Monday, November 23, 2009

इन महिलाओं को भी जानतीं हैं नारीवादी महिलायें?


स्त्री-चेतना के विकास के लिए आज स्त्री-विमर्श को प्रमुख माना जा रहा है। स्त्री-विमर्श क्या है और भारतीय संदर्भों में इसकी क्या उपयोगिता, क्या आवश्यकता है इसे समझने की आवश्यकता है। स्त्री-विमर्श को संदर्भित रूप में देखा जाये तो यह पश्चिम से आयातित शब्द है जिसने वहाँ की महिलाओं को स्वतन्त्रता प्रदान की। पश्चिम में एक समय वह भी आया जबकि स्त्री-विमर्श से जुड़े कई लोगों ने अपने आपको नारीवादी आन्दोलन से बापस कर लिया।
भारतीय संदर्भों में जब भी स्त्री-विमर्श की चर्चा की जाती है तो वह तुलसीदास से शुरू होकर आज की किसी प्रमुख हस्ती के साथ समाप्त हो जाती है। जो नारीवादी स्त्रियाँ अपने आपको स्त्री-विमर्श का पुरोधा मानतीं हैं वे बात-बात पर महिलाओं को रोके जाने के उदाहरण दिया करतीं हैं।
यहाँ यह बताना ज्यादा दिलचस्प होगा कि यदि कोई महिला विकास नहीं कर पाती है तो उसके पीछे पुरुष की भेदभाव भरी नीति काम करती है और यदि किसी महिला ने विकास कर लिया तो यह उसकी अपनी प्रेरणा, अपनी चेतना, अपना संघर्ष कहा जायेगा। कुछ भी हो महिलाओं ने हमारे देश में प्राचीन काल से ही सम्मानजनक दर्जा पाया है, उनके काम भी अविस्मरणीय रहे हैं।
आज की पोस्ट के द्वारा हम कुछ नाम आपके सामने रख रहे है, कृपया बतायें कि ये कौन हैं? इनका नाम किस क्षेत्र में उल्लेखनीय है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरुष मानसिकता के कारण ये हमेशा हाशिये पर रहीं और स्वयं महिलाओं ने भी इनके बारे में जानने का प्रयास नहीं किया?
आग्रह विशेष रूप से स्त्री-विमर्श की पुरोधा महिलाओं से, जो बात-बात पर झंडा लेकर पुरुष समाज के विरुद्ध निकल पड़तीं हैं कि कहीं इन महिलाओं को आप लोगों ने भी तो विस्मृत नहीं कर दिया है?
इन महिलाओं के नाम इस प्रकार हैं--

1) हंसा मेंहता
2) राजकुमारी अमृत कौर
3) सरोजनी नायडू
4) अम्मू स्वामीनाथन
5) दुर्गाबाई देशमुख
6) सुचेता कृपलानी
7) रेणुका रे
8) लीला रे
9) पूर्णिमा बैनर्जी
10) कमला चैधरी
11) मालती चैधरी
12) दक्षयानी वेलायुदान

---------------------
आपकी सुविधा के लिए बता दें कि ये नाम स्वतन्त्रता के समय के हैं। हो सकता है कि आधुनिक ललनाओं ने इनके नाम भी न सुन रखे हों? आखिर उनकी आदर्श महिलाओं में ये नाम नहीं फिल्मी ग्लैमर गल्र्स के नाम होंगे?
---------------------
चलिए खोजिए इनका योगदान, हम तो 25 तारीख को बता ही देंगे।

22 comments:

Pratibha Katiyar said...

लीजिये एक और इम्तिहान पास करिये...मैं इस पोस्ट का विरोध करती हूं. खासकर इसमें जिस तरह नारीवादी शब्द का यूज हुआ है.

निर्मला कपिला said...

