Friday, November 27, 2009

ईडियट की स्पेलिंग भी जानती है ?

यूँ तो जितने कमेंट्स सेंगर जी की पिछली पोस्ट पर आए और अफलातून जी की पोस्ट पर आए उन्हे पढ लेने के बाद कुछ कहने की ज़रूरत रह नही जाती। चोखेरबाली की वर्षगाँठ के अवसर पर जब मधु किश्वर ने कहा कि पुरुषों को भी साथ लीजिए इसे जनाना डब्बा मत बनाइए तो राजकिशोर जी की कही यह बात याद आती है कि - आप पुरुषों को शामिल कीजिए , पर अभी उनपर विश्वास मत कीजिए!और यह मै आपके कान मे कहना चाहता हूँ , वे सुनेंगे तो मुझे छोड़ेंगे नही , हालाँकि यही सच है।
नही जानती कि इनमे से कौन बात पूरी तरह अमल मे लानी होगी, पर ये दो बातें विरोधी नही हैं !
खैर , मै एक उदाहरण से बात शुरु करती हूँ ।
बचपन मे सहेलियों के बीच यह खूब होता था कि लड़ाई-भिड़ाई में एक दूसरे को ईडियट या शट अप कह दिया तो भुनी हुई दूसरी सहेली झट कहती थी -हुँह ! ईडियट की स्पेलिंग भी जानती है ?
गोल गोल घुमाऊंगी नही बात को। चोखेरबाली स्त्री मुक्ति की झण्डा बरदारों की राजनीतिक पार्टी नही है। जिस राजनीतिक विचरधारा पर पार्टी चलाते हो उसके पुरोधाओं की पुस्तक भी पढी है या पूंजी के दास हो केवल ?
अब तक ऐसी स्त्रीवादी पार्टी नही बनी है सो यह सवाल नही उठता है ।बार बार यह बताने की ज़रूरतनही कि देखो , मै पहली महिला जिसने फलाँ फलाँ किया उसे जानती हूँ , भीखाई जी कामा हंसा मेंहता,राजकुमारी अमृत कौर,सरोजनी नायडू,अम्मू स्वामीनाथन, दुर्गाबाई देशमुख
सुचेता कृपलानी
के बारे मे पढा है मैने या वर्जीनिया वूल्फ ,उमा चक्रवर्ती , निवेदिता मेनन को पढा है ....इससे मुझे हक है कि मै अपने मन की बात लिखूँ !
जिन नारीवादियों का आह्वान किया गया है वे इस ब्लॉग पर कहीं नही हैं और जहाँ कहीं भी वे हैं ...वहाँ भी उनसे यह पूछना नारीवाद को सरासर न समझना ही माना जाएगा।

इस प्रकार तो आप न सिर्फ़ सामयिक नारीवादी लेखिकाओं - कार्यकर्ताओं के प्रति विद्वेषपूर्ण दिखते हैं अपितु इन महान स्त्रीवादी सामाजिक परिवर्तन की पुरोधाओं के प्रति भी अपमानजनक प्रतीत होते हैं। चूंकि मौजूदा पीढ़ी में इनकी बाबत सूचना न होने के पीछे भी पुरुष सत्ता्त्मक समाज का योगदान कहा जा सकता है ।(अफलातून)

यह ठीक उसी प्रकार का आरोप है कि -

नारीवादी स्त्रियों में आपसी एकता और परस्पर एकता की भावना नहीं होती !
औरत ही औरत की दुश्मन होती है !

सारी फेमेनिस्ट औरतें तर्क विमुख होती हैं !

फेमेनिज़्म एक पश्चिमी दर्शन है ! कोकाकोला की तरह झागदार और लुभावना आयात भर है!

नारी संगठन बस नारेबाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं !गावों में इनकी कोई रुचि नहीं !

मध्यवर्गीय कामकाजी औरतें घर से बाहर कामकाज के लिए नहीं मटरगश्ती के लिए निकलती हैं !

पारिवारिक शोषण की शिकायत करने वाली स्त्रियां ऎडजस्ट करना नहीं जानती !(नीलिमा)

और यह निश्चित तौर पर कह जा सकता है कि इस तरह के आरोप पुरुषों द्वारा भयाक्रांत होकर दिए जाते हैं।ठीक वैसे ही जब बचपन मे सहेलियाँ ईडियट सुनकर भुनभुना जाती थीं और कुछ न सूझने पर कहती थीं - तुझे स्पेलिंग भी पता है ईडियट की ?

