने की कोशिश होती है, दीवाली के दीप
हमेशा से ये कहते आये हैं की ---जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना ,अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए .

शरद कोकास said...

सही तो यह है कि हमे सरस्वती के मिथक से भी मुक्त होना पडेगा । एक बार मैने कह दिया था कि सरस्वती पुत्र हो जाने भर से ही अच्छी कविता लिखना नही आ जाता , तो बिना इसका आशय समझे एक सरस्वती पुत्र ने बवाल खड़ा कर दिया था । ऐसे ही लोगों ने यह फैला रखा है कि जहाँ सरस्वती वास करती है वहाँ लक्ष्मी नही होती । वास्तविकता सब जानते हैं । अत: इस वाद से ही हम मुक्त हो तभी कुछ रचनात्मक कार्य हो सकते हैं ।

Asha Joglekar said...

लक्ष्मी का पूजन अर्थात परिश्रम से धन कमाना और सरस्वती का पूजन मतलब अभ्यास से ज्ञानवान होना ।
पर हम तो मूर्तीपूजा के आगे सही मतलब भूल गये हैं ।

Arshia Ali said...

गिरिराज जी ने बहुत गम्भीर बात कही है।
( Treasurer-S. T. )

ज्योति सिंह said...

ye baat maine bhi suni hai ki saraswati w laxmi ji ek saath vaas nahi karati magar bina gyan ke dhan kamana bhi muskil hai ,tabhi hum bachcho ko padhne ke liye jod dete hai ,ye virohabhas hai ya apvaad ye samjhana zara muskil hai magar dikhta kuchh aur hi hai .aesi charcha kuchh had tak duvidhaye door to karati hai .isliye gyan se jude rahana jaroori bhi hai ,aana achchha laga ,umda .

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