आप उन औरतों का भी जिक्र करें जो समाज मे प्रताडित और हर रोज़ मर मर कर जी रही हैं अगर सच देखना है तो इधर किसी गाँव मे आयें तो आपको पता चलेगा कि किस दास्ता भरी जिन्दगी वो जी रही हैं ये संख्या तो आटे मे नमक की तरह भी नहीं है अपनी सभ्यता संस्कृ्ति मे रहने वाली महिलायें सब से अधिक पीडित हैं और घर से ले कर स्कूलों तक उनका शोशण हो रहा है आज किसी स्कूल को ही ले लें क्या हो रहा है छोटी -2 बच्चियों के साथ क्या वो कल को वगावत नहीं करेंगी तो क्या करेंगी। कहीं से वगावत की चिन्गारी यौऔँ ही नहीं ऊहा करती। मगर आप पुरुष हैं इस लिये नहीं समझेंगे कि शादी शुदा औरत को भी कई बार बलात्कार जैसी स्थिति से गुजरना पडता है। वो चुप रहती हैं तो केवल घर को बान्धे रखने के लिये और भी बहुत कुछ है जिस के लिये आप खुला संवाद कर सकते हैं उन से जो अपनी संस्कृ्ति और सभयता मे विश्वास करती हैं और नारी मर्यादा मे भी। आपका आलेख एक पक्षा है हम नरी वादी सोच के लिये किसी एक बिन्दू पर तो असहम्त हो सकते हैं मगर बिलकुल इसे नकार नहीं सकते। धन्यवाद। यूँ तो सीता के साथ भा अन्याय हुया था क्या कसूए था उसका जो उसे त्यागना पडा क्या इसे आप पुरुश का अत्याचार नेहीं कहेंगे? राम ने भी रावण ने भी ।बाकी फिर धन्यवाद्

स्वप्नदर्शी said...

In sabke naam sune hai, aur ye sabhee streeyaan, rajkumariyaan aur kisee na kisee tarah usee haisyat ke sambandh rakhatee thee.

Inkaa apanaa yogdaan hai.

aaj kee list bhee jod de

1. Sonia Gandhi
2. pratibha Patil
3. Mayavati
4. jaylaitha
5. mamtaa Banerjee.......

bahut lambee list hai, shayad hazaar-10 hazaar se upper.

par desh kee so karoD aabaadee me agar sansadhano ke batvaare me gender ke hisaab se bharat agar pakistaan aur iraan ke aas-paas khaDaa hai to kya kahenge?

rashmi ravija said...
This comment has been removed by the author.
rashmi ravija said...

यह तो एक इम्तिहान की तरह है....पर हमसे ऐसी परीक्षा देने की अपेक्षा ही क्यूँ की जाती है...हमें क्या, कुछ साबित करना है और क्यूँ??....सरोजनी नायडू, को हाशिये पर कहना तो उनके अपमान जैसा है....शायद चौथी क्लास का कोई छात्र भी बता देगा ,उनकी कवितायें टेक्स्टबुक का हिस्सा हैं.
आज गूगल पर सर्च करके यह इम्तिहान पास करना कोई मुश्किल नहीं...25 तक के इंतज़ार की जरूरत नहीं ...पर हमें क्यूँ साबित करना है??...हम आसपास ही रोज ऐसे उदाहरण देखते हैं जो झंडा लेकर नहीं चलती पर रोज किस जद्दोजहद से अपने अस्तित्व की लड़ाई लडती हैं.उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया इसलिए उनकी रोज की अग्निपरीक्षा कहीं से कमतर नहीं है.
बता दूँ...मेरी बाई के दो बेटे और एक बेटी है...दोनों बेटे फेल हो गए जबकि उनके लिए ट्यूशन भी रखा था.लड़की घर का खाना बनाकर,पानी भरकर ,कपड़े धोकर भी पास हो गयी....यह सब उसने अपने बलबूते पर किया...
"हो सकता है कि आधुनिक ललनाओं ने इनके नाम भी न सुन रखे हों? आखिर उनकी आदर्श महिलाओं में ये नाम नहीं फिल्मी ग्लैमर गल्र्स के नाम होंगे?"...yah baat to itni ochhi hai ki ispar comment karne ka bhi man nahi...its sad...very very sad...to pass such comments on women folk

Unknown said...

बेहतर होता सेन्गर साहब इसे अपने निजी ब्लोग पे लगाते और खुली बहस वहा होती. आपकी चुनौती इस लिये फ़िस्स हो गयी है क्योकि आप तकनीक के लोगो के बीच प्रश्न उछाल कर चले गये है.१५ मिन मे कोइ भी इन १० महिलओ का जीवन परिचय यहा चस्पा कर देगा. थोडी मेहनत करेगा तो अपनी भाशा मे उसे लिख देगा. चोखेरबाली ब्लोग पर आप चोखेरबाला ना बने.

Unknown said...

Nariwadi Mahilaon ki jankari ko leker presumption pale huye hn aur kafi judgemental hn Kumarendra sahab-"aapki jankari ke.....filmi glamer girls k nam honge"
Asal me NARIWADI VIMARSH se kafi khar khaye huye hn aap."Nariwadi Vimarsh kya h....ise samajhne ki aavshyakta h",Kumar sahab aapki post ko padkr laga ki abhi khud aapko is vishay me samajh badhani hogi.Pashchim se keval shabd aayatit h 'Chetna' nahi.mujhe lagta h aapko abhi poora paridrashya dekhne ki zarurat h.