आप स्त्री-विमर्श के स्वर को मजबूत नहीं कर सकते,मत कीजिए। लेकिन उसी की जमीन पर खड़े होकर उसी के खिलाफ अनर्गल बातें करें,ये हमें बर्दाश्त नहीं। (विनीत)
.
हमें क्या, कुछ साबित करना है और क्यूँ??....सरोजनी नायडू, को हाशिये पर कहना तो उनके अपमान जैसा है....
.हम आसपास ही रोज ऐसे उदाहरण देखते हैं जो झंडा लेकर नहीं चलती पर रोज किस जद्दोजहद से अपने अस्तित्व की लड़ाई लडती हैं.उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया इसलिए उनकी रोज की अग्निपरीक्षा कहीं से कमतर नहीं है.(रश्मि रविजा)

अगर कोई महिला अगर इस या उस सूची की महिलाओं को नहीं जानती तो क्या उसे अपने हक के, अपने विचारों के बारे में कहने का हक नहीं रह जाता? (आर अनुराधा)


स्त्री को अपनी बात कहने के लिए कोई इतिहास , कोई राजनीति , कोई शास्त्र जानने की ज़रूरत नही है ... वह खुद जहाँ है वहाँ जो महसूस करती है जो सोचती है जो कहती है जो लिखती है .....अपनी पीड़ा से या बहनापे या जब अपने मानवीय अधिकारों का दावा करती है , उनके लिए लड़ना चाहती है ,उन्हे छीनना चाहती है, पाना चाहती है उसके लिए कतई ज़रूरी नही कि आप उसे स्त्रीवादी मानें , स्त्रीवादी होने के लिए किसी विशेष योग्यता का प्रमाण पत्र भी माँगें !इससे यह भी सामने आता है कि स्त्री विमर्श को देखने का स्वस्थ नज़रिया ही अभी विकसित नही हो पाया है । और जब तक स्त्री विमर्श के लिए वैकल्पिक सौन्दर्य शास्त्र , बोध विकसित नही होगा तब तक ऐसी परीक्षाएँ रोज़ होंगी , प्रमाण पत्र माँगे जायेंगे ......और हम जानते हैं कि बदलाव के दौर मे हृदय परिवर्तन नही होते बल्कि चक्रवात आते हैं ।जो साथ नही बहते वे उखड़ते हैं !

14 comments:

Anonymous said...

Sujata
Great post
The definition of words needs to be updated
Feminism is one such word .
It needs to be seen in broader prospect in todays context but its still where it was in minds of many

There was time when woman was undeducated and would not reply back or question because of limited knowledge but now its different yet the mind set of many man is still where it was

i have many times said that woman have evolved more in terms of mental evolution in last decade and i still feel the same

rashmi ravija said...

बहुत ही सशक्त आलेख...फेमिनिस्ट,स्त्रीवादी,पश्चिम से प्रभावित...ये सब उपालंभ देकर स्त्रियों को एक वर्ग विशेष में सीमित रखने की कोशिश की जाती है...जबकि समाज के हर वर्ग में मुखर,आत्मविश्वास से परिपूर्ण,गलत का विरोध करने वाली,दूसरी महिलाओं को सहार देने वाली स्त्रियाँ मिल जाएँगी...ये कामवाली,सब्जीवाली,झाड़ू लगनेवाली,स्कूल में पढ़ाने वाली...कोई भी हो सकती हैं....इनलोगों को इन भारीभरकम शब्दों का कोई ज्ञान नहीं..पर ये बदस्तूर अपना काम कर रही हैं...हाँ, विरोध का सामना इन्हें भी करना पड़ता होगा...पर ये अपने स्तर पर उनसे निपटने में भी सक्षम हैं.

अफ़लातून said...

आपके कान में कही बात न सुनने पर भी राजकिशोर को महिला मामले में कहाँ छोड़ते हैं ?

मनोज कुमार said...

सभ्य होने के लिए निर्भय होना नितांत आवश्यक है।
अच्छी रचना। बधाई।

ghughutibasuti said...

सुजाता, बहुत आवश्यक पोस्ट लिखी है। हमें क्या पाने, कहने, करने का अधिकार होना चाहिए यह तय करने का अधिकार हमने किसी को नहीं दिया। यदि कोई पुरुष स्त्री के आत्मसम्मान व अधिकारों के संघर्ष में साथ चलना चाहे तो उसका स्वागत है। यदि रोड़े अटकाना चाहे तो हम उसे रोकने का भरसक प्रयत्न करेंगे। किन्तु कोई हमारे ही कंधे पर बन्दूक रखकर निशाना भी हम पर ही साधे तो यह बिल्कुल सहन नहीं होगा। कमसे कम अपने कंधे पर तो बंदूक रखे।
घुघूती बासूती

Pratibha Katiyar said...

बिलकुल ठीक बात कही सुजाता जी आपने. यह बहुत जरूरी था. समझने की बात यह भी है कि अगर कोई पुरुष नारी विमर्श के साथ है तो यह कोई एहसान नहीं कर रहा है.

शोभना चौरे said...

sujataji
bahut hi achhi post .har yug me nari ne apni prgtivadi soch ko lekar apna vjood kaym rakha hai aur nya kirtiman racha hai aur rachti rhegi .
rasmi rvija ki bat se purnth shmt .

mukti said...