आर. अनुराधा said...

1. मेरी भी एक फेहरिस्त है साथियो- बारबरा मैकलिंटॉक, एलिजाबेथ ब्लैकबर्न, कैरोल ग्रेइडर, मैरी क्लोदोव्स्का क्यूरी, लिसे मेटनर,एमी नोथर, गेरटी कोरी, मारिया मायर, डोरोथी हॉडकिन, रीटा लेवी, आयरीन क्यूरी.....

हा हा हा हा!!
(वैसे इस फेहरिस्त में बेबी हलदार को भी शामिल किया जा सकता है।)

2. कुमारेंद्र सेंगर की इस वाहियात पोस्ट का मतलब समझ में नहीं आया। लगता है उन्होंने भी इन नामों से नया-नया परिचय पाया है इसलिए, अपने को 'साबित' करने की जल्दबाजी भरी कोशिश में यह पोस्ट लगा दी। कोई उपयुक्त मज़ाहिया ब्लॉग इसके लिए खोजा होता तो बेहतर था।
3. वैसे, अगर कोई कलाकार है, और अगर उसे पढ़ना नहीं आता या पढ़ना आता हो तो भी वह पढ़ता नहीं या पढ़ना चाहता नहीं, और वह नहीं जानता कि आधुनिक कला के क्या नए प्रतिमान हैं तो क्या वह कलाकार नहीं रह जाता? अगर कोई महिला अगर इस या उस सूची की महिलाओं को नहीं जानती तो क्या उसे अपने हक के, अपने विचारों के बारे में कहने का हक नहीं रह जाता?

4. और जनाब सेंगर ने इस पोस्ट के जरिए अपनी 'मर्दवादी मानसिकता' (कहना नहीं चाहती थी, पर यही सच है) उजागर कर दी। क्या यही या ऐसी कोई और लिस्ट आप पुरुषों के सामने भी रखेंगे? और जिन्हें जवाब नहीं आता होगा उन्हें आप किसी विमर्ष में शामिल होने के काबिल नहीं मानेंगे? अज्ञान के अहंकार की कोई सीमा नहीं होती। जो कम जानता है, वह अज्ञानी से भी ज्यादा खतरनाक है।

शोभना चौरे said...

aur ak preeksha ?kisne diya ye adhikar ?

अफ़लातून said...

नीलिमा को इस साल गिरह पर हार्दिक मुबारकबाद ।
टिप्पणी लम्बी है, यहां छप नहीं रही।इसलिए अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ।

Kavita Vachaknavee said...

इस लेख का लहजा इतना वाहियात है कि मानो - हट, हट.... तुम क्या हो, ....... तुम ! पैर की जूती !!
केवल मर्दों के पैर की ही नहीं, उन स्त्रियों के भी, जिनको मैं कुछ भाव देता हूँ|

स्वप्नदर्शी said...

@ Dear Aflatoonji,

I agree that my comment was very reactionary and almost came out of anger. I value your perspective. But my point was not to undervalue these women, but the attitude that the failure to share social space and gender inequalities is contributed by inbuilt or accepted incapability/desires of women.
Most of the time, people use these examples, that if you are capable, you will survive and shine like a bright star, without looking at the social context. In similar distorted manner people also coat Darwin and almost most educated people here and there say”survival of the fittest”

which is stupidity when you apply it to the social competition. people forget that Darwin refers to the changes and adaptability over millions of years and the process of change in genes and environment.

I could have written about all of these women, but the intent of using these examples makes me mad to some extent. I will look forward to your articles. Also it may be a good idea to ask why even after 60 years of independence, the social presence and ownership of property and resources reflect such a discrimination? if everything is goody-goody in our society and some stupid feminists keep quarreling on notworthy issue.

ambrish kumar said...

mansa aur maksad bhi saaf kar de to jyada behatar ho .

विनीत कुमार said...

सेंगर साहब की इस पोस्ट पर मुझे एक विज्ञापन याद आ रहा है-मथुज गोल्ड का। उसमें एक बंदा कहता है- लोन लेने आए हैं,कोई एमए करने नहीं आए हैं। अब मैं कहता हूं- ब्लॉगिंग करने आए हैं,कोई एम.ए करने नहीं आए है।
पिछले दिनों राष्ट्रपति निवास,शिमला में स्त्री-विमर्श पर चली बहस में रोहिणी अग्रवाल ने भी अपने पर्चे में भारतीय और पाश्चाच्य के सवाल के बीच स्त्री-विमर्श को देखने-समझने की कोशिश की। मैंने उस समय उनसे यही सवाल किया कि स्त्री-विमर्श का सवाल सिर्फ अवधारणा से जुड़ा हुआ नहीं है,ये मुक्ति का सवाल है। इसलिए इस बात से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता कि ये कहां से आया? मुक्ति का पाठ चाहे कहीं का भी हो,उसे पढ़ा जाना चाहिए।
सेंगर साहब आप जिस सूची को हमारे सामने रखकर स्मार्ट होने के नमूने पेश करना चाह रहे हैं,उससे साफ हो जाता है कि आप कितने अक्लमंद किस्म के पुरुष हैं?
एक लिस्ट मैं भी जारी करुं और पूछूं कि इनमें से आप कितनों को जनते हैं तो आप उसे किस रुप में लेगें? ब्लॉगिंग को अगर आप सचमुच में टाइम पास की चीज समझ रहे हैं तो बेहतर हो कि इसके लिए अलग से कोई ब्लॉग बना लें। लेकिन चोखेरबाली जैसे कम्युनिटी ब्लॉग पर इस तरह की अनर्गल बातें लिखकर हमारा टाइम खोटा न किया करें। पोस्ट पढ़ने में टाइम लगता है,जबाब देने में टाइम लगता है। अबकी बार तो जबाब दे दिया लेकिन आगे से बाकी सदस्यों से अपील करुंगा कि इस तरह की पोस्टों का सामूहिक बहिष्कार करें। आप स्त्री-विमर्श के स्वर को मजबूत नहीं कर सकते,मत कीजिए। लेकिन उसी की जमीन पर खड़े होकर उसी के खिलाफ अनर्गल बातें करें,ये हमें बर्दाश्त नहीं।
असहमति अलग बात है लेकिन असहमति के नाम पर बाहियात किस्म की बातें करना अलग बात है। इस मंच के दुरुपयोग किए जाने पर आपको सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिए।

KK Mishra of Manhan said...

क्यों भाई सेंगर क्या गलत लिख दिया उन्हों ने तो बड़ी दूर की बात की, उन महिलाओं की जिन्होने उस दौर में तहे दिल से अन्दोलनों को गले लगाया, स्तरीय किताबें लिखी, अब तो सब दिखावटी है अपवाद छॊड़कर, पुरूषॊ की तो दशा और खराब है।

Anonymous said...

क्यों भाई सेंगर क्या गलत लिख दिया उन्हों ने तो बड़ी दूर की बात की, उन महिलाओं की जिन्होने उस दौर में तहे दिल से अन्दोलनों को गले लगाया, स्तरीय किताबें लिखी, अब तो सब दिखावटी है अपवाद छॊड़कर, पुरूषॊ की तो दशा और खराब है।

Neelima said...

सेंगर जी की विवादित पोस्ट तो अधूरी है ! उनसे अपील है कि वे नारीवादी आंदोलन और नारीवारी स्त्रियों की अन्य न्यूनताओं और खामियों का उल्लेख करते जिनकी वजह से स्त्री मुक्ति की आकांक्षा की वैलिडिटी को खारिज किया जाए ! आपसे आग्रह है मृणाल पांडे का चर्चित लेख ' मित्र से संलाप पढ लें ! शायद आपको अपने भीतर झांकने की कोई दृष्टि मिल जाए !


( वैसे आपकी सहायता के लिए ) पुरुषों द्वारा नारीवादी स्त्रियों पर लगाए गए आरोपों की फेहरिस्त दे रही हूं !

नारीवादी स्त्रियों में आपसी एकता और परस्पर एकता की भावना नहीं होती !
औरत ही औरत की दुश्मन होती है !

सारी फेमेनिस्ट औरतें तर्क विमुख होती हैं !

फेमेनिज़्म एक पश्चिमी दर्शन है ! कोकाकोला की तरह झागदार और लुभावना आयात भर है!

नारी संगठन बस नारेबाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं !गावों में इनकी कोई रुचि नहीं !

मध्यवर्गीय कामकाजी औरतें घर से बाहर कामकाज के लिए नहीं मटरगश्ती के लिए निकलती हैं !