बिल्कुल सही बात लिखी है आपने सुजाता.औरतों को अपनी बात कहने के लिये किसी शास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता नहीं है. जैसे औरतों की ज़िन्दगी का हर पल एक संघर्ष है, उसी तरह उनकी कही हुयी एक-एक बात खुद में एक दस्तावेज है.
और जो भी यह मानता है कि समाज में औरतों के साथ भेदभाव होता है और यह भेद अनुचित है, वही नारीवादी है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष. क्योंकि अब भी समाज का बहुसंख्यक वर्ग यह बात ही नहीं मानता और मानता भी है तो उसे ग़लत नहीं समझता.

स्वप्नदर्शी said...

great!

कविता रावत said...

Aapke lekh mein longon ki bahut saari logon ke padhane ko mili, achha laga. Naari ke bari mein sift itna kahungi ki Naari ho ya purush Dono ka mahatwa apni jagah barabar ka hai, ek ke bina dusare ki kalpana bhi nahi ki ja sakti hai. phir yah baat har koi samjhne mein der kyun karta hai, yah sawal ban kyun baar-baar uthta hai...
Prastuti ke liye Shubhkanayne

सुजाता said...

"आपकी सुविधा के लिए बता दें कि ये नाम स्वतन्त्रता के समय के हैं। हो सकता है कि आधुनिक ललनाओं ने इनके नाम भी न सुन रखे हों? आखिर उनकी आदर्श महिलाओं में ये नाम नहीं फिल्मी ग्लैमर गल्र्स के नाम होंगे?"(सेंगर जी की सन्दर्भ पोस्ट से)
यदि इस प्रकार की पूर्वग्रह ग्रस्त टीका टिप्पणी को छोड़कर सेंगर जी उल्लिखित नामों के विषय मे जो जानकारी देना चाहें तो लिखें। मुझे या अन्य किसी भी सदस्य को खुशी ही होगी।

Unknown said...

bhahoot accha likha hai aapne.meri najro me mahila striwadi nahi hoti.wo khud stri hai isliye apne bare me bolegi hi.purus ko striwadi kah sakte hai,yadi wo striyo ke bare me sakaratmak socta hai.

Anonymous said...

Humse narivadi hone ka pag pag pe parman manga jata hai kya kabhi Senger Sahab se kisi ne sabhya hone ka ya insan hone ka praman manga hai? Jis internet ke madhyam se blogging kar rahe hein, kya us ke nirmataon ka naam bhi jaante hein. Jis coca cola ki jhag ka zikar hua hai use to shauk se hi pete honge.

Making me invisible is a problematic, high jacking my struggle and appropriating it for personal aggrandizement is problematic.



Agar mera narivad mere ghar aur pas pados mein kayam hai to yeh mere simit sadhano aur gharelu zimmedarion ki wajah se hai. Agar mere sarokaron ko kuchh behne rashtriya antarashtriya level pe le jati hein to kya burai hai?

Haan burai hai agar mere haq ki baat mujhe na kahne di jaye ya mere sarokaron ko tod marod kar pesh kiya jaye aur mujhe adrisht kiya jaye.

RAJ SINH said...

सुजाता जी बहुत सुन्दर आलेख !
पढ़ा तो बहुत पहले था पर टिप्पणी न दे सका था . इस बीच बड़े सारे अच्छे व्यक्तव्य आये .
मुक्ति जी से संपूर्णतः सहमत .

दरअसल नारी उत्थान, शसक्तीकरण या विमर्श में अक्सर यह शामिल नहीं हो पाता कि इतिहास के हर मोड़ पर , दुनियां भर में ,हर समाज
में करीब करीब ' पुरुस सत्तात्मक ' व्यवस्था के जडमूल में तथाकथित ' धर्म ' या ' मजहब ' आदि ही रहे हैं और उसकी बनावट और अधिकार पुरुषों के पक्छ में ही रहे हैं . क्यूंकि उन्होंने ही बनाये . समाज तो चलते रहे पर आधी आबादी की गुलामी की कीमत पर .
सब विमर्श जहां पहुँचने चाहिए वह यह है कि सम्पूर्ण समाज की खुशहाली समाज के हर व्यक्ति की खुशहाली पर है. स्त्री ,पुरुष सभी के लिए . और उसका निराकरण परस्पर ' समता , समानता और सम्मान ' से ही संभव है . टकराव से नहीं . पर पारंपरिक हठवादिता अगर ऐसा नहीं होने देने में शामिल की जाती हो तो टकराव भी ' धर्म ' है .

क्यूंकि हर असहमति विरोध नहीं होती ,हर विरोध विद्रोह नहीं होता और हर विद्रोह गलत भी नहीं होता .

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...