पारिवारिक शोषण की शिकायत करने वाली स्त्रियां ऎडजस्ट करना नहीं जानती !

{

Anonymous said...

dr sanger abhi wahii tak haen jitnae naam unhonae ginae haen aaj sae das saal baad jab wo post likhaegae to usmae neelima , sujata , rachna , swapandarshi , anuradha , pratibha aur bhi kayee naam hogae jinkae vishay mae wo aap nayee peedhi ki naariyon sae puchhae gae ki inkae baarey mae jaatee haen kyaa

its is a stupid post not worth commenting but i really enjoyed the way woman readers asked "him right to test them " wow that is what woman needs to do to stand up and speak and QUESTION THE AUTHORITY OF MAN TO QUESTION THEM

KK Mishra of Manhan said...

नीलिमा जी ने बिल्कुल ठीक कहा, पर कुछ भाई लोग महिलाओं की तरफ़दारी की बात इस लिये कर रहे है यहां क्योंकि वल लल्लूलाल हैं और लार टपकाते घूमां करते हैं ब्लाग्स पर या फ़िर किसी महिला से कभी आदर से कभी बात नही की सोच रहे है ब्लाग पर ही सही किसी फ़ेमनिस्ट की वाह-वाही लूट ले

अरे भाई महिला कोई अलग प्रजाति है क्य जो हल्ला मचाये हो वह तो समाज़ के आधे हिस्से की मालिक है और पुरूष या स्त्री को एक दूसरे से अलग कर समाज़ की कल्पना नही की जा सकती फ़िर क्यो आंदोलन चलाकर इन दोनो को अलग प्रजाति बनाने पर जुटे हो

KK Mishra of Manhan said...

निक्कमें ब्लागेर्स जिन्होने जीवन में कुछ भी बेहतर नही किया और न ही सम्मान पाया किसी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दरवाजे नही गये वहां कुछ कहना तो दूर छपने की बात क्या कहें जिन्होने कभी पेड़ नही लगाये वह मशीन पर बैठ कर अन्तर्जाल पर पेड़ लगाने की बात करते हैं जिन्होनें नारी के शोषण की बात की या सोची कर नही पाये वह नारी आंदोलनों के सहयोग की बात करते है। जिन्होने हमेशा सर्वहारा को अन्दोलनों में ढ़केल कर उसकी रोजी-रोटी पर ग्रहण लगाया और अखबारों मे खुद सुर्खियों में रहकर वाह-वाही बटोरी और लगातार गरीब के वोट और गोट दोनों का भक्षण कर रहे है उन लोगो से यहां क्या उम्मीद, लिखे रहो भैया नीला घोड़ा आप का है और विदेशियों ने आप को साइबर पर जगह दे दी है लिखो……लिखो मगर शर्म मत खाना……

KK Mishra of Manhan said...

जब किसी गरीब महिला का शारिरिक शोषण होता है तो यही फ़ेमनिस्ट उनकी इज्जत को अखबारों और टेलीविजन पर ज़ार ज़ार करने पहुच जाती है कुछ बड़ी नेताओं ने इज़्ज़त के बदले रुपये की आमद कर दी है सरकारी व्यव्स्था में, किसी महिला या पुरूष दोनो की इज्जत का बदला क्या चुकाया जा सकता है, देखिये फ़ेम्निस्ट वगैरह का चक्कर छोड़िए और महिला-पुरूष दोनो जब मिलकर ये संघर्ष, संस्कार में तब्डील कर लेगे, एक दूसरे की लड़ाई के तौर पर तभी कुछ संभव है, संसार में विषम हालातों को छोड़ दिया जाय तो सम्मान (इज्जत) हमेशा धन से सर्वोपरि हैं अगर देखना है तो किसी गरीब से आज दो मेठे बोल कर मेरी बात का इम्तिहान ले लीजिए और यहां गरीब महिला या पुरूष की अलाहिदा बात नही कर रहा हू मै मनुष्य यानी होमोसैपियन्स की बात कर रहा हूं

रेखा श्रीवास्तव said...

पोस्ट पर नजर जरा देर से पड़ी, सेंगर जी , नारीवादी कोई संप्रदाय नहीं है, जो नारी है वह उसकी हिमायती है, ऐसा आलेख जो किसी के अस्तित्व या फिर उसके सम्मान से जुड़ा हो , एक न्यायप्रिय व्यक्ति चाहे स्त्री हो या पुरुष सहन नहीं करेगा. सो भविष्य में अग्नि परीक्षा की कोशिश नकरें.